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Books - प्रतिकूल परिस्थितियों में भी उद्विग्‍न न हों

Media: TEXT
Language: MARATHI
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कठिनाइयों से डरिये मत !

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कठिनाइयों के दो स्वरूप होते हैं। एक बाह्य परिस्थितियों के रूप में आने वाली कठिनाई और दूसरी आन्तरिक स्वरूप में उपस्थित होने वाली। साधारणतया लोग बाह्य कठिनाइयों की ही जानकारी रखते हैं। आन्तरिक कठिनाइयों को कोई विरला ही समझ पाता है। वस्तुतः अन्तः-बाह्य दोनों के मूल में आन्तरिक कठिनाइयां ही प्रमुख होती हैं। बाह्य कठिनाइयां आन्तरिक कठिनाइयों की छाया मात्र ही होती हैं। अनुकूल परिस्थितियां, साधन, सुविधा मनुष्य के पतन का कारण बनती देखी गई हैं जबकि विपरीत परिस्थितियों में, कठिनाइयों में भी लोगों ने आगे बढ़ कर जीवन में उत्कृष्ट स्थिति प्राप्त की है। कठिनाइयों से भी लाभ उठा कर आगे बढ़ने, जीवन में सफलता प्राप्त करने के लिये मनुष्य के दृष्टिकोण एवं उसके जीवन-क्रम की बुनियाद में सुधार होना आवश्यक है। अपने कर्तव्य-धर्म की जानकारी और उसके प्रति अनन्य निष्ठा पैदा होना सफलता की प्राथमिक शर्त है। कर्तव्य की जानकारी और उसके प्रति निष्ठा से मनुष्य कृतसंकल्प होता है और इससे उसमें असाधारण शक्ति का स्रोत फूट पड़ता है। ऐसी स्थिति में मनुष्य भारी से भारी कठिनाई को भी सहर्ष सहन करता है। कर्तव्य के लिये सर्वस्व लुटा देने को तैयार हो जाता है। हरिश्चन्द्र, पाण्डव, नल, कर्ण, प्रताप, शिवाजी, ईसा, गांधी आदि ने अपने कर्तव्य धर्म की रक्षा के लिये कितने कष्ट सहे यह सभी जानते हैं। कर्तव्य का ध्यान रखने पर व्यक्ति को आन्तरिक शक्ति मिल जाती है जिससे वह मार्ग में आई हुई कठिनाइयों को सहज ही सहन कर लेता है, जिससे उसकी शक्ति, साहस, कार्यक्षमता में दिनों दिन विकास होता जाता है। कर्तव्य में लगा हुआ व्यक्ति बाह्य कठिनाइयों पर क्रमशः विजय प्राप्त करता जाता है तो उसके साथ ही उसकी आन्तरिक कठिनाइयां भी स्वतः ही हल होती चली जाती हैं। कर्तव्य दृष्टि प्राप्त होने के पहले एवं बाद में भी सबसे बड़ी आवश्यकता है सक्रियता की। कर्तव्य को जान कर भी मनुष्य निष्क्रिय रह सकता है। अतः इसके साथ ही आवश्यकता इस बात की है कि मनुष्य सक्रिय बना रहे। अकर्मण्यता की स्थिति में अनेकों ऊल-जलूल विचार आते-जाते रहते हैं और इससे मानसिक शक्तियों का विघटन होने लगता है। शक्तियों का बंटवारा हो जाता है। खाली मन शैतान का घर होता है। मानसिक दुर्बलता से शक्तियों के विघटित हो जाने पर कठिनाइयों से लड़ना और भी कठिन हो जाता है। कठिनाइयों से भागने की मनोवृत्ति कायरता है। इससे कठिनाई घटती नहीं निरन्तर बढ़ती ही जाती है। भागने वाले मनुष्य को चारों ओर से कठिनाइयां घेर लेती हैं। वह कहीं भी भाग कर जाय उनसे छुटकारा नहीं मिलता। कठिनाइयों से भागने वाले की आत्मिक शक्तियां कुण्ठित हो जाती हैं। अतः आवश्यकता इस बात की है कि कठिनाइयों का डट कर मुकाबला किया जाय, उन्हें जीवन में सहर्ष स्वीकार किया जाय, वरण किया जाय। जो कठिनाई का सामना करने का निश्चय कर लेते हैं, उनको कठिनाई का भान ही नहीं होता। कब आई और कब चली गई; इसका ध्यान तक नहीं रहता उन्हें। कठिनाइयों का सामना करने से ही आत्म-शक्तियां जागृत होती हैं, उनका विकास होता है। यही कारण है कि साधन-सुविधा सम्पन्न घरानों में अधिकांश बच्चों का पर्याप्त विकास नहीं होता क्योंकि उनकी आवश्यकतायें सरलता से पूरी हो जाती हैं। उनकी शक्तियों को संघर्ष का स्पर्श नहीं मिलता। दूसरी ओर संसार के अधिकांश महापुरुषों का प्रादुर्भाव कठिनाइयों के बीहड़ वनों में ही हुआ है। कठिनाइयों को उनसे दूर भाग कर, घबरा कर, दूर नहीं किया जा सकता। उनका खुल कर सामना करना ही बचने का सरल रास्ता है। प्रसन्नता के साथ कठिनाइयों का वरण करना उनसे उत्पन्न घबराहट का सर्वोत्तम उपाय है, आन्तरिक, मानसिक शक्तियों के विकसित होने का राजमार्ग है। संसार के अधिकांश महापुरुषों ने कठिनाइयों का स्वागत करके ही जीवन में महानता प्राप्त की है। कठिनाइयों को देखकर मनुष्य जितना रूठता है कठिनाइयां भी उतनी ही रूठ जाती हैं। कहावत है—‘‘रूठे को मनाना और टूटे को बनाना बुद्धिमानी है।’’ रूठा हुआ दुःख समझौता कर लेने पर दूर हो जाता है। एक व्यक्ति को देहाती जीवन छोड़ कर शहर में रहना पड़ा। शहर की गन्दगी, घिचपिच, मकानों की असुविधा आदि से वह परेशान हो गया। वह बड़ा दुःखी था किन्तु करता क्या? आखिर जब उसने इन परिस्थितियों से समझौता कर लिया तो वे शिकायतें फिर न रहीं। प्रसन्नतापूर्वक जीवन बिताने लगा। जो कठिनाइयां दुःख और परेशानी कारण होती हैं वे ही समझौता कर लेने पर सरल बन जाती हैं। जटिल से जटिल समस्याओं के हल करने का सरल उपाय है—उनसे समझौता कर लेना। समझौते का अर्थ यह भी नहीं है कि कठिनाइयों के कारण अपने उद्देश्य, आदर्श, लक्ष्य को ही छोड़ दिया जाय वरन् यह है कि—उन्हें भी जीवन यात्रा का एक साथी मान कर अपनी यात्रा जारी रखते हुए साथ रहने दिया जाय। जीवन में आने वाली सभी विषम परिस्थितियों में सहज भाव रखते हुए उन्हें अपने जीवन का अंग मानना घबराहट दूर करने का सरल उपाय है। सुखद और दुःखद घटनाओं में समभाव रखना मानसिक दृढ़ता प्राप्त करने का एक सुसज्जित मार्ग है। समझौते को, कठिनाइयों को जीवन में स्वीकार करने का तरीका यह है कि अपने आपकी तुलना स्वयं से निम्न परिस्थितियों में रहने वाले लोगों से करें। आज हमें चार रोटी मिल कर भी बेचैनी है, किन्तु दो रोटी मिलने वाले से अपनी तुलना करने पर इस बेचैनी का निवारण हो जायगा। आज हमें जीवन निर्वाह की पर्याप्त साधन-सुविधायें नहीं हैं, किन्तु अधिकतर अभावग्रस्त लोगों को तथा असुविधामय जीवन में उत्कर्ष प्राप्त करने वालों को देखें तो हमारी यह शिकायत दूर हो सकती है। इसी तरह अपने से गिरी हुई परिस्थिति के लोगों से स्वयं की तुलना करने पर कठिनाइयां, परिस्थितियां, सुविधाओं का अभाव सब दूर हो जाते हैं। कठिनाई, दुःख, कष्टों के निवारण के लिये अथवा इनसे होने वाली क्षति से बचने के लिये अपने अहंकार को कम करना आवश्यक है। जो वृक्ष नम्र होना जानते हैं वे बड़े-बड़े झंझावातों में भी अपनी जड़ सहित जमे रहते हैं। पानी की प्रबल धारा बेंत का कुछ नहीं बिगाड़ती, किन्तु बड़े-बड़े पेड़ जो कठोर होते हैं, अकड़ कर खड़े रहते हैं वे एक झोंके में ही धराशायी हो जाते हैं। जो मनुष्य नम्रता, निरहंकारता के सद्गुणों से सम्पन्न होते हैं जो कष्टसहिष्णु होते हैं उनका बड़ी-बड़ी कठिनाइयां, कष्ट, मुसीबतें भी कुछ नहीं बिगाड़तीं। सबसे प्रेम करने वाले, शिकायत न करने वाले को अनेक सहयोगी मिल जाते हैं। कठिनाइयां भी उनके साथ सहयोग करती हैं। जो समझौता करना जानते हैं उनकी जटिल समस्याएं भी सहज ही हल हो जाती हैं।
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Type: TEXT
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