सफलता ही नहीं, असफलता भी
Listen online
View page note
Please go to your device settings and ensure that the Text-to-Speech engine is configured properly. Download the language data for Hindi or any other languages you prefer for the best experience.
कार्यों का परिणाम मिलता है यह एक ध्रुव सत्य है। कोई भी क्रिया प्रतिक्रिया से रहित नहीं है। जो कुछ किया जाता है उसका प्रतिफल भी अवश्य होता है। पर यह प्रतिफल कब, कितनी मात्रा में कैसा होगा, उसका रूप ठीक तरह निश्चित नहीं किया जा सकता। यह सब बातें परिस्थितियों पर भी निर्भर रहती हैं। साईकिल चलाने में कितनी देर में कितनी दूर पहुंच जावेंगे, इसका एक उत्तर नहीं हो सकता। क्योंकि साथ में और भी कितनी ही बातों से इसका उत्तर सम्बन्धित है। सड़क खराब है या अच्छी? हवा सामने की है या पीछे की? चलाने वाले का स्वास्थ्य कैसा है? साईकिल अच्छी हालत में है या खराब हालत में? इन बातों की अनुकूलता-प्रतिकूलता जानकर ही यह अनुमान किया जा सकता है कि यात्रा कितनी देर में पूरी होगी?हम जो सफलता चाहते हैं, जिनके लिये प्रयत्नशील हैं वह कामना कब तक पूरी हो जायेगी, इसका उत्तर सोचने से पूर्व अन्य परिस्थितियों को भुलाया नहीं जा सकता। अपना स्वभाव, सूझ-बूझ, श्रमशीलता, योग्यता, दूसरों का सहयोग, सामयिक परिस्थितियां, साधनों का अच्छा-बुरा होना, सिर पर लदे हुए तात्कालिक उत्तरदायित्व, प्रगति की गुंजायश, स्वास्थ्य आदि अनेक बातों से सफलता सम्बन्धित रहती है और सब बातें सदा अपने अनुकूल ही नहीं रहतीं। इसलिये केवल इसी आधार पर सफलता की आशा नहीं की जा सकती कि हमने प्रयत्न पूरा किया तो सफलता भी निश्चित रूप से नियत समय पर मिल ही जानी चाहिये।एक विद्यार्थी बहुत परिश्रमी और ठीक प्रकार पढ़ने-लिखने वाला है। वह विद्याध्ययन में अपनी ओर से कुछ त्रुटि नहीं रहने देता। पर परिस्थितियां यदि उसके प्रतिकूल रहती हैं तो परीक्षाफल संदिग्ध हो जाता है। स्वास्थ्य का यकायक बिगड़ जाना, घर में कोई आघात लगाने वाली शोक-सन्ताप भरी दुर्घटना हो जाना, किसी कारण मन का खिन्न या क्षुभित रहना, अध्यापक का सुशिक्षित न होना, समय पर पुस्तक का न मिल सकना, बुरे साथियों द्वारा पढ़ाई के समय ध्यान बंटाने वाला उच्छृंखल वातावरण बने रहना, घर से विद्यालय बहुत दूर होने पर चलते-चलते थक जाना, प्रश्नपत्र में अप्रत्याशित प्रश्नों का आ जाना, परीक्षक की असावधानी या कठोरता, परीक्षा काल में कोई आकस्मिक उद्वेग आदि कितने ही कारण ऐसे हो सकते हैं जिनसे परिश्रमी और ठीक तरह पढ़ने वाले विद्यार्थी को भी असफलता का मुंह देखना पड़े।हमें बाह्य व्यक्ति, पदार्थ और कारण बुरे दिखाई पड़ते हैं, पर यह नहीं सूझता कि अपना दृष्टिकोण ही तो कहीं दूषित नहीं है। आत्म-निरीक्षण इस संसार का सबसे कठिन काम है। अपने दोषों को ढूंढ़ सकना समुद्र के तल में से मोती ढूंढ़ लाने वाले गोताखोरों के कार्य से भी अधिक दुष्कर है। अपने दोषों को स्वीकार कर सकना किसी साहसी से ही बन पड़ता है और सुधारने के प्रयत्न को कोई विरला ही शूरवीर करता है। यही कारण है कि हममें से अधिकांश व्यक्ति दोषदर्शी, छिद्रान्वेषी दृष्टिकोण अपनाये रहते हैं और हर किसी को दोषी, निन्दनीय, घृणित एवं दुर्भावनायुक्त समझते रहते हैं। परिणाम स्वरूप सर्वत्र हमें दुष्टता और शत्रुता ही दीखती है। निराशा और व्यथा ही घेरे रहती है।सारे संसार को अपनी इच्छानुकूल बना लेना कठिन है। क्योंकि यह परमात्मा का बनाया हुआ है और अपनी इस कृति को वही बदल सकता है। पर अपनी निज की दुनिया को अपने अनुकूल बदल सकना हममें से हर एक के लिये सम्भव है। जिस प्रकार परमात्मा का बनाया हुआ एक संसार है उसी प्रकार हर मनुष्य की बनाई हुई भी उसकी अपनी एक निजी दुनिया होती है जिसे वह अपने दृष्टिकोण के अनुसार बनाता है। उसी में सन्तुष्ट–असन्तुष्ट, खिन्न-प्रसन्न बना रहता है। यदि कोई चाहे तो अपनी दुनिया को बदल सकता है। दृष्टिकोण के परिवर्तन के साथ-साथ यह परिवर्तन पूर्णतया सम्भव है।अपने प्रियजनों में भी जब हम दोष निकालने खड़े होते हैं तो वे इतने भयानक दीखते हैं कि उनका तुरन्त परित्याग कर देने या खून खच्चर करके बदला लेने की प्रतिहिंसा जागृत होती है। माता ने अमुक दिन चांटा मारा था, अपमान किया था, भाई ने उपेक्षा का व्यवहार किया था, भावज ने ताना मारा था, बहिन ने चुगली की थी, स्त्री ने आज्ञा का उल्लंघन किया था, पुत्र ने अवज्ञा की थी, नौकर ने अशिष्टता दिखाई थी। इस प्रकार की घटनाओं का स्मरण किया जाय तो वे एक के बाद एक असंख्यों सूझ पड़ेंगी। जिन्हें हम दुर्भावना गिनते हैं। सम्भव है उन लोगों के मन में वैसा भाव बिलकुल भी न रहा हो पर अपनी रंगीन चश्मों वाली आंखों से तो उनका साधारण व्यवहार भी दुष्टतापूर्ण सूझ पड़ सकता है। ऐसी दशा में उन सबको शत्रु समझ लिया जाना स्वाभाविक ही है शत्रुओं के बीच रहता हुआ मनुष्य नरक, अशान्ति और असन्तोष ही अनुभव कर सकता है। हममें से अधिकांश के पारिवारिक जीवन आज ऐसे ही उद्विग्न बने हुए हैं।यों श्रम का सत्परिणाम एक सुनिश्चित तथ्य है। मेहनत कभी भी बेकार नहीं जाती। उसका सुफल मिलता ही है। श्रमशील की योग्यता, प्रतिभा क्षमता एवं सूझ-बूझ निरन्तर बढ़ती ही जाती है और उसका लाभ प्रकारान्तर से मिलता ही है। इसी प्रकार आलसी को कोई आकस्मिक सफलता मिल भी जाय तो उससे तात्कालिक प्रसन्नता प्राप्त की जा सकती है, पर उन विशेषताओं से वंचित ही रहना पड़ेगा जो कठोर श्रम गहन अध्यवसाय के कारण अपने को प्राप्त हो सकती थीं।यदि श्रम का सत्परिणाम सुनिश्चित न होता तो कोई क्यों श्रमशीलता का कष्टसाध्य मार्ग अपनाता। कृषि, व्यापार, उद्योग, शिल्प, शिक्षा आदि में करोड़ों आदमी निरन्तर पूर्ण तत्परता के साथ लगे रहते हैं और प्रतिफल भी उनको मिलता ही है। इतना होते हुए भी अवरोधों की कमी नहीं रहती। पुरुषार्थियों को असफलता और आलसियों को आकस्मिक लाभ की घटनायें भी घटित होती रहती हैं। यद्यपि ऐसा कम और कभी-कभी ही होता है, पर होता अवश्य है। संख्या में थोड़ी रहने के कारण इन्हें अपवाद कहा जाता है। यह अपवाद भी कई बार मनुष्य के मन को विचलित और क्षुब्ध कर दिया करते हैं। जिन्हें ऐसी ही उल्टी परिस्थितियों से पाला पड़ा है वे पुरुषार्थ की व्यर्थता और भाग्य के सर्वोपरि होने की बात सोचने लगते हैं। कई बार तो ऐसे लोग हतोत्साह और निराश होकर ऐसा भी सोचने लगते हैं कि—‘‘अपने बल-बूते कुछ बनने वाला नहीं है जो कुछ होना होगा भाग्य से ही होगा, जब दिन फिरेंगे तभी कुछ लाभ होगा। हमारा हाथ-पैर पीटना बेकार है। तकदीर के आगे बेचारी तदवीर क्या कर सकती है।’’हम अपवादों पर ध्यान न दें। स्थिर व्यवस्था और विधान के प्रति आस्था रखें। कर्म तत्परतापूर्वक करें, उसमें तनिक भी असावधानी न होने दें। पर सफलता के लिये उतावले न हों। अमुक समय तक अमुक मात्रा में सफलता मिल ही जानी चाहिये यह कोई निश्चय नहीं कह सकता। परिस्थितियां और घटनायें उसमें विघ्न डाल सकती हैं और मंजिल तक पहुंचने में देर लग सकती है। बीच-बीच में कई अवसर असफलता के मिल सकते हैं। लम्बा रास्ता लगातार चलते हुए कहां पार होता है? बीच-बीच में रुकना भी तो पड़ता है चलते रहने से मंजिल कटती है तो उसे प्रगति कह सकते हैं पर निरन्तर चलना, निरन्तर प्रगति भी कहां सम्भव है? कुछ देर रुकना और सुस्ताना भी तो पड़ता है। जितनी देर रुकें उतनी देर यही सोचते रहना उचित नहीं कि इस समय हमारा भाग्य साथ नहीं दे रहा है, प्रगति रुक रही है, सफलता नहीं मिल रही है। प्रगति की भांति अवरोध भी प्रकृति का नियम है। दिन में काम करने के बाद रात को सोना भी तो पड़ता है।हमें प्रत्येक पग पर सफलता ही मिले यह कोई आवश्यक बात नहीं। असफलता में जो आघात लगता है, उससे अधिक सावधानी बरतने और अधिक तत्परतापूर्वक श्रम करने की प्रेरणा मिलती है। भूल सुधारने का मौका भी इन्हीं झटकों से मिलता है। कितने ही कारण इस संसार में ऐसे मौजूद रहते हैं जो प्रगति को रोकते हैं और जितनी जल्दी हम चाहते हैं उतनी जल्दी सफलता प्राप्त नहीं कर पाते। बाधाओं की मंजिल पार करने में जो लोग अपने धैर्य और साहस का परिचय देते हैं, घबराते और असन्तुलित नहीं होते वे ही दृढ़-चरित्र और स्वास्थ-मानस कहला सकने के अधिकारी होते हैं। धैर्य और साहस ही तो मनुष्य की सबसे बड़ी विशेषता है। असफलता इसी विशेषता को परखने आया करती है और जो उसकी परीक्षा में उत्तीर्ण होता है, उसे इतना मनोबल देकर जाती है जिसके आधार पर वह उन्नति के उच्च शिखर पर पहुंच सके।हमें सफलता के लिये शक्ति भर प्रयत्न करना चाहिये पर असफलता के लिये भी जी में गुंजायश रखनी चाहिये। प्रगति के पथ पर चलने वाले हर व्यक्ति को इस धूप-छांव का सामना करना पड़ता है। हर कदम सफलता से ही भरा मिले ऐसी आशा केवल बाल बुद्धि वालों को शोभा देती है विवेकशीलों को नहीं। केवल सफलता की ही आशा करना और उसके न मिलने पर सिर धुनना अथवा निराश हो बैठना, ओछे, उथले और बचकाने स्वभाव का चिन्ह है। जिन्दगी जीने की विद्या का एक महत्त्वपूर्ण पाठ यह है कि हम न छोटी-मोटी सफलताओं से हर्षोन्मत्त हों और न असफलताओं को देखकर हिम्मत हारें। दिन और रात की भांति असफलता का चक्र भी चलते ही रहने वाला है। एक ही तरह की वस्तु सदा मिले यह असंभव आशा हमें आरम्भ से ही नहीं करनी चाहिये और असफलता के लिये भी अपने कार्यक्रम में उचित गुंजायश रखे रहना चाहिये और उसका भी वैसा स्वागत करना चाहिये जैसा सायंकालीन संध्या का करते हैं। प्रातःकाल की ऊषा भी उतनी ही सुन्दर होती है जितनी सायंकाल की संध्या। सफलताओं में, सुख-सुविधाओं की जैसी आशा केन्द्रित रहती है वैसी ही आत्म–सुधार की, धीर-बीर बनाने की प्रेरणा असफलता में भी सन्निहित है। वस्तुतः ये दोनों आपस में सगी बहने हैं, कुशल-क्षेम पूछने और परस्पर मिलने अक्सर आया करती हैं। इनके प्रेमालाप में हम बाधक क्यों बनें? अपनी कर्तव्य-परायणता का आतिथ्य प्रस्तुत करते हुए इन दोनों का ही उचित स्वागत क्यों न किया करें?

