• News
  • Blogs
  • Gurukulam
English हिंदी
×

My Notes


  • TOC
    • उनका प्यार लुटाता ममतामयी स्वरूप
    • यह तो गूँगे का गुड़ है
    • गुरुसत्ता के साथ मनोविनोद के क्षण
    • हम पाँच शरीरों से काम कर रहे हैं
    • साक्षात् शिव स्वरूप
    • वे तंत्र के भी मर्मज्ञ थे
    • भविष्य द्रष्टा हमारे गुरुदेव
    • बेटा! हमारा जन्म- जन्मांतरों का साथ है
    • लाखों का जीवन बदला
    • बेटा! हम सदा तुम्हारे साथ रहेंगे
    • जिसने जो माँगा, वो पाया
    • हम किसी के ऋणी नहीं रहेंगे, हजार गुना करके लौटाएँगे
    • उनकी चेतना आज भी सक्रिय है
    • गुरुदेव के साथ बातचीत के कुछ प्रसंग
    • पूज्य गुरुदेव- विशिष्ट व्यक्तियों की दृष्टि में
    • यह तो गूँगे का गुड़ है -1
  • My Note
  • Books
    • SPIRITUALITY
    • Meditation
    • EMOTIONS
    • AMRITVANI
    • PERSONAL TRANSFORMATION
    • SOCIAL IMPROVEMENT
    • SELF HELP
    • INDIAN CULTURE
    • SCIENCE AND SPIRITUALITY
    • GAYATRI
    • LIFE MANAGEMENT
    • PERSONALITY REFINEMENT
    • UPASANA SADHANA
    • CONSTRUCTING ERA
    • STRESS MANAGEMENT
    • HEALTH AND FITNESS
    • FAMILY RELATIONSHIPS
    • TEEN AND STUDENTS
    • ART OF LIVING
    • INDIAN CULTURE PHILOSOPHY
    • THOUGHT REVOLUTION
    • TRANSFORMING ERA
    • PEACE AND HAPPINESS
    • INNER POTENTIALS
    • STUDENT LIFE
    • SCIENTIFIC SPIRITUALITY
    • HUMAN DIGNITY
    • WILL POWER MIND POWER
    • SCIENCE AND RELIGION
    • WOMEN EMPOWERMENT
  • Akhandjyoti
  • Login


Back to Books

Books - ऋषि युग्म की झलक-झाँकी-1

Media: TEXT
Language: HINDI
TEXT TEXT


जिसने जो माँगा, वो पाया

Listen online

View page note

Please go to your device settings and ensure that the Text-to-Speech engine is configured properly. Download the language data for Hindi or any other languages you prefer for the best experience.
×

Add Note


First 10 12 Last
    पूज्य गुरुदेव- माताजी दोनों एक ही थे। परम पूज्य गुरुदेव के स्थूल शरीर छोड़ने के बाद उनकी प्रत्यक्ष जिम्मेदारियाँ माताजी के कंधों पर आ गईं। उस समय उनके पास रहने वाले परिजन बताते हैं कि माताजी ने पूज्य गुरुदेव की कमी का अहसास नहीं होने दिया। उनमें पूज्य गुरुदेव की समस्त शक्तियाँ प्रारंभ से ही विद्यमान थीं, परंतु गुरुदेव के रहते तक उन्होंने इसका खास अहसास नहीं होने दिया। स्वयं को उनकी आड़ में छिपाये रखा। कभी- कभी आवश्यकता पड़ने पर परिजनों को उन्होंने उनका आभास भी कराया है। परंतु गुरुदेव के सूक्ष्म में विलीन होने के पश्चात् तो वे स्पष्ट रूप से सामने आईं। परिजनों को उन्होंने एहसास कराया कि वे गुरुदेव से भिन्न नहीं हैं। अर्धनारी नटेश्वर की तरह वे और गुरुदेव दोनों एक ही हैं।

    जो उनके पास आया, वह निहाल हो गया। किसी को उन्होंने खाली हाथ नहीं लौटाया। अधिकतर लोग उनसे लौकिक चीजें ही माँगते रहे। जिसपर वे कभी- कभी खेद भी प्रकट करते थे। कहते कि मैं तो कठिन तप से कमाई आध्यात्मिक विभूतियाँ देना चाहता हूँ, पर हमारे बच्चे अभी तक बच्चे ही बने हुए हैं। लौकिक चीजें ही माँगते हैं। यह सब तो मेरे लिये टॉफी चॉकलेट बाँटने के समान है। किसी ने उनसे विद्या माँगी, किसी ने भक्ति। किसी ने पवित्रता तो किसी ने शक्ति। जिसने जो माँगा वो पाया। उनके विषय में बस यही कहा जा सकता है-

‘‘तेरे दरबार की गुरुवर निराली शान यह देखी,
तुझे देते नहीं देखा, मगर झोली भरी देखी।’’

मैंने तो तिलक कर दिया है, तू लड़का देख ले।

श्री सुदर्शन मित्तल जी

   श्री द्वारिका प्रसाद चैतन्य जी जब मथुरा आये थे, बातों- बातों में एक दिन गुरुदेव से कह दिये, गुरुदेव मुझे केवल लड़की के विवाह की चिन्ता है।
पूज्यवर ने तुरन्त कहा- ‘‘बेटा, तू क्यों चिन्ता करता है, तेरी लड़की, मेरी लड़की है, तू बिलकुल भी चिन्ता न कर।’’ चैतन्य जी ने बताया कि उसके बाद मैं निश्चिन्त हो गया। बात आई- गई हो गई।

   समय पर अचानक एक दिन एक लड़का आया, उसने एक चिट्ठी दी। मैंने खोलकर पढ़ी, पूज्यवर ने लिखा था- ‘‘मैंने तो तिलक कर दिया है, तू लड़का देख ले।’’

चिट्ठी पढ़कर मैं हैरान रह गया। लड़के को ऊपर से नीचे तक देखा। तुरन्त तिलक कर गुरुदेव ने भेजा था सो ओजस् चेहरे पर झलक रहा था। किन्तु बिना उसके बारे में कुछ भी जाने समझे अपनी लड़की के लिए कैसे हाँ कर दूँ, अजीब स्थिति हो गई थी। फिर भी लड़के को बिठाया, बातचीत किया। अन्दर गया, घर में चर्चा की व दोनों एक दूसरे का पता लेकर एक दूसरे के गृह- ग्राम गये। दोनों ने दोनों को पसंद किया, बात तय हुई।

इसी बीच लड़के के मामा ने विवाह की लिस्ट दी, जिसे मैंने मना कर दिया, कहा- ‘‘मैं इतना सामान नहीं दे सकता।’’ अब तो उनके घर वाले सकते में आ गये। गुरुजी ने तिलक किया है, मना कैसे करते? अतः कहा ‘‘गुरुजी गोत्र समान है। कहते हैं, ऐसे में दोनों की एक दूसरे से पटती नहीं।’’

   बहाना तो बहाना था। गुरुदेव ने उसी लहजे में लड़के से पूछा, ‘‘ये लड़की मेरी है, मेरा गोत्र चमार है, तू बता शादी करेगा?’’

लड़के ने हाँ कर दी व शादी धूम- धाम से हो गई।

बाद में चैतन्य जी अन्तर्मन से भाव- विभोर होकर कहते हैं- ‘‘मित्तल जी, मैं अगर खोजता तो कितना भी खोजता, किन्तु मुझे ऐसा लड़का कदापि नहीं मिलता। यह तो गुरुवर की असीम कृपा है जिन्होंने मुझे इतना अच्छा दामाद प्रदान किया।’’

बायना (हुंडी) तो भरना ही पड़ेगा

श्री शिव प्रसाद मिश्र

    श्री रघुवीर सिंह चौहान जी की बड़ी लड़की की शादी तय हो चुकी थी। चूँकि श्री चौहान जी मेरे साथ ही गुरुदेव व वंदनीया माताजी से परिजनों को मिलाने के कार्य में व्यस्त रहते थे, अतः हम लोग प्रायः ही उनसे पूछते रहते-

‘‘चौहान जी, लड़की की शादी की तैयारी हो गई?’’

वे कहते, ‘‘सब गुरुजी ठीक करेंगे।’’। शादी में मात्र दो माह का समय था। जब भी पूछते, उनका एक ही जवाब होता। ‘‘सब गुरुजी ठीक करेंगे।’’
अब शादी में मात्र चार- पाँच दिन ही बचे थे। चौहान जी पूर्ववत् ही अपने कार्य में लगे रहते। शादी की तैयारियों की बाबत पूछने पर अब भी उनका यही जवाब था। ‘‘सब गुरुजी ठीक करेंगे।’’ मैं किसी कार्यवश ज्वालापुर गया। अकस्मात् ही उनके घर पर नजर पड़ी। देखा, अरे! घर तो ज्यों का त्यों पड़ा है। न लिपाई- पुताई, न रंग- रोगन। चार दिन बाद शादी है लेकिन उसके एक भी लक्षण दिखाई नहीं पड़ रहे। मुझे चिंता हुई। आकर अन्य भाई- बहनों से चर्चा की। सोचा, अब गुरुजी- माताजी से कहे बिना काम नहीं चलेगा।

उस दिन भी चौहान जी से जब पूछा तो जवाब वही का वही। अब शादी में केवल तीन दिन शेष थे। मैंने पूज्य गुरुदेव से सब बात बताई। गुरुजी ने सारी बात सुनी। थोड़े गंभीर हुए, फिर बोले, ‘‘बेटा, बायना तो भरना पड़ेगा’’ उनकी बात सुनकर मुझे लगा कि ‘कहीं ये पूर्व जन्म के नरसिंह मेहता तो नहीं हैं, जो अपने कृष्ण को हुंडी चुकाने को विवश कर रहे हैं। प्रभु की लीला प्रभु ही जाने।’ मैं अभी सोच ही रहा था कि पूज्यवर का आदेश हो गया ‘‘बेटा, तू देख। सारी व्यवस्था कर।’’

    मैंने नीचे आकर परम वंदनीया माताजी से परामर्श किया, उन्होंने भी सारी व्यवस्था हेतु स्वीकृति दे दी और अन्य परिजनों को भी सहयोग करने के लिये कहा।

हमने चौके से बर्तन आदि सभी आवश्यक सामग्री मेटाडोर में भरी और कुछ भाई- बहनों को साथ ले कर चौहान जी के घर पहुँचे। सावित्री जीजी चौके वाली कुछ बहनों को साथ लेकर गईं। उन सबने लिपाई पुताई से लेकर चौके की पूरी व्यवस्था सँभाली।

क्योंकि, बारात बहादराबाद से ही आनी थी, सो कितनी व्यवस्था करनी पड़ेगी, इसका पहले से ही अन्दाजा ले लिया जाय; यह सोचकर मैं समधी जी के यहाँ बहादराबाद चला गया। देखा तो मेरे नेत्र खुले के खुले रह गये। वे गाँव के मान्य ठाकुर थे। गाँव भर में उत्सव का माहौल था। वे उस समय पूरे गाँव को खाना खिला रहे थे। मैं कुछ देर रुका। फिर बात ही बात में पूछा, ‘‘कितनी बारात जायगी?’’ उत्तर मिला- ‘‘पूरा गाँव तैयार है।

एक हजार तो हो ही जायेंगे।’’ सुनकर मेरी तो सिट्टी- पिट्टी गुम थी। निवेदन किया। यह तो बहुत ज़्यादा है। आपके समधी शायद सँभाल न सकें। कृपया, उन पर इतना बोझ न डालें। कुछ आदर्श की भी बात की। वे पहले पाँच सौ, फिर तीन सौ; अंततः बड़ी मुश्किल से डेढ़ सौ के लिये तैयार हुए। पर फिर भी तीन सौ बाराती हो ही गये थे। शायद इससे अधिक उनको भी नकारते न बन पड़ा हो।

    ज्वालापुर आकर मैं किराना सामान लेने गया। यह सन् 77- 78 की बात है। उस समय मैं 1345 रु. का किराने का सामान लाया। मिठाई गिनकर दो सौ पीस से कुछ उपर ही लिया था। तीन सौ बराती आए और लगभग तीन सौ ही घराती हो गये।

सावित्री जीजी, भारती अम्मा के जिम्मे चौके की सब व्यवस्था थी। फिर भी इतनी बड़ी व्यवस्था में जिससे जो बना पूरा सहयोग किया। श्री महेन्द्र शर्मा जी ने पूड़ी तली। श्री राम सहाय शुक्ला जी व मैं भी जो हाथ आया वही काम किया।

तीन दिन के अन्दर सब तैयारियाँ और व्यवस्था देखकर मुहल्ले वासी भी हैरान रह गये। सब के मुँह पर एक ही बात थी कि लक्ष्मी माँ का काम फटाफट होते सुना था पर देखा आज ही है।

    मैं खुद आश्चर्य में था कि मैं जो किराना सामान लाया था, उसी में सब व्यवस्था कैसे पूरी हो गई? बारात की विदाई के बाद भी पूड़ी- सब्जी, लड्डू आदि बहुत बचा था। मानो माताजी स्वयं इसे पूर्ण करने आई थीं।

मिठाई तो मैं गिनकर लाया था। दो सौ, पर छः सौ लोगों में कैसे पूरी हो गई, मैं हैरान था। चौहान जी की भक्ति और गुरुवर की शक्ति के आगे हम सब नत मस्तक थे।

लड़की जब ससुराल गई और यहाँ की बातें वहाँ तक पहुँचीं, तो उसे चमत्कारी लड़की मानकर छः माह तक दूर- दूर से लोग उसे देखने आते रहे। इस प्रकार निष्ठा ने विजय पाई। भगवान को भक्त का बायना भरना पड़ा।

माँगो, क्या माँगते हो?

   राजनांदगाँव शहर के बाबूभाई मानेक, की अनुभूति उल्लेखनीय है। उन्होंने बताया कि उन्हें संतान नहीं थी। गुरुजी हमारे घर में आये, तो उन्होंने भोजन करते हुए पूछा, ‘‘क्यों बाबूभाई! तुम्हें संतान नहीं है?’’ मैंने कहा, ‘‘नहीं गुरुजी।’’ तो पूछा, ‘‘तुम्हें कामना भी नहीं है।’’ मैं बोला- ‘‘नहीं गुरुजी, अब हमारी कोई कामना नहीं है।’’ ‘‘तुम्हें नहीं होगी। माताजी को बुलाओ।’’ पूज्य गुरुजी ने कहा। मैंने अपनी धर्मपत्नी को बुलाया। उनसे गुरुजी ने पूछा- ‘‘क्यों माताजी, तुम्हें संतान पाने की कामना नहीं होती।’’ वे बोलीं, ‘‘नहीं, गुरुजी।’’ ‘‘अगर मैं तुम्हें संतान दे दूँ तो’’- गुरुजी ने कहा। पत्नी ने कहा, ‘‘गुरुजी अब आप संतान दे भी देंगे, तो हमारी आयु 55 साल की हो गयी है, 20 साल पालने- पोसने में लगेंगे। पता नहीं 75 साल तक हम जिएँ या न जिएँ, पता नहीं उतना सुख मिले या नहीं। जब कामना थी, तब पूरे देश में बहुत घूमे- भटके, हर संत- महन्त के पास गये। लेकिन अब अपनी कामना मिटा दी है।’’ पूज्यवर खुश हुए, कहा, ‘‘बहुत अच्छी बात।’’

भोजन के बाद गुरुजी ने हमें गायत्री माता की मुर्ति के पास बिठाया और बोले, ‘‘माताजी! माँगो, क्या माँगती हो?’’ पत्नी ने कहा, ‘‘गुरुजी मुझे, ज्ञान, भक्ति और वैराग्य दे दो।’’ मुझसे कहा, ‘‘बाबूभाई! माँगो, क्या माँगते हो?’’ मैंने भी यही माँगा, ‘‘ज्ञान, भक्ति और वैराग्य।’’ पूज्यवर ने हम दोनों के सिर पर हाथ रखा और दस मिनट तक रखा। ऐसी दिव्य अनुभूति हुई कि संसार भर का सारा सुख- वैभव उसके आगे मिट्टी के ढेले जैसा लगा और जिसकी चर्चा सत्संग में सुनते आये थे, वह दिव्य आत्मानन्द, परमानन्द, ब्रह्मानन्द आदि की अद्भुत अनुभूति हुई।

   उस दिन के बाद से ऐसा हुआ कि अपने आप सन्त, मुनि एवं ऋषि स्तर की आत्माएँ हमारे घर आने लगीं। उनसे अमृत ज्ञान उपदेश मिलता रहा। उनकी सेवा में समय बीता और पदार्थों से वैराग्य सा हो गया, तो खूब सारा दान- पुण्य करते रहे। अस्पताल खोला, डॉक्टर रखे। जो माँगा, वह गुरुजी ने दे दिया। हम तो धन्य हो गए।

अपने तप का एक अंश देंगे

   अंजार, कच्छ की केशर बहन विश्राम भाई ठक्कर बहुत पुरानी कार्यकर्ता हैं। उन्हें 29 दिसंबर 1967 को गुरुजी ने एक पत्र लिखा जो इस प्रकार है-
‘‘...प्रिय पुत्री, तुम्हारा पत्र पढ़ते समय लगा कि तुम हमारे सामने ही बैठी हो, हमारी गोदी में खेल रही हो। शरीर से तुम दूर हो, किन्तु आत्मा की दृष्टि से हमारे अतिनिकट हो। हमारा प्रकाश तुम्हारी आत्मा में निरंतर प्रवेश करता रहेगा और इसी जीवन में तुम्हें पूर्णता के लक्ष्य तक पहुँचा देगा। हम अपनी तपस्या का एक अंश तुम्हें देंगे और तुम्हें पूर्णता तक पहुँचा देंगे। हमारा सूक्ष्म शरीर तीन वर्ष बाद इतना प्रबल हो जायेगा कि बिना किसी कठिनाई के कहीं भी पहुँच सके और दर्शन दे सके।’’

जो परिजन केशर बहिन को जानते हैं, वे उनकी भाव- समाधि की स्थिति से भी भली- भाँति परिचित हैं।

अल्सर गायब हो गया

श्री आर. पी. त्रिपाठी, उज्जैन

   1974 में अचानक मुझे पेट में भयंकर तकलीफ हुई। चैक कराने पर पता चला कि पैप्टिक अल्सर है और वह अल्सर इस स्थिति तक पहुँच चुका था कि कभी भी फूट सकता था। डॉक्टर ने कहा कि जितनी जल्दी हो सके आप्रेशन करा लो, यदि यह फूट गया तो आपकी जान भी जा सकती है। मुझे तकलीफ इतनी ज़्यादा थी कि मैं दो घूँट पानी भी नहीं पी सकता था। कुछ ही दिनों में मेरा वजन 20 किलो कम हो गया था। कानपुर के एक अनुभवी डॉक्टर से ऑप्रेशन का समय भी ले लिया था। गायत्री परिवार के समर्पित कार्यकता श्री मोतीलाल जी मेरे अच्छे मित्र थे। उन्होंने कहा, ‘‘आप्रेशन तो कराना ही है, पर क्योंकि हम गुरुजी से जुड़े हैं, तो ऑप्रेशन के पहले गुरुदेव के दर्शन कर लें तो अच्छा रहेगा।’’ हम गुरुदेव के दर्शन करने शान्तिकुञ्ज पहुँचे। गुरुदेव ने देखते ही पूछा, ‘‘सब ठीक- ठाक है?’’ मैंने कुछ नहीं बताया, पर मेरी पत्नी ने सब हाल बताया और कहा, ‘‘गुरुदेव, ऑप्रेशन कराना है, आपका आशीर्वाद चाहिये।’’

    सुनकर गुरुदेव ने कहा, ‘‘बेटा, मैं भी तो डॉक्टर हूँ। अब तुम यहाँ आ गये हो तो ऑप्रेशन की कोई जरूरत नहीं है। मैं तुम्हारा पूरा इलाज करता हूँ। यहाँ से रोज हरकी पौड़ी पर स्नान करने जाना और रोज खूब पानी पीना। रोज शाम को मेरे प्रवचन में भाग लेना और कल मनसा देवी के दर्शन करना।’’
   उस समय मेरी स्थिति ऐसी थी कि मैं 10 कदम भी नहीं चल पाता था। दो घूँट पानी मुश्किल से पी पाता था। 1974 के समय में मनसा देवी के लिये पहाड़ पर चढ़ कर जाना स्वस्थ आदमी को भी कठिन जान पड़ता था। उस पर भी आश्चर्य की बात, गुरुजी बोले, ‘‘हरकी पौड़ी पर दही- बड़े और गोलगप्पे खाना।’’ यह तो मेरे मन की बात थी, क्योंकि दोनों ही मुझे बहुत अच्छे लगते थे।

    मैंने गुरुजी के कहे अनुसार किया। हर की पौड़ी नहाने के लिये गया। मन में सोचा, जब गुरुदेव ने दही- बड़े खाने के लिये कहा है तो खा ही लेता हूँ। मैंने छक कर दही- बड़े खाये। मुझे कुछ नहीं हुआ। दूसरे दिन हम मनसा देवी की चढ़ाई भी चढ़ गये। जैसा- जैसा गुरुजी ने कहा था, वैसा ही किया। 15 दिन का समय गुरुदेव ने दिया था। कहा था, कहीं अस्पताल जाने की जरूरत नहीं है, सब कैंसिल कर दो, बाद में जाना। 15 दिन बाद जब गुरुदेव के पास गये तो उन्होंने कहा, ‘‘बेटा, अब तुम जाओ। डाक्टर के पास जाने की कोई जरूरत नहीं है। कभी पेट में दर्द हो तो चले जाना।’’ उस समय से आज तक मुझे पैप्टिक अल्सर नहीं है।

तुझे कुछ नहीं हुआ है बेटी

श्री सुदर्शन मित्तल जी

   घटना सन् 1958 के ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान यज्ञ के पहले की है। आगरा के अन्दर एक खान एस. पी. थे। उनकी पत्नी असाध्य बीमारी से पीड़ित थी। फौजदार सिंह से गुरुजी के विषय में जानकारी मिली, तो उन्होंने कहलवाया, ‘‘क्या मैं अपनी पत्नी को ला सकता हूँ?’’

फौजदार सिंह जी ने गुरुदेव से पूछा, तो उन्होंने कह दिया, ‘‘ले आना बेटा।’’ दूसरे दिन वे अपनी गाड़ी से पत्नी को लेकर आये। गुरुदेव आँगन में ही दोनों हाथ पीछे बाँधे टहल रहे थे। उसी मुद्रा में कहा- ‘‘उतार कर ले आ बेटा।’’ खान साहब ने अपनी पत्नी को गोद में उठाया और गाड़ी से नीचे ले आए।
   गुरुदेव ने उन्हें इशारे से ही मंदिर में ले जाने व गायत्री माता के समक्ष बरामदे में सुलाने को कहा व स्वयं कमर में हाथ बाँधे हुए उन्हीं के पीछे- पीछे चलते हुए कहते रहे-

‘‘तुम मेरी अच्छी बेटी हो, तुम मेरी प्यारी बेटी हो, तुम्हें कुछ नहीं हुआ है, उठकर बैठ जा, देख धीरे- धीरे बैठना।’’ देखते- देखते ही वह महिला अपने मन से उठने लगी व बैठ गई। गुरुदेव ने कहा- ‘‘खड़ी हो जा, धीरे- धीरे खड़ी होना।’’ तो वह धीरे- धीरे खड़ी हो गई। उन्होंने कहा- ‘‘अब चलकर अपने पिता के पास नहीं आयेगी’’ इतना कहने पर वह धीरे- धीरे पिताजी अर्थात् गुरुजी के पास आ गई।

   अब गुरुजी ने कहा- ‘‘कुछ खायेगी।’’ उस महिला ने जवाब दिया- ‘‘ हाँ खाऊँगी।’’ खान साहब ने सुना तो दंग रह गये। वैसी आवाज उन्होंने कभी नहीं सुनी थी। चूँकि पूज्यवर के द्वारा दिया गया जीवन दान था। वे अवाक् रह गए व चरणों में गिर पड़े। वह पत्नी जिसके रोग को डॉक्टरों ने असाध्य घोषित कर दिया हो व जिसे ‘‘तुझे कुछ नहीं हुआ है बेटी’’ कहकर आधे घंटे से भी कम समय में उठाकर बैठा दें, खड़ा कर दें, व खिला कर घर भेज दें उन सिद्ध संत के चरणों में भला कौन नतमस्तक नहीं होगा? खान साहब मन ही मन कृतज्ञ होकर जिस पत्नी को गोद में लाद कर लाये थे, अपने पैरों चलाते हुए लेकर चले गये।

गुरुदेव हमारे शिवशंकर वरदाई

श्री गोविंद पाटीदार

   विगत 16 से 20 अप्रैल 1970 की तिथियों में खरगोन, ग्राम घेगाँव में 108 कुंडीय यज्ञ का आयोजन था। पूज्य गुरुदेव इस समारोह में पधारे थे। उन्हीं दिनों उनसे मंत्र दीक्षा ली थी। अपनी हिमालय यात्रा के बाद पूज्य गुरुदेव ने लौटकर शान्तिकुञ्ज हरिद्वार में साधना आरण्यक की स्थापना की। ‘जीवन साधना’ सत्रों की शृंखला चली। 1976 के एक सत्र में वहाँ जाने का सौभाग्य मुझे भी मिला। उनसे भेंट करने के लिए एक दिन उनके कमरे में गये। अन्य परिजन भी थे। सबसे बारी- बारी से पूज्य गुरुदेव ने कुशल समाचार पूछे। मेरी कुशलता भी पूछी। मैंने कहा, ‘‘गुरुदेव और तो सब ठीक है, परन्तु एक दुःख है।’’ उन्होंने करुणापूर्वक कहा, ‘‘बेटा, जल्दी बता, क्या बात है?’’ मैंने बताया, ‘‘पिताजी, मेरे बड़े भाई को हमेशा बाँध कर रखना पड़ता है। वे पागल हैं।’’ पूज्य गुरुदेव ने क्षणभर के लिए आँख बंद की और कहा, ‘‘बेटा, यह पूर्व जन्म के किन्हीं कर्मों के कारण है, इस प्रारब्ध को इसी जन्म में काट लेना अच्छा है। परन्तु उसे इतना जरूर ठीक कर देंगे कि वह खुला रह सके।’’ मेरा हृदय भर आया, गला रुँध गया और आँखों से आँसू झरने लगे। गुरुदेव ने मेरे सिर पर हाथ फिराया और कहा, ‘‘बेटा, सब ठीक ही होगा। चिन्ता मत करो। परिवार की जिम्मेदारी मेरे ऊपर छोड़ दो।’’

   नौ दिनों के शिविर के पश्चात् घर लौटना हुआ। ठीक 20 दिन बाद बड़े भाई अपने आप खुल गये। पूछने पर बताया कि जाने कौन सफेद खादी के कपड़े पहने बाबा आये थे। उन्होंने दूर से मेरे ऊपर बर्फ फेंक दी। उसी से सब जंजीरें अलग हो गईं।

आज भी मेरे बड़े भाई बंधनों से मुक्त अवस्था में प्रसन्नतापूर्वक रहते हैं। कभी- कभार कई महीनों में एकाध हल्का- सा दौरा आ जाता है, पर फिर ठीक हो जाते हैं। बड़े भाई के दोनों बालक चि. गजानंद एवं चि. रमेशचंद्र इंजीनियर के पद पर हैं तथा सपरिवार इंदौर ही रहते हैं। मैं अपने परिवार सहित 12 जून 1984 से गुरुदेव के चरणों में शान्तिकुञ्ज आ गया। पूज्य गुरुदेव वरदाई ही थे।

अब तो बराबर यह चिंतन रहता है कि उनके अनुदानों का ऋण चुकाने में ही जीवन के शेष दिन बीतें।

शब्द क्या - वरदान थे वे वचन

श्री मोतीलाल स्वर्णकार, उज्जैन

  सन् 1964- 65 में गुरुदेव नलखेड़ा जिला शाजापुर में आये थे। तब मैं माध्यमिक शाला नलखेड़ा में क्राफ्ट टीचर था। 5 कुण्डीय गायत्री यज्ञ आयोजित किये गये थे। घर पर ही गुरुदेव के ठहरने का इंतजाम था। एकांत पाते ही गुरुदेव ने मुझसे मेरी समस्या पूछी। मैंने कहा, ‘‘गुरुदेव, पाँच कन्याएँ हैं, एक पुत्र है, इनकी शिक्षा- दीक्षा तथा विवाह संस्कार करना है। नलखेड़ा से स्थानांतरण करवा दीजिए।’’ गुरुदेव ने कहा 9 दिन में उज्जैन ट्रांसफर बी. टी. आई. में होगा। वहाँ उज्जैन में कोई शाखा नहीं है, वहाँ सुरेशनारायण मेहता डी. ई. ओ. व जनार्दन देशमुख से मिलकर शाखा स्थापित कर युग निर्माण योजना का कार्य करना। बात बेहद अविश्वसनीय थी। भला किसी व्यक्ति का कुछ ही दिनों के अंतर से दो बार स्थानांतरण कैसे हो सकता था? किन्तु गुरुदेव की महिमा। 9 दिन के अंदर ही बी. टी. आई. उज्जैन में मेरा ट्रांसफर हो गया। फिर मैं उज्जैन में ही रहा। यहाँ 5 कन्याओं व एकपुत्र की ग्रेजुएशन तक शिक्षा पूरी हुई। सभी की बिना दहेज के शादी कराई। उज्जैन से ही रिटायर हुआ। गायत्री परिवार की शाखा सन् 1964 में स्थापित की। गुरुकृपा से मेरा हर कार्य निर्विघ्न रूप से पूरा होता रहा है। उनके वचन मेरे जीवन में वरदान बन कर आये।

कमाल आशीर्वाद का

श्रीमती शांता सोनी, इंदौर

  सन् 1966- 67 में पूज्य गुरुदेव सिंहस्थ पर्व पर उज्जैन पधारे। लौटते समय प्रातः 6 बजे मेरे कलिया देह निवास से साइकिल रिक्शे में बैठकर जा रहे थे, मार्ग में श्री गोपालजी सोनी का घर था। उन्होंने व उनकी पत्नी ने फूलमालाओं से पूज्य गुरुदेव का स्वागत किया। जब गुरुदेव ने सबकी कुशलक्षेम पूछी तो उनकी पत्नी ने रोते हुए कहा, ‘‘गुरुजी, मेरी गोद खाली है। जो संतान होती है, 2- 4 माह में मर जाती है।’’ फिर वह फूट- फूट कर रोने लगी। पूज्य गुरुदेव द्रवीभूत हो उठे और उन्हें आशीर्वाद दिया। उनके आशीर्वाद स्वरूप आज उनके दो पुत्र हैं, जो स्वस्थ, सुखी और संपन्न हैं।

जाकी कृपा पंगु गिरि लाँघै।

  शान्तिकुञ्ज में उन दिनों प्राण प्रत्यावर्तन सत्र चल रहे थे। वेदमूर्ति तपोनिष्ठ परम पूज्य गुरुदेव की तप ऊर्जा से नित नए अनुदानों- वरदानों की सृष्टि व वृष्टि हो रही थी। उन्हीं दिनों जाड़े की एक दोपहर में उत्तरप्रदेश के खीरी लखीमपुर जिले के मोहम्मदी कस्बे के प्रतिष्ठित कपड़ा व्यवसायी श्री दयाशंकर रस्तोगी अपनी पत्नी श्रीमती शकुन्तला रस्तोगी के साथ पूज्य गुरुदेव से मिलने के लिए पहुँचे। उनके साथ उनका विकलांग पुत्र सुनील भी था। गुरुदेव ने उन्हें प्रेम से बिठाने के साथ घर के हाल समाचार पूछे। उत्तर में सुनील की माँ श्रीमती शकुन्तला ने बताया, ‘‘गुरुदेव! मेरे तीन लड़के- सुनील, इन्द्रकिशोर व आनन्द एवं दो लड़कियाँ आदर्श व विद्योत्तमा हैं। यह सुनील ही सबसे बड़ा है।’’ इसी के साथ ही उन्होंने सुनील के विकलांग होने की सारी कथा सुना डाली। श्री दयाशंकर जी ने बताया, ‘‘गुरुजी! यह लड़का जन्म के समय तो स्वस्थ- सामान्य था। पर जन्म के पन्द्रहवें दिन इसे तीव्र ज्वर हुआ, तब से यह हाल हो गया है। चिकित्सा के सारे प्रयास भी निष्फल गए।’’

   सारी बातें सुनने के बाद गुरुदेव ने सुनील की ओर देखा। ग्यारह वर्षीय इस बालक के चेहरे पर एक अद्भुत भोलापन था। उसकी आँखों में एक अनूठी चमक थी। गुरुदेव ने इन सबको समझाते हुए कहा, ‘‘जन्म- जन्मान्तर के कर्म प्रारब्ध का रूप लेते हैं और यह प्रारब्ध ही अच्छी- बुरी परिस्थितियों के रूप में प्रकट होता है। बुरे प्रारब्ध को धैर्यपूर्वक सह जाना तप है। तुम्हारा बच्चा यही तप कर रहा है। पर तुम निराश न हो, हम इसे प्रतिभा का वरदान देते हैं। यह विकलांग होने के बावजूद किसी पर बोझ नहीं बनेगा। स्वयं कमाकर खाएगा और तुम लोगों का भी नाम उज्ज्वल करेगा। इसके कारण लोग तुम्हें और इसके भाई- बहिनों को पहचानेंगे।’’ गुरुदेव की बातें सुनकर सुनील के माता- पिता को आश्चर्य हुआ, पर उन्हें गुरुदेव की तप शक्ति पर श्रद्धा थी और सचमुच घर पहुँचकर सुनील में चित्रकला का अंकुरण हुआ। पूज्य गुरुदेव का वरदान साकार होने लगा। उसकी बनायी पेंटिंग्स चर्चित एवं प्रशंसित होने लगी। रेडियो एवं टी० वी० पर उसकी वार्ताएँ प्रसारित हुई। समाचार पत्र समय- समय पर उसके व्यक्तित्व एवं कर्तृत्व को प्रकाशित करने लगे। श्री दयाशंकर रस्तोगी एवं शकुन्तला रस्तोगी तो इस गुरु कृपा पर भाव विभोर हो गए। उन्होंने संकल्प लिया कि वे अपनी एक पुत्री का विवाह शान्तिकुञ्ज के ही किसी योग्य कार्यकर्त्ता से करेंगे। सन् 1994 में उन्होंने ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान में कार्यरत, श्री सुरेश वर्णवाल से अपनी कन्या विद्योत्तमा का विवाह किया। गुरुदेव की कृपा के प्रति निष्ठावान् सुनील रस्तोगी अपनी अनुभूति महात्मा सूरदास के इन शब्दों में बयान करते हैं-

‘जाकी कृपा पंगु गिरि लाँघै।’
मात्र आशीर्वाद से बच्ची स्वस्थ हुई

  श्री वरदीचंद चौधरी, सुवासरामंडी मंदसौर

   मेरी लड़की निर्मला मोदी की डिलेवरी हुई थी, जिसमें उसका दिमाग पागल जैसा हो गया था, फलतः मैं इलाज हेतु भटकता फिरा। 5 माह तक 25 डाक्टरों को दिल्ली में दिखाया, किन्तु वे भी किसी निर्णय पर नहीं पहुँच सके। एक दिन रात्रि को सोते हुए गुरुदेव की याद आई और सुबह ही मैं शान्तिकुञ्ज पहुँचने हेतु रवाना हो गया। शान्तिकुञ्ज में पहुँचकर गुरुदेव से मिला। उन्होंने कहा कि आपकी बच्ची ठीक होकर 15 दिन पश्चात् नोएडा से मुझसे मिलने स्वयं आवेगी। मेरी बच्ची गुरुदेव की वाणी से स्वस्थ हो गई व 15 दिन पश्चात् गुरुदेव से स्वयं मिलने गई। इस बीमारी के दौरान उसने बड़ी तादाद में गायत्री मंत्र लेखन किया। आज मेरी बच्ची पूर्ण स्वस्थ व प्रसन्न है। यह गुरुदेव की कृपा का ही फल है।

ऋण लौटाने हेतु मजबूर किया

  चेन्नई के श्री रामलाल खण्डेलवाल जी ने अपने दस लाख रुपये एक मुसलमान व्यक्ति को ब्याज पर दे दिये। फिर वे जब भी अपने पैसे उनसे वापस माँगते, वह चाकू दिखाकर धमकी दे देता। वह किसी प्रकार भी पैसा लौटाने को तैयार नहीं था। रामलाल जी सोचने लगे कि अब तो हमारे दस लाख रुपये डूब गये। अब हमें, हमारा पैसा वापस नहीं मिलेगा। संयोग से शान्तिकुञ्ज की टोली वहाँ चेन्नई पहुँची। उन्होंने टोली के भाईयों से निवेदन किया, कि एक व्यक
First 10 12 Last


Other Version of this book



ऋषि युग्म की झलक-झाँकी-1
Type: TEXT
Language: HINDI
...

ऋषि युग्म की झलक-झाँकी
Type: TEXT
Language: HINDI
...


Releted Books



Religion and Science
Type: SCAN
Language: ENGLISH
...

యుగ ఋషి జన్మశతాబ్ది
Type: SCAN
Language: TELUGU
...

The Legend of a Divine Campaign
Type: SCAN
Language: ENGLISH
...

प्रज्ञावतार का स्वरूप और क्रिया-कलाप
Type: SCAN
Language: HINDI
...

મારી વસીયત અને વિરાસત
Type: SCAN
Language: GUJRATI
...

हमारी वसीयत और विरासत
Type: TEXT
Language: EN
...

My Life - Its Legacy and Message
Type: SCAN
Language: ENGLISH
...

हमारी वसीयत और विरासत
Type: SCAN
Language: EN
...

Spectrum of Knowledge
Type: SCAN
Language: ENGLISH
...

प्रज्ञावतार की विस्तार प्रक्रिया
Type: TEXT
Language: EN
...

प्रज्ञावतार की विस्तार प्रक्रिया
Type: SCAN
Language: EN
...

सुनसान के सहचर
Type: TEXT
Language: HINDI
...

Companions in Solitude
Type: TEXT
Language: ENGLISH
...

Companion in Solitude
Type: SCAN
Language: ENGLISH
...

सुनसान के सहचर
Type: SCAN
Language: EN
...

अदभुत, आश्चर्यजनक किन्तु सत्य -3
Type: TEXT
Language: HINDI
...

अदभुत, आश्चर्यजनक किन्तु सत्य -2
Type: TEXT
Language: HINDI
...

अदभुत, आश्चर्यजनक किन्तु सत्य -1
Type: TEXT
Language: HINDI
...

नव सृजन के निमित्त महाकाल की तैयारी
Type: SCAN
Language: EN
...

નવસર્જન નિમિત્તે મહાકાળની તૈયારી
Type: SCAN
Language: GUJRATI
...

नवसृजन के निमित्त महाकाल की तैयारी
Type: TEXT
Language: EN
...

दीक्षित -नैष्ठिक
Type: TEXT
Language: EN
...

पत्र पाथेय
Type: SCAN
Language: HINDI
...

प्रज्ञावतार का कथामृत
Type: SCAN
Language: HINDI
...

Articles of Books

  • उनका प्यार लुटाता ममतामयी स्वरूप
  • यह तो गूँगे का गुड़ है
  • गुरुसत्ता के साथ मनोविनोद के क्षण
  • हम पाँच शरीरों से काम कर रहे हैं
  • साक्षात् शिव स्वरूप
  • वे तंत्र के भी मर्मज्ञ थे
  • भविष्य द्रष्टा हमारे गुरुदेव
  • बेटा! हमारा जन्म- जन्मांतरों का साथ है
  • लाखों का जीवन बदला
  • बेटा! हम सदा तुम्हारे साथ रहेंगे
  • जिसने जो माँगा, वो पाया
  • हम किसी के ऋणी नहीं रहेंगे, हजार गुना करके लौटाएँगे
  • उनकी चेतना आज भी सक्रिय है
  • गुरुदेव के साथ बातचीत के कुछ प्रसंग
  • पूज्य गुरुदेव- विशिष्ट व्यक्तियों की दृष्टि में
  • यह तो गूँगे का गुड़ है -1
About Shantikunj

Shantikunj has emerged over the years as a unique center and fountain-head of a global movement of Yug Nirman Yojna (Movement for the Reconstruction of the Era) for moral-spiritual regeneration in the light of hoary Indian heritage.

Navigation Links
  • Home
  • Literature
  • News and Activities
  • Quotes and Thoughts
  • Videos and more
  • Audio
  • Join Us
  • Contact
Write to us

Click below and write to us your commenct and input.

Go

Copyright © SRI VEDMATA GAYATRI TRUST (TMD). All rights reserved. | Design by IT Cell Shantikunj