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Books - ऋषि युग्म की झलक-झाँकी-1

Media: TEXT
Language: HINDI
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बेटा! हमारा जन्म- जन्मांतरों का साथ है

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    अवतारी चेतना जब धरा पर आती है, तब अपने साथ श्रेष्ठ आत्माओं को भी सहयोगी- सहचरों के रूप में श्रेय- सौभाग्य का भागीदार बनाती है। जन्म- जन्मान्तरों से उनके साथ जुड़ी हुई वे आत्माएँ जो उनकी सहयोगी- सहचरी रही हैं, उन्हें वह फिर से संगठित करती हैं, और अपने प्रयोजन को पूरा करती हैं। भगवान् राम आये, तो उनके साथ वे रीछ- वानरों के रूप में आयीं। भगवान् कृष्ण आये, तब उनका साथ ग्वाल- बालों ने दिया। युग निर्माण का कार्य भी बहुत बड़ा कार्य है, इसके लिए भी महान् आत्माओं को अवतरित होना पड़ेगा।

    वे कहते थे, जैसे गोताखोर गहरे समुद्र में से बहुत मेहनत करके कुछ मोती खोज पाते हैं, वैसे ही हमने अपनी सबसे ज्यादा तप शक्ति ऊँचे स्तर की, संस्कारवान्, दिव्य आत्माओं को अपने आँचल में समेटने में लगाई है। बेटा हमारा- तुम्हारा जन्म- जन्मान्तरों का साथ है। मैंने आप सबके रूप में हीरे- मोती खोजे हैं व उन्हें एक सूत्र में पिरोया है।

    अपने इस परिवार को उन्होंने प्रज्ञा परिवार का नाम दिया। जुलाई 1984 की अखण्ड ज्योति में पृ. 62 पर उन्होंने लिखा है- ‘‘हमें अनेक जन्मों का स्मरण है, लोगों को नहीं। जिनके साथ पूर्व जन्मों के सघन संबंध रहे हैं, उन्हें संयोगवश या प्रयत्न पूर्वक हमने परिजनों के रूप में एकत्रित कर लिया है और वे जिस- तिस कारण हमारे इर्द- गिर्द जमा हो गये हैं। इस जन्म- जन्मांतरों से संग्रहित आत्मीयता के पीछे जुड़ी हुई अनेकानेक गुदगुदी उत्पन्न करने वाली घटनाऐं हमें स्मरण हैं।’’

बेटा! इस हाथ के ऊपर भरोसा करना

श्री जयंती भाई पटेल

    संत रविदास जी के विषय में कहते हैं कि जब सब पंडितों ने उनका विरोध किया और उनके साथ भोजन करने के लिये मना कर दिया था। तब भगवान ने अपने भक्त की लाज रखी थी। जब वे सब पंडित खाना खाने बैठे तो हर किसी को अपने साथ संत रविदास बैठे दिखाई दिये। पर इसके लिये भक्त को भी कड़ी परीक्षाओं से गुजरना पड़ता है।

ऐसा ही कुछ प्रसंग मेरे साथ भी घटा। घटना का प्रारंभ सन 1968 से होता है, जब गुरुदेव को मैं जानता भी नहीं था। उन दिनों मैं गुजरात में रहता था और एक को- ऑपरेटिव सोसायटी में नौकरी करता था। उस समय मैं बहुत बड़ी विपत्ति में फँसा था। जो दलाल हमें सरकार से अनाज, चावल, शक्कर आदि सप्लाई करता था, उसने सरकार के साथ धोखाधड़ी की। हमें माल सप्लाई करता रहा और फर्जी बिल देता रहा। इस प्रकार उसने 1 लाख 48 हजार रुपये की ठगी की। इसका पता हम लोगों को तब चला जब सरकार के पास पैसा नहीं पहुँचा और सरकार की ओर से चैकिंग की गई। दलाल को जेल तो हो गई पर सरकार हम लोगों से पैसे की भरपाई की माँग करने लगी। हम लोग 14 व्यापारी थे जिनके साथ दलाल ने धोखा किया था। फर्जी बिल देकर पैसा वसूलता रहा था। पैसा तो हम बराबर चुकाते रहे थे सो सरकार को इतना पैसा कहाँ से चुकाते? मेरे हिस्से में 26000 रुपये बैठते थे। उस समय में वह बहुत बड़ी रकम थी। हमने मिलकर वकील जुगत राम रावल जी को नियुक्त किया था। साल भर केस चलता रहा पर कोई निष्कर्ष नहीं निकला था। हम लोग काफी परेशानी में थे।

    भादों महीने की अमावस्या के दिन गुरुजी के शिष्य, भाई श्री भोगीलाल पटेल जी हमारे घर आये। जब उन्होंने हमारी समस्या जानी तो बोले कि हमारे गुरु इतने शक्तिशाली हैं कि वे आपको इस संकट से उबार लेंगे। मैं अभी उन्हें पत्र लिखता हूँ। उन्होंने मेरे सामने ही पत्र लिख दिया और दो गायत्री मंत्र लेखन पुस्तिका हाथ में थमाया। अगले दिन से नवरात्रि प्रारंभ थी, नवरात्रि में उसे पूरा करने के लिये कहा। अंतिम दिन पूर्णाहुति के लिये आमंत्रित भी किया।

    ठीक आठवें दिन गुरुजी का जवाब आया। लिखा था, बेटा चिंता न करें, आपकी परेशानी हमने जानी है। आपको बचाने के लिये हमारी शक्ति लगी हुई है। नौवें दिन पूर्णाहुति थी, मैं पत्र भी साथ में ले गया। श्री भोगीलाल जी बड़े प्रसन्न हुए व बोले कि आपका काम हो गया समझें, आप निश्चिंत हो जाइए। दशहरे के दिन पेपर में समाचार आ गया कि, दलाल ही पूरे प्रकरण का दोषी है। सभी 14 व्यापारी निर्दोष हैं।
 
इस घटना से गायत्री मंत्र व पूज्य गुरुदेव में मेरा विश्वास बढ़ गया। मैंने 250 मंत्र लेखन पुस्तक लिखने का संकल्प ले लिया। जिसे मैंने 5 साल में पूरा किया। पर इसके बाद मेरी कड़ी परीक्षा शुरू हुई। जिस ब्राह्मण ने मुझे पढ़ाया था उसे जब पता चला कि मैं गायत्री मंत्र लेखन कर रहा हूँ तो उसने मुझे मना किया और कहा कि बड़ी गलती कर रहे हो। इसे आज से अभी से छोड़ दो। यह ब्राह्मणों का मंत्र है। तुम आग से खेल रहे हो। तुम्हारी 71 पीढ़ी का सर्वनाश हो जायेगा और भी बहुत कुछ समझाया पर मैं माना नहीं। इस पर वह बहुत नाराज हुआ और मेरे घर वालों को भड़काया। घर वाले भी मुझे मना करने लगे। प्रायः इस बात को लेकर झगड़ा होने लगा कि मैं ब्राह्मण के मना करने पर भी गायत्री मंत्र लेखन क्यों कर रहा हूँ? जब मैं किसी प्रकार नहीं माना तो उन्होंने मुझे घर से निकाल दिया। मैं पत्नी बच्चे को लेकर घर से निकल गया पर मंत्र लेखन नहीं छोड़ा। इस पर भी ब्राह्मण को संतोष नहीं हुआ। अब उसने गाँव वालों को भड़काया। गाँव वाले भी मेरे पीछे पड़ गये। समझाने लगे। पर मैं नहीं माना तो उन्होंने मुझसे बात करना बंद कर दिया। मैं बिल्कुल अकेला पड़ गया।

     संघर्ष करते हुए लगभग छः महीने बीत गये। इस बीच मैं बार- बार गुरुजी को पत्र लिखता रहा। उनका आश्वासन पत्र मिलता रहा। एक दिन मन में विचार आया कि गुरुजी को मैं जानता नहीं फिर भी इतना विश्वास क्यों कर रहा हूँ? पत्नी से कहा पता नहीं कब माहौल अनुकूल बनेगा? मेरा विचलन देखकर पत्नी बहुत आक्रोशित हुई और बोली, ‘‘खबरदार, जो फिर ऐसी बात कही। जो होगा देखा जायेगा।’’ संघर्ष करते करते साल भर बीतने को आया।

 भादों का महीना था, मेरे पास गुजराती में युगनिर्माण योजना आती थी, उसमें छपा था कि अहमदाबाद में गुरुजी का कार्यक्रम है। हम दोनों उस कार्यक्रम में गये। जब हम पहुँचे गुरुजी प्रवचन कर रहे थे। प्रवचन के बाद उन्होंने कहा, ‘‘जो गायत्री परिवार के परिजन हैं वे सब रुकें बाकी सब घर जायें। हमें उनसे बातचीत करनी है।’’ हम बहुत पीछे बैठे थे। गुरुजी से प्रथम बार मिल रहे थे। जैसे ही हमने गुरुजी को प्रणाम किया। वे हमें देखते ही मानो डाँटते हुए से बोले, ‘‘बेटा जयंतिलाल, गाँव वाले तेरा क्या बिगाड़ लेंगे, जो मैं तेरे साथ हूँ? गाँव वालों से तुम इतना डरते क्यों हो? मेरे रहते तुम्हारा बाल भी बाँका नहीं हो सकता। चिंता मत करना।’’ फिर पत्नी से बोले, ‘‘बेटा तेरे को कुछ कहना है?’’ पत्नी ने कहा, ‘‘बापजी, ये दुःख हमारा दूर हो जाय, बस।’’ गुरुजी बोले, ‘‘सब ठीक हो जाएगा।’’ हम तीन दिन बाद प्रोग्रम पूरा करके गाँव वापस गये। नवरात्रि पर्व प्रारंभ हो गया था। गुजरात में नवरात्रि में गर्बा किया जाता है। 5वें दिन हम गर्बा कर रहे थे,10:30 बजे पूर्णाहुति थी। इतने में गाँव की ही लगभग 10 साल की लड़की रुक्मिणी, दूर से नाचती हुई आई और गरबी का जलता हुआ खप्पर (मटके के ढक्कन जैसा बड़ा सा दिया) उठा लिया।

 लगभग 5- 7 मिनट तक उसे हाथ में उठा कर वह नाचती रही और फिर धीरे से रख दिया। वह खप्पर इतना गरम हो जाता है कि उससे हाथ जल जाते हैं पर वह कन्या उसे हाथ में उठाकर नाची और फिर धीरे से रख भी दिया और उसे कुछ भी नहीं हुआ। यह सब देखकर ब्राह्मण दौड़ कर उसके सामने गया और प्रणाम कर कहा, ‘‘भले पधारे माताजी, हमारे लिये क्या आदेश है?’’ ब्राह्मण को देखते ही लड़की एकदम आक्रोशित होकर बोली, ‘‘तुमने मेरे भक्त को बहुत दुखी किया है, मैं तुमको नहीं छोड़ूँगी।’’ इतना सुनते ही ब्राह्मण थर- थर काँपने लगा और तुरंत मुझे बुलाया। एक लड़का मुझे पकड़ कर ले आया। मैंने बच्ची को प्रणाम किया, तब वह बोली, ‘‘बेटा, मुझे माफ करना, तेरा दुःख दूर करने में मुझे देरी हो गई। आज से तेरा दुःख खतम।’’

     उसी समय वहाँ उपस्थित गाँव के एक पटवारी बब्बू पाणी ब्राह्मण ने कहा, ‘‘आप माताजी हैं। इसका प्रमाण दो।’’ कन्या बोली, ‘‘तुझे क्या प्रमाण चाहिये, बता?’’ पटवारी ने अपना हाथ बढ़ाया और कहा, ‘‘मेरे हाथ में अपना हाथ दो तो मेरे हाथ में कुमकुम आ जाये, तो मैं आपको माताजी मानूँगा।’’ लड़की ने तुरंत उसके हाथ में हाथ दिया तो उसका हाथ लाल हो गया। यह देखकर उस कन्या के पिताजी उसके पाँव पड़े। कन्या ने उनकी पीठ पर थपकी दी, तो पीठ पर भी कुमकुम लग गया।

       इतने में वह पटवारी फिर बोला, ‘‘हम गायत्री मंत्र को नहीं मानते। मेरे चाचाजी ने पुत्र प्राप्ति के लिये अनुष्ठान किया था, उसे पुत्र नहीं हुआ। अतः विश्वास नहीं है।’’ बच्ची ने बताया, ‘‘उसने उच्चारण करने में गलती की थी, इसलिये फलित नहीं हुआ।’’ पटवारी ने कहा, ‘‘सही उच्चारण कैसे होता है, बताइये?’’ तब लड़की ने सबके सामने ऊँचे स्वर में उच्चारण करके बताया। फिर मुझसे बोली, ‘‘बेटा! तुम्हारी मंत्र लेखन पुस्तिका ले आओ तो।’’ मैं दौड़ कर अपनी मंत्र लेखन पुस्तिका ले आया और माताजी को दी। उन्होंने उसे अपने माथे से लगाया और जलते हुए खप्पर पर रखदी। उसे कुछ नहीं हुआ। माताजी बोली, ‘‘ये शुद्ध भावना से लिखा हुआ शुद्ध गायत्री मंत्र है। ले बेटा, अपनी पुस्तिका।’’

इस घटना के एक माह बाद गुरुदेव स्वयं नखत्राणा पधारे। वहाँ हमने दीक्षा ली। फिर हम अंजार गये, वहाँ तीन दिन का कार्यक्रम था। वहाँ गुरुदेव ने प्रेम से अपने पास बिठाया। मैंने कहा, ‘‘गुरुदेव मैं बहुत भाग्यशाली हूँ, कल मैंने आपसे दीक्षा ली है।’’ तब गुरुजी बोले, ‘‘हाँ बेटा, मैं तेरे लिये ही इतने दूर से आया हूँ। तेरे साथ तो मेरा जनम- जनम का साथ है। तुम्हारे जैसे बच्चे को खोजते- खोजते ही, मैं यहाँ तक आया हूँ। तुम्हारे जैसे अनेकों को मैं मेरी माला के मनकों के रूप में पिरोते जा रहा हूँ। अब तुम मेरा काम करने में लग जाओ।’’

अपना हाथ दिखाते हुए गुरुदेव ने कहा, ‘‘बेटा, ये हाथ हाड़- चाम का है, मगर लोहे से भी ज़्यादा मजबूत है। इस हाथ के ऊपर भरोसा करना। तू मेरा काम करना। तेरा काम मैं करूँगा।’’

पत्र द्वारा परिचय हुआ

बाबू भाई कापड़िया, न्यू जरसी, अमेरिका

      1980 से मैं अमेरिका में रह रहा हूँ। इससे पहले 1962 से 1968 तक मैं फिजी में रहा। उन दिनों मैं मुम्बई में रह रहा था, जब मुझे गुरुदेव का हरिद्वार से एक पत्र मिला। उसके साथ बायोडाटा फार्म भी था। मैंने उसे गुजराती में भर कर भेज दिया। उसके जवाब में एक माह बाद मुझे गायत्री उपासक की उपाधि का एक सर्टिफिकेट मिला। कुछ दिनों बाद मुझे फिर एक पत्र मिला जिसमें लिखा था कि आपको 24 शक्तिपीठों में से एक चुना जाता है। मैंने गुरुजी को जवाब लिखा कि अभी तो मैं नहीं आ सकता क्योंकि अभी मुझे मेरे वृद्ध पिता जी की देखभाल करनी है। भविष्य में जो भी मुझसे करते बन पड़ेगा वह मैं करूँगा। उसके बाद पत्र व्यवहार बंद हो गया। पर इस समय तक न तो मैं गुरुजी का नाम ही जानता था और न ही गायत्री परिवार के बारे में कुछ जानता था। मुझे आज भी इस बात का आश्चर्य है कि उन्हें मेरा मुम्बई का एड्रेस (Address) कैसे मिला?

     इसके बाद 1976 में मैं हरिद्वार आया। मैं होटल में ठहरा था। गुरुदेव से मिलने शान्तिकुञ्ज आया। उस समय उनका प्रवचन चल रहा था। प्रवचन के बाद मैं गुरुजी से मिला। उन्होंने मुझे होटल से कपड़े लाने और एक रात शान्तिकुञ्ज में रुकने के लिये कहा। मैं कपड़े लेकर शान्तिकुञ्ज आ गया। गुरुजी ने सुबह यज्ञ के बाद मिलने के लिये कहा।

जब मैं उनसे मिला तो बातचीत में मैंने बताया कि मैं अमेरिका जाने की योजना बना रहा हूँ। इस पर गुरुजी ने कहा कि बेटा मैं सब जानता हूँ। मैं तुम्हारा ध्यान रखूँगा। अमेरिका जाने से पहले मुझे एक पत्र जरूर लिख देना। मैंने अमेरिका जाने से पूर्व पत्र लिख दिया। 1980 में मैं अमेरिका गया। पहुँचते ही, अगले ही दिन मुझे नौकरी भी मिल गई। मैं हैरान हुआ। ऐसा लगा, जैसे वे मेरा ही इंतजार कर रहे हों। 2002 में रिटायर भी हो गया। 1980 से ही मैं गायत्री परिवार के कार्यों में संलग्न हूँ। यहाँ शाखा बनाई व गुरुजी की कृपा से जो भी बन पड़ता है, उनका काम करता रहता हूँ। गुरुवर के विषय में सोचता हूँ, तो यही लगता है जैसे उनका हमारा जन्म- जन्मांतरों का संबन्ध है। ऐसा आभास होता है, जैसे वे हर पल हमारे साथ हैं।

वो पूर्व जन्म की बहुत बड़ी भक्त थीं

भक्तिन अम्मा

       भक्तिन अम्मा बताती हैं कि रायपुर की श्रीमती शारदा मुझसे पहले शान्तिकुञ्ज आई थीं। वे नित्य प्रति परम वन्दनीया माताजी के प्रत्येक कमरे का सामान साफकर यथावत रखतीं, झाड़ूपोंछा करतीं, चादर बदलतीं। उन्होंने मिशन की बहुत सेवा की। उनके अंतिम क्षणों में गुरुजी- माताजी ने भी उनकी पुकार सुनी। सन् 86 में, मकर संक्रान्ति के ठीक सात दिन पहले उनकी तबियत खराब हुई। वे वशिष्ठ भवन में रहती थीं। परम वन्दनीया माताजी को जैसे ही खबर मिली उन्होंने उन्हें तुरन्त ऊपर बुलवा लिया। उन्हें दिल का दौरा पड़ा था। ऊपर भी वे तीसरे दिन भी बेहोश ही रहीं। नली (नाक में) द्वारा उनको आहार दिया जा रहा था। मैंने देखा, माताजी स्वयं उनके सिर को सहला रही हैं। उनके कपड़े, आवश्यक सामान को सहेजकर रख रही हैं।
      मृत्यु से तीन चार दिन पहले माताजी ने यह अनुभव किया कि वे गुरुजी से मिलना चाहती हैं। उस समय जबकि गुरुदेव किसी से नहीं मिलते थे। उतर कर नीचे (बीच वाली मंजिल पर) आये और उनसे मिले।

       गुरुजी ने उन्हें फूल की एक पँखुड़ी दी और कहा, जिस दिन ये सूखेगी उस दिन ये जाएँगी। शारदा अम्मा ने उनके दर्शन कर स्वयं को कृतार्थ अनुभव किया। सन्तोष की साँस ली और उसके तीसरे दिन प्राण त्याग दिये। उनके हाथ की मुटठी खोल कर देखा वह फूल की पँखुड़ी सूख चुकी थी। ऐसे थे परम कृपालु गुरुदेव, जो सच्चे मन से आराधना करने वाले की हर इच्छा पूर्ण करते थे।
    उनके शरीर छोड़ने पर माताजी ने कहा, ‘‘बेटा, वो पूर्व जन्म की बहुत बड़ी भक्त थीं।’’

पूर्व जन्म में तू ऋषि कन्या थी

डॉ. लक्ष्मण सिंह मनराल, अल्मोड़ा

    बात १९५९ के उत्तरार्द्ध की है। एक गोष्ठी में गुरुदेव बरेली में आत्मदानी श्री चमनलाल गौतम जी के निवास पर आयोजित गोष्ठी को संबोधित कर रहे थे। हजारों परिजन ध्यानमग्न गुरुवाणी सुन रहे थे। गुरुदेव का बोलना प्राणों को झंकृत कर देता था। जो एक बार उनकी बात सुनता सदा के लिए उनका अनुयायी हो जाता था। पास ही महिलाओं की कतार में एक युवती महिला ने ज्यों ही अपनी अंजलि फैलाई त्यों ही गुरुजी के चरणों के आस- पास बिखरे फूल स्वयं उड़कर (वहाँ न पंखा था न तेज हवा का झोंका) उस उस महिला की अंजलि में आकर समाने लगे। यह क्रम तब तक चलता रहा जब तक उसकी दोनों हाथों की अंजलि फूलों से भर नहीं गई। सारा पंडाल साँस रोके एक टक देख रहा था। मैं भी पास ही बैठा देखता रहा। शांत वातावरण में कुछ खलबली बढ़ी। गुरुदेव ने प्रवचन रोक दिया। वह महिला सकुचाती हुई अंजलि बाँधे ही अपने स्थान पर खड़ी हुई। संकोच के साथ बोली, ‘‘गुरुदेव, जब से मैंने आपकी स्त्रियों की गायत्री उपासना पुस्तक पढ़ी, तभी से मैंने गायत्री जप प्रारम्भ कर दिया। पूजा के मध्य एक दिन मैं अपनी अंजलि इसी प्रकार फैला बैठी वहाँ गायत्री माँ के चरणों में चढ़ाये पुष्प इसी प्रकार मेरी अंजलि में भरने लगे, मैं डर गई। परिवार वालों ने भला- बुरा कहा। स्वयं मैं भी घबरा गई, लेकिन मैंने उपासना नहीं छोड़ी। उपासनाकाल में जब भी मेरे दोनों हाथ अंजलि बाँधते हैं, फूल स्वयं भर आते हैं। मैं क्या करूँ, गुरुवर? मेरा मार्गदर्शन करने की कृपा करिये।’’

  गुरुदेव को हमने इतनी ध्यानमग्न मुद्रा में पहली बार देखा। फिर वे बोले, ‘‘बेटी, तू साधारण नारी नहीं है। पूर्व जन्म में तू ऋषि कन्या थी। यहाँ देवशक्तियों ने तेरे माध्यम से नारियों की गायत्री उपासना की पुष्टि कर दी है। इसमें घबराना कैसा? यह अत्यंत शुभप्रद लक्षण है। तुम अपनी उपासना जारी रखो।’’ गुरुदेव की बात सुनकर सभी परिजन श्रद्धावनत थे। बाद में गुरुजी ने स्वयं वे पुष्प स्वीकार किये और एक- एक पंखुड़ी वहाँ पर उपस्थित परिजनों को प्रसाद रूप में अपने हाथों से बाँटी। मेरे पास यह पुष्प खण्ड वर्षों तक सुरक्षित थे। आज भी जब हम उन साथियों से मिलते हैं जो उस दिन वहाँ उपस्थित थे, तो उस दृश्य की चर्चा अवश्य करते हैं।

बेटा यह पारस पत्थर है।

   ओरीजोत, बस्ती, उ०प्र० के श्री मिठाई लाल चौधरी जी बताते हैं कि परम पूज्य गुरुदेव की उनके जीवन में इतनी कृपा है कि उन्हें लगता है जैसे उनके सभी कार्य गुरुसत्ता ही पूरा करती है। वे कहते हैं कि सन् १९७७ की बात है। एक दिन रात्रि के समय गुरुदेव मेरे पैत्रिक निवास- ग्राम मनियारा, जनपद संत कबीर नगर में स्वप्न में सफेद धोती कुरता एवं जाकिट पहिने हुए आए। मुझे जगाया और बोले, ‘‘कहाँ भटक गये थे?’’ बस! उसी दिन से मैं गुरुदेव का हो गया।

    वर्ष १९७८ में गुरुदेव ने मुझे एक कागज पर अपने हाथ से गायत्री मंत्र लिखकर दिया और कहा, ‘‘बेटा, यह पारस पत्थर है। इसे किसी अच्छे कार्य में प्रयुक्त करोगे तो उसका भला हो जाएगा।’’ मैंने उसके माध्यम से बहुत से लोगों की सहायता की। गुरुजी के कहे अनुसार उसके माध्यम से बहुत से लोगों की समस्याएँ दूर हुईं। बहुतों को स्वास्थ्य लाभ मिला। यह पारस पत्थर उन्होंने 14 लोगों को दिया था। जिसमें से 12 लोगों का तो गायब हो गया। केवल मेरे पास और प्रतापगढ़ की कार्यकर्ता, बहन पुष्पा मौर्या के पास अभी तक सुरक्षित है।

    मार्च 1994 में मैं बीमार पड़ा। माताजी को पत्र लिखा। 17 मार्च 1994 को माताजी का पत्र मिला जिसमें लिखा था, ‘‘बेटा! आप्रेशन न कराना।’’ पर डाक्टरों ने आप्रेशन जरूरी बताया और मैंने आप्रेशन करा भी लिया। मेरे शरीर के तीन आप्रेशन हुए और दो बार सीरिंज से खींच कर मवाद निकाला गया। 23 मार्च से 12 मई 1994 तक लगभग 100 लीटर तक मवाद निकल गया होगा। बार- बार यही अहसास होता रहा कि माताजी की इच्छा के विरुद्ध आप्रेशन कराने के चलते ही इतना कष्ट झेलना पड़ा। 20 टाँके अब भी टूटे हुए हैं, पर फिर भी मैं स्वस्थ एवं प्रसन्नचित्त हूँ।

कितने संस्मरण गिनाऊँ, बस गुरुचरणों में समर्पित हूँ और उनके कार्यों में लगा रहता हूँ।

तेरा प्राण प्रत्यावर्तन तो हो गया।

श्री कृष्ण अग्रवाल

    घटना सन् 73 की है। शान्तिकुञ्ज में पूज्य गुरुदेव प्राण प्रत्यावर्तन सत्र चला रहे थे। विदित हो कि उस समय तक उस सत्र के लिये परिजनों द्वारा स्वीकृति हेतु आवेदन नहीं भेजा गया था। पूज्य गुरुदेव ने स्वयं ही कुछ कार्यकर्ताओं को प्राण प्रत्यावर्तन सत्र की स्वीकृति भेजी थी।

    मुझे इसी पत्र ने अधिक घनिष्ठता से जोड़ा, क्योंकि पत्र पाकर मुझे लगा कि मुझे गुरुजी याद करते हैं। बिना आवेदन के ही स्वीकृति आ गई।
मैंने जवाब दिया कि जून में मेरी बहन कौशिल्या की शादी है, उसे निपटाकर मैं तुरन्त हरिद्वार आऊँगा। विवाह से आठ दिन पूर्व मैं शादी का सामान लाने हेतु तेन्दुकोना बागबाहरा (छत्तीसगढ़) से गोंदिया जा रहा था। रायपुर में ट्रेन बदलनी थी। जैसे ही ट्रेन आई,धीरे हुई, हड़बड़ी में मैंने ट्रेन में चढ़ने की कोशिश में एक बोगी के दरवाजे का डंडा पकड़ लिया। किन्तु भीड़ के कारण मेरा पैर, पायदान तक ही पहुँच सका। मैं एक प्रकार से लटक गया। लटके- लटके तीन बोगी जितनी दूरी तक घिसट गया। हाथ में डंडा, सामने प्लेटफार्म, आधा शरीर गाड़ी में, आधा प्लेटफार्म के नीचे। उस हादसे को स्मरण कर आज भी रोंगटे खड़े हो जाते हैं। ईश्वर किसी को ऐसा दिन न दिखाये।

     किन्तु होनी तो होनी है, गाड़ी धीरे हुई। हाथ में डंडा पकड़े हुए सारे शरीर का वजन संभाले मैं थक गया था। गाड़ी अभी धीमी ही थी, पर अकल काम नहीं की। मुझे लगा गाड़ी रुक गई और डंडा हाथ से छोड़ दिया। मैं सीधा नीचे पाँत के पास गिर पड़ा। गाड़ी धीरे- धीरे सरक रही थी। अब क्या करें? भगवान ने सद्बुद्धि दी, प्लेटफार्म थोड़ा सामने की तरफ आगे निकला हुआ था। उसी बीच दुबक कर बैठ गया। पुनः तीन डब्बे के लगभग गाड़ी सरकी, फिर रुकी। जैसे- तैसे पटरी के बीच में से जाकर धीरे- धीरे दो डब्बों के बीच के गैप तक आया। यहीं से धीरे से प्लेटफार्म पर चढ़ा और जाकर एक डिब्बे में बैठ गया। मेरे हाथ- पैर बुरी तरह कांप रहे थे। कई खरोंचें आई थीं, खून बह रहा था। उस समय रात्रि के आठ बज रहे थे। मेरी स्थिति देखकर एक व्यक्ति ने पूछा, ‘‘भाई साहब काँप क्यों रहे हैं? क्या बात है?’’ मैंने पूरी राम कथा सुनाई। उन्होंने कहा, ‘‘भाई साहब, पूरी धोती लाल हो गई है। ट्रेन तो गोंदिया सुबह पहुँचेगी, तब तक आपकी हालत और खराब हो जायेगी। अच्छा हो, आपका कोई परिचय हो तो ब्रेक जर्नी ले लीजिये व डॉक्टर से तुरन्त इलाज करा लें अन्यथा परेशानी में पड़ सकते हैं।’’

      मुझे उनकी सलाह अच्छी लगी। मैंने ब्रेकजर्नी लिखवाई और ढूँढते- खोजते परिचय के एक व्यापारी के घर पहुँच गया। वहाँ बैठा तो गद्दी खून से लाल हो गई। उन्हें अपनी स्थिति बताई व डॉक्टर हेतु पूछा। उन्होंने कहा, ‘‘अब तो देर हो गई है। सभी दवाखाने बंद हो चुके हैं। सुबह ही कुछ व्यवस्था हो सकेगी।’’ निराश हो मैं घर से बाहर पान की दुकान तक गया कि कुछ पूछताछ करूँ। बाहर पान वाले से चर्चा की तो वह भी सुबह की बात कहने लगा। इतने में एक बारह- चौदह साल का लड़का वहाँ आया, उसने सारी बातें सुनीं। वह बोला, ‘‘दवाई तो मैं बता सकता हूँ पर जलन होगी, सहना पड़ेगा।’’ मरता क्या न करता? नहीं से तो अच्छा है जलन ही सह लिया जाय। सोचकर कहा, ‘‘आप बताइये तो सही, जितना सह पायेंगे- सहेगें।’’ उसने पान वाले से कहा, ‘‘दवाई तो तुम्हारे पास है। कत्था और चूना मिला कर दे दो, लगाते हैं।’’

     पान वाले ने कत्था चूना मिलाकर दिया तो मैंने बालक से कहा, ‘‘आप ही लगा दीजिए।’’ वह तैयार हो गया और सभी जगहों में लगाने लगा, हाथ, पीठ, छाती, पेट सभी जगह लगाया। वह दवाई लगा रहा था तो मुझे ठंडक अनुभव हो रही थी। मैं मन ही मन सोचने लगा कि इसने तो कहा था जलन होगी पर मुझे तो ठंडक लग रही है। जब वह पैर में लगाने लगा तो मेरा नियम था मैं, पैर किसी से छुआता नहीं था। अतः मैंने कहा, ‘‘आप पैर मत छुइये, दीजिए मैं लगा लेता हूँ।’’ उसने दवाई मुझे दे दी। मैं पैर में लगाने को झुका और जैसे ही दवा लगाया वहाँ मुझे तीव्र जलन हुई। कराहते हुए मैंने सोचा कि आने वाले बालक को धन्यवाद तो दे दूँ। किन्तु पैर में दवा लगाते तक जाने वह कहाँ रफूचक्कर हो गया। पान वाले से पूछा, ‘‘वह लड़का कहाँ गया?’’ वह बोला, ‘‘बाबूजी, मैंने भी नहीं देखा। मैं तो आपके पैर की तरफ देख रहा था।’’ अंर्तयामी अपना काम कर अंतर्ध्यान हो चुके थे, पर मैं समझ न सका।
     ध्यान में ही नहीं आया कि यह किसी की कृपा है, दूसरे दिन गोंदिया गया। सामान लेकर आया। विवाह सम्पन्न हो गया।

इसके बाद जब शान्तिकुञ्ज पहुँचा, गुरुजी से मिलने गया तो उन्होंने कहा, ‘‘आ बेटा आ! तेरा ही इंतजार कर रहा था। अब तुझे प्राण प्रत्यावर्तन की कोई जरूरत नहीं। तेरा तो प्राण प्रत्यावर्तन मैंने पहले ही कर दिया है। बेटे! चलती ट्रेन में चढ़ने का दुस्साहस कर तूने तो पागलपन ही कर दिया। पर पता है! तेरे इस काम के लिये, तेरे पास जाने में, मुझे कितनी तकलीफ उठानी पड़ी।’’ तब मुझे समझ में आया कि उस रात्रि में, जो बालक आकर दवाई बताया और लगाया वह और कोई नहीं, स्वयं पूज्यवर ही थे। इसीलिये उनके हाथ से लगी दवाई ठंडक पहुँचा रही थी और जब मैंने लगाई तब जलन हुई।
मैं कृतज्ञता से भर गया। आँखों के सामने वह सारा दृश्य घूम गया। सोचने लगा, उस रात वे न आते तो क्या होता? उसी कृतज्ञता ने मुझे पूर्ण समर्पित कार्यकर्ता के रूप में बदल दिया।

अमरकंटक शक्तिपीठ तुझे ही बनाना है

श्री लक्ष्मण अग्रवाल बिलासपुर

     बात सन् 1979 की है। पूज्य गुरुदेव ने चौबीस तीर्थों में चौबीस गायत्री शक्ति पीठ बनाने का संकल्प ले लिया था। जिम्मेदारी देने हेतु परिजनों के मजबूत कन्धे ढूँढ़े जा रहे थे। इन्हीं दिनों की याद करते हुए श्री अग्रवाल जी कहते हैं- ‘‘मुझे एक दिन दोपहर बारह बजे एक टेलिग्राम मिला। टेलिग्राम हरिद्वार से था। जिसमें लिखा था कि फौरन हरिद्वार चले आओ। उसी दिन डेढ़- दो बजे के लगभग श्री शिवप्रसाद मिश्रा जी भी हरिद्वार से पहुँचे और कहा- ‘‘गुरुजी ने आपको तत्काल बुलाया है।’’ मैं आश्चर्य में पड़ गया। सोचने लगा, ‘‘ऐसी क्या बात हो गई? टेलीग्राम भी आया व मिश्रा जी भी कह रहे हैं।’’ चर्चा के दौरान मिश्रा जी ने बताया कि शायद गुरुजी आपसे अमरकंटक में शक्तिपीठ बनाने हेतु चर्चा करें। उन्होंने कहा है, ‘‘अमरकंटक हेतु अग्रवाल जी को बुला लो, बात समझ में आई।’’

    अपना सौभाग्य मान कर हम दम्पत्ति, मिश्रा जी के साथ ही रवाना हो गये। गुरुदेव तो जैसे इंतजार में ही थे। पहुँचते ही कहा- ‘‘बेटा! तुझे ही देख रहा था। देख, मैंने देश के चौबीस तीर्थों में चौबीस गायत्री शक्तिपीठ बनाने का निर्णय लिया है। अमरकंटक की शक्तिपीठ तू बना ले।’’ अग्रवाल जी कुछ क्षण मौन रहे। फिर बोले- ‘‘गुरुजी, अमरकंटक बिलासपुर से दो ढाई सौ किलोमीटर दूर पड़ता है। मुझसे अकेले बनाना तो संभव नहीं है।’’ पूज्यवर ने पुनः कहा- ‘‘देख बेटा! अमरकंटक शक्तिपीठ बनाना तो तुझे ही है। तेरी सहायता हम करेंगे।’’ अग्रवाल जी ने फिर कहा- ‘‘गुरुजी! अमरकंटक म
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