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Books - ऋषि युग्म की झलक-झाँकी-1

Media: TEXT
Language: HINDI
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यह तो गूँगे का गुड़ है

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   वे परिजन जो पूज्य गुरुदेव के साथ मथुरा से जुड़े और फिर उनके बुलाने पर शान्तिकुञ्ज भी आ गये। यहीं के हो कर रह गये। जिन्हें गुुरुदेव ने नींव के पत्थर कहा है उनके पास इतने संस्मरण हैं कि यदि सबको प्रकाशित किया जाय तो वाङ्मय के 108 खण्ड भी कम पड़ जायेंगे। उनके निजी जीवन के अनुभवों को तो वे प्रकट भी नहीं करना चाहते। यदि कभी करते भी हैं तो उन्हें प्रकाशन में लाना नहीं चाहते। वे उन क्षणों को याद कर भाव- विभोर होकर बस यही कहते हैं, ‘‘यह तो गूँगे का गुड़ है। जो स्वाद हमने चखा है, उसे बयान करने के लिये शब्द नहीं हैं। बेटा! हमारा जीवन सफल हो गया। हम तो जन्म- जन्मांतरों के लिये अपने गुरु के ऋणी हो गये हैं। हर जन्म उनके साथ रहें, बस यही तमन्ना है।’’

एक बात जो सब कोई कहते हैं, वह यह कि गुरुदेव का जीवन- व्यवहार अति सरल और सादगी भरा था। उनके सादे वेश को देखकर पहली नज़र में तो हर कोई आश्चर्य से भर जाता था कि यही वे उच्च कोटि के संत हैं जिनसे मैं मिलने आया हूँ। संत इतने सरल भी होते हैं। जाने कौन सा चुंबक था, क्या आकर्षण था उनके भीतर कि फिर उस क्षण भर की मुलाकात में ही वह उनका होकर रह जाता था।

सादगी के आवरण में वे स्वयं के अलौकिक स्वरूप को छिपाये रहते थे। उनके साथ रहते हुए हमने अपनी आराध्य सत्ता के विभिन्न रूपों का दर्शन किया है। कभी- कभी हँसी- मजाक करते हुए या सहज बातचीत के क्रम में वे अपने- आप को प्रकट भी करते थे। अचानक कुछ ऐसे वाक्य बोल जाते कि हमें लगता कि कहीं वे अवतारी चेतना तो नहीं। परंतु जब तक हमारा ध्यान उनके संकेतों की ओर जाता, वे बात पलट देते थे।

जब कभी किसी परिजन पर कष्ट पड़ा या हृदय से किसी ने उन्हें पुकारा तब उन्होंने उसे अपने भगवत् स्वरूप के दर्शन भी कराये हैं। प्रस्तुत हैं कुछ ऐसे परिजनों के संस्मरण जो उनके साथ लंबे समय तक रहे हैं।

श्री देवराम पटेल

गुरुजी जब युग निर्माण की नींव रख रहे थे, तब उन्होंने स्वयं को सरलता व सादगी के आवरण में इस प्रकार छिपा कर रखा कि उनके साथ रहने वाला भी जान नहीं पाया कि वह साक्षात् भगवद् चेतना के साथ है। और जब लोगों ने उन्हें पहचानना प्रारंभ किया तब उन्होंने स्वयं को एक कमरे में कैद कर लिया। अपने जीवन काल के अंतिम कुछ वर्षों में गुरुजी ने सबसे मिलना छोड़ दिया था।

गुरुदेव के साथ हरिद्वार आने वाले व शान्तिकुञ्ज के निर्माण कार्य की देखरेख करने वाले पहले कार्यकर्ता श्री रामचंद्र जी थे। सन् 1968 में रामचंद्र जी मथुरा आये थे। उसी समय गुरुजी ने हरिद्वार में शान्तिकुञ्ज के लिये जमीन ली थी। उन्होंने रामचंद्र जी से कहा, ‘‘तुम हमारे काम के लिये शान्तिकुञ्ज चलो।’’ रामचंद्र जी बोले, ‘‘गुरुजी, वहाँ रहने की कुछ व्यवस्था हो जाये, तब तो मैं जाऊँ।’’ तब गुुरुजी बोले, ‘‘बनने पर तो बहुत लोग पहुँच जायेंगे। तुम बनाने में हमारा सहयोग करो।’’

   रामचंद्र जी गुरुजी के साथ हरिद्वार आ गये। यहाँ आकर एक झोंपड़ी बनाई गई। जिसमें रामचंद्र जी रहने लगे। उसमें केवल एक खाट डालने जितनी ही जगह थी। उन दिनों गुरुजी मथुरा में ही रहते थे। गुरुजी के जीवन में इतनी सादगी थी कि शान्तिकुञ्ज के निर्माण कार्य की देखरेख करने जब भी आते उसी झोंपड़ी में उनके लिये खाना बनता। रामचंद्र जी बाहर खाट बिछा देते। गुरुजी वहीं बैठ कर खना खा लेते। सोने के लिये सप्तऋषि आश्रम चले जाते।
 
एक बार रामचंद्र जी ने कहा, ‘‘गुरुजी, कम से कम दो खाट पड़ने लायक जगह तो बना दो। आप बाहर बैठते हैं तो अच्छा नहीं लगता। गुरुजी बोले, ‘‘कैदी जेल में रहता है न, तो इसको जेल मान लो।’’ इस प्रकार कितनी सरलता से उन्होंने सामंजस्य बिठा कर चलने की बात समझा दी। इतनी सरलता थी उनके व्यक्तित्व में।

   अपने निजी खर्च के संबंध में वे बड़े कठोर रहते थे। यह सन् 1968- 69 की बात है। शान्तिकुञ्ज अभी बन ही रहा था। चारों ओर जंगल था। ईंट लाने, ठेकेदार से बात करने व अन्य बहुत से कार्यों के लिये शहर जाना पड़ता था। उन दिनों इस क्षेत्र में आवागमन का कोई साधन नहीं था। गुरुजी के मन में आया एक साईकिल खरीद लेते हैं। अपने साथ ज्यादा पैसा वे लाये नहीं थे अतः आधा पैसा स्वयं दिया व आधा पैसा रामचंद्र जी से लिया और साईकिल खरीद ली गई। उसी साईकिल से रामचंद्र जी के साथ साईकिल पर पीछे बैठ कर ईंट भट्ठे वाले के पास चले जाते।

जहाँ भी जाते सामान नकद ही खरीदते थे। उधार कभी नहीं करते थे। न ही किसी से अनावश्यक सेवा ही लेते। एक बार एक भट्ठे वाले के पास ईंट का आर्डर दिया और पैसा भी दिया। भट्ठे वाले ने कहा, ‘‘हम आपको स्कूटर पर छोड़ देते हैं।’’ इस पर गुरुजी बोले, ‘‘नहीं, नहीं, हमारी तो रामचंद्र जी की साईकिल ही ठीक है।’’

प्रारंभ में जब बगीचा लगाया गया तो रामचंद्र जी के साथ स्वयं सब नर्सरियों में जाते थे। वहाँ से पौध आदि खरीद कर लाते थे। बगीचा लगाने में उनकी मदद भी करते। स्वयं कुदाली लेकर गड्ढे भी बनाते। बारिश के दिनों में नेकर पहन लेते और सिर पर पॉलीथीन की थैली लपेट लेते। वे गड्ढे खोदते जाते और रामचंद्र जी बताया करते थे कि मैं, उनमें पौधे रोपता जाता।

श्री देवराम पटेल जी बताते हैं कि मथुरा में, मैं जब शुरू- शुरू में आया तो एक दिन मैंने उनके पैर पकड़ लिये। मुझे पता नहीं चला कि क्या हुआ। मैं बहुत देर तक उनके पैर पकड़े रहा। जब बहुत देर हो गई तो गुरुजी बोले अब छोड़ दे और मुझे उठाया। फिर बोले, अब तो आ गये, अब कहाँ जाओगे? बात साधारण थी पर अलौकिक थी, क्योंकि उसके बाद मैं उन्हीं का हो गया। साधारण में भी कितनी असाधारण बात कह दी थी उन्होंने, इसका रहस्य तो वे ही जानते थे। 1969 में मैंने उनके दर्शन किये, 1969 में ही मैंने मथुरा में नौ दिन का सत्र किया। 1970 में तीन माह का समयदान और सन् 1971 में मैं शान्तिकुञ्ज आ गया। शान्तिकुञ्ज आया तो फिर यहीं का हो गया।

    गुरुजी का व्यवहार इतना सरल था कि उन्हें देखकर कोई समझ ही नहीं पाता था कि वे इतने बड़े महापुरुष हैं। एक बार वे नीचे किसी काम में व्यस्त थे। उन्हें भूख लगी। ठण्ड के दिन थे। बगीचे में टमाटर, मूली आदि लगा था। रामचंद्र जी पौधों को पानी दे रहे थे। उस समय यहाँ दो- चार ही परिवार थे। कोई मूली को पूछता तक नहीं था।

गुरुजी ने दो मूली उखाड़ी। रामचंद्र जी से उसे धुलवाया, कटवाया और बोले, ‘‘जाओ, माताजी से नमक ले आओ’’ और उन्होंने वहीं बैठकर मूली खा ली और बोले ‘‘नाश्ता हो गया, चलो काम करते हैं।’’

    वे समय को इतना महत्त्व देते थे कि किसी कारणवश एक क्षण भी यदि खाली हो तो उसके सदुपयोग की बात सोचते। एक दिन एक सज्जन उनसे मिलने आने वाले थे। उनको देर हो गई। गुरुजी उनका इंतजार कर रहे थे। उन्होंने सोचा, कोई और काम नहीं है तो चलो, भोजन ही कर लेते हैं। उन्होंने माताजी को फोन किया ‘‘माताजी, भोजन करने आ जाऊँ।’’ माताजी बोलीं, ‘‘अभी तो एक ही बजा है!’’ गुरुजी 3ः00- 4ः00 बजे तक भोजन करते थे। बोले, ‘‘अच्छा! अभी एक ही बजा है क्या? अच्छा! अच्छा! ठीक है।’’

हम 10- 11 बजे के लगभग कभी गुरुजी के पास जाते तो कभी- कभी वे लेख लिख रहे होते। हम चुप- चाप जाकर खड़े हो जाते और उनका लेखन पूरा होने का इंतजार करते। गुरुजी लेख पूरा हो जाने पर जब नज़र उठा कर मुझे खड़ा देखते तो कहते, अरे! कब से खड़े हो? बोल देते! तुम्हारा इतना समय बरबाद नहीं होता। गुरुजी, आप लिख रहे थे। आपको डिस्टर्ब होता। अरे! मैं बाद में भी लिख लेता। इस प्रकार वे दूसरों के समय को भी महत्त्व देते थे।
   वे काम को इतना महत्त्व देते थे कि काम के आगे भोजन को भी उन्होंने कभी महत्त्व नहीं दिया। हम कभी भी पहुँच जाते थे। कभी- कभी समय का ध्यान नहीं रहता था, तो ऐसे स    मय भी पहुँच जाते, जब वे भोजन कर रहे होते। भोजन करना बीच में ही छोड़कर पूछते, ‘‘बताओ क्या काम है?’’ मुझे अक्सर काम के ही सिलसिले में जाना पड़ता था। मैं चुप रहता, नहीं बताता तो भी खाना बीच में ही छोड़कर उठ जाते। कहते, ‘‘अच्छा चलो।’’ माताजी कभी- कभी स्नेह भरी नाराजगी प्रकट करतीं ‘‘दुष्ट लोग, आचार्य जी को भोजन भी करने नहीं देते।’’

भोजन ठीक से नहीं करने पर काम करते- करते उन्हें भूख भी लग जाती थी। माताजी उन्हें भुने चने दे देती थीं। कभी भूख लगने पर उन्हें ही मुट्ठी भर खा लेते।

उन दिनों गुड़िया दीदी, (गुरुजी की पोती) यहीं रहती थी। वह गुरुजी के आस पास डोलती रहती, कहती ‘‘दादाजी, चीज दो।’’ गुरुजी कहते, ‘‘जा माताजी से ले ले।’’ वह कहती, ‘‘दादाजी, आपके पास चने हैं न।’’ गुरुजी हँसते और ‘‘अच्छा, अच्छा! ले लो,’’ कहकर उसे दे देते।

     काम की धुन इतनी रहती थी कि एक बार सुबह- सुबह चार बजे ही सबको बुला लिया। हम सब आँख मलते हुए भागे- भागे गुरुजी के पास पहुँचे। जब कभी कोई महत्त्वपूर्ण योजना उनके मन में आती तो वे समय का इंतजार नहीं करते थे। कभी भी बुला लेते थे, फिर चाहे सुबह के चार ही क्यों न बजे हों?

    वे व्यावहारिकता को भी महत्त्व देते थे। एक बार साँप आ गया और फन फैला कर बैठ गया। फुफकारने लगा। गुरुजी खटिया पर लेटे थे। जैसे ही उन्होंने देखा, तत्काल कहा, ‘‘ये काल है, मारो इसे। किसी को काट देगा तो?’’ हम सब खड़े थे। सोच रहे थे, कैसे मारें? गुरुजी बोले ‘‘अच्छा! तुम लोग नहीं मारते। लाओ, मैं मार देता हूँ।’’ उस समय जाँजगीर चाँपा के एक भाई, श्री छेदी लाल साहू जी आये हुए थे। वे तुरंत लाठी लेकर आये और उस साँप को मार दिया।

    इतना सरल व्यवहार था उनका कि जैसे बड़े साधारण हों। वे सदा स्वयं को छिपाये रहे। इसीलिये कहते भी थे, ‘‘मुझे मेरा काम कर लेने दो। जिसके लिये मैं आया हूँ। अभी लोग जान जायेंगे, तो हर की पैड़ी तक लाईन लग जायेगी। इसलिये तुम लोग मुझे चुप- चाप काम कर लेने दो। मेरे जाने के बाद लोग मुझे जानेंगे।’’

    हम लोग कभी- कभी काम की अधिकता के कारण गुरुजी से मिलने नहीं जाते थे। सोचते थे कि काम तो गुरुजी का ही कर रहे हैं। व्यर्थ उनका भी और अपना भी समय क्यों खर्च करें। तब कभी- कभी गुरुजी कहते थे, तुम लोग अभी आ नहीं रहे हो। आगे चलकर मेरी चरण पादुका पर प्रणाम करने के लिये भी धक्के खाओगे। इतनी लम्बी लाईन लगी रहा करेगी।

     मेरा परिवार गुरुजी से जुड़ा तो बहुत पहले से था पर मैं पहली बार जनवरी 1969, में बिलासपुर में गुरुजी से मिला। उस समय गुरुजी वहाँ एक सभा में आये थे। उस समय बिलासपुर में ‘ग्रेजुएट कान्फ्रेंस, ठाकुर छेदीलाल सहकारी सभा कक्ष’ में उन्होंने कहा था, ‘‘यह स्थान नोट कर लो। मेरा यह भाषण नोट कर लो और समय नोट कर लो। ये भाषण मैं कहाँ- कहाँ कर रहा हूँ, पता लगा लेना।’’ उस सभा में बिलासपुर के कर्मठ कार्यकर्ता श्री रामाधार विश्वकर्मा जी व उमाशंकर चतुर्वेदी जी भी थे। इन दोनों भाईयों ने बाद में पता लगाया था। गुरुजी का वह प्रवचन उसी समय में पाँच जगहों में हुआ था। जिसमें से एक कलकत्ता, एक ग्वालियर में हुआ था।

    गुरुजी अपने संकल्पों के बड़े पक्के थे। जो एक बार निश्चय कर लिया है वह फिर टूट नहीं सकता। मथुरा छोड़ने पर उन्होंने अपने निजी परिवार के कार्यों से मुक्त हो जाने का संकल्प ले लिया था। एक बार माताजी बिमार थीं। सतीश भाई साहब को चिट्ठी लिखनी थी। माताजी जिस भाई के द्वारा उन्हें पत्र लिखवाती थीं, वे किसी कारणवश अपने घर गये हुये थे। गुरुजी बोले चिट्ठी पटेल लिख देगा। माताजी बोलीं अगर देवराम लिख देगा तो सतीश यह समझेगा कि माताजी बहुत बीमार हैं। वह परेशान हो जायेगा, इसलिये लाईये मैं ही अपने हाथ से धीरे- धीरे लिख देती हूँ। माताजी ने ही चिट्ठी लिखी किन्तु गुरुजी ने नहीं लिखी। कारण, वे मथुरा से विदाई ले चुके थे। अपने नियमों के प्रति बहुत कठोर थे। परिवार से विदाई ले ली, तो ले ली। सारा विश्व ही मेरा परिवार है। फिर उतने छोटे परिवार को ही कैसा महत्त्व।

वे शान्तिकुञ्ज में ठहरने, विशेषतः रात रुकने को बहुत महत्त्व देते थे। माताजी अपनी गोष्ठियों में भी कहती थीं, ‘‘बेटा, रात को जब तुम लोग सो जाते हो, तब हम और गुरुजी एक- एक के सिरहाने जाते हैं और तुम लोगों की ब्रेन वाशिंग करते हैं। जन्म- जन्मांतरों के कुसंस्कारों को साफ करते हैं।’’
   
ठहरने के संदर्भ में गुरुजी चाहते थे कि परिजन शान्तिकुञ्ज में ही ठहरें भले ही थोड़ी- बहुत असुविधा होती हो पर आश्रम के वातावरण में ही रहें। एक बार श्री रामाधार जी शान्तिकुञ्ज आये। उन दिनों शान्तिकुञ्ज बहुत छोटा था। रामाधार जी परिवार समेत आये थे व परमार्थ आश्रम में ठहरे थे। गुरुजी ने पूछा, ‘‘बेटा कहाँ ठहरा है?’’ वह बोले, ‘‘गुरुजी, यहाँ दिक्कत होती इसलिये परमार्थ आश्रम में ठहरा हूँ।’’ गुरुजी ने तुरंत डॉक्टर साहब को बुलाया और बोले, ‘‘प्रणव, इन बच्चों के लिये शान्तिकुञ्ज में जगह नहीं है, इसलिये तुम लोग भी बाहर ही ठहरो।’’ फिर उन्हें बोले, ‘‘जाओ तुरंत अपना सामान लाओ और यहीं ठहरो। जैसी भी जगह मिले।’’

    उन्हें अपनी भूल का एहसास हुआ। वे तुरंत गये, अपना सामान ले आये और शान्तिकुञ्ज में ही रुके।

   गुरुजी प्रेरणाप्रद चीजों को सदा महत्त्व देते थे। गांधी पिक्चर तब नई- नई आई थी। हरिद्वार में भी दिखाई जा रही थी। उस समय गुरुजी ने सबको 2- 2 रुपये दिये थे और गांधी पिक्चर देखने के लिये कहा था।

   इसी प्रकार तब स्लाईड प्रोजेक्टर अभी नया- नया ही आया था। उन्होंने मिशन के प्रचार प्रसार के लिये स्लाईड बनवाईं और बाकायदा उसका प्रशिक्षण दिला कर परिजनों को प्रचार- प्रसार हेतु तैयार व प्रोत्साहित किया।

माताजी अपने लिये खर्च के मामले में तो बहुत ही कठोर थीं। अन्य सामान के विषय में भी समझातीं, ‘‘देखो, कम कीमत में बढ़िया सामान होना चाहिये। दो- चार दुकान घूमो और दाम पूछो व सामान देखो। जहाँ कम दाम में बढ़िया सामान मिले, वहाँ से लो, क्योंकि नकद ले रहे हो।’’

   माताजी, गुरुजी की छाया के रूप में रहीं। उन्हें लोग जान भी नहीं पाये। वे गुरुजी की आड़ में स्वयं को छिपाये रहीं। लोगों ने उनका स्वरुप तो तब जाना जब वे अश्वमेध यज्ञों में गईं। लोगों ने उनके प्रवचन सुने, उनके आशीर्वादों से निहाल हुए, तब लोग उन्हें जान पाये। गुरुजी का संदेश देश- विदेश में फैला कर, थोड़े ही समय में अपना स्वरूप दिखा कर जल्दी ही उन्होंने अपनी लीला समेट ली।

   माताजी के पास हजारों चिट्ठियाँ आती थीं। सबको पढ़ना, जवाब देना कठिन काम था, पर वे बड़ी सहजता से करती चली जाती थीं। प्रारंभ के दिनों में हमें भी एक दिन में 80- 90 पत्र लिखने पड़ते थे। उतनी चिट्ठी पढ़ना और जवाब देना सरल काम नहीं था। हम कैसे करते थे, यह हमें भी नहीं पता। ऐसा लगता था जैसे कोई दिमाग में बैठ कर लिखा रहा है। कभी- कभार एक- आध चिट्ठी का जवाब हम पढ़ लेते तो स्वयं आश्चर्य करते थे। ऐसी विलक्षण शक्ति थी माताजी की।

    कभी- कभी माताजी बोलतीं, तुम लोग सोचते हो बढ़िया चिट्ठी से बढ़िया आशीर्वाद मिलेगा। हम आशीर्वाद देंगे, तभी तो आशीर्वाद मिलेगा? कलेक्टर की चिट्ठी कलर्क लिखता है, पर जब तक उस पर कलेक्टर के दस्तखत नहीं होते, उसकी क्या कीमत? जब हम दस्तखत करेंगे, तभी तो उसकी कीमत होगी।

   वात्सल्य इतना था कि अपनी माँ भी क्या ध्यान रखती होगी? उन दिनों माताजी के पास ऊपर चौके में ही चाय बनती थी। हम पहले चाय नहीं पीते थे। यहाँ आये तो माताजी के दर्शन के पश्चात् चुप- चाप नीचे उतरने लगते तो माताजी जाने कैसे देख लेती थी। तुरंत बोलतीं, छोरा भाग रहा है, बुला। फिर पूछतीं चाय नहीं पी? यहाँ ठण्ड है, चाय नहीं पियेगा तो मरेगा क्या? चल! चाय पी।

   कभी- कभी परिजनों को डाँट कर भी भोजन करा देतीं। एक बार एक परिजन श्री एस. एन. सिंह जी आये। वे बोले, ‘‘माताजी मैं तो रोटी ही खाता हूँ। चावल मुझे नुक्सान करता है।’’ इस पर माताजी बोलीं, ‘‘देख बेटा, इसे चावल ही चावल खिलाना। देखती हूँ, कैसे नुक्सान करता है?’’ और वास्तव में उन्हें कुछ नहीं हुआ।

प्राण प्रत्यावर्तन शिविर में आखिरी दिन सबको पूड़ी- कचौड़ी खिलाती थीं। साथ में रास्ते के लिये बाँध कर भी देती थीं। कहतीं, ‘‘इतने दिन उपवास किया है, मन ललचायेगा, पर तुम लोग बाहर की चीज मत खाना। इसे ले जाओ, रास्ते में यही खाना। घर पहुँचकर घर का बना खाना ही खाना।’’

    एक बार गुरुजी ने पत्र व्यवहार के क्रम में बुलाया। एक चिट्ठी दिखाते हुए उन्होंने पूछा, ‘‘इसे जानते हो?’’ उस समय चौके में टीकमगढ़ की एक लड़की रहती थी, सुधा श्रीवास्तव, उसके पिता हरी राम श्रीवास्तव जी का पत्र था। मैंने कहा, ‘‘जानता हूँ गुरुजी, सुधा के पिता जी हैं।’’ पत्र में समाचार लिखा था, उन्हें पुत्र प्रप्ति हुई है। गुरुजी बताने लगे, ‘‘यह साल भर पहले आया था और मेरे साथ घूमने गया था। (गुरुजी हर मिलने वाले से उसका हाल- चाल, कष्ट- कठिनाई पूछते थे।) मैंने इसे खोद- खोद कर पूछा तब इसने बस इतना ही बताया कि मेरी छः लड़कियाँ हैं।’’

   फिर बोले, ‘‘बेटा, इसे माताजी की तरफ से चिट्ठी लिख देना कि तुम्हारी सारी लड़कियों की शादी हम अच्छे घरों में कराएंगे और तुम्हारा लड़का संस्कारवान् होगा।’’

श्री देवराम पटेल जी की पत्नी बताती हैं कि जब वे सन्1971 में शान्तिकुञ्ज आईं तो उन दिनों में यहाँ चारों ओर जंगल था। कोई विशेष आबादी भी नहीं थी। कुछ भी सामान लाना हो तो शहर जाना पड़ता था। मैं भरा- पूरा घर छोड़ कर आई थी, मेरी भाषा भी थोड़ी अलग थी। सो मुझे घर की बहुत याद आती थी। पर माताजी तो माताजी, वह सबके मन की बात जान जाती थीं। एक दिन मुझे बुलाया और बोलीं, ‘‘घर की याद आती है? माँ की याद आती है? मैं हूँ न तेरी माँ। तू मेरे पास आ जाया कर। मैं तुम्हारी माँ, बाप सब हूँ। लो पानी पियो।’’ उन्होंने मुझे अपने हाथ से पानी पिलाया। मेरा मन भर आया, पर उस दिन के बाद मुझे कभी घर की याद नहीं आई। लगा ही नहीं कि मैं घर से कहीं बाहर हूँ।

   सुबह माताजी के साथ आरती करते। भजन गाते। माताजी कुछ न कुछ बात व चुटकुला आदि सुनाकर खूब हँसाती। एक बार बोलीं, ‘‘चलो छोरियो! चूल्हा बनाते हैं।’’ गये तो देखा, माताजी ने खूब सुंदर मिट्टी का चूल्हा बना कर रखा था। क्योंकि हम छत्तीसगढ़ के हैं, सो हमें रोटी बनानी नहीं आती थी। माताजी ने अपने हाथ से हमें रोटी बेलना सिखाया। कहतीं, ‘‘आ छोरी! तुझे रोटी बनाना सिखाऊँ।’’ बाजरे की रोटी, मक्के की रोटी, पूरी, कचौरी, माताजी सब कुछ बनाना जानती थीं। रोटी तो वो फटाफट हाथ से ही बनाती थीं। उसके लिये उन्हें चकले- बेलन की जरूरत नहीं पड़ती थी।

   माताजी सब काम जानती थीं। शायद ही कोई काम ऐसा होगा, जो उनसे छूटा हो। गाना- बजाना, लिखना- पढ़ना, सिलना आदि वे सब जानती थीं। प्रारंभ के एक दो साल तो ऐसे कटे, जैसे हम माताजी के साथ पिकनिक मना रहे हों। माताजी दिन भर हँसते- हँसाते किसी न किसी काम में व्यस्त रखती थीं। दोपहर के समय खाना बनाना व गाना- बजाना सब होता। माताजी ढोलक बहुत बढ़िया बजाती थीं।

    वे हारमोनियम लेकर बैठतीं तो किसी भी गीत की धुन तुरंत निकाल लेती थीं। माताजी का प्रिय गीत था, ‘‘मैंने तेरी गीता गाई। टूटी फूटी भाषा में भर, जग के कानों तक पहुँचाई। .....गंगा से गंगा जल लेकर, गंगा को जलधार चढ़ाई।’’ उनके पास से हम लोग काम करके, नाच- गाकर आनंदित होकर लौटते। वे सदा कुछ न कुछ नया सिखाती रहतीं।

उनकी दृष्टि हर चीज पर रहती। एक बार बोलीं, ‘‘छोरी तेरा ब्लाऊज पुराना हो रहा है।’’ फिर उन्होंने कपड़ा निकाला और बोलीं, ‘‘चल, मैं तुझे ब्लाऊज सिलना सिखाती हूँ।’’ उन्होंने दराती (हसिया) से ब्लाऊज काटा। मैं देख कर हैरान रह गई। सूई- धागा लेकर हम लोगों को ब्लाऊज- पेटीकोट सिलना सिखाया। स्वयं के लिये भी सिला। हम सबने सूई- धागे से ब्लाऊज- पेटीकोट सिल कर पहने।

    माताजी, हम लोगों की चूड़ी, बिंदी, साड़ी- ब्लाऊज आदि हर छोटी- बड़ी चीज का ध्यान रखती थीं। कभी- कभी बुलातीं और पूछतीं, कोई तकलीफ तो नहीं है, फिर लड्डू, मिठाई, चूड़ी- बिन्दी, साड़ी आदि देकर झोली भर कर भेजतीं। जाने कौन सा ऐसा अक्षय भण्डार था उनके पास। फिर धीरे- धीरे कन्या शिविर आदि शुरू हुए तो माताजी की व्यस्तता बढ़ती गई। उतनी व्यस्तता में भी वे एक- एक का ध्यान रखती थीं। कभी भी बुलातीं, ‘‘उस छोरी के पास साड़ी नहीं है,’’ कहकर, बुलाकर साड़ी देतीं। उसके पास अमुक चीज नहीं है, कहकर कुछ देतीं। इस प्रकार सबकी छोटी से छोटी आवश्यकता का भी वह ध्यान रखती थीं। इतना ध्यान तो साक्षात् जगदम्बा ही रख सकती हैं।

     कभी- कभी हम लोग मिलने जाते, तब माताजी लिख रही होतीं। वे हम लोगों से बात भी करती जातीं और लिखती भी जातीं। सब हाल- चाल पूछतीं और एक दो बात कहकर खूब हँसाती भी, पर हमने देखा इतना सब करते हुए भी कलम उनकी बराबर चलती रहती। बात करते- करते भी कलम रुकती नहीं थी। जैसे दोनों अलग- अलग दिमाग से किये जा रहे हों।

सन् 1986 में मैं बहुत बीमार पड़ी। मुझे लकवा हो गया था। मैं बिल्कुल बिस्तर से लग गई। मेरा उठना- बैठना, चलना- फिरना, खाना- पीना आदि सब बंद हो गया था। डॉक्टर बोले कि अब यह नहीं बचेंगी। एक माह से भी अधिक समय हो गया था। मैं बिस्तर से उठ भी नहीं सकती थी। सबने मेरे बचने की उम्मीद छोड़ दी थी। तब बच्चे लोग मुझे गोद में उठाकर माताजी के दर्शनों के लिये ले गये। माताजी ने मुझे देखा और कहा, ‘‘तुझे, क्या हुआ है छोरी?’’ ऐसा कहकर, एक थपकी टाँग पर, एक कंधे पर और एक पीठ पर दी। बस तीन थपकी दीं और बोलीं, ‘‘बेटी, क्या हो गया? चिंता मत कर..., ठीक हो जाएगी। बिल्कुल ठीक हो जाएगी... बिल्कुल ठीक हो जाएगी... बिल्कुल ठीक हो जाएगी।’’ तीन बार कहा फिर बोलीं, ‘‘तू तो जा नहीं सकती। तेरे छोटे- छोटे बच्चे हैं। चिंता मत कर, तू ठीक हो जाएगी।’’

माताजी के आशीर्वाद से मैं अगले ही दिन न केवल बिस्तर से उठकर खड़ी हुई, बल्कि स्वयं चल कर शौचालय तक गई। मुझे चलते देखकर बच्चे चिल्लाने लगे, ‘‘माँ, चल मत, तू गिर जाएगी।’’

    उन दिनों हम ऋतंभरा भवन में रहते थे। ‘‘मैं चल रही हूँ!’’ सुनकर पास- पड़ौस वाले सब कार्यकर्ता इकट्ठे हो गए। सब मुझे चलते हुए देखकर हैरान थे। जिसने भी सुना, सब काम छोड़कर मुझे देखने दौड़ पड़ा। मुझे आज भी वो दृश्य याद है, जब मुझे देखने के लिये मेला जैसा लग गया था। उस दिन सबने माताजी की शक्ति को अपनी आँखों से देखा था। उस भगवती की लीला को जाना था।
  उस दिन के बाद से आज तक 24 वर्ष (1986- 2010) हो गये, मैं पूर्णतः स्वस्थ हूँ।

श्रीमती यशोदा शर्मा

   लाली! खाना क्यों नहीं खाया?

  मैं जब कन्या सत्र में शान्तिकुञ्ज आई थी तो हमारा ग्रुप सबसे बड़ा ग्रुप था। उस सत्र में 250 लड़कियाँ थीं। कुछ विवाहित भी थीं; पर सबके लिये एक सा नियम था। हम लोगों का बैच सर्वाधिक शरारती भी गिना गया।

हमारा सत्र शुरु हुए 5- 6 दिन ही हुए थे। हम लोग देखते थे कि कभी- कभी कुछ सीनियर लड़कियाँ घण्टी लगने से पहले ही खाना खा लेती हैं। उस दिन हमें भी थोड़ा जल्दी भूख लग आई। हमारे साथ की बहनें भी बोलीं कि आज अभी से भूख लग रही है। हमने सोचा, चलो आज हम भी जल्दी भोजन कर लेते हैं।

हम चार लोग ऊपर भोजनालय में गए और थाली और पानी का गिलास लेकर बैठ गए। भारती अम्मा और सोमा अम्मा रोटी सेक रही थीं। हमें यूँ बैठे देखकर वे आपस में इशारा कर मुस्कुराईं; पर बोलीं कुछ नहीं। हमें लगा कि शायद हमसे कुछ गल्ती हो गई है। पर फिर सोचा कि अब तो बैठ ही गए हैं, अब क्या करें? बैठे रहते हैं। वे दोनों कुछ देर तक आपस में इशारा कर मुस्कुराती रहीं, फिर अचानक भारती अम्मा उठीं और हमारे सामने से थाली उठाकर ले गईं, बोलीं कुछ नहीं।

  हमें बहुत अपमान महसूस हुआ। हम चुपचाप नीचे उतर आये। भोजन की घण्टी बजी, सबने भोजन कर लिया; पर हम चारों भोजन करने नहीं गये। भूख तो बहुत लग रही थी; पर मन में आता कि इतने अपमान के बाद अब कैसे जायें?

उन दिनों जब सब भोजन करते थे तो माताजी सामने बैठती थीं। इतने लोगों में भी उन्हें पता चल गया कि हम चारों भोजन करने नहीं आये हैं। उन्होंने हमें बुलवाया। हिम्मत बटोर कर हम लोग गये। माताजी अपने कमरे में थीं। हम वहीं चले गये। माताजी ने पूछा, ‘‘लाली! खाना क्यों नहीं खाया?’’ माताजी के इतना पूछते ही हमारी रुलाई फूट गई। हम फफक- फफक कर रोने लगे और फिर सब बात बताई। कहा, ‘‘माताजी वो हमें हमारी गलती बतातीं, हमें समझा देतीं, हमें बुरा नहीं लगता। पर इस व्यवहार से अब हम खाना खाने कैसे जायें?’’

माताजी ने भारती अम्मा और सोमा अम्मा को बुलाया और उक्त व्यवहार के लिये डाँट लगाई। फिर आगे से किसी के भी साथ ऐसा व्यवहार करने के लिये मना किया। फिर बोलीं, ‘‘अब इन छोरियों के लिये गरम- गरम खाना बनाओ।’’ माताजी ने दुबारा खाना बनवाया और अपने सामने बिठाकर खूब लाड़- प्यार लुटाते हुए खाना खिलाया। वह क्षण ऐसे थे कि अपनी सगी माँ भी शायद इतना प्यार न लुटाती होगी। उस दिन माँ जगदम्बा का प्यार पाकर हम धन्य हो गए। ऐसे न जाने कितने ही क्षण अनेकों परिजन अपने हृदय में समेटे हुए हैं। आज भी जब हम उन पलों को याद करते हैं तो वो पल सजीव हो उठते हैं।

  गुरुजी का समझाने का तरीका बड़े गजब का था।

कन्या शिविर में अक्सर गुरुदेव पारिवारिकता के संबंध में प्रवचन करते और छोटी- छोटी बातें भी इस ढंग से बताते कि सम�
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