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युगऋषि और उनकी योजना

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उत्साह की सार्थक दिशा

        युगऋषि (परम पूज्य गुरुदेव) की जन्मशताब्दी मनाने का उत्साह उनके स्नेह बन्धन में बँधे हर परिजन के मन में उमड़ रहा है। यह बात सच है, किन्तु उस उत्साह की दिशाधारा की, उसके अनुरूप साधन- सामर्थ्य की समीक्षा करते हुए उसकी समुचित व्यवस्था भी तो करनी पड़ेगी।

        भावनाशील बच्चों में अपने माता- पिता को संतुष्ट करने का उत्साह बहुधा उमड़ा करता है। वे कभी अपनी खिलौना मोटर में बिठाकर उन्हें सैर कराने का उत्साह दिखाते हैं, कभी अकेले सब काम देख लेने का उत्साह दिखाते हुए उन्हें विश्राम करने को कहते हैं, तो कभी अपने खेल के बर्तनों में तरह- तरह के व्यंजन बनाकर उन्हें इच्छित भोजन कराने की उमंग प्रकट करते हैं। माता- पिता उनकी भावना देखकर, भोली- भाली बातें सुनकर मुदित भी होते हैं। परन्तु उन्हें वास्तविक हर्ष और गौरव की अनुभूति तब होती है, जब बच्चे अपने गुण, कर्म, स्वभाव में परिष्कार और विकास करके स्वयं को वास्तव में कुछ कर सकने की स्थिति में ले आते हैं।

        जन्मशताब्दी पर समारोह करने, उसके लिए तन, मन, धन की बाजी लगा देने का उत्साह ऊपर वर्णित भोले बच्चों के उत्साह जैसा ही कहा जा सकता है। हमारे आध्यात्मिक माता- पिता उससे मन मोद का अनुभव तो कर सकते हैं, किन्तु उन्हें आंतरिक हर्ष और गौरव की अनुभूति तो तभी होगी, जब हम उनके जीवन लक्ष्य ‘युग निर्माण’ में अपनी छोटी- सी ही सही- किन्तु प्रौढ़ भूमिका निभाने की अपनी योग्यता बढ़ाएँ और जिम्मेदारी सँभालें।

        हमारा यह उत्साह भी ठीक हो सकता है कि हम युगऋषि की जन्म शताब्दी के घोषित कार्यक्रमों में जन- जन को भागीदार बनाएँ, किन्तु इस शुभकामना को फलित करने के लिए हमें अनेक प्रश्नों के संतोष जनक समाधान देने तथा अनेक संभावित चुनौतियों की कसौटियों पर स्वयं को खरा सिद्ध करने योग्य अपने आपको विकसित करना होगा। अपने उत्साह को ऐसी ही सशक्त प्रामाणिक तैयारी की दिशा में मोड़ना होगा।
क्या तैयारी, कैसी तैयारी?

        हम जब लोगों से आग्रह करेंगे कि वे शताब्दी योजना में शामिल हों, तो वे पूछेंगे कि किसकी शताब्दी है?

        हम उत्तर देंगे- ‘हमारे गुरुदेव की, एक सिद्ध पुरुष की’। तो वे कह सकते हैं- आपके गुरु की शताब्दी है, आप मनायें। हम उसमें क्यों भाग लें? अथवा वे सिद्ध पुरुष हैं, तो हमारा अमुक काम करवा दीजिये, चमत्कार दिखा दीजिए।

        ध्यान रखें कि यह सच है कि पू. गुरुदेव ने अपने तप का अंश देकर तमाम लोगों के दुःख बँटाये। उन्हें सुख पहुँचाया है, किन्तु यह उनका स्वभाव है, जीवन का उद्देश्य नहीं। भगवान् राम भी अयोध्या से लेकर जंगल तक में अपने सम्पर्क में आने वालों के दुःख- सुख में काम आते रहे, किन्तु यह उनका स्वभाव था- जीवनोद्देश्य नहीं। उनका जीवनोद्देश्य था रावण के आतंक का निवारण और आदर्श शासन व्यवस्था ‘रामराज्य’ की स्थापना। इसी प्रकार युगऋषि ने अपने संत स्वभाव से जो किया, वह भले ही चमत्कारी कहा जाय, किन्तु वह उनका जीवनोद्देश्य नहीं है। उनका जीवनोद्देश्य रहा है युग की विनाशकारी विभीषिकाओं को निरस्त करना तथा उज्ज्वल भविष्य के उपयुक्त व्यक्तित्वों का निर्माण करना।
        इसीलिए वे अपने निकटस्थ परिजनों को यह समझाते रहे कि उनका परिचय चमत्कारी सिद्ध पुरुष के रूप में न दिया जाय। ऐसा करोगे तो स्वार्थी मुफ्तखोरों की भीड़ लग जायेगी। उन्हीं के लिखे शब्दों में देखें-     
        ‘‘आप लोगों से यह मत कहना कि हमारे गुरुजी बड़े सिद्ध पुरुष हैं, बड़े महात्मा हैं और वरदान देते हैं,  वरन् यह कहना कि युगऋषि ऐसे व्यक्ति का सम्बोधन है, जिसके पेट से क्रान्ति की आग निकलती है, आँखों से शोले निकलते हैं। आप ऐसे गुरुजी का परिचय देना, सिद्ध पुरुष का नहीं।’’    

        इसलिए जन्मशताब्दी के संदर्भ में परिजनों से बार- बार निवेदन किया जा रहा है कि उनका परिचय गायत्री वाले चमत्कारी बाबा के रूप में नहीं, युगद्रष्टा, युगस्रष्टा की क्षमताओं से सम्पन्न युगऋषि के रूप में देने की अपनी क्षमता विकसित करें।    

        यह काम आसान नहीं है। चमत्कारी बाबा की मुनादी तो कोई भी झूठा- सच्चा वाचाल व्यक्ति कर सकता है, किन्तु युगऋषि का परिचय देने वाले में तो ‘युग साधक- युग सैनिक’ की स्पष्ट झलक मिलनी चाहिए। शब्दों की प्रामाणिकता सिद्ध करने के लिए जीवन की गवाही देनी पड़ती है। इसलिए इसके लिए नैष्ठिक, उत्साही परिजनों को अपने व्यक्तित्व को परिष्कृत बनाने का क्रम बनाये रखना होगा। तभी हम उनका परिचय युगऋषि के रूप में दे सकेंगे।