त्रिविध उपलब्धियाँ
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सभी चाहते हैं कि हमारा समाज आदर्श, सभ्य, स्वर्गीय परिस्थितियों से युक्त बने। युगऋषि ने इसके लिए सूत्र दिया है कि सभ्य समाज बनाने के लिए अधिकांश व्यक्तियों का शरीर स्वस्थ तथा मन स्वच्छ बनाना होगा। स्वस्थ शरीर एवं स्वच्छ मन के संयोग से ही सभ्य समाज की स्थापना संभव होगी। ये सभी आपस में जुड़े हैं।
स्वस्थ शरीर :- समाज में प्रचलित कहावत है ‘पहला सुख निरोगी काया’। इसी प्रकार संस्कृत की कहावत है ‘शरीरमाद्यं खलु धर्म साधनम्’ अर्थात् धर्म, श्रेष्ठ कर्म, परमार्थ आदि करने के लिए शरीर प्रारंभिक साधन है। यदि शरीर स्वस्थ नहीं है, तो मन में अच्छे भाव, अच्छे विचार होते हुए भी मनुष्य अच्छे कार्यों को अंजाम नहीं दे सकता। इसलिए सामाजिक क्रांति के लिए, समाज निर्माण के लिए स्वास्थ्य साधना जरूरी है।
स्वच्छ मन: - शरीर स्वस्थ हो और मन स्वच्छ न हो, तो क्या होगा? मनुष्य में कार्यक्षमता तो होगी, लेकिन वह उसका प्रयोग अच्छे उद्देश्य के लिए नहीं कर सकेगा। जैसे गंदगी के कीड़े दूध, स्वच्छ जल, स्वस्थ फलों में रस नहीं ले पाते, उसी प्रकार अस्वच्छ मन को अच्छे कार्यों में रस नहीं आता। जिस कार्य में मन रस नहीं लेता, उस कार्य को कोई व्यक्ति बेगार के रूप में थोड़े समय के लिए भले सहन कर ले, स्वेच्छा से लम्बे समय तक उसे अपना नहीं सकता।
युगऋषि ने ‘अस्वच्छ मन के उपद्रव’ जैसे शीर्षकों से अनेक लेख लिखे हैं। आज ज्ञान, विज्ञान, बुद्धिवाद से विकसित असाधारण शक्ति, सामर्थ्य का उपयोग जनहित में न होकर जनउत्पीड़न, जनशोषण में हो रहा है, तो उसके पीछे केवल अस्वच्छ- अनगढ़ मनों का ही करिश्मा है। इसीलिए मन को लेकर अनेक कहावतें प्रचलित हैं, जैसे- ‘मन के हारे हार है, मन के जीते जीत।’, ‘मन एव मनुष्याणां कारणं बन्ध मोक्षयोः।’’ अर्थात् मनुष्य के बंधन एवं मोक्ष का कारण मन ही है। इसलिए साधना- स्वाध्याय के द्वारा मन को स्वच्छ बनाने का जन- आन्दोलन चलाना जरूरी है। इसके आधार पर ही विनाशकारी विडम्बनाओं से मुक्ति मिल सकेगी और मंगलकारी संभावनाओं को साकार किया जा सकेगा।
सभ्य समाज :- सभ्य, श्रेष्ठ, देवोपम समाज कैसा हो, इसके बारे में सभी समझदार एकमत हैं। यदि स्वस्थ शरीर एवं स्वच्छ मन वाले नर- नारियों को पर्याप्त संख्या में गढ़ा और एकजुट किया जा सके, तो सभ्य समाज की दिव्य संभावनाएँ साकार होते देर न लगेगी।
स्वस्थ शरीर :- समाज में प्रचलित कहावत है ‘पहला सुख निरोगी काया’। इसी प्रकार संस्कृत की कहावत है ‘शरीरमाद्यं खलु धर्म साधनम्’ अर्थात् धर्म, श्रेष्ठ कर्म, परमार्थ आदि करने के लिए शरीर प्रारंभिक साधन है। यदि शरीर स्वस्थ नहीं है, तो मन में अच्छे भाव, अच्छे विचार होते हुए भी मनुष्य अच्छे कार्यों को अंजाम नहीं दे सकता। इसलिए सामाजिक क्रांति के लिए, समाज निर्माण के लिए स्वास्थ्य साधना जरूरी है।
स्वच्छ मन: - शरीर स्वस्थ हो और मन स्वच्छ न हो, तो क्या होगा? मनुष्य में कार्यक्षमता तो होगी, लेकिन वह उसका प्रयोग अच्छे उद्देश्य के लिए नहीं कर सकेगा। जैसे गंदगी के कीड़े दूध, स्वच्छ जल, स्वस्थ फलों में रस नहीं ले पाते, उसी प्रकार अस्वच्छ मन को अच्छे कार्यों में रस नहीं आता। जिस कार्य में मन रस नहीं लेता, उस कार्य को कोई व्यक्ति बेगार के रूप में थोड़े समय के लिए भले सहन कर ले, स्वेच्छा से लम्बे समय तक उसे अपना नहीं सकता।
युगऋषि ने ‘अस्वच्छ मन के उपद्रव’ जैसे शीर्षकों से अनेक लेख लिखे हैं। आज ज्ञान, विज्ञान, बुद्धिवाद से विकसित असाधारण शक्ति, सामर्थ्य का उपयोग जनहित में न होकर जनउत्पीड़न, जनशोषण में हो रहा है, तो उसके पीछे केवल अस्वच्छ- अनगढ़ मनों का ही करिश्मा है। इसीलिए मन को लेकर अनेक कहावतें प्रचलित हैं, जैसे- ‘मन के हारे हार है, मन के जीते जीत।’, ‘मन एव मनुष्याणां कारणं बन्ध मोक्षयोः।’’ अर्थात् मनुष्य के बंधन एवं मोक्ष का कारण मन ही है। इसलिए साधना- स्वाध्याय के द्वारा मन को स्वच्छ बनाने का जन- आन्दोलन चलाना जरूरी है। इसके आधार पर ही विनाशकारी विडम्बनाओं से मुक्ति मिल सकेगी और मंगलकारी संभावनाओं को साकार किया जा सकेगा।
सभ्य समाज :- सभ्य, श्रेष्ठ, देवोपम समाज कैसा हो, इसके बारे में सभी समझदार एकमत हैं। यदि स्वस्थ शरीर एवं स्वच्छ मन वाले नर- नारियों को पर्याप्त संख्या में गढ़ा और एकजुट किया जा सके, तो सभ्य समाज की दिव्य संभावनाएँ साकार होते देर न लगेगी।

