त्रिवेणी संगम
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युगनिर्माण अभियान को युगऋषि ने त्रिवेणी संगम कहा है। इसे तीन धाराएँ मिलकर स्वरूप देती हैं।
१. ईश्वर- यह योजना ईश्वर की है, इसलिए उसके लिए शक्ति- अनुदान भी सब को उसी से प्राप्त होते हैं। फसल के संदर्भ में यह अनुकूल मौसम की तरह है। अस्तु, पहली धारा है- योजना तथा शक्ति ईश्वर की।
२. ऋषि- ईश्वरीय योजना को मूर्त रूप देने की पहल ऋषितन्त्र द्वारा होती रहती है। वे ईश्वरीय योजना और उसके अनुशासनों का स्वरूप स्पष्ट कर देते हैं। उसे आस्था का आधार देते हैं। जो उन अनुशासनों को मानते हैं, उन्हें ऋषियों का समर्थ संरक्षण- मार्गदर्शन मिलता रहता है। फसल के संदर्भ में इसे उपजाऊ भूमि की उपमा दी जा सकती है। मौसम की उर्वरता का लाभ बीज को भूमि के माध्यम से ही मिलता है। दूसरी धारा है- अनुशासन एवं संरक्षण ऋषियों का।
३. मनुष्य- यह योजना वस्तुतः मनुष्यों के हित के लिए है। मौसम और भूमि बीज को विकसित- फलित करने के लिए ही है ,, किन्तु इसमें बीज को भी तो कुछ पुरुषार्थ- सहकार करना पड़ता है। उसे मौसम से जुड़कर अपने अंदर की संचित ऊर्जा को अंकुरित करने का पुरुषार्थ स्वयं भी तो करना पड़ता है। इसलिए यह तीसरी धारा है- पुरुषार्थ और सहकार सत्पुरुषों का।
पहली और दूसरी धाराएँ तो अपने आप में समर्थ- परिपूर्ण रहती हैं। तीसरी- मनुष्य की धारा की सुनिश्चितता पर ही फसल निर्भर करती है। उपलब्धि का सूत्र है- १&२&३। एक और दो तो पूर्ण हैं, किन्तु यदि तीसरी धारा का मान शून्य है, तो उपलब्धि- शून्य ही रह जायेगी। वह १/२ है, तो उपलब्धि आधी रहेगी और वह १ है, तो उपलब्धि पूरी रहेगी।
उपरोक्त कथन का अर्थ है कि जो संकल्प लें, उसे पूरा करें। बस इसी क्रम से थोड़े से शुरू करें, एक- एक करके संकल्प पूरा करते रहें, तो देवत्व का विकास और स्वर्ग का आधार समर्थ होता रहे।
१. ईश्वर- यह योजना ईश्वर की है, इसलिए उसके लिए शक्ति- अनुदान भी सब को उसी से प्राप्त होते हैं। फसल के संदर्भ में यह अनुकूल मौसम की तरह है। अस्तु, पहली धारा है- योजना तथा शक्ति ईश्वर की।
२. ऋषि- ईश्वरीय योजना को मूर्त रूप देने की पहल ऋषितन्त्र द्वारा होती रहती है। वे ईश्वरीय योजना और उसके अनुशासनों का स्वरूप स्पष्ट कर देते हैं। उसे आस्था का आधार देते हैं। जो उन अनुशासनों को मानते हैं, उन्हें ऋषियों का समर्थ संरक्षण- मार्गदर्शन मिलता रहता है। फसल के संदर्भ में इसे उपजाऊ भूमि की उपमा दी जा सकती है। मौसम की उर्वरता का लाभ बीज को भूमि के माध्यम से ही मिलता है। दूसरी धारा है- अनुशासन एवं संरक्षण ऋषियों का।
३. मनुष्य- यह योजना वस्तुतः मनुष्यों के हित के लिए है। मौसम और भूमि बीज को विकसित- फलित करने के लिए ही है ,, किन्तु इसमें बीज को भी तो कुछ पुरुषार्थ- सहकार करना पड़ता है। उसे मौसम से जुड़कर अपने अंदर की संचित ऊर्जा को अंकुरित करने का पुरुषार्थ स्वयं भी तो करना पड़ता है। इसलिए यह तीसरी धारा है- पुरुषार्थ और सहकार सत्पुरुषों का।
पहली और दूसरी धाराएँ तो अपने आप में समर्थ- परिपूर्ण रहती हैं। तीसरी- मनुष्य की धारा की सुनिश्चितता पर ही फसल निर्भर करती है। उपलब्धि का सूत्र है- १&२&३। एक और दो तो पूर्ण हैं, किन्तु यदि तीसरी धारा का मान शून्य है, तो उपलब्धि- शून्य ही रह जायेगी। वह १/२ है, तो उपलब्धि आधी रहेगी और वह १ है, तो उपलब्धि पूरी रहेगी।
उपरोक्त कथन का अर्थ है कि जो संकल्प लें, उसे पूरा करें। बस इसी क्रम से थोड़े से शुरू करें, एक- एक करके संकल्प पूरा करते रहें, तो देवत्व का विकास और स्वर्ग का आधार समर्थ होता रहे।

