कुछ अन्य सूत्र
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त्रिविध शोधन :- स्वर्गीय परिस्थितियों के अवतरण के लिए, मनुष्य में देवत्व का उदय करने के लिए मनुष्य का त्रिविध- (१.चिंतन, २.चरित्र एवं ३.व्यवहार) शोधन जरूरी है। जो लोग सीधे ही व्यवहार बदलने की कोशिश करते हैं, वे असफल ही होते हैं। जब तक मनुष्य के चिंतन एवं चरित्र का परिष्कार नहीं होगा, तब तक वह अच्छे व्यवहार का दिखावा तो कर सकता है, वह उसका स्वभाव नहीं बन सकता। इसलिए तीनों के शोधन के संयुक्त प्रयास जरूरी हैं।
हम बदलेंगे- युग बदलेगा :- परिवर्तन का क्रम स्वयं से शुरू किया जाय, तो परिवर्तन की सतत शृंखला चल पड़ती है। दीप से दीप जलने लगता है। किन्तु दूसरों को बदलने के प्रयास से शुरुआत की जाय, तो परिवर्तन के प्रयास झगड़े में बदलने लगते हैं। इसीलिए बदलाव या सुधार स्वयं से, अपने से शुरू करके उसे अपनों के माध्यम से विस्तार देने की रीति- नीति अपनानी होगी।
निवेदन- युगऋषि द्वारा प्रस्तुत उक्त सभी सूत्र वर्गभेद से परे सबके लिए उपयोगी हैं। यदि कुशलतापूर्वक उन्हें लोगों के सामने रखा जाय, तो वे उनका लाभ जरूर उठायेंगे। इस दिशा में अपनी क्षमता और प्रयास बढ़ाकर हम युग निर्माण की प्रचंड लहर खड़ी कर सकते हैं।
प्रज्ञापुत्र स्तर के प्रत्येक कार्यकर्ता को चाहिए कि वह इस दिशा में अपने अध्ययन एवं चिन्तन को इतना प्रखर एवं प्रगाढ़ बनाये कि सामान्य चर्चाओं से लेकर उद्बोधनों तक के क्रम में युगऋषि एवं युग निर्माण योजना के सूत्रों का परिचय स्वाभाविक ढंग से उभरने लगे। विभिन्न शिक्षण- प्रशिक्षण संस्थानों से लेकर तमाम सृजनशील संगठनों के बीच युगऋषि की जन्मशताब्दी के संदर्भ में व्याख्यान मालाओं का क्रम चलाया जा सकता है।
हम बदलेंगे- युग बदलेगा :- परिवर्तन का क्रम स्वयं से शुरू किया जाय, तो परिवर्तन की सतत शृंखला चल पड़ती है। दीप से दीप जलने लगता है। किन्तु दूसरों को बदलने के प्रयास से शुरुआत की जाय, तो परिवर्तन के प्रयास झगड़े में बदलने लगते हैं। इसीलिए बदलाव या सुधार स्वयं से, अपने से शुरू करके उसे अपनों के माध्यम से विस्तार देने की रीति- नीति अपनानी होगी।
निवेदन- युगऋषि द्वारा प्रस्तुत उक्त सभी सूत्र वर्गभेद से परे सबके लिए उपयोगी हैं। यदि कुशलतापूर्वक उन्हें लोगों के सामने रखा जाय, तो वे उनका लाभ जरूर उठायेंगे। इस दिशा में अपनी क्षमता और प्रयास बढ़ाकर हम युग निर्माण की प्रचंड लहर खड़ी कर सकते हैं।
प्रज्ञापुत्र स्तर के प्रत्येक कार्यकर्ता को चाहिए कि वह इस दिशा में अपने अध्ययन एवं चिन्तन को इतना प्रखर एवं प्रगाढ़ बनाये कि सामान्य चर्चाओं से लेकर उद्बोधनों तक के क्रम में युगऋषि एवं युग निर्माण योजना के सूत्रों का परिचय स्वाभाविक ढंग से उभरने लगे। विभिन्न शिक्षण- प्रशिक्षण संस्थानों से लेकर तमाम सृजनशील संगठनों के बीच युगऋषि की जन्मशताब्दी के संदर्भ में व्याख्यान मालाओं का क्रम चलाया जा सकता है।

