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Books - युगऋषि की वेदना एवं उमंगें जानें तदनुसार कुछ करें

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वेदना समझें, भूल सुधारें

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१. विचारों से जुड़े रहें- खेद की बात है कि गायत्री परिवार का एक विशाल संगठन बना था। पर उसके सदस्यों को अखण्ड ज्योति पढ़ते रहने का महत्त्व हम न समझा सके। फलस्वरूप उनमें से अधिकांश लोग उस दिशा में चल सकने की स्थिति में न आ सके, जो हमारा लक्ष्य था। अब यह निश्चित रूप से स्वीकार कर लिया गया है कि उन्हीं को अपने परिवार का परिजन माना जा सकता है और उन्हीं से कुछ आशा रखी जा सकती है, जो अखण्ड ज्योति पढ़ते हैं। जो हमारी वाणी को सुनना नहीं चाहते, जिन्हें हमारे विचारों और प्रेरणाओं की आवश्यकता नहीं, जो हमारे सुझावों और संदेशों का कोई मूल्य नहीं मानते, उन्हें परिजन कहना हमारा एक भ्रममात्र था, जो अब पूरी तरह दूर कर लिया गया है। अपने परिचित लोगों की भारी भीड़ में से हम युग निर्माण जैसे महान कार्य में कुछ सहयोग की आशा उन्हीं से करते हैं, जो कम से कम हमारे विचारों के प्रति सहानुभूति रखते हैं और उन्हें पढ़ने की आवश्यकता अनुभव करते हैं।
-अखण्ड ज्योति, जुलाई १९६२, पृष्ठ ४८

२. संस्कार जगायें, अनुदान पायें— अपने प्रियजनों को सुखी बनाने के लिए हर कुलपति प्रयत्न करता है, हम भी इसी दृष्टि से इन दिनों अपना प्रयत्न तीव्र कर रहे हैं। यदि कुछ ठोस लाभ दिए बिना विदा होना पड़ा, तो अपने प्रिय परिवार के प्रति हमारा उत्तरदायित्व पूरा न हो सकेगा और उसकी लज्जा एवं वेदना हमें देर तक कष्ट देती रहेगी। इस व्यथा से छुटकारा पाने के लिए वर्तमान छटनी पर बहुत जोर दे रहे हैं। जो हमारी बात तो सुन सकते हैं, पर बताए मार्ग पर चलने के लिए तनिक भी तैयार नहीं, उनके साथ उलझे रहने की अपेक्षा अब हमें ऐसे लोगों को साथ रखना है, जो कुछ काम कर सकने लायक श्रद्धा और आत्मीयता हमारे प्रति उत्पन्न कर चुके हैं। अधिक न सही तो कम से कम इतनी सेवा हम अपने इन प्रिय परिजनों की करेंगे ही कि उनके वर्तमान परिवार सुसंस्कृत बनें और उनकी गोदी में ऐसी उच्च आत्माएँ अवतरित हों, जो उस परिवार को तथा हमारे अंतःकरण को प्रसन्नता प्रदान कर सकें।
-अखण्ड ज्योति, अगस्त १९६६, पृष्ठ ४७

३.नहीं चाहिए संख्यापूरक— जिनकी आस्था दुर्बल है, उनके लिए तिल भर बोझ भी पर्वत जैसा भारी पड़ेगा। ऐसे लोगों से किस प्रकार आशा करें कि वे हमारे प्रयोजन में दो- चार कदम चलने का साथ देंगे जो हमारे जीवन का एकमात्र लक्ष्य है। व्यक्ति और समाज की उत्कृष्टता, सांस्कृतिक एवं भौतिक पुनरुत्थान, भावनात्मक नव- निर्माण आज के युग की महानतम माँग है। प्रबुद्ध व्यक्तियों के लिए इन उत्तरदायित्वों से विमुख होना या इनकार कर सकना अशक्य है। हमें स्वयं इसी दिशा में जिस सत्ता ने बलपूर्वक लगाया है, वह अन्यान्य भावनाशील लोगों के अंतःकरण में भी वैसी ही प्रेरणा कर रही है और वे सच्चे आध्यात्मिक व्यक्तियों की तरह इसके लिए कटिबद्ध हो रहे हैं। पर जिन्हें यह सब कुछ व्यर्थ दीखता है, जिन्हें इतने महत्त्वपूर्ण कार्य में कोई आकर्षण, कोई उत्साह, कोई साहस उत्पन्न नहीं हो रहा है, उनके संबंध में हमें निराशा हो सकती है।

अपनी तपश्चर्या और ईमानदारी में कहीं कोई कमी ही होगी, जिसके कारण जिन व्यक्तियों के साथ पिछले ढेरों वर्षों से संबंध बनाया, उनमें कोई आध्यात्मिक साहस उत्पन्न न हो सका। वह भजन किस काम का, जिसके फलस्वरूप आत्मनिर्माण एवं परमार्थ के लिए उत्साह उत्पन्न न हो। किन्हीं को हमने भजन में लगा भी दिया है, पर उनमें भजन का प्रभाव बताने वाले उपरोक्त दो लक्षण उत्पन्न न हुए हों, तो हम कैसे मानें कि उन्हें सार्थक भजन करने की प्रक्रिया समझाई जा सकी? हमारा परिवार संगठन तभी सफल कहा जा सकता था, जब उसमें वे सम्मिलित व्यक्ति उत्कृष्टता और आदर्शवादिता की कसौटी पर खरे सिद्ध होते चलते। अन्यथा संख्यावृद्धि की विडंबना से झूठा मन बहलाव करने से क्या कुछ बनेगा?
-अखण्ड ज्योति, अक्टूबर १९६६, पृष्ठ ४७


४. हमारी साधना की सार्थकता क्या रहेगी?— हमारा परिवार यदि व्यक्तिगत सम्पर्क की परिधि तक ही सीमित रहा और हमारे मिशन के प्रति उसमें आवश्यक निष्ठा उत्पन्न न हुई, तो एक प्रकार से हमारे प्रयोजनों का मटियामेट हो जाएगा। भीड़ बढ़ा लेना और जन- सम्पर्क फैला लेना, मिलनसारी या प्रतिभा का चमत्कार हो सकता है, पर उस समूह में कोई जीवट न रही, तो बालू की दीवार की तरह उस भीड़ को बिखरने में भी देर न लगेगी और यदि कहीं ऐसा हो गया, तो हमारी जीवन- साधना की सार्थकता क्या रह जाएगी? -अखण्ड ज्योति, अगस्त १९७०, पृष्ठ ५५, ५६

५. न स्वयं को भूलें, न भटकें— निस्संदेह अखण्ड ज्योति परिवार में असाधारण उच्च संस्कारों से संबंधित आत्माएँ हैं। उन्हें बड़े प्रयास और ढूँढ़- खोज के साथ एकत्रित किया गया है। इन संस्कारवान् आत्माओं की इस परिवर्तन वेला में अति महत्त्वपूर्ण जिम्मेदारियाँ थीं। उन्हें नल- नील, अंगद और हनुमान की तरह; अर्जुन, प्रताप, शिवाजी, गुरु गोविन्दसिंह, समर्थ गुरु रामदास की तरह ईश्वरीय आकांक्षाओं की पूर्ति के लिए बढ़- चढ़कर शौर्य, साहस और त्याग- बलिदान का परिचय देना चाहिए था, पर यह देखते हुए दुःख होता है कि जिन्होंने हमारे साथ किसी समय तप और त्याग की दोनों ही क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण उपलब्धियाँ प्राप्त की थीं, वे अब नर पशुओं की तरह वासना और तृष्णा में लिप्त होकर शोक- संताप की जलन में जल रहे हैं, किन्तु तथ्य और प्रयोजन की ओर ध्यान नहीं देते। -अखण्ड ज्योति, अगस्त १९६९, पृष्ठ ६, ७

६. तो गुरुसत्ता को पीड़ा होगी— हमारे साथी, सहचर जो सभी हमारे दिन- रात के सहचर थे, कदम- से मिलाकर चलते थे, अपूर्णता को पूर्णता में परिवर्तित करने के लिए अपनी सतत साधना में संलग्न थे, महान लक्ष्य की पूर्ति ही जिनकी एकमात्र आकांक्षा थी, लोभ, मोह के बंधनों को जिनने काफी ढीला कर लिया था, जिन पर हमें भारी हर्ष और गर्व था, वे अब न जाने किससे शापित होकर नरक में जा गिरे और अपनी पूर्व जन्मों की स्थिति, परिस्थिति एवं प्रवृत्ति को बुरी तरह भूल गए। जिसके जीवन दीप अपने आप में प्रकाशवान थे, दूसरों के प्रकाशार्थ थे, अब वे लगभग बुझ गए। बत्ती के अग्रभाग पर जहाँ दीप्तिमान ज्योति जलती रहती थी, वहाँ अब कालिमा का अवशेष मात्र चिह्नित है।

उच्च आत्माएँ जो अपने को प्रकाशवान कर चुकीं और जिनके प्रकाश का लाभ सुदूर क्षेत्रों में व्याप्त होने की आशा थी वे बुझ जाएँ, तो यह एक बड़ी दुर्घटना एवं भयंकर सार्वजनिक हानि की बात है। लोभ- मोह के जाल- जंजाल में जकड़ा हुआ जड़ जीवन नर- पशुओं के लिए क्षम्य हो सकता है। जिनकी मनुष्यता जाग गई उनके लिए वह स्तर ऐसे ही उपहासास्पद है, जैसे कि कोई बड़ी आयु का व्यक्ति बालकों जैसे खिलौने से खेले, घुटनों के बल चले और वैसी ही बोली बोले। प्रबुद्ध आत्माएँ धर्म और ब्रह्मज्ञान को वाचालता नहीं दिखाती फिरतीं, वे उन आदर्शों को जीवनक्रम में उतारती हैं। वेदान्त जिनकी जीभ तक सीमित रह गया, व्यावहारिक जीवन में न उतरा, समझना चाहिए वे प्रगति के पथ पर न बैठ सके, विडंबना के दलदल में फँस गए।
-अखण्ड ज्योति, अगस्त १९६९, पृष्ठ ३५

७. भूल कहाँ हुई?— अपना परिवार तो हमने इतना बड़ा इकट्ठा कर लिया पर उन्हें कुछ मोटी बातें समझा सकने में सफल न हो सके ।। हम उनके मन पर यह छाप न छोड़ सके कि उत्कृष्टता और आदर्शवादिता की गतिविधियों को अपनाना किसी प्रकार भी घाटे का सौदा नहीं है। यह प्रक्रिया स्वास्थ्य सुधारती है, दीर्घजीवन प्रदान करती है, दाम्पत्य प्रेम में भारी उल्लास भर देती है, बच्चे सुसंस्कृत बनते हैं। पैसे की तंगी नहीं रहती, मनोविकारों और उद्वेगों में नहीं जलना पड़ता, यश मिलता है, सच्चे और सज्जन मित्र मिलते हैं और उनकी मित्रता निभती है। दूसरों का सहयोग मिलता है, प्रगति का पथ प्रशस्त होता है, असफलताएँ क्षुब्ध नहीं करती, चित्त में प्रसन्नता उमड़ती रहती है, आत्म- संतोष मिलता है और ईश्वर के अनुग्रह एवं सान्निध्य का हर घड़ी अनुभव होता है। और भी असंख्य लाभ हैं।

हानि केवल इतनी ही है कि अपनी मूढ़ मान्यताओं, अंधपरम्पराओं और बुरी आदतों से हाथ धोना पड़ता है। लोभ- मोह की जलन और वासना, तृष्णा की उद्विग्नता भी कम हो जाती है। दुष्टता भरा अहंकार घट जाता है, इसके अतिरिक्त और कुछ भी हानि नहीं है। लाभ इतना अधिक है कि सामान्य मनुष्य महामानवों की श्रेणी में जा पहुँचता है और उपेक्षणीय व्यक्तित्व सभी के सिर आँखों पर जा विराजता है।

यदि इतनी मोटी बात और अक्षरशः तथ्यपूर्ण उस सचाई को हम परिजनों को समझा सके होते, तो उनकी तथाकथित आध्यात्मिकता पूजा- पाठ और कथा- वार्ता तक सीमित होकर न रह गई होती। उसे जीवन व्यवहार में भी स्थान मिला होता और उनका स्वरूप वैसा न रहता जैसा आज है। वे अपेक्षाकृत बहुत सुखी और संतुष्ट होते और समाज को उनके व्यक्तित्व से भारी प्रकाश एवं बल मिल रहा होता। ईश्वर जाने कि (१) इस युग का अंधकार उतना सघन है अथवा (२) परिजनों का विवेक एवं शौर्य मर गया अथवा (३) अपने समझाने वाली क्षमता इतनी न्यून है कि उसका कोई प्रभाव नहीं पड़ता।

तीनों में से जो भी कारण हो अथवा तीनों ही कारण हों उपाय तो करना ही होगा। परिजनों को मोह- शोक में डूबे हुए नहीं छोड़ सकते। वे अपनी अच्छी स्थिति का गर्व करते रहें। हमारी दृष्टि में आत्मकल्याण की साधना और लोकमंगल की प्रवृत्ति से उदासीन व्यक्ति की आत्मिक स्थिति अति दयनीय है। अपने इन पूर्वजों, स्वजनों के उद्धार के लिए हम भागीरथ तप करेंगें और इसी उर्वर क्षेत्र में हरीतिमा उगाएँगे जिससे सारा उपवन सुशोभित हो उठे।
-अखण्ड ज्योति, अगस्त १९६९, पृष्ठ ३८, ३९

८. अपनों को उबारने के प्रयास— हम बहुत भोले जरूर हैं पर इतने मूर्ख नहीं जो वस्तुस्थिति को समझते न हों। आत्मकल्याण और लोकनिर्माण की सम्मिश्रित कार्य पद्धति को भी जीवन में कुछ स्थान देने की बात हम कहते हैं और उसे यों ही मजाक में उड़ा दिया जाता है तो हमें भारी कष्ट होता है। इसे हम किसी की मजबूरी नहीं मान सकते। इसमें विशुद्ध उपेक्षा, अन्यमनस्कता और अश्रद्धा छिपी हुई है। यह गलत है। किसी समय वे बहुत आगे बढ़े- चढ़े व्यक्ति नगण्य से सामयिक कर्तव्य की ऐसी उपेक्षा करें हमें यह बहुत कष्टकारक लगता है। लगभग वैसा ही अनुभव होता है, जैसा भागीरथ को अपने पूर्वजों की दयनीय स्थिति के बारे में होता था।

कोई घी से रोटी खाता है या रेशमी कपड़ा पहनता है, यह देखकर हम उसे प्रसन्नचित्त नहीं मान सकते। आत्मिक दृष्टि से जो दरिद्र है, उसे असंख्य प्रकार की जलन जलाती रहेगी और वह नरक का भी अनुभव करता रहेगा। इस स्थिति में हम अपने स्वजनों को नहीं रहने दे सकते, हम उन्हें प्यार करते हैं, मित्र मानते हैं, इसलिए हमें अथक प्रयत्न करना होगा कि उन्हें ऊँचा उठाएँ और समुन्नत करें।
 -अखण्ड ज्योति, अगस्त १९६९, पृष्ठ ३९

९. जो हो, हम एकरस, एकनिष्ठ भाव से अपने मार्ग पर चलते हुए लंबी मंजिल पूरी कर चुके। विराम का अवसर आया तो यह उत्कण्ठा तीव्र हो चली कि हमारा परिवार घटिया स्तर का जीवनयापन करने का कलंक न ओढ़े रहे। प्रकारांतर से यह लांछन अपने ऊपर भी आता है। हम किस बूते पर अपना सिर गर्व से ऊँचा कर सकेंगे और किस मुख से यह कह सकेंगे कि अपने पीछे कुछ ऐसा छोड़कर आए, जिसे देखकर लोग उसके संचालक का अनुमान लगा सकें। ईश्वर की महान कृतियों को देखकर ही उसकी गरिमा का अनुमान लगाया जाता है। हमारा कर्तृत्व पोला था या ठोस, यह अनुमान उन लोगों की परख करके लगाया जाएगा, जो हमारे श्रद्धालु एवं अनुयायी कहे जाते हैं। यदि वे वाचालता भर के प्रशंसक और दण्डवत, प्रणाम भर के श्रद्धालु रहे, तो माना जाएगा कि सब कुछ पोला रहा।

असलियत कर्म में सन्निहित है। वास्तविकता की परख क्रिया से होती है। यदि अपने परिवार की क्रियापद्धति का स्तर दूसरे अन्य नर- पशुओं जैसा ही बना रहा तो हमें स्वयं अपने श्रम और विश्वास की निरर्थकता पर कष्ट होगा और लोगों की दृष्टि में उपहासास्पद बनना पड़ेगा। यह अवसर न आए, इसलिए हम इन दिनों बहुत जोर देकर अपने उद्बोधन का स्वर तीखा करते चले जा रहे हैं और गतिविधियों में गर्मी ला रहे हैं, ताकि यदि कुछ सजीव लोग अपने साथियों में रहे हों तो आगे आएँ और मृत मूर्च्छित अपनी माँद में जाकर चुपचाप पड़ जाएँ। बात बहुत, काम कुछ नहीं वाली विडंबना का तो अब अंत होना ही चाहिए।
-अखण्ड ज्योति, नवम्बर १९६९, पृष्ठ ६२

१०. गुरुसत्ता की आकांक्षा- हर बाप चाहता है कि उसका बेटा उसकी अपेक्षा अधिक बड़ा आदमी बने। हर माँ चाहती है कि उसकी बेटी उसकी तुलना में अधिक सुखी रहे। हमारी आंतरिक भावना ही नहीं, चेष्टा भी यही है कि प्रज्ञा- परिजनों को वह सुयोग मिले, जिसके आधार पर वे महामानवों में गिने जा सकने की स्थिति तक पहुँचें और इतिहास के पृष्ठों पर अपने अंतिम चिह्न छोड़ जाएँ।

एक चीज हमारे मन में है। उसे लेने वाला कोई हो, ऐसा जी ललचाता है। गाय थनों में दूध भरे फिरती है और उन्हें खाली करने के लिए बच्चे को रभा- रंभाकर ढूँढ़ती और पुकारती है। हमारे पास कुछ ऐसा भी है, जो उच्चस्तरीय है और हमारे मार्गदर्शक ने समूची अनुकम्पा समेट कर हमें दी है। उसे साथ लेकर नहीं मरना चाहते, वरन् यह चाहते हैं कि उस पारसमणि का प्रियजन भी लाभ उठाएँ, जो हमें सौभाग्यवश मिली है। यह स्वाति बूँद की तरह बरसी और नगण्य सी सीप के पेट से बहुमूल्य मोती उगाने में समर्थ हुई है।
 -अखण्ड ज्योति, जनवरी १९८६, पृष्ठ ५६

११. खोखलापन घातक है— अब ऐसा लगने लगा है कि जो विशाल भीड़ हमें चारों ओर से घेरे रही है, घेरे रहती है उसके कम ही लोग उस स्तर के हैं, जिन्हें हमारे प्रयासों के प्रति सच्ची सहानुभूति हो। अधिकांश लोग निहित स्वार्थ वाले हैं, जो अपने किसी प्रयोजन विशेष में सहायता प्राप्त करने के लिए हमारा उपयोग भर करना चाहते हैं। उनकी मनोभूमि उस स्तर तक विकसित नहीं हो सकी है कि वे हमारे जीवनोद्देश्य और क्रियाकलाप के पीछे काम करके दूरगामी प्रयोजन की उपयोगिता समझें और उसके लिए कुछ सहयोग- अनुदान देने की हिम्मत करें। मनुष्य, मनुष्य से सहायता प्राप्त करे-यह उचित है, पर केवल उतने तक ही सीमित बनकर रह जाए, यह बुरा है।

भीड़ में क्या बना है। सोमवती अमावस्या को गंगा तट पर स्नान करने वाले और रामलीला में रावण- वध के उत्सव में उपस्थित रहने वाले तथाकथित धार्मिक लोगों की भारी भीड़ जमा होती है, पर उस जनसमूह के पीछे कोई लक्ष्य नहीं होता। अतएव उस एकत्रीकरण का न व्यक्ति को लाभ मिलता है और न समाज को। वह जमघट विडंबना मात्र बनकर रह जाता है। सोचते हैं अपने साथ जुड़ा हुआ लाखों मनुष्यों का जनसमूह कहीं ऐसा ही खोखला न हो, जो हमारे पीठ फेरते ही मुँह फेर ले और जिस प्रयोजन को हम विश्वव्यापी बनाने के लिए अपने को तिल- तिल गलाते रहे हैं, वे उसकी ओर मुड़कर भी न देखें। यदि ऐसा हुआ, तो उन रंगीन सपनों का क्या होगा, जो हमने बड़ी साध के साथ जीवन भर सजाए और सँजोए हैं?
-अखण्ड ज्योति, अगस्त १९७०, पृष्ठ ५६

१२. सदुपयोग क्षमता सम्पन्न बनें— आज धन, शिक्षा और साधनों की प्रचुर मात्रा में अभिवृद्धि हुई है। यदि उसका सदुपयोग संभव हुआ होता, तो इतनी साधन संपन्न जनता स्वर्गीय सुख का आनंद ले रही होती, पर हो ठीक उलटा रहा है। बढ़ती हुई सम्पदा विपत्ति का कारण ही बनती चली जा रही है और मानव जीवन का हर पक्ष, समाज का हर क्षेत्र इतना कलुषित हो रहा है कि घुटन में प्राण ही निकल रहे हैं। बाहर जितना ही सौंदर्य, भीतर उतनी ही कुरूपता। बाहर जितना वैभव, भीतर उतना ही दारिद्रय। बाहर जितना ज्ञान, भीतर उतना ही अंधकार। इतना छद्म और इतना पाखण्ड शायद ही इतिहास में कभी आया हो। मानवीय महानता तो एक प्रकार से पलायन ही करती चली जा रही है। उसके स्थान पर जाल में फँसाने का अहेरी धंधा पनप रहा है। अब नैतिकता की, मानवता की कसौटी पर खरे सिद्ध होने वाले लोग दीपक लेकर ही तलाश किए जा सकते हैं।
 -अखण्ड ज्योति, मई १९७२, पृष्ठ १

१३. प्रतिभाओं का अधःपतन ही मुख्य समस्या— आज बारीकी से देखा जाए तो राजतन्त्र, धर्मतन्त्र, समाजतन्त्र, अर्थतन्त्र, बुद्धितन्त्र, कलातन्त्र के क्षेत्रों में नेतृत्व करने वाली प्रतिभाएँ बुरी तरह अपने कर्तव्य से च्युत हो रही हैं। मुख से बकवास करते रहने का कोई मूल्य नहीं, प्रभाव पड़ता है आस्थाओं का और कृतियों का। वे छिपाए छिपती भी नहीं। यदि उनका स्वर अवांछनीय है तो मोटे तौर से कोई जाने या न जाने पर सूक्ष्म जगत् में उनका भारी प्रभाव पड़ेगा। समर्थ प्रतिभाएँ जहाँ अपने वर्चस्व से लोकमानस को अपने समान उत्कृष्ट बना सकती हैं, वहाँ उनकी निकृष्टता व्यापक रूप से अवांछनीयता का भी विस्तार कर सकती है। सर्वसाधारण की गतिविधियों में गिरावट आ जाना उतना चिंताजनक नहीं जितना प्रतिभाओं का नैतिक अधःपतन। आज यही विश्वसंकट का प्रधान केन्द्र बिन्दु है। यही क्रम चलता रहा, तो समस्त संसार के लिए आत्मघाती संकट कुछ ही दिनों में प्रस्तुत हो सकता है।             -अखण्ड ज्योति मई १९७२, पृष्ठ ३०

१४. विनोबा जी कहते रहते थे कि किसी संस्था को तभी तक जीवित रहना चाहिए जब तक उसके कार्यकर्ता निस्पृह और सच्चे सेवाभावी हों। वे न रहें या घट जाएँ तो उन्हें विलासी प्रलोभन के सहारे रोके रहना व्यर्थ है। इस कसौटी पर अखण्ड ज्योति के प्रज्ञा परिजन अब तक निरन्तर खरे उतरते रहे हैं और उनके सेवा कार्यों से सन्तुष्ट जनता उन्हें इतना सम्मान और सहयोग प्रदान करती है कि उनकी ब्राह्मणोचित निर्वाह आवश्यकताएँ निरन्तर पूरी होती रहें। साथ ही इस परमार्थी वर्ग की संख्या भी बढ़ती रहती है। आमतौर से सादगी का ब्राह्मणोचित जीवन लोगों को रास नहीं आता। सभी आलसी और विलासी रहना चाहते हैं।

समय प्रभाव के सर्वथा विपरीत शक्ति केन्द्र के साथ जुड़े हुए और निजी जीवन में बढ़- चढ़कर आदर्श उपस्थिति करने वाले सद्गृहस्थ घर रहकर भी पुरातन काल के ब्राह्मणों जैसी जीवनचर्या अपनाते हैं। जो गड़बड़ करते हैं, मार्ग भ्रष्ट होते हैं वे मार्ग से हट जाते हैं या हटा दिए जाते हैं। जनसमुदाय ऐसे व्यक्तियों को किसी भी स्थिति में बरदाश्त नहीं करता व लोकेषणा में उलझा व्यक्ति स्वयं अपने पैरों कुल्हाड़ी मारकर ग्लानि भरा जीवन जीता देखा जाता है।

-अखण्ड ज्योति, जनवरी १९८८, पृष्ठ ५७
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