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Books - युगऋषि की वेदना एवं उमंगें जानें तदनुसार कुछ करें

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१. परिवार के प्रति कर्तव्यपरायण हों, मोह में न पड़े—         परिवार के प्रति हमें सच्चे अर्थों में कर्तव्यपरायण और उत्तरदायित्व निर्वाह करने वाला होना चाहिए। आज मोह के तमसाच्छन्न वातावरण में जहाँ बड़े लोग छोटों के लिए दौलत छोड़ने की हविस में और उन्हीं की गुलामी करने में मरते- खपते रहते हैं, वहाँ घर वाले भी इस शहद की मक्खी को हाथ से नहीं निकलने देना चाहते, जिसकी कमाई पर दूसरे ही गुलछर्रे उड़ाते हैं। आज के स्त्री बच्चे यह बिल्कुल पसंद नहीं करते कि उनका पिता या पति उनको लाभ देने के अतिरिक्त लोकमंगल जैसे कार्यों में कुछ समय या धन खर्च करे। इस दिशा में कुछ करने पर घर का विरोध सहना पड़ सकता है। उन्हें आशंका रहती है कि कहीं इस ओर दिलचस्पी लेने लगे तो अपने लिए जो मिलता था उसका प्रवाह दूसरी ओर मुड़ जाएगा। ऐसी दशा में स्वार्थ संकीर्णता के वातावरण में पले उन लोगों का विरोध उनकी दृष्टि में उचित भी है, पर उच्च आदर्शों की पूर्ति उनके अनुगमन से संभव ही नहीं रहती। यह सोचना क्लिष्ट कल्पना है कि घर वालों को सहमत करने के बाद तब परमार्थ के लिए कदम उठाएँगे।

        यह पूरा जीवन समाप्त हो जाने पर भी संभव न होगा। जिन्हें वस्तुतः कुछ करना हो, उन्हें अज्ञानग्रस्त समाज के विरोध की चिन्ता न करने की तरह परिवार के अनुचित प्रतिबंधों को भी उपेक्षा के गर्त में ही डालना पड़ेगा। घर वाले जो कहें, जो चाहें वही किया जाए यह आवश्यक नहीं। हमें मोहग्रस्त नहीं विवेकवान् होना चाहिए और पारिवारिक कर्तव्यों की उचित मर्यादा का पालन करते हुए उन लोभ एवं मोह भरे अनुबन्धों की उपेक्षा ही करनी चाहिए, जो हमारी क्षमता को लोकमंगल में न लगने देकर कुटुम्बियों की ही सुख- सुविधा में नियोजित किए रहना चाहते हैं। इस प्रकार का पारिवारिक विरोध आरम्भ में हर महामानव और श्रेयपथ के पथिक को सहना पड़ा है। अनुकूलता पीछे आ गई यह बात दूसरी है, पर आरम्भ में श्रेयार्थी को परिवार के इशारे पर गतिविधियाँ निर्धारित करने की अपेक्षा आत्मा की पुकार को ही प्रधानता देने का निर्णय करना पड़ा है।                      
        -अखण्ड ज्योति, जून १९७१, पृष्ठ ५८
२. सृजनशिल्पी की भूमिका निभानी है—         युग निर्माण परिवार के प्राणवान परिजनों को इन दिनों सृजनशिल्पी की भूमिका निभानी चाहिए। इसके लिए आवश्यक है कि भौतिक ललक लिप्साओं पर नियंत्रण किया जाए। लोभ, मोह के बंधन ढीले किए जाएँ। संकीर्ण स्वार्थपरता को हलका किया जाए। पेट और प्रजनन भर के लिए जीवन की सम्पदा का अपव्यय करते रहने की आदत को मोड़ा- मरोड़ा जाए। औसत भारतीय स्तर का निर्वाह पर्याप्त समझा जाए। महत्त्वाकाँक्षाओं की दिशा बदली जाए। वासना, तृष्णा और अहंता के आवेश शिथिल किए जाएँ। युग धर्म के निर्वाह के लिए कुछ बचत इसी परिवर्तन से हो सकती है। परमार्थ तभी बन पड़ता है, जब स्वार्थ पर अंकुश लगाया जाए। ब्राह्मणत्व और देवत्व की गरिमा स्वीकार करने और उच्चस्तरीय आदर्शों को व्यवहार में उतारने के साहस जुटाने का यही अवसर है। उसे चूका नहीं जाना चाहिए।

        युग पर्व के विशेष उत्तरदायित्वों की अवमानना करने वाले जीवंत प्राणवानों को चिरकाल तक पश्चात्ताप की आग में जलना पड़ता है। देव मानवों की बिरादरी में रहकर कायरता के व्यंग, उपहास सहना जितना कठिन पड़ता है उतना उच्च प्रयोजन के लिए त्याग, बलिदान का जोखिम उठाना नहीं। जिनकी अंतरात्मा में ऐसी अंतःप्रेरणा उठती हो वे उसे महाकाल प्रेरित युग चेतना का आह्वान ‘उद्बोधन’ समझें और तथाकथित बुद्धिमानों और स्वजनों की उपेक्षा करके भी प्रज्ञावतार का अनुकरण करने के लिए चल पड़ें। इसमें इन्हें प्रथमतः ही प्रसव पीड़ा की तरह कुछ अड़चन पड़ेगी, पीछे तो सब कुछ शुभ और श्रेष्ठ ही दृष्टिगोचर होगा।              
        -अखण्ड ज्योति, अगस्त १९७९, पृष्ठ ५५, ५६
३. ज्ञानयज्ञ के लिए अंशदान—         नव सृजन के लिए साधनों की भी आवश्यकता रहेगी ही। भौतिक प्रयोजनों में तो अर्थ साधन ही प्रधान होते हैं, किन्तु युग प्रवाह बदलने जैसे अध्यात्म अभियान के लिए भी अंततः साधन तो चाहिए ही। यों श्रम, समय, मनोयोग, भाव संवेदन जैसे तत्त्वों की ही युग परिवर्तन में प्रमुखता मानी जाएगी, फिर भी अर्थ साधनों के बिना उन्हें भी कार्य रूप में परिणत कर सकना सम्भव नहीं हो सकेगा। वस्तुएँ तो इस निमित्त भी चाहिए ही। सामान्य निर्माण कार्यों के लिए साधन जुटाने पड़ते हैं फिर इस महानतम कार्य के लिए साधनों के बिना ही काम चलता रहे ऐसा संभव नहीं।

        यह आवश्यकता भी जाग्रत् आत्माओं को ही पूरी करनी होगी। वैयक्तिक कार्यों में कटौती करके ही युग धर्म के लिए समयदान की व्यवस्था बन सकती है। इसी प्रकार निजी खर्चों में कटौती करके ही युग की पुकार के निमित्त अर्थ साधन प्रस्तुत कर सकना सम्भव हो सकता है। उत्तराधिकारियों के लिए जो अनावश्यक धन सम्पदा छोड़ी जाती है, उस मोह ग्रस्तता पर अंकुश लगाने का तो हर दृष्टि से औचित्य है। निजी परिवार को ही सब कुछ मानते रहना और विश्व परिवार के लिए कुछ भी न करना, ऐसा व्यामोह है जो युग शिल्पियों के लिए अशोभनीय ही ठहरता है।

        युग निर्माण परिवार के हर सदस्य को आरम्भ से ही एक घंटा समय और आधा कप चाय की कीमत ज्ञानयज्ञ के लिए देते रहने की प्रेरणा दी गई है। वह दिशा निर्धारण युग शिल्पियों के लिए आरंभिक एवं अनिवार्य कर्तव्य बोध की तरह था। अब उसमें उदात्त अभिवृद्धि का समय आ गया। समय और धन दोनों ही अनुदानों का स्तर तथा परिमाण बढ़ना चाहिए। जिसे अपने अंतरंग में जितनी युग चेतना हलचल मचाती दिखाई पड़े, उन्हें उतने से ही भावभरे अनुदान प्रस्तुत करने की तैयारी करनी चाहिए।                   
        -अखण्ड ज्योति, अगस्त १९७९, पृष्ठ- ५६
४. प्रज्ञापुत्रों को जाग्रत् जीवन्त होना है—         युगसंधि के इस बीजारोपण वर्ष में सभी प्रज्ञापुत्रों को जाग्रत् और जीवंत होने के लिए कहा गया है। आदर्शवादी कल्पना, मान्यता, भावना अपने समय पर अपने स्थान पर उपयुक्त है, पर इतने भर से काम चलता नहीं। मनमोदक खाने से किसका पेट भरा है। शेखचिल्ली को उसका मनचाहा गृहस्थ कहाँ मिला था। आदर्शवादिता अपनाने में अपने अभ्यस्त चिंतन और निर्धारित जीवनचर्या में क्रान्तिकारी उलट- पुलट करनी होती है। जो ऐसा साहस जुटा पाते हैं, जुटाने के लिए प्राणपण से प्रयत्न करते हैं उन्हीं को साधक कहते हैं। साधना से सिद्धि मिलने का सिद्धान्त सुनिश्चित है। सिद्धि का तात्पर्य जादुई चमत्कार दिखाकर किसी को अचंभे में डालना नहीं वरन यह है कि अपनी प्रबल मनस्विता और पुरुषार्थ परायणता के सहारे अभीष्ट लक्ष्य तक हर कीमत पर पहुँच कर ही रहा जाए।

        युगशिल्पी यदि यह अनुभव करते हैं कि महाकाल ने इन दिनों उनके लिए युग सृजन की साधना ही सर्वोपरि महत्त्व की समझी और निर्धारित की है तो फिर उन्हें अंगद, हनुमान, अर्जुन, विवेकानंद, रामतीर्थ, गोविंद सिंह, समर्थ रामदास, चाणक्य, बुद्ध, महावीर, गाँधी, विनोबा आदि के चरणचिह्नों पर चलते हुए युग धर्म के निर्वाह में एकनिष्ठ भाव से लग जाना चाहिए। इसके लिए प्रवचन कला इतनी प्रभावी नहीं हो सकती जितनी कि अपना आदर्शवादी उदाहरण प्रस्तुत कर सकने की साहसिकता। इन दिनों इसी उभार की अत्यधिक आवश्यकता है। इन्हीं दिनों प्रत्येक प्रज्ञा पुत्र को अपने स्वरूप को समझने और तदनुरूप जीवन की दिशाधारा निर्धारित करने के लिए आग्रह किया जा रहा है। इसे व्यक्ति विशेष का अनुरोध न समझा जाए, अपितु महाकाल का ऐसा निर्देश निर्धारण माना जाए, जिसे मानने पर ही आत्मिक जागरूकता सार्थक होती है। जो बहाने तकेंगे, कृपणता की व्यस्तता और चिंताओं के आवरण में छिपाने का प्रयत्न करेंगे, वे मुँह छिपा लेने पर भी प्रस्तुत कठिनाइयों से बच नहीं सकेंगे। अमूल्य समय को गँवा बैठने की हानि इतनी बड़ी सहेंगे जिसके लिए अनंतकाल तक पश्चात्ताप करना पड़ेगा और उसकी क्षतिपूर्ति कदाचित भविष्य में कभी भी संभव न हो सकेगी।             
        -अखण्ड ज्योति, अक्टूबर १९८०, पृष्ठ १०
५. प्रज्ञा परिवार—         अपने मिशन और परिवार का नामकरण गायत्री परिवार किया गया। अगले दिनों इसका स्वरूप ज्यों का त्यों रहेगा, पर बोलचाल की भाषा में उसे प्रज्ञा परिवार कहना भी उपयुक्त है। अब तक गायत्री परिवार के सदस्य परिजन कहलाते रहे हैं किंतु अब उन्हें अपने समुदाय और उत्तरदायित्व का बोध कराने वाला चिर प्राचीन किंतु नवीन नाम ‘प्रज्ञा परिजन’ दिया जा रहा है। गायत्री उपासक के स्थान पर ‘प्रज्ञापुत्र’ कहे जाने का महत्त्व आत्मबोध की दृष्टि से इसलिए अधिक है कि युग चेतना को उभारने और नवयुग का सृजन करने में निरत महाकाल की महाकाली- महाप्रज्ञा के अग्रदूत होने के गौरव का अनुमान किया जा सके। नित्य उपासना के अतिरिक्त ज्ञानयज्ञ के निमित्त नियमित रूप से समयदान एवं अंशदान निकालते रहने की सदस्यता शर्त देव परिवार के परिजनों के लिए आरंभ से ही निर्धारित की गई है। अपने समय में अग्निहोत्र को प्रतीक और ज्ञानयज्ञ को युग धर्म के रूप में मान्यता मिली थी। कभी सब लोग देवमानव थे और सभी ज्ञान सम्पन्न, इसलिए ज्ञानयज्ञ को उतना महत्त्व नहीं दिया गया, जितना कि वह महत्त्वपूर्ण है। आज इसलिए महत्त्वपूर्ण है कि इन दिनों चारों ओर अज्ञानांधकार की घोर तमिस्रा ने सर्वत्र अपना साम्राज्य जमा लिया है। इस स्थिति में ज्ञानयज्ञ की लाल मशाल जलानी पड़ेगी और उसी को युग यज्ञ की मान्यता देनी पड़ेगी।                 
        -अखण्ड ज्योति, अक्टूबर १९८०, पृष्ठ  ४८
६. प्रज्ञा परिजन अपना स्वरूप समझें। उनके भीतर दूसरों की तुलना में कहीं अधिक सुसंस्कारिता, आध्यात्मिकता की ऊर्जा विद्यमान है। इस ऊर्जा के सदुपयोग का ठीक यही मौसम है। समय चूक जाने पर पछताना ही शेष रह जाता है। गाड़ी चूक जाने पर यात्री पछताते और दूसरी गाड़ी के लिए लम्बी प्रतीक्षा में बैठे रहते हैं। जो गाड़ी इन दिनों प्लेटफार्म पर है, वह चली गई तो फिर दूसरी आने के लिए कितनी लम्बी प्रतीक्षा करनी पड़ेगी? और तब तक कौन सौभाग्यशाली अपनी वर्तमान स्थिति बनाए रहेगा? इस सम्बन्ध में कुछ कह सकना कठिन है।इन पंक्तियों में सामयिक उद्बोधन इतना ही है कि प्रज्ञा परिजन अपनी विशिष्ट उत्कृष्टता पर बार- बार विचार करें, अपना स्वरूप लक्ष्य समझें और युग धर्म की चुनौती स्वीकार करने में आनाकानी न करें। हनुमान और बुद्ध की तरह उनमें बीजांकुर मौजूद हैं मात्र इन्हें उभरने का अवसर मिलने भर की कमी है। इसके लिए ठीक यही समय है। आत्मकल्याण और विश्वकल्याण का दुहरा सुयोग सामने है। मात्र इतना भर करना शेष है कि अपने को, समय को पहचाना जाए और तद्नुरूप दिशाधारा निर्धारित करने में प्रमाद न बरता जाए।                       
        -अखण्ड ज्योति, जून १९८२, पृष्ठ ४ ७. तीन स्तर की जाग्रत् आत्माओं का संगठन—         प्रज्ञा परिवार में तीन स्तर की जाग्रत् आत्माओं का एकत्रीकरण हुआ है। वातावरण में प्रभाव प्रेरणा भर सकने की दृष्टि से उपयुक्त व्यक्तियों को ‘प्रज्ञापुंज’ कहा जायेगा। नव सृजन के अग्रदूत युग शिल्पी, जो परिवर्तन के महान निर्णय को अपने में उतारने और दूसरों में प्रवेश कराने के लिए प्रचण्ड पराक्रम करेंगे, उन्हें ‘प्रज्ञापुत्र’ कहा गया है। तीसरे ‘प्रज्ञा परिजन’ जो जन संपर्क और लोक सेवा के क्षेत्रों में भी अपनी विवशताओं के कारण कुछ अधिक न कर सकेंगे, किन्तु आत्मनिर्माण और परिवार निर्माण की दृष्टि से कुछ उठा भी न रखेंगे। इन दोनों में से प्रज्ञा पुंजों को विशिष्ट, प्रज्ञा पुत्रों को वरिष्ठ और प्रज्ञा परिजनों को कनिष्ठ कहकर संबोधित किया जाता है। इन्हें मूर्धन्य, प्रखर और पराक्रमी भी कहा जा सकता है।                      
        -अखण्ड ज्योति, मई १९८२, पृष्ठ- ५५
८. दायित्व निभाएँ—         ठोस काम वह किया जाना चाहिए जिसे करने का दायित्व महाकाल ने वरिष्ठ प्रज्ञापुत्रों के कंधों पर सौंपा है। वह कार्य एक ही है- जनमानस में महाप्रज्ञा का आलोक भर देना। इसके लिए किस स्थिति में किन्हें क्या करना चाहिए, इसका उल्लेख इन पंक्तियों में होता रहा है। उस पर एक बार फिर दृष्टिपात किया जा सकता है कि जो सौंपा गया था वह बन पड़ा या नहीं। बन पड़ा तो इतना कम तो नहीं है जो तपती धरती को मूसलाधार जल बरसने वाले महामेघ की गरिमा से कम पड़े। समय की माँग बड़ी है उसके लिए उथली पूजा से काम नहीं चल सकता। जलते तवे पर पानी की कुछ बूँदें पड़ने से क्या काम चलता है। इसके लिए इन दिनों समर्थों का ऐसा पुरुषार्थ होना चाहिए, जो उलटे को उलटकर सीधा कर सके। इसके लिए प्रत्येक वरिष्ठ प्रज्ञापुत्र सर्वथा समर्थ है। यदि परिस्थितियाँ बाधक हैं तो उन्हें ठोकर मारकर रास्ता रोकने से हटाया जा सकता है।

        स्रष्टा का राजकुमार मनुष्य केवल इसलिए दुर्बल पड़ता है कि उसे लोभ, मोह और अहंकार की बेड़ियाँ बेतरह जकड़कर असहाय बना देती हैं। यदि औसत भारतीय स्तर का निर्वाह अपनाया जाए, परिवार को छोटा, सभ्य, सुसंस्कृत, स्वावलम्बी रखा जा सके, तो युग धर्म के उच्चस्तरीय निर्वाह की सुविधा हर किसी को सहज ही मिल सकती है। संकीर्ण स्वार्थपरता और अहंकारी साज- सज्जा जुटाने में तनिक कटौती की जा सके, तो हर विचारशील को इतना अवकाश मिल सकता है, जिसमें वह आत्मकल्याण और युग निर्माण की महती आवश्यकताओं को पूरा कर सके। प्रकारांतर से यही कोयले के बहुमूल्य हीरा बनाने वाला कायाकल्प है। इसे स्वेच्छापूर्वक किया जा सकता है। सहयोग की कमी हो तो सत्पात्र की सुगंध सूँघकर खिले पुष्प पर मँडराने वाले भ्रमरों की तरह समूचा देव परिकर दौड़ पड़ता है।

        गुरुदेव ने मात्र अपनी पात्रता बढ़ाने में अथक प्रयास किए है और वह पाया है जो सच्चे अध्यात्म का सच्चा अवलम्बन करने पर मिलना चाहिए। इसी के अनुकरण की आवश्यकता है। सबके लिए एक ही संदेश है। यदि किसी की प्रज्ञा अभियान में, उसके सूत्र- संचालक में वास्तविक श्रद्धा हो तो उसका बखान करके नहीं, वरन् अपनी ऐसी श्रद्धांजलि प्रस्तुत करनी चाहिए जिसकी इस विनाश के ज्वालामुखी पर बैठे संसार को नितांत आवश्यकता है। ऐसी अनिवार्य आवश्यकता है, इतनी अनिवार्य कि उसे एक क्षण के लिए भी टाला नहीं जा सकता।                  
        -अखण्ड ज्योति, जुलाई १९८५, पृष्ठ -६४
९. व्यामोह से उबरें-         वरिष्ठ प्रज्ञापुत्र अपने को देव मानव समझें और अनुभव करें कि यह जन्म उन्हें सम्पदा एवं विलासिता के व्यामोह में डूबे रहने के लिए नहीं मिला है। नियति का निर्धारण यह है कि वे युग की समस्याओं को सुलझाने के लिए अपने आपको भीम, अर्जुन समझें, अंगद, हनुमान मानें और वह करें, जो नल- नील द्वारा असंभव को संभव करके दिखा दिया गया था। प्रज्ञापुत्रों को इस आपत्तिकाल में लालसा, लिप्सा, तृष्णा, वासना और अहंता की महत्त्वाकांक्षाएँ पूरी करने की छूट नहीं है। उन्हें दूसरा प्रयोजन देकर भेजा गया है, उसी को तत्परतापूर्वक करना है, सफलता- असफलता का,

        लाभ- हानि का विचार किए बिना, क्योंकि महाभारत विजय की तरह पाण्डवों की जीत निश्चित है। इससे पीछे हटकर अपयश ही कमाया जा सकता है, अपना लोक- परलोक ही बिगाड़ा जा सकता है। अच्छा हो कि ऐसा अवसर न आए। अच्छा हो कि यह सुनने के लिए, यह देखने के लिए कान व नेत्र, सक्रिय न रहें कि जिनके ऊपर आदर्शवादिता और उत्कृष्टता को जीवन्त रखने का दायित्व था, वे परीक्षा की घड़ी आने पर खोटे सिक्के की तरह काले पड़ गए और कूड़े के ढेर में छिप गए।

        प्रज्ञा परिजनों को भी इतना समय उसी प्रकार नवसृजन के लिए उत्सर्ग करना चाहिए, जिस प्रकार कि बुद्ध के परिव्राजकों और गाँधी के सत्याग्रहियों ने बिना लोभ- लालच की ओर मन डुलाए कष्ट के दिन हँसते हुए बिताए। क्या करना होगा? इसके लिए अनेक बार बताया जा चुका है कि इस अवधि को गृहस्थ ब्राह्मणों और विरक्त संतों की तरह लोक मानस के परिष्कार में, घर- घर अलख जगाने में, दुष्प्रवृत्ति उन्मूलन की विचारक्रांति में और सत्प्रवृत्ति संवर्द्धन के पुण्य- परमार्थ में नियोजित किया जा सकता है। प्रश्न अनुदान- योगदान का है। जिसने इसे स्वीकार कर लिया, उसके लिए समयदान और अंशदान कोई समस्या नहीं। उसे तो सुदामा के तंदुलों और शबरी के बेरों की तरह कोई भी प्रस्तुत कर सकता है।

        शरीर से बालू चिपटाकर समुद्र पाटने का दुस्साहस करने वाली गिलहरी से अधिक गई- गुजरी स्थिति में हम में से कोई भी नहीं है। कृपणता तो पापी मन में घुसी रहती है। वही चित्र- विचित्र बहाने गढ़ती और अस्वस्थता, असमर्थता की आड़ ढूँढ़ती है।              
        -अखण्ड ज्योति, सितम्बर १९८६, पृष्ठ ५४ १०. सर्वप्रथम आगे आने वाले युग सृजेताओं को व्रतधारी प्रज्ञापुत्र कहा जाएगा। वे उपासना, साधना, आराधना के आधार पर आत्म परिष्कार करेंगे। धार को पैनी करेंगे और इतनी अंतः क्षमता अर्जित करेंगे जिसके आधार पर उनसे कुछ महत्त्वपूर्ण कार्य करते बन पड़ें। उपासना अर्थात् दिव्य सत्ता के लिए बैठना, उसके साथ गुँथ जाना, आग- ईंधन की तरह, सूर्यार्घ्य के समय अर्पित किए गए जल की तरह। कर्मकाण्ड के रूप में गायत्री जैसे मंत्र का अर्थ सहित ध्यान एवं जप और उदीयमान सूर्य का ध्यान किया जा सकता है। यह नियमित होना चाहिए।

        उपासना से आत्मबल बढ़ता है, प्राण ऊर्जा का रोम- रोम में संचार होता है। इस कृत्य को दैनिक जीवन में किसी न किसी प्रकार गुँथा ही रखना चाहिए। साधना का पूरा नाम है- जीवन साधना, जीवन को सुव्यवस्थित बनाना। जीवन सम्पदा को आत्म- परिष्कार और लोकमंगल के पुण्य परमार्थ के साथ जोड़कर, उसे सब प्रकार कृतकृत्य बनाना। इसके लिए आत्मनिरीक्षण, आत्मसुधार, आत्मनिर्माण और आत्मविकास जैसी चेष्टाएँ करनी पड़ती हैं। इन्द्रिय संयम, अर्थ संयम, समय संयम, विचार संयम अपनाना होता है। सादा जीवन उच्च विचार का मन्त्र हृदयंगम किया जाए। औसत नागरिक स्तर का निर्वाह पाकर संतुष्ट रहा जाए।

        अपने परिवार के सदस्यों को स्वावलम्बी और सुसंस्कारी बनाना पर्याप्त माना जाए। उनके लिए उत्तराधिकार में बड़ी सम्पदा छोड़ मरने की ललक न संजोयी जाए। यही है प्रामाणिकता, प्रखरता और प्रतिभा अर्जित करने का राजमार्ग। आराधना का अर्थ है- विराट् ब्रह्म की, विशाल विश्व की, विश्वमानव की सेवा साधना में समुचित उत्साह और तत्परता रखना। इसी परमार्थ परायणता को ईश्वर की आराधना कहते हैं। यही वह पूजा है जिससे आत्मसंतोष, लोकसम्मान एवं देवी अनुग्रह के तीनों लाभ प्राप्त होते हैं। स्वार्थ और परमार्थ की समन्वित सिद्धि होती है। लोक परलोक दोनों बनते हैं।  
        -अखण्ड ज्योति, सितम्बर १९८८, पृष्ठ ६१, ६२
११. लोकमानस का परिष्कार सबसे बड़ा परमार्थ—         इन दिनों सबसे बड़ा परमार्थ लोक मानस का परिष्कार ही है। इस क्षेत्र में घुसी विकृतियों के कारण ही दरिद्रता, रुग्णता, आपदा जैसी पिछड़ेपन की जन्मदात्री हीनताएँ मनुष्य के सिर पर चढ़ती हैं। आज की समस्त समस्याएँ आर्थिक संकट के कारण ही उत्पन्न हुई हैं। उन सबका एक ही समाधान है जनमानस का परिष्कार, सत्प्रवृत्ति संवर्द्धन। इन्हीं पुण्य प्रयोजनों को प्रमुखता देनी चाहिए।                 
        -अखण्ड ज्योति, सितम्बर १९८८, पृष्ठ ६२
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