संगठन का स्वरूप
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औंधे-सीधे लोगों का, भानुमती का कुनबा इकट्ठा करके कोई संगठन बना लिया जाए तो ठहरता कहाँ है? जिन लोगों की दृष्टि में विचारों का कोई मूल्य या महत्त्व नहीं, वे किसी कार्य में देर तक कब ठहरने वाले हैं ? जो लोग अखण्ड ज्योति नहीं मँगा सके, जो गायत्री साहित्य नहीं पढ़ सके, वे किसी समय बड़े भारी श्रद्धावान् लगने वाले साधक भी आज सब कुछ छोड़ बैठे दीखते हैं। प्रेरणा का सूत्र टूट गया तथा अपना निज का कोई गहरा स्तर था नहीं फिर उनके पैर भौतिक बाधाओं के झकझोरे में कब तक टिके रहते ? इसलिए हम बारीकी से देखते रहते हैं कि सामने बैठा हुआ लम्बी-चौड़ी बातें बनाने वाला व्यक्ति हमारी विचारधारा के साथ अखण्ड ज्योति या साहित्य के माध्यम से बँधा है या नहीं ? यदि वह इसकी उपेक्षा करता है तो हम समझ लेते हैं कि वह देर तक टिकने वाला नहीं है। जो हमारे विचारों को प्यार नहीं करते, उनका मूल्य नहीं समझते, वे शिष्टाचार में मीठे शब्द भले ही कहें, गुरुजी, गुरुजी भले ही कहें, वस्तुतः हजारों मील दूर हैं। उनसे किसी बड़े काम की आशा नहीं रखी जा सकती।
-अखण्ड ज्योति, जनवरी १९६२, पृष्ठ ४३
२. परिवार रचना की दो परम्पराएँ- परिवारों का गठन दो प्रकार का होता है, एक रक्त परिवार दूसरा विचार परिवार। भावनाओं और आकांक्षाओं की एकता वाले भी एक कुटुम्बी ही बन जाते हैं। रक्त के आधार पर बना हुआ वंश परिवार कहलाता है और भावनाओं के आधार पर बना संगठन ज्ञान परिवार या गुरु परिवार कहलाता है।
संगठन तो पहले भी हमने किया था, पर हमारे विचारों को सबसे नियमित पढ़ने-सुनने की शर्त न रहने से उनकी न तो जीवन दिशा बन सकी और न आस्था दृढ़ रह सकी। एक से विचारों के लोगों में स्वभावतः प्रेमभाव पैदा होता है। एक दूसरे को प्रेरणा और प्रोत्साहन देते हैं और लौकिक जीवन में भी एक दूसरे की सहायता किसी न किसी प्रकार करते हैं। दूसरे लोग इस संघबद्धता से प्रभावित होते हैं। हममें से प्रत्येक को अपने वैयक्तिक जीवन का सर्वांगपूर्ण विकास करने के लिए अपने समीपवर्ती क्षेत्र में जितनों को भी अपने प्रभाव क्षेत्र में ला सकना संभव हो, उसके लिए शिथिल मन से नहीं, पूरे उत्साह से प्रयत्न करना चाहिए।
युग परिवर्तन कार्यक्रम का आधार ही यह संगठन होगा। व्यापक अनैतिकता का अंत सत्पुरुषों की संगठन शक्ति के बिना और किसी उपाय से संभव नहीं। जितना-जितना यह संगठन व्यापक और प्रबल होता जाएगा, उसी अनुपात से अपने कार्यक्रम बनते चलेंगे और एक-एक कदम उठाते हुए उस लक्ष्य की पूर्णता तक पहुँच सकेंगे, जिसके ऊपर समस्त विश्व की, समस्त मानव जगत् की सुख-शांति निर्भर है।
-अखण्ड ज्योति, सितम्बर १९६२, पृष्ठ ४५
३. कोई संस्था संगठन न होते हुए भी हमारा यह भावना परिवार वह है जो संस्कारों और भावनाओं के प्रगाढ़ सम्बन्धों के कारण परस्पर अत्यन्त दृढ़तापूर्वक बँधा हुआ है। युग निर्माण की प्रथम भूमिका का संपादन करने के लिए हमें अपने इस परिवार में आवश्यक जीवन दिखाई पड़ता है। इसी से आरम्भिक कार्यक्रम अपने घर से प्रारम्भ हो रहा है।
पीछे तो इसका विस्तार अपरिचित क्षेत्र में होना है। अगणित व्यक्ति, संगठन, देश और समूह इस योजना को अपने-अपने ढंग से कार्यान्वित करेंगे। जिस प्रकार अध्यात्मवाद, साम्यवाद, भौतिकवाद आदि अनेक वाद कोई संस्था नहीं वरन विचारधारा एवं प्रेरणा होती है। व्यक्ति या संगठन इन्हें अपने-अपने ढंग से कार्यान्वित करते हैं। इसी प्रकार युग निर्माण कार्यक्रम एक प्रकाश-प्रवाह एवं प्रोत्साहन उत्पन्न करने वाला एक मार्गदर्शन बनकर विकसित होगा।
-अखण्ड ज्योति, अप्रैल १९६३, पृष्ठ ४६
४. सज्जनों का संगठन युग निर्माण योजना का लक्ष्य है। इसलिए संगठन से पूर्व हमें सज्जनता के लक्षणों से युक्त मनुष्यों को खोजना पड़ेगा। विचित्र स्वभाव के अवांछनीय गुण, कर्म, स्वभाव के व्यक्तियों का संगठन कुछ महत्त्व नहीं रखता वरन उलटी विकृति उत्पन्न करता है। दुष्ट लोगों का इकट्ठा होना भी बुरा है। वे यदि कहीं इकट्ठे होंगे तो वहाँ विध्वंसक या अनुपयुक्त वातावरण ही उत्पन्न करेंगे।
इसलिए संगठन कार्य आरम्भ करने से पूर्व हमें यह पूरा ध्यान रखना होगा कि सज्जनता प्रधान गुण, कर्म, स्वभाव के लोग ही अपने देवसमाज में सम्मिलित हो सकें। आसुरीवृ़ित्त प्रधान लोगों को पहले सुधारना चाहिए और जब वे काम के बन जाएँ, तब उन्हें संगठन में सम्मिलित कर लेना चाहिए। एक ओर सुधारक प्रयत्न जारी रहे और दूसरी ओर सुधरे हुओं को संगठन में सम्मिलित करने का।
सेवाभावी उत्साही व्यक्तियों को स्वयंसेवक की तरह अपने आप को जन साधारण के कार्यों में सहयोग देने के लिए आगे कदम बढ़ाना चाहिए और अपना समय देकर दूसरों के साथ सम्पर्क बनाने और उन्हें उपयुक्त प्रेरणा देते रहने का कार्य करना चाहिए। पदाधिकारी या नेता बनने की आकांक्षा बुरी है। इससे संगठन बढ़ते नहीं, नष्ट होते हैं। इसलिए हमें केवल स्वयंसेवक बनने की आकांक्षा करनी चाहिए। कोई पद मिले, नेता चुने जाएँ, तब कुछ काम करेंगे। यह विचार मन से बिल्कुल निकाल देना चाहिए और भावनाशील व्यक्तियों को विचार क्रांति का क्षेत्र व्यापक बनाने एवं उसे संगठित करने में निरंतर लगे रहने को तत्पर होना चाहिए।
-अखण्ड ज्योति, दिसम्बर १९६३, पृष्ठ ५४६.
अभी दस हजार कर्मयोगियों द्वारा एक लाख व्यक्तियों को विचार क्रांति के छात्रों के रूप में प्रशिक्षित किया जा रहा है, यह संख्या भी कम संतोष, गर्व और हर्ष की नहीं है। एक लाख छात्रों का यह विचार क्रांति विश्वविद्यालय आज की परिस्थितियों में अनुपम एवं अभिनव ही कहा जा सकता है। जीवन निर्माण की कला सिखाने, विवेक सम्मत विचारधारा अपनाने, नवनिर्माण के लिए त्याग, बलिदान करने को कटिबद्ध करने के लिए ऐसा प्रेरणा केन्द्र कोई था भी नहीं, जो भारतीय जनता में मानसिक स्तर की अभिनव रचना कर सके। इस अभाव की पूर्ति के लिए अपना यह सत्प्रयत्न क्या महत्त्वपूर्ण नहीं है? आज यह प्रयास इतने विस्तृत देश को देखते हुए छोटा भले ही प्रतीत होता हो, पर कल उसके परिणाम दूरगामी होंगे। यह प्रशिक्षण एक लाख तक ही सीमित न रहेगा। आज के यह छात्र कल के युग निर्माण शिक्षक बनेंगे और उनके द्वारा अगली पीढ़ी की शिक्षा आरंभ होगी। यह क्रम चक्रवृद्धि ब्याज की दर से बढ़ेगा तो कुछ ही वर्षों में समस्त संसार को, समस्त मानव जाति को आदर्शवादिता की प्रेरणा से अनुप्राणित कर सकना संभव होगा। वर्तमान कठिनाइयों और बुराइयों के प्रति क्षोभ व्यक्त करते रहने, उन्हें कोसते रहने से कुछ काम चलने वाला नहीं है, प्रतिकार और उपचार से ही कुछ प्रयोजन सिद्ध होता है। अखण्ड ज्योति परिवार की यह विचार क्रांति पद्धति ऐसी ही रचनात्मक प्रक्रिया है, जिसका सुन्दर परिणाम हम थोड़े ही दिनों में प्रत्यक्ष देखेंगे।
-अखण्ड ज्योति, अगस्त १९६५, पृष्ठ ४५, ४६७.
7 .भीड़ में से संस्कारवानों की खोज— संख्या बल- प्रदर्शन की दृष्टि से उपयोगी होती है पर काम थोड़े से काम के व्यक्ति ही चलाया करते हैं। भीड़ का उत्साह क्षणिक होता है। जिनमें दृढ़ता और निष्ठा नहीं वे आवेश में कुछ तूफान तो कर सकते हैं, पर देर तक किसी आदर्श पर ठहर नहीं सकते। ऐसे लोग नारे लगाने और प्रदर्शन करने के लिए काम चलाऊ प्रयोजन पूरा कर सकते हैं पर किसी दीर्घकालीन पारमार्थिक प्रयोजन के लिए वे कुछ अधिक काम के सिद्ध नहीं हो सकते। कोई ठोस काम हमेशा निष्ठावान आदर्श व्यक्तियों के बलबूते पर ही चलता है।-अखण्ड ज्योति, नवम्बर १९६६, पृष्ठ ४५
८.
अखण्ड ज्योति परिवार का संगठन हमारे आजीवन प्रयत्न का फल है। सूक्ष्म दृष्टि से ढूँढ़- ढूँढ़कर हमने देश भर में से संस्कारवान् जाग्रत् आत्माओं को प्रयत्नपूर्वक एकत्रित किया है। इसमें बहुत समय लगा है और बहुत श्रम। परिवार के अधिकांश सदस्य पूर्वजन्मों की भारी आध्यात्मिक सम्पदा से सम्पन्न हैं। उनका वर्तमान स्वरूप सामान्य भले ही दीखता हो, पर उनके अंतरंग में वे तत्त्व विद्यमान हैं कि थोड़े से प्रयत्न से उन्हें जगाया, बढ़ाया और समुन्नत स्थिति तक पहुँचाया जा सकता है। वाल्मीकि, अजामिल, अंगुलिमाल, सूरदास, तुलसीदास जैसे हेय जीवन बिताने वाले थोड़ा- सा अवसर मिलने पर देखते- देखते उच्च भूमिका में इसलिए जाग्रत् हो उठे थे कि उनके पास पूर्वजन्मों की संचित संपत्ति बहुत थी। फिर जिनके हेय जीवन नहीं हैं-केवल मूर्छित मात्र हैं, उन्हें सजग और समुन्नत बनाया जा सकना कुछ अधिक कठिन नहीं है।
जिस दिन व्यक्ति की अंतः भूमिका यह स्वीकार कर ले कि मानव जीवन का उद्देश्य पेट पालने और बच्चे उगाने से कुछ आगे बढ़कर भी है, यह अलभ्य अवसर किन्हीं महान प्रयोजन के लिए भगवान् ने दिया है और थोड़ा दुस्साहस कर अपने स्वतंत्र विवेक का सहारा लेकर कोई भी व्यक्ति अपनी विचारणा और प्रक्रिया को बदलने में वैसा ही समर्थ हो सकता है, जैसे कि ऐतिहासिक महापुरुष समर्थ हुए हैं। इतनी सी बात यदि गले उतर जाए तो आज बिलकुल ही गया- गुजरा दीखने वाला व्यक्ति कल अपनी रीति- नीति में आमूल- चूल परिवर्तन कर सकता है और जमीन पर रेंगने वाला, आकाश में उड़ने लग सकता है। संस्कारवान् व्यक्तियों के लिए यह आत्म परिवर्तन अति सरल होता है, कोई छोटी- सी चोट उनकी दिशा में आश्चर्यजनक मोड़ प्रस्तुत कर सकती है।
-अखण्ड ज्योति, नवम्बर १९६८, पृष्ठ ६३
९ संगठन बढ़े- सुदृढ़ बने— हर प्रबुद्ध परिजन को अपने दूसरे साथियों में उल्लास और उत्साह पैदा करना है। इसलिए जहाँ जितने अखण्ड ज्योति परिजन हैं, वहाँ उन्हें परस्पर, सम्पर्क, सहयोग एवं घनिष्ठ भाव पैदा करना चाहिए ताकि एक मजबूत शृंखला में आबद्ध होकर एक दूसरे से प्रेरणा प्राप्त करने की प्रक्रिया ठीक तरह चलने लगे। अपने में से एक को भी बिछुड़ने नहीं देना चाहिए, वरन् प्रयत्न यह करना चाहिए कि विशालता की अभिवृद्धि हो और संख्या की दृष्टि से हम अब की अपेक्षा दूने चौगुने हो जाएँ। बड़ी सेना अपनी उत्कृष्टता एवं विशालता के आधार पर बड़े मोर्चे फतह करती है। अपना मोर्चा बहुत बड़ा है, अति व्यापक है। समस्त संसार अपना कार्य- क्षेत्र है। जीवन की हर दिशा को प्रकाश देना और संसार की हर समस्या को सुलझाना है। इसलिए शक्ति में वृद्धि भी आवश्यक है। कहना न होगा कि संघ शक्ति इस युग की सबसे बड़ी शक्ति है। हम जितने हैं, उतने पर ही सीमित एवं संतुष्ट नहीं रह सकते हैं। मोर्चे की विशालता को देखते हुए परिवार का विस्तार होना भी अपेक्षित है।
-अखण्ड ज्योति, नवम्बर १९६८, पृष्ठ ६५
१०. भीड़ का संगठन बेकार है। मुर्दों का पहाड़ इकट्ठा करने से तो बदबू ही फैलेगी। जिनके मन में कसक है, जो वस्तुस्थिति को समझ चुके हैं उन्हीं का एक महान प्रयोजन के लिए एकत्रीकरण वास्तविक संगठन कहला सकता है। युग निर्माण परिवार संगठन में अब वे ही लोग लिए जा रहे हैं, जो ज्ञानयज्ञ के लिए समयदान और अंशदान देने के लिए निष्ठा और तत्परता दिखाने लगे हैं। कर्मठ लोगों का संगठन बन जाने पर प्रचारात्मक अभियान को संतोषजनक स्तर तक पहुँचा देने पर ऐसी स्थिति आ जाएगी कि जो अति महत्त्वपूर्ण कार्य इन दिनों शक्ति एवं परिस्थिति के अभाव में कर नहीं पा रहे हैं, वे आसानी से किए जा सकें।
सृजनात्मक और संघर्षात्मक कार्यक्रम की हमें अति विशाल परिमाण पर तैयारी करनी होगी। इन दिनों तो उनकी चर्चा मात्र करते हैं, बहुत जोर नहीं देते, क्योंकि जिस लोक- समर्थन के लिए प्रचार और कार्य कर सकने के लिए जिस संगठन की आवश्यकता है वे दोनों ही तत्त्व अपने हाथ में उतने नहीं हैं, जिससे कि अगले कार्यों को संतोषजनक स्थिति में चलाया जा सके। पर विश्वास है कि प्रचार और संगठन का पूर्वार्द्ध कुछ ही दिन में संतोषजनक स्तर तक पहुँच जाएगा। तब हम सृजन और संघर्ष का विशाल और निर्णायक अभियान आसानी से छेंड़ सकेंगे और उसे सरलतापूर्वक सफल बना सकेंगे।
-अखण्ड ज्योति, जून १९७१, पृष्ठ ६० १०.
सद्भावना सम्पन्न, सद्विचार वाले, सन्मार्गगामी सज्जनों की संख्या बढ़ाना, ऐसे गुण, कर्म, स्वभाव के लोगों को खोज करके, उन्हें संगठित करना, युग निर्माण योजना को मूर्तिमान बनाने के लिए आवश्यक है। आगे चलकर वे रचनात्मक कार्य आरंभ करने होंगे जिनके द्वारा मनुष्य में सोये हुए देवत्व का तीव्र गति से जागरण हो सके। वह त्याग, प्रेम, उदारता, संयम, सदाचार का जीवन जिए और इस धरती पर ही स्वर्ग अवतरित हुआ दृष्टिगोचर होने लगे। ऐसा सतयुग लाने के लिए आज की परिस्थितियों को बदलना होगा और चारों ओर फैली हुई दुष्प्रवृत्तियों की असुरता के विरुद्ध हमें एक मजबूत मोर्चाबंदी करके देवासुर संग्राम खड़ा करना होगा। रीछ, बंदरों की ही सही पर सेना तो चाहिए ही। हमें भी अपना संगठन इन्हीं उद्देश्यों की पूर्ति के लिए करना ही पड़ेगा।
-अखण्ड ज्योति, १९६३ दिसम्बर, पृष्ठ ५६११. सृजन सेना का गठन करना है— अगला कार्यक्रम परिव्राजकों की सृजन सेना का गठन है। लेखनी, वाणी के माध्यम से चल रहे विचार क्रांति अभियान को अब तक जो सफलता मिली है, उसका श्रेय भी जनसम्पर्क के रूप में चलने वाले प्रयासों को ही दिया जा सकता है। भावी प्रगति का मध्य बिन्दु भी इसी को माना जाएगा। बौद्धकालीन विचार क्रांति की व्यापकता और सफलता का श्रेय उस मिशन के लिए समर्पित परिव्राजकों को ही दिया जा सकता है। उन्हीं के प्रयास से भारत, एशिया और समस्त संसार को धर्मचक्र प्रवर्तन के महान अभियान से लाभ लेने का अवसर मिला था। ज्ञानयज्ञ की लाल मशाल भी उसी प्रक्रिया का उत्तरार्द्ध सम्पन्न कर रही है, अस्तु माध्यमों के संदर्भ में भी उसी प्रक्रिया का अनुकरण करना होगा। सुयोग्य परिव्राजकों का सुगठित परिवार ही घर- घर में पहुँचकर जन- जन के मन- मन में युग चेतना का संचार कर सकेगा। जन- जागरण का अलख जगाना प्राणवान् परिव्राजकों के लिए ही संभव हो सकता है।
-अखण्ड ज्योति, अगस्त, १९७८, पृष्ठ ५५
१२. सभी जानते हैं कि संगठन में कितनी शक्ति होती है। तिनकों के मिलने से हाथी बाँधने वाला मोटा रस्सा बनता है। धागे मिलने से मजबूत फर्श, कालीन बनते हैं। सींकों का सम्मिलित स्वरूप बँधी बुहारी बनता है और सारे घर आँगन को झाड़- बुहारकर साफ करता है। मेले- ठेलों में बिखरी भीड़ धक्के खाती और जेब कटाती है। पर वही जनसमुदाय जब सैनिकों के रूप में संगठित, प्रशिक्षित और कटिबद्ध हो जाता है, तो सुरक्षा और व्यवस्था की महती आवश्यकता पूरी करता है। नवनिर्माण अपने युग का अति महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक कार्य है। इसे सम्पन्न करने के लिए भावनाशीलों का उद्देश्यपूर्ण गठन एक छत के नीचे होना चाहिए। प्रज्ञा परिवार इस बार ऐसी ही छोटी- छोटी इकाइयों के रूप में अपनी समवेत स्थिति प्रकट करने जा रहा है। इसे बड़ा कदम माना जाना चाहिए और आशा की जानी चाहिए कि इस आधार पर व्यक्तित्वों की प्रखरता प्रकट होगी और समाज के नवनिर्माण की प्रक्रिया दुर्गति से आगे बढ़ चलेगी। व्यक्तिगत चिंतन, चरित्र और व्यवहार में आदर्शवादिता का समन्वय होना चाहिए। जन- जन की प्रामाणिकता, प्रखरता निखरनी चाहिए। समाज में सहकारिता, उदारता और एकता- समता की रीति- नीति चलनी चाहिए। सर्वत्र समझदारी, ईमानदारी, जिम्मेदारी और बहादुरी का माहौल बनना चाहिए। सत्प्रवृत्तियों का संवर्द्धन और दुष्प्रवृत्तियों का उन्मूलन समग्र तत्परता और तन्मयता के साथ होना चाहिए। व्यक्ति को उत्कृष्ट और समाज को समर्थ बनाना चाहिए।
-अखण्ड ज्योति, फरवरी १९८७, पृष्ठ ६७
१३. बड़े संगठन सँभालने में नहीं आते। उनमें अनगढ़ों की भरमार रहने से टाँग खिंचाई होती है और मेढ़क तराजू में तोलने के समय देखी जाने वाली धमा- चौकड़ी मचती है। संख्या प्रदर्शन अपनी कोई आवश्यकता भी नहीं। यहाँ क्वालिटी चाहिए, क्वान्टिटी नहीं। इस दृष्टि से हम पाँच से पच्चीस का चक्रवृद्धि क्रम यदि चल पड़े, तो इसी परिवार के बेटे- पोते परपोते मिलकर समूची विश्व- व्यवस्था बना सकने में सफल हो सकते हैं। हम पाँच हमारे पच्चीस का उद्घोष यदि प्राणपण से पूरा करने में सभी परिजन भावनापूर्वक जुट पड़ें तो देखते ही देखते एक लाख का प्रज्ञा संगठन खड़ा होने का स्वप्न साकार हो सकता है।
-अखण्ड ज्योति, अक्टूबर १९८८, पृष्ठ ५४
१४. वन्दनीया माताजी का संदेश— वसंत पर्व पर यह मिशन हजारों- लाखों वर्षों तक चलेगा, क्योंकि दैवी शक्ति इसके साथ है। मिशन का सूत्र- संचालन ऐसा है कि न तो किसी को शंका करनी चाहिए, न ही भटकना चाहिए। यदि यह व्यक्ति पर टिका मिशन होता, तो व्यक्ति के साथ ही समाप्त भी हो जाता। यह शक्ति पर टिका अभियान है, दैवी अभियान है। विवेकानन्दों, निवेदिताओं ने अभी अपनी प्रसुप्त क्षमता को पहचाना नहीं है। यदि सभी जाग्रत आत्माओं को यह अनुमान हो सके कि वे क्या हैं व किन उद्देश्यों के लिए उनका अवतरण हुआ है तो देखते- देखते प्रतिकूलताओं के बीच भी नवसृजन होता चला जाएगा। पूज्यवर की परोक्ष जगत् से व मेरी प्रत्यक्ष जगत् से तपश्चर्या इन्हीं उद्देश्यों के निमित्त है। संकल्प लें कि आजीवन गुरुदेव के पदचिह्नों पर ही सब चलेंगे वैसा ही उल्लास मन में बनाए रखेंगे तथा विद्या विस्तार के सभी महत्त्वपूर्ण दायित्वों को अंतिम स्थिति तक पहुँचाकर रहेंगे। लोकमंगल के लिए ही सबका समर्पित जीवन होगा। घर- घर में गुरुजी के विचार पहुँचाकर ही रहेंगे।
-अखण्ड ज्योति, मार्च १९९१, पृष्ठ ५७
-अखण्ड ज्योति, जनवरी १९६२, पृष्ठ ४३
२. परिवार रचना की दो परम्पराएँ- परिवारों का गठन दो प्रकार का होता है, एक रक्त परिवार दूसरा विचार परिवार। भावनाओं और आकांक्षाओं की एकता वाले भी एक कुटुम्बी ही बन जाते हैं। रक्त के आधार पर बना हुआ वंश परिवार कहलाता है और भावनाओं के आधार पर बना संगठन ज्ञान परिवार या गुरु परिवार कहलाता है।
संगठन तो पहले भी हमने किया था, पर हमारे विचारों को सबसे नियमित पढ़ने-सुनने की शर्त न रहने से उनकी न तो जीवन दिशा बन सकी और न आस्था दृढ़ रह सकी। एक से विचारों के लोगों में स्वभावतः प्रेमभाव पैदा होता है। एक दूसरे को प्रेरणा और प्रोत्साहन देते हैं और लौकिक जीवन में भी एक दूसरे की सहायता किसी न किसी प्रकार करते हैं। दूसरे लोग इस संघबद्धता से प्रभावित होते हैं। हममें से प्रत्येक को अपने वैयक्तिक जीवन का सर्वांगपूर्ण विकास करने के लिए अपने समीपवर्ती क्षेत्र में जितनों को भी अपने प्रभाव क्षेत्र में ला सकना संभव हो, उसके लिए शिथिल मन से नहीं, पूरे उत्साह से प्रयत्न करना चाहिए।
युग परिवर्तन कार्यक्रम का आधार ही यह संगठन होगा। व्यापक अनैतिकता का अंत सत्पुरुषों की संगठन शक्ति के बिना और किसी उपाय से संभव नहीं। जितना-जितना यह संगठन व्यापक और प्रबल होता जाएगा, उसी अनुपात से अपने कार्यक्रम बनते चलेंगे और एक-एक कदम उठाते हुए उस लक्ष्य की पूर्णता तक पहुँच सकेंगे, जिसके ऊपर समस्त विश्व की, समस्त मानव जगत् की सुख-शांति निर्भर है।
-अखण्ड ज्योति, सितम्बर १९६२, पृष्ठ ४५
३. कोई संस्था संगठन न होते हुए भी हमारा यह भावना परिवार वह है जो संस्कारों और भावनाओं के प्रगाढ़ सम्बन्धों के कारण परस्पर अत्यन्त दृढ़तापूर्वक बँधा हुआ है। युग निर्माण की प्रथम भूमिका का संपादन करने के लिए हमें अपने इस परिवार में आवश्यक जीवन दिखाई पड़ता है। इसी से आरम्भिक कार्यक्रम अपने घर से प्रारम्भ हो रहा है।
पीछे तो इसका विस्तार अपरिचित क्षेत्र में होना है। अगणित व्यक्ति, संगठन, देश और समूह इस योजना को अपने-अपने ढंग से कार्यान्वित करेंगे। जिस प्रकार अध्यात्मवाद, साम्यवाद, भौतिकवाद आदि अनेक वाद कोई संस्था नहीं वरन विचारधारा एवं प्रेरणा होती है। व्यक्ति या संगठन इन्हें अपने-अपने ढंग से कार्यान्वित करते हैं। इसी प्रकार युग निर्माण कार्यक्रम एक प्रकाश-प्रवाह एवं प्रोत्साहन उत्पन्न करने वाला एक मार्गदर्शन बनकर विकसित होगा।
-अखण्ड ज्योति, अप्रैल १९६३, पृष्ठ ४६
४. सज्जनों का संगठन युग निर्माण योजना का लक्ष्य है। इसलिए संगठन से पूर्व हमें सज्जनता के लक्षणों से युक्त मनुष्यों को खोजना पड़ेगा। विचित्र स्वभाव के अवांछनीय गुण, कर्म, स्वभाव के व्यक्तियों का संगठन कुछ महत्त्व नहीं रखता वरन उलटी विकृति उत्पन्न करता है। दुष्ट लोगों का इकट्ठा होना भी बुरा है। वे यदि कहीं इकट्ठे होंगे तो वहाँ विध्वंसक या अनुपयुक्त वातावरण ही उत्पन्न करेंगे।
इसलिए संगठन कार्य आरम्भ करने से पूर्व हमें यह पूरा ध्यान रखना होगा कि सज्जनता प्रधान गुण, कर्म, स्वभाव के लोग ही अपने देवसमाज में सम्मिलित हो सकें। आसुरीवृ़ित्त प्रधान लोगों को पहले सुधारना चाहिए और जब वे काम के बन जाएँ, तब उन्हें संगठन में सम्मिलित कर लेना चाहिए। एक ओर सुधारक प्रयत्न जारी रहे और दूसरी ओर सुधरे हुओं को संगठन में सम्मिलित करने का।
सेवाभावी उत्साही व्यक्तियों को स्वयंसेवक की तरह अपने आप को जन साधारण के कार्यों में सहयोग देने के लिए आगे कदम बढ़ाना चाहिए और अपना समय देकर दूसरों के साथ सम्पर्क बनाने और उन्हें उपयुक्त प्रेरणा देते रहने का कार्य करना चाहिए। पदाधिकारी या नेता बनने की आकांक्षा बुरी है। इससे संगठन बढ़ते नहीं, नष्ट होते हैं। इसलिए हमें केवल स्वयंसेवक बनने की आकांक्षा करनी चाहिए। कोई पद मिले, नेता चुने जाएँ, तब कुछ काम करेंगे। यह विचार मन से बिल्कुल निकाल देना चाहिए और भावनाशील व्यक्तियों को विचार क्रांति का क्षेत्र व्यापक बनाने एवं उसे संगठित करने में निरंतर लगे रहने को तत्पर होना चाहिए।
-अखण्ड ज्योति, दिसम्बर १९६३, पृष्ठ ५४६.
अभी दस हजार कर्मयोगियों द्वारा एक लाख व्यक्तियों को विचार क्रांति के छात्रों के रूप में प्रशिक्षित किया जा रहा है, यह संख्या भी कम संतोष, गर्व और हर्ष की नहीं है। एक लाख छात्रों का यह विचार क्रांति विश्वविद्यालय आज की परिस्थितियों में अनुपम एवं अभिनव ही कहा जा सकता है। जीवन निर्माण की कला सिखाने, विवेक सम्मत विचारधारा अपनाने, नवनिर्माण के लिए त्याग, बलिदान करने को कटिबद्ध करने के लिए ऐसा प्रेरणा केन्द्र कोई था भी नहीं, जो भारतीय जनता में मानसिक स्तर की अभिनव रचना कर सके। इस अभाव की पूर्ति के लिए अपना यह सत्प्रयत्न क्या महत्त्वपूर्ण नहीं है? आज यह प्रयास इतने विस्तृत देश को देखते हुए छोटा भले ही प्रतीत होता हो, पर कल उसके परिणाम दूरगामी होंगे। यह प्रशिक्षण एक लाख तक ही सीमित न रहेगा। आज के यह छात्र कल के युग निर्माण शिक्षक बनेंगे और उनके द्वारा अगली पीढ़ी की शिक्षा आरंभ होगी। यह क्रम चक्रवृद्धि ब्याज की दर से बढ़ेगा तो कुछ ही वर्षों में समस्त संसार को, समस्त मानव जाति को आदर्शवादिता की प्रेरणा से अनुप्राणित कर सकना संभव होगा। वर्तमान कठिनाइयों और बुराइयों के प्रति क्षोभ व्यक्त करते रहने, उन्हें कोसते रहने से कुछ काम चलने वाला नहीं है, प्रतिकार और उपचार से ही कुछ प्रयोजन सिद्ध होता है। अखण्ड ज्योति परिवार की यह विचार क्रांति पद्धति ऐसी ही रचनात्मक प्रक्रिया है, जिसका सुन्दर परिणाम हम थोड़े ही दिनों में प्रत्यक्ष देखेंगे।
-अखण्ड ज्योति, अगस्त १९६५, पृष्ठ ४५, ४६७.
7 .भीड़ में से संस्कारवानों की खोज— संख्या बल- प्रदर्शन की दृष्टि से उपयोगी होती है पर काम थोड़े से काम के व्यक्ति ही चलाया करते हैं। भीड़ का उत्साह क्षणिक होता है। जिनमें दृढ़ता और निष्ठा नहीं वे आवेश में कुछ तूफान तो कर सकते हैं, पर देर तक किसी आदर्श पर ठहर नहीं सकते। ऐसे लोग नारे लगाने और प्रदर्शन करने के लिए काम चलाऊ प्रयोजन पूरा कर सकते हैं पर किसी दीर्घकालीन पारमार्थिक प्रयोजन के लिए वे कुछ अधिक काम के सिद्ध नहीं हो सकते। कोई ठोस काम हमेशा निष्ठावान आदर्श व्यक्तियों के बलबूते पर ही चलता है।-अखण्ड ज्योति, नवम्बर १९६६, पृष्ठ ४५
८.
अखण्ड ज्योति परिवार का संगठन हमारे आजीवन प्रयत्न का फल है। सूक्ष्म दृष्टि से ढूँढ़- ढूँढ़कर हमने देश भर में से संस्कारवान् जाग्रत् आत्माओं को प्रयत्नपूर्वक एकत्रित किया है। इसमें बहुत समय लगा है और बहुत श्रम। परिवार के अधिकांश सदस्य पूर्वजन्मों की भारी आध्यात्मिक सम्पदा से सम्पन्न हैं। उनका वर्तमान स्वरूप सामान्य भले ही दीखता हो, पर उनके अंतरंग में वे तत्त्व विद्यमान हैं कि थोड़े से प्रयत्न से उन्हें जगाया, बढ़ाया और समुन्नत स्थिति तक पहुँचाया जा सकता है। वाल्मीकि, अजामिल, अंगुलिमाल, सूरदास, तुलसीदास जैसे हेय जीवन बिताने वाले थोड़ा- सा अवसर मिलने पर देखते- देखते उच्च भूमिका में इसलिए जाग्रत् हो उठे थे कि उनके पास पूर्वजन्मों की संचित संपत्ति बहुत थी। फिर जिनके हेय जीवन नहीं हैं-केवल मूर्छित मात्र हैं, उन्हें सजग और समुन्नत बनाया जा सकना कुछ अधिक कठिन नहीं है।
जिस दिन व्यक्ति की अंतः भूमिका यह स्वीकार कर ले कि मानव जीवन का उद्देश्य पेट पालने और बच्चे उगाने से कुछ आगे बढ़कर भी है, यह अलभ्य अवसर किन्हीं महान प्रयोजन के लिए भगवान् ने दिया है और थोड़ा दुस्साहस कर अपने स्वतंत्र विवेक का सहारा लेकर कोई भी व्यक्ति अपनी विचारणा और प्रक्रिया को बदलने में वैसा ही समर्थ हो सकता है, जैसे कि ऐतिहासिक महापुरुष समर्थ हुए हैं। इतनी सी बात यदि गले उतर जाए तो आज बिलकुल ही गया- गुजरा दीखने वाला व्यक्ति कल अपनी रीति- नीति में आमूल- चूल परिवर्तन कर सकता है और जमीन पर रेंगने वाला, आकाश में उड़ने लग सकता है। संस्कारवान् व्यक्तियों के लिए यह आत्म परिवर्तन अति सरल होता है, कोई छोटी- सी चोट उनकी दिशा में आश्चर्यजनक मोड़ प्रस्तुत कर सकती है।
-अखण्ड ज्योति, नवम्बर १९६८, पृष्ठ ६३
९ संगठन बढ़े- सुदृढ़ बने— हर प्रबुद्ध परिजन को अपने दूसरे साथियों में उल्लास और उत्साह पैदा करना है। इसलिए जहाँ जितने अखण्ड ज्योति परिजन हैं, वहाँ उन्हें परस्पर, सम्पर्क, सहयोग एवं घनिष्ठ भाव पैदा करना चाहिए ताकि एक मजबूत शृंखला में आबद्ध होकर एक दूसरे से प्रेरणा प्राप्त करने की प्रक्रिया ठीक तरह चलने लगे। अपने में से एक को भी बिछुड़ने नहीं देना चाहिए, वरन् प्रयत्न यह करना चाहिए कि विशालता की अभिवृद्धि हो और संख्या की दृष्टि से हम अब की अपेक्षा दूने चौगुने हो जाएँ। बड़ी सेना अपनी उत्कृष्टता एवं विशालता के आधार पर बड़े मोर्चे फतह करती है। अपना मोर्चा बहुत बड़ा है, अति व्यापक है। समस्त संसार अपना कार्य- क्षेत्र है। जीवन की हर दिशा को प्रकाश देना और संसार की हर समस्या को सुलझाना है। इसलिए शक्ति में वृद्धि भी आवश्यक है। कहना न होगा कि संघ शक्ति इस युग की सबसे बड़ी शक्ति है। हम जितने हैं, उतने पर ही सीमित एवं संतुष्ट नहीं रह सकते हैं। मोर्चे की विशालता को देखते हुए परिवार का विस्तार होना भी अपेक्षित है।
-अखण्ड ज्योति, नवम्बर १९६८, पृष्ठ ६५
१०. भीड़ का संगठन बेकार है। मुर्दों का पहाड़ इकट्ठा करने से तो बदबू ही फैलेगी। जिनके मन में कसक है, जो वस्तुस्थिति को समझ चुके हैं उन्हीं का एक महान प्रयोजन के लिए एकत्रीकरण वास्तविक संगठन कहला सकता है। युग निर्माण परिवार संगठन में अब वे ही लोग लिए जा रहे हैं, जो ज्ञानयज्ञ के लिए समयदान और अंशदान देने के लिए निष्ठा और तत्परता दिखाने लगे हैं। कर्मठ लोगों का संगठन बन जाने पर प्रचारात्मक अभियान को संतोषजनक स्तर तक पहुँचा देने पर ऐसी स्थिति आ जाएगी कि जो अति महत्त्वपूर्ण कार्य इन दिनों शक्ति एवं परिस्थिति के अभाव में कर नहीं पा रहे हैं, वे आसानी से किए जा सकें।
सृजनात्मक और संघर्षात्मक कार्यक्रम की हमें अति विशाल परिमाण पर तैयारी करनी होगी। इन दिनों तो उनकी चर्चा मात्र करते हैं, बहुत जोर नहीं देते, क्योंकि जिस लोक- समर्थन के लिए प्रचार और कार्य कर सकने के लिए जिस संगठन की आवश्यकता है वे दोनों ही तत्त्व अपने हाथ में उतने नहीं हैं, जिससे कि अगले कार्यों को संतोषजनक स्थिति में चलाया जा सके। पर विश्वास है कि प्रचार और संगठन का पूर्वार्द्ध कुछ ही दिन में संतोषजनक स्तर तक पहुँच जाएगा। तब हम सृजन और संघर्ष का विशाल और निर्णायक अभियान आसानी से छेंड़ सकेंगे और उसे सरलतापूर्वक सफल बना सकेंगे।
-अखण्ड ज्योति, जून १९७१, पृष्ठ ६० १०.
सद्भावना सम्पन्न, सद्विचार वाले, सन्मार्गगामी सज्जनों की संख्या बढ़ाना, ऐसे गुण, कर्म, स्वभाव के लोगों को खोज करके, उन्हें संगठित करना, युग निर्माण योजना को मूर्तिमान बनाने के लिए आवश्यक है। आगे चलकर वे रचनात्मक कार्य आरंभ करने होंगे जिनके द्वारा मनुष्य में सोये हुए देवत्व का तीव्र गति से जागरण हो सके। वह त्याग, प्रेम, उदारता, संयम, सदाचार का जीवन जिए और इस धरती पर ही स्वर्ग अवतरित हुआ दृष्टिगोचर होने लगे। ऐसा सतयुग लाने के लिए आज की परिस्थितियों को बदलना होगा और चारों ओर फैली हुई दुष्प्रवृत्तियों की असुरता के विरुद्ध हमें एक मजबूत मोर्चाबंदी करके देवासुर संग्राम खड़ा करना होगा। रीछ, बंदरों की ही सही पर सेना तो चाहिए ही। हमें भी अपना संगठन इन्हीं उद्देश्यों की पूर्ति के लिए करना ही पड़ेगा।
-अखण्ड ज्योति, १९६३ दिसम्बर, पृष्ठ ५६११. सृजन सेना का गठन करना है— अगला कार्यक्रम परिव्राजकों की सृजन सेना का गठन है। लेखनी, वाणी के माध्यम से चल रहे विचार क्रांति अभियान को अब तक जो सफलता मिली है, उसका श्रेय भी जनसम्पर्क के रूप में चलने वाले प्रयासों को ही दिया जा सकता है। भावी प्रगति का मध्य बिन्दु भी इसी को माना जाएगा। बौद्धकालीन विचार क्रांति की व्यापकता और सफलता का श्रेय उस मिशन के लिए समर्पित परिव्राजकों को ही दिया जा सकता है। उन्हीं के प्रयास से भारत, एशिया और समस्त संसार को धर्मचक्र प्रवर्तन के महान अभियान से लाभ लेने का अवसर मिला था। ज्ञानयज्ञ की लाल मशाल भी उसी प्रक्रिया का उत्तरार्द्ध सम्पन्न कर रही है, अस्तु माध्यमों के संदर्भ में भी उसी प्रक्रिया का अनुकरण करना होगा। सुयोग्य परिव्राजकों का सुगठित परिवार ही घर- घर में पहुँचकर जन- जन के मन- मन में युग चेतना का संचार कर सकेगा। जन- जागरण का अलख जगाना प्राणवान् परिव्राजकों के लिए ही संभव हो सकता है।
-अखण्ड ज्योति, अगस्त, १९७८, पृष्ठ ५५
१२. सभी जानते हैं कि संगठन में कितनी शक्ति होती है। तिनकों के मिलने से हाथी बाँधने वाला मोटा रस्सा बनता है। धागे मिलने से मजबूत फर्श, कालीन बनते हैं। सींकों का सम्मिलित स्वरूप बँधी बुहारी बनता है और सारे घर आँगन को झाड़- बुहारकर साफ करता है। मेले- ठेलों में बिखरी भीड़ धक्के खाती और जेब कटाती है। पर वही जनसमुदाय जब सैनिकों के रूप में संगठित, प्रशिक्षित और कटिबद्ध हो जाता है, तो सुरक्षा और व्यवस्था की महती आवश्यकता पूरी करता है। नवनिर्माण अपने युग का अति महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक कार्य है। इसे सम्पन्न करने के लिए भावनाशीलों का उद्देश्यपूर्ण गठन एक छत के नीचे होना चाहिए। प्रज्ञा परिवार इस बार ऐसी ही छोटी- छोटी इकाइयों के रूप में अपनी समवेत स्थिति प्रकट करने जा रहा है। इसे बड़ा कदम माना जाना चाहिए और आशा की जानी चाहिए कि इस आधार पर व्यक्तित्वों की प्रखरता प्रकट होगी और समाज के नवनिर्माण की प्रक्रिया दुर्गति से आगे बढ़ चलेगी। व्यक्तिगत चिंतन, चरित्र और व्यवहार में आदर्शवादिता का समन्वय होना चाहिए। जन- जन की प्रामाणिकता, प्रखरता निखरनी चाहिए। समाज में सहकारिता, उदारता और एकता- समता की रीति- नीति चलनी चाहिए। सर्वत्र समझदारी, ईमानदारी, जिम्मेदारी और बहादुरी का माहौल बनना चाहिए। सत्प्रवृत्तियों का संवर्द्धन और दुष्प्रवृत्तियों का उन्मूलन समग्र तत्परता और तन्मयता के साथ होना चाहिए। व्यक्ति को उत्कृष्ट और समाज को समर्थ बनाना चाहिए।
-अखण्ड ज्योति, फरवरी १९८७, पृष्ठ ६७
१३. बड़े संगठन सँभालने में नहीं आते। उनमें अनगढ़ों की भरमार रहने से टाँग खिंचाई होती है और मेढ़क तराजू में तोलने के समय देखी जाने वाली धमा- चौकड़ी मचती है। संख्या प्रदर्शन अपनी कोई आवश्यकता भी नहीं। यहाँ क्वालिटी चाहिए, क्वान्टिटी नहीं। इस दृष्टि से हम पाँच से पच्चीस का चक्रवृद्धि क्रम यदि चल पड़े, तो इसी परिवार के बेटे- पोते परपोते मिलकर समूची विश्व- व्यवस्था बना सकने में सफल हो सकते हैं। हम पाँच हमारे पच्चीस का उद्घोष यदि प्राणपण से पूरा करने में सभी परिजन भावनापूर्वक जुट पड़ें तो देखते ही देखते एक लाख का प्रज्ञा संगठन खड़ा होने का स्वप्न साकार हो सकता है।
-अखण्ड ज्योति, अक्टूबर १९८८, पृष्ठ ५४
१४. वन्दनीया माताजी का संदेश— वसंत पर्व पर यह मिशन हजारों- लाखों वर्षों तक चलेगा, क्योंकि दैवी शक्ति इसके साथ है। मिशन का सूत्र- संचालन ऐसा है कि न तो किसी को शंका करनी चाहिए, न ही भटकना चाहिए। यदि यह व्यक्ति पर टिका मिशन होता, तो व्यक्ति के साथ ही समाप्त भी हो जाता। यह शक्ति पर टिका अभियान है, दैवी अभियान है। विवेकानन्दों, निवेदिताओं ने अभी अपनी प्रसुप्त क्षमता को पहचाना नहीं है। यदि सभी जाग्रत आत्माओं को यह अनुमान हो सके कि वे क्या हैं व किन उद्देश्यों के लिए उनका अवतरण हुआ है तो देखते- देखते प्रतिकूलताओं के बीच भी नवसृजन होता चला जाएगा। पूज्यवर की परोक्ष जगत् से व मेरी प्रत्यक्ष जगत् से तपश्चर्या इन्हीं उद्देश्यों के निमित्त है। संकल्प लें कि आजीवन गुरुदेव के पदचिह्नों पर ही सब चलेंगे वैसा ही उल्लास मन में बनाए रखेंगे तथा विद्या विस्तार के सभी महत्त्वपूर्ण दायित्वों को अंतिम स्थिति तक पहुँचाकर रहेंगे। लोकमंगल के लिए ही सबका समर्पित जीवन होगा। घर- घर में गुरुजी के विचार पहुँचाकर ही रहेंगे।
-अखण्ड ज्योति, मार्च १९९१, पृष्ठ ५७

