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Monday 31, March 2025

शुक्ल पक्ष चतुर्थी, चैत्र 2025




पंचांग 01/04/2025 • April 01, 2025

चैत्र शुक्ल पक्ष चतुर्थी, कालयुक्त संवत्सर विक्रम संवत 2082, शक संवत 1947 (विश्वावसु संवत्सर), चैत्र | चतुर्थी तिथि 02:32 AM तक उपरांत पंचमी | नक्षत्र भरणी 11:06 AM तक उपरांत कृत्तिका | विष्कुम्भ योग 09:47 AM तक, उसके बाद प्रीति योग 06:07 AM तक, उसके बाद आयुष्मान योग | करण वणिज 04:04 PM तक, बाद विष्टि 02:32 AM तक, बाद बव |

अप्रैल 01 मंगलवार को राहु 03:26 PM से 04:59 PM तक है | 04:30 PM तक चन्द्रमा मेष उपरांत वृषभ राशि पर संचार करेगा |

 

सूर्योदय 6:10 AM सूर्यास्त 6:31 PM चन्द्रोदय 7:47 AM चन्द्रास्त 10:12 PM अयन उत्तरायण द्रिक ऋतु वसंत

 

  1. विक्रम संवत - 2082, कालयुक्त
  2. शक सम्वत - 1947, विश्वावसु
  3. पूर्णिमांत - चैत्र
  4. अमांत - चैत्र

तिथि

  1. शुक्ल पक्ष चतुर्थी   - Apr 01 05:42 AM – Apr 02 02:32 AM
  2. शुक्ल पक्ष पंचमी   - Apr 02 02:32 AM – Apr 02 11:50 PM

नक्षत्र

  1. भरणी - Mar 31 01:45 PM – Apr 01 11:06 AM
  2. कृत्तिका - Apr 01 11:06 AM – Apr 02 08:49 AM


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गायत्री माता आरती और चालीसा: घर में शांति और सुख का आह्वान

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 भगवान की कृपा कैसे प्राप्त करें ? Bhagwan Ki Kripa Kaise Prapt Kare

भगवान की कृपा कैसे प्राप्त करें ? Bhagwan Ki Kripa Kaise Prapt Kare

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गायत्रीतीर्थ शांतिकुंज, नित्य दर्शन

गायत्री माता
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गायत्री माता - अखंड दीपक
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चरण पादुका
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चरण पादुका
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सजल श्रद्धा - प्रखर प्रज्ञा (समाधि स्थल)
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प्रज्ञेश्वर महादेव - देव संस्कृति विश्वविद्यालय
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शिव मंदिर - शांतिकुंज
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हनुमान मंदिर - शांतिकुंज
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आज का सद्चिंतन (बोर्ड)

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आज का सद्वाक्य

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नित्य शांतिकुंज वीडियो दर्शन


!! आज के दिव्य दर्शन 01 April 2025 !! !! गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार !!

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!! परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य जी का अमृत सन्देश !!

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परम् पूज्य गुरुदेव का अमृत संदेश



जब आप आचमन करें ये ध्यान करें ये विचार करें कि हमारी वाणीए हमारी वाणीए वाणी का संशोधन हो रहा है। वाणी को हम धो रहे हैंए वाणी को साबुन लगा रहे हैंए वाणी को पत्थर पर पीट रहे हैंए वाणी की धुलाई कर रहे हैंए वाणी की पिटाई कर रहे हैंए और हम पानी डाल रहे हैं। जैसे बच्चा गंदा हो जाता हैए टट्टी कर आता हैए टट्टी जा करके ऊपर बाल्टी से पानी डालते हैंए नहलाते हैंए टट्टी धोते हैंए उसको साफ करते रहते हैं। विचार कीजिएए हमारी गंदी वाणीए जो अभक्ष्य खाने की वजह सेए जो आवांक्षनीय वार्तालाप करने की वजह से गंदी हो गई हैए उसको हम धोते हैं और साफ करते हैं। धोते और साफ करते हैंए विचार कीजिए। जैसे धोबीए धोबी घाट पर अपने कपड़े को ले जाता हैए आप कल्पना कीजिएए अपनी जीभ को धोती की तरीके से हम ले जाते हैं और पत्थर पर दे करके पानीए जो हमने आचमन का लिया थाए उसके सहारे दे पिटाई देए पिटाई देए डंडा देए डंडा। यहीं पे सारे का सारा कचूमर निकाल देते हैं। अब गंदी रहेगी या साफ होगीघ् साफ होगीए साफ होगी। कैसेघ् कहाँ मान लियाए बता तो रहे हैंए बेटेए और क्या बताएंघ् तुझे बता तो रहे हैं।
तुझे प्रत्येक क्रिया के साथ.साथ में हमने चिंतन दिया हुआ है। चिंतन दिया हुआ है। ऋषियों ने जितने भी कर्मकाण्ड बनाए हैंए उस कर्मकाण्डों के साथ.साथ में एक चिंतन दिया हुआ है। चिंतन दिया हुआ है। उस चिंतन के साथ आप मिला देंगेए तो मन और क्रिया का समावेश हो जाएगा। मन और क्रिया का समावेश हो जाएगा। ये दोनों चीजें शामिल हो जाएंगीए विचारणा और क्रियाए विचारणा और क्रिया। इन दो को मिला देने से हमारा शरीर और मन जिस तरीके से दोनों बन जाते हैं और मिल जाते हैंए ऐसी आपकी साधना जीवंत हो जाएगी। प्रत्येक क्रिया के साथ पाँच.पाँच हम उपासनाएं बताते हैं। पाँच उपासना का मोटा.मोटा स्वरूप हमने पत्रिकाओं में भी छाप दिया था। और पार साल भी जब हमने स्वर्ण जयंती साधना वर्ष बताई थीए गुरू जीए हम साधना स्वर्ण जयंती साधना वर्ष करते हैंए और 45 मिनट भजन करते हैं। भजन तो करता हैए बेटाए पर मुझे एक बात बताए कर्मकाण्ड के साथ.साथ में जो विचारणा दी हुई हैए उसको भी करता है कि नहींघ् नहींए महाराज जीए मैं तो लगा रहता हूँए बस माला पूरी कर लेता हूँए माला पूरी कर लेता है। तेरे लिए बहुत.बहुत धन्यवादए तेरे लिए बहुत.बहुत आशीर्वाद।
मुझे तो एक बात बताए तू माला जब जप करता हैए तो उसके साथ.साथ में विचारों को लाता है कि नहीं लाताघ् नहींए महाराज जीए विचारए विचार तो मेरे भागते रहते हैं। तो बेटेए तेरी उपासना अधूरी है। तेरी उपासना का जो परिणामए तेरे लिए मिलना चाहिए थाए मेरे लिए मिलना चाहिए थाए और वातावरण के परिशोधन के लिए मिलना चाहिए थाए न वातावरण का परिशोधन हुआए न जिस उद्देश्य से हमने तेरे लिए शक्ति दी थी और प्रेरणा दी थीए और शिक्षा दी थीए और दीक्षा दी थीए न हमारा उद्देश्य पूरा हुआए न तेरा हुआए तीनों में से एक भी उद्देश्य पूरा नहीं हुआ। इसलिए क्रिया के साथ.साथ में विचारणा का समावेश करने की शिक्षा मैं हमेशा देता रहा हूँ।

 

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अखण्ड-ज्योति से



 जो लोग अधिक कार्य व्यस्त हैं, जो अस्वस्थता या अन्य कारणों से नियमित साधन नहीं कर सकते वे गायत्री चालीसा के 108 पाठों का अनुष्ठान कर सकते हैं। 9 दिन नित्य 12 पाठ करने से करने से नवरात्रि में 108 पाठ पूरे हो सकते हैं प्रायः डेढ़ घण्टे में 12 पाठ आसानी से हो जाते हैं। इसके लिए किसी प्रकार के नियम, प्रतिबन्ध, संयम, तप आदि की आवश्यकता नहीं होती। अपनी सुविधा के किसी भी समय शुद्धता पूर्वक उत्तर को मुख करके बैठना चाहिए और 12 पाठ कर लेने चाहिए। अन्तिम दिन 108 या 24 गायत्री चालीसा धार्मिक प्रकृति के व्यक्तियों में प्रसाद स्वरूप बाँट देना चाहिए।

स्त्रियाँ, बच्चे, रोगी, वृद्ध पुरुष तथा अव्यवस्थित दिनचर्या वाले कार्य व्यस्त लोग इस गायत्री चालीसा के अनुष्ठान को बड़ी आसानी से कर सकते हैं। यों तो गायत्री उपासना सदा ही कल्याणकारक होती है पर नवरात्रि में उसका फल विशेष होता है। गायत्री को भू-लोक की कामधेनु कहा गया है। यह आत्मा की समस्त क्षुधा पिपासाओं को शान्त करती है। जन्म मृत्यु के चक्र से छुड़ाने की सामर्थ्य से परिपूर्ण होने के कारण उसे अमृत भी कहते हैं। गायत्री का स्पर्श करने वाला व्यक्ति कुछ से कुछ हो जाता है इसलिए उसे पारसमणि भी कहते हैं। अभाव, कष्ट, विपत्ति, चिंता, शोक एवं निराशा की घड़ियों गायत्री का आश्रय लेने से तुरन्त शाँति मिलती है, माता की कृपा प्राप्त होने से पर्वत के समान दीखने वाले संकट राई के समान हलके हो जाते हैं और अन्धकार में भी आशा की किरणें प्रकाशमान होती हैं।
   

गायत्री को शक्तिमान, सर्वसिद्धि दायिनी सर्व कष्ट निवारिणी कहा गया है। इससे सरल, सुगम, हानि रहित, स्वल्परमसाध्य एवं शीघ्र फलदायिनी साधना और कोई नहीं है। इतना निश्चित है कि कभी किसी की गायत्री साधना निष्फल नहीं जाती। अभीष्ट अभिलाषा की पूर्ति में कोई कर्म फल विशेष बाधक हो तो भी किसी न किसी रूप में गायत्री साधना का सत् परिणाम साधक को मिलकर रहता है। उलटा या हानिकारक परिणाम होने की तो गायत्री साधना में कभी कोई सम्भावना ही नहीं है।

 यों तो गायत्री साधना सदा ही कल्याणकारक होती है पर नवरात्रि में तो यह उपासना विशेष रूप से श्रेयष्कर होती है। इसलिए श्रद्धापूर्वक अथवा परीक्षा एवं प्रयोग रूप में ही सही-उसे अपनाने के लिए हम प्रेमी पाठकों से अनुरोध करते रहते हैं। गायत्री साधना के सत्य परिणामों पर हमारा अटूट विश्वास है। जिन व्यक्तियों ने भी यदि श्रद्धापूर्वक माता का अंचल पकड़ा है उन्हें हमारी ही भाँति अटूट विश्वास प्राप्त होता है।

पं श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड ज्योति मार्च 1996

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