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Monday 02, March 2026

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Holi Celebrations फागुन आया संग में, रंगों की बरसात।

Holi Celebrations फागुन आया संग में, रंगों की बरसात।

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Holi Celebrations फागुन आया संग में, रंगों की बरसात।

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Holi Celebrations फागुन आया संग में, रंगों की बरसात।

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यज्ञ कर्मकाण्ड सिखने की सरल विधि  Yagya Karmkand Sikhne Ki Sarl Vidhi  How To Learn Yagya Karmkand

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अमृत सन्देश:-  बुद्ध का मौन उपदेश | Buddh Ka Moun Updesh पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य

अमृत सन्देश:- बुद्ध का मौन उपदेश | Buddh Ka Moun Updesh पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य

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गायत्रीतीर्थ शांतिकुंज, नित्य दर्शन

गायत्री माता
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गायत्री माता - अखंड दीपक
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गुरुजी माताजी
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चरण पादुका
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सजल श्रद्धा - प्रखर प्रज्ञा (समाधि स्थल)
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प्रज्ञेश्वर महादेव - देव संस्कृति विश्वविद्यालय
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शिव मंदिर - शांतिकुंज
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हनुमान मंदिर - शांतिकुंज
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आज का सद्चिंतन (बोर्ड)

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आज का सद्वाक्य

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नित्य शांतिकुंज वीडियो दर्शन


!! शांतिकुंज दर्शन 02 March 2026 !! गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार !!

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अमृतवाणी: मनुष्य के हृदय में भगवान का वास_

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परम् पूज्य गुरुदेव का अमृत संदेश



बेटे मनुष्य के हृदय में भगवान समा गया बस बाहर से निकला और मनुष्य के भीतर अंतरात्मा में समा गया। दिल के आईने में है तस्वीर ए यार जब जरा गर्दन उठाई देख ली। अयम आत्मा ब्रह्मा प्रज्ञानम ब्रह्मा सच्चिदानंदोहम सच्चिदानंदोहम शिवोहम सारे के सारे सूत्रों में एक ही बात बताया गया है कि हमारा अहम अगर इसको शुद्ध बना दिया जाए तब,निकम्मा नहीं, निकम्मा नहीं, निकम्मा अहं जब बोलेगा तो घमंडी हो जाएगा। रावण के तरीके से बोलेगा मैं मैं मैं और बकरा चिल्लाता है मैं मैं मैं अच्छा तेरी मैं मैं बताता हूँ भगवान उसी को साफ करता है जो बार-बार मैं, अहं, जिसको अहंकार कहते हैं, ये बेटे अलग है। और जिस चीज के लिए मैं कह रहा हूं हमारा स्वः, स्वः, ये हमारा निर्मल स्वरूप है, शुद्ध और स्वच्छ स्वरूप है। वो वास्तव में भगवान का ही प्रतीक है। सच्चिदानंदोहम उसी के लिए कहा गया है। सच्चिदानंदोहम उसी के लिए कहा गया है, तत्वमसि उसी के लिए कहा गया है, अयंमात्मा तत्वमसि के लिए कहा गया है, ये है सुपर ईगो। सुपर ईगो हमारा भीतर वाला स्वच्छ, निर्मल, यही हमारा जीवात्मा, महात्मा बनता है। यही हमारा जीवात्मा जब और शुद्ध हो जाता है, देवात्मा बनता है। और भी शुद्ध हो जाता है तो यही हमारा आत्मा परमात्मा बन जाता है। 

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अखण्ड-ज्योति से




व्यक्तिगत जीवन, पारिवारिक बन्धन और सामाजिक संवेदन—तीनों अध्याय एक-एक कर दृश्य-पटल पर घूमते जाते हैं। महाश्रमण महावीर के धर्मोपदेश उस प्रकार की कथा की तरह हैं, जिसमें इन तीनों के उज्ज्वल पृष्ठ ही नहीं, कषाय-कल्मषों के कथानक भी एक के ऊपर एक उभरते चले आते हैं। मेघ अनुभव करते हैं कि तृष्णाओं, वासनाओं और अहन्ताओं के जाल में जकड़ा जीवन नष्ट होता चला जा रहा है, पर लिप्साएँ शान्त नहीं हो पा रहीं, वरन् और अधिक बढ़ती हैं। उनकी पूर्ति के लिए और अधिक अनैतिक कृत्य, पापों की गठरी बढ़ रही है। काल दौड़ा आ रहा है, जहाँ से उपभोग का अन्त हो जाएगा। शरीर को नाश कर देने वाला क्षण अब आया कि तब आया; तब फिर पश्चाताप के अतिरिक्त हाथ कुछ लगने वाला नहीं। विषय-वासनाओं के कीचड़ में फँसे जीवन को विवेक-ज्योति से देखने पर निज का जीवन ही अत्यधिक घृणास्पद लगा। मेघ ने उधर से दृष्टि फेर ली।

काम, क्रोध, मद, मोह, द्वेष, द्वन्द्व, घृणा, तिरस्कार, अनैतिकता, अवांछनीयताएँ—यदि यही संसार है तो इसमें और नरक में अन्तर ही क्या। कुविचारों की कुत्सा में झुलसते मायावी जीवन में भी भला किसी को शान्ति मिल सकती है? हमारे महापुरुष महावीर यही तो कहते हैं कि मनुष्य को अध्यात्मवादी होना चाहिए, उसके बिना लोक-यश सम्भव नहीं। मुझे तप का जीवन जीना चाहिए।

निश्चय अटल हो गया। श्रोणिक-पुत्र मेघ ने भगवान महावीर से मन्त्र-दीक्षा ली और महाश्रमण के साथ ही रहकर तपस्या में लग गए।

विरक्त मन को उपासना से असीम शान्ति मिलती है। कूड़े-से जीवन में मणि-मुक्ता-सी ज्योति झल-झलाने लगती है, मन, वाणी, चित्त अलौकिक स्फूर्ति से भर जाते हैं। साधक को रस मिलने लगता है, सो मेघ भी अधिकांश समय उसी में लगाते। किन्तु आर्य-श्रेष्ठ महावीर की दृष्टि अत्यन्त तीखी थी। वे जानते थे—रस-रस सब एक हैं, चाहे वे भौतिक हों या आध्यात्मिक। रस की आशा चिर-नवीनता से बँधी है, इसीलिए जब तक नयापन है तब तक उपासना में रस स्वाभाविक है, किन्तु यदि आत्मोत्कर्ष की निष्ठा न रही तो मेघ का मन उचट जाएगा। अतएव उसकी निष्ठा को सुदृढ़ कराने वाले तप की आवश्यकता है। सो वे मेघ को बार-बार उधर धकेलने लगे।

मेघ ने कभी रूखा भोजन नहीं किया था। अब उन्हें रूखा भोजन दिया जाने लगा, कोमल शैया के स्थान पर भूमि-शयन, आकर्षक वेष-भूषा के स्थान पर मोटे वल्कल-वस्त्र और सुखद सामाजिक सम्पर्क के स्थान पर राजगृह आश्रम की स्वच्छता, सेवा-व्यवस्था। एक-एक कर इन सब में जितना अधिक मेघ को लगाया जाता, उनका मन उतना ही उत्तेजित होता, महत्त्वाकांक्षाएँ सिर पीटतीं और अहंकार बार-बार आकर खड़ा होकर कहता—“ओ रे मूर्ख मेघ! कहाँ गया वह रस? जीवन के सुखोपभोग छोड़कर कहाँ आ फँसा?” मन और आत्मा का द्वन्द्व निरन्तर चलते-चलते एक दिन वह स्थिति आ गई, जब मेघ ने अपनी विरक्ति का अस्त्र उतार फेंका और कहने लगे—“तात! मुझे तो साधना कराइए, तप कराइए जिससे मेरा अन्तःकरण पवित्र बने।”

महाश्रमण मुस्कराए और बोले—“तात! यही तो तप है। विपरीत परिस्थितियों में भी मानसिक स्थिरता—यह गुण जिसमें आ गया वही सच्चा तपस्वी है, वही स्वर्ग-विजेता है। उपासना तो उसका एक अंग मात्र है।”

मेघ की आँखें खुल गईं और वे एक सच्चे योद्धा की भाँति मन से लड़ने को चल पड़े।

 परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य 
 अखण्ड ज्योति फरवरी 1985

 

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