Sunday 01, March 2026
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सिद्धियाँ कहाँ है और कैसे प्राप्त करें | Siddhiyan Kahan Aur Kaise Prapt Karen | Dr Chinmay Pandya
अमृत सन्देश:- भक्ति की शुरुआत पवित्रीकरण से | Bhakti Ki Shuruat Pavitrikarnam Se पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य
गायत्रीतीर्थ शांतिकुंज, नित्य दर्शन
आज का सद्चिंतन (बोर्ड)
आज का सद्वाक्य
नित्य शांतिकुंज वीडियो दर्शन
!! गायत्री_माता_मंदिर Gayatri_Mata_Mandir गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार 01 March 2026!!
!! प्रज्ञेश्वर महादेव मंदिर देव संस्कृति विश्वविद्यालय 01 March 2026!!
!! परम पूज्य गुरुदेव का कक्ष गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार 01 March 2026!!
!! सप्त ऋषि मंदिर गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार 01 March 2026!!
!! देवात्मा हिमालय मंदिर Devatma Himalaya Mandir गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार 01 March 2026!!
!! शांतिकुंज दर्शन 01 March 2026 !! गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार !!
!! अखण्ड दीपक Akhand_Deepak (1926 से प्रज्ज्वलित) चरण पादुका गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार 01 March 2026!!
अमृतवाणी: चेतना को धोना ही अध्यात्म है_पं. श्रीराम शर्मा आचार्य
अमृतवाणी: चेतना को धोना ही अध्यात्म है_पं. श्रीराम शर्मा आचार्य
परम् पूज्य गुरुदेव का अमृत संदेश
जो विराट ब्रह्म है उसके बारे में तो आपको कुछ ज्यादा जानने की बात नहीं है। फिर जिसको हम ध्यान कहते हैं, उपासना कहते हैं, भजन करना सिखाते हैं आपको और जिसको कहते हैं, उपासना कहते हैं, भजन करना सिखाते हैं आपको और जिसको कहते हैं, उपासना कहते हैं, भजन करना सिखाते हैं आपको और जिसको हम सर्वशक्तिमान बताते हैं, जिसको हम सिद्धियों का स्वामी बताते हैं, चमत्कार चमत्कारी बताते हैं, दयालु बताते हैं और अनेक चीजें बताते हैं, वो आखिर भगवान क्या है? बेटे हमारे भीतर जो समाया हुआ है, हमारा जो जीवात्मा, जो जिसको सुपर ईगो हम कहते हैं, हमारी चेतना का प्रक्षिप्त रूप बस यही भगवान। इसी की हम उपासना करते हैं। हम किसकी उपासना करते हैं? अपने आप की उपासना करते हैं। किसी और की नहीं बेटे, किसी और की नहीं कर सकते हैं। हम केवल अपने अलावा और किसी की उपासना नहीं कर सकते। अपना भीतर वाला हिस्सा जो हमारा गलीज हो गया है, गंदा हो गया है, भ्रष्ट हो गया है, दुष्ट हो गया है। कशाय कलमशों की परते जिसके ऊपर चढ़ गई है, जिसको धोने के लिए और साफ करने के लिए हम कोशिश करते हैं। वास्तव में असल में इतना ही अध्यात्म है।
अखण्ड-ज्योति से
वन्य पशुओं और जंगली झाड़ियों की तरह मनुष्य की सत्ता भी अनगढ़ होती है। उसे प्रयत्नपूर्वक सुगठित एवं परिष्कृत करने के लिए तत्त्वदर्शियों न जिस प्रक्रिया को अपनाया, उसे संस्कृति कहा जाता है। क्रमशः सभ्यता की लम्बी मंजिल पर चलते हुए ही मनुष्य उस स्तर पर पहुँचता है, जिससे मानवता गौरवान्वित होती है। यह सुन्दर संसार, व्यवस्थित समाज और व्यक्तित्वों के सुविकसित साधन सम्पन्न होने जैसे सभी वरदान इस संस्कृति साधना की देन हैं।
मनुष्य का व्यक्तित्व भी अपने आप में एक छोटा विश्व है। उसकी भीतरी और बाहरी सत्ता में इतना कुछ विद्यमान है जिसके सहारे आज का दयनीय दुर्दशाग्रस्त जीव कल सर्व समर्थ ब्रह्म बन सके। पर वह दिव्य वैभव प्रसुप्त पड़ा है। उसे कैसे जगाया और कैसे प्रयोग किया जाय, यह ऐसा विज्ञान है जिसे जानने पर विश्व की सर्वश्रेष्ठ उपलब्धियाँ करतलगत होती हैं।
आत्म-साधना, संस्कृति के उच्च सोपान पर पहुँचने का उच्च शिखर है, उस पर खड़ा होने वाला जो देखता, अनुभव करता और देता है, उसे निस्संकोच अनुपम और अद्भुत कहा जा सकता है।
परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड ज्योति मई 1970
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