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Saturday 28, February 2026

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"गायत्री माता आरती और चालीसा: घर में शांति और सुख का आह्वान" | Gayatri Mata Aarti & Gayatri Chalisa

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अमृत सन्देश:-  भगवान जिनकी इबादत करता है | Bhagwan Jinki Ibdat Krta Hai पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य

अमृत सन्देश:- भगवान जिनकी इबादत करता है | Bhagwan Jinki Ibdat Krta Hai पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य

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गायत्रीतीर्थ शांतिकुंज, नित्य दर्शन

गायत्री माता
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गायत्री माता - अखंड दीपक
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गुरुजी माताजी
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चरण पादुका
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सजल श्रद्धा - प्रखर प्रज्ञा (समाधि स्थल)
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प्रज्ञेश्वर महादेव - देव संस्कृति विश्वविद्यालय
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शिव मंदिर - शांतिकुंज
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हनुमान मंदिर - शांतिकुंज
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आज का सद्चिंतन (बोर्ड)

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आज का सद्वाक्य

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नित्य शांतिकुंज वीडियो दर्शन


!! शांतिकुंज दर्शन 28 February 2026 !! गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार !!

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अमृतवाणी: आत्मा का परिशोधन ही अध्यात्म का मूल उद्देश्य

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परम् पूज्य गुरुदेव का अमृत संदेश




बुद्ध भगवान तब कुण्डिया नगर के कुण्डियाधान वन में विहार कर रहे थे। कोलिय पुत्री सुप्पवासा को आज सात वर्ष गर्भ धारण किये हो गये थे, किन्तु प्रसव हो ही नहीं रहा था। उदर में बच्चे का विकास बराबर हो रहा था, इसलिये सुप्पवासा के कष्ट की कोई सीमा न थी।

सुप्पवासा कुण्डिया नगर में ही थी। भगवान बुद्ध को नगर में आया सुनकर उसने अपने पति कोलिय पुत्र को बुलाकर कहा- “आर्य पुत्र! आप देख रहे हैं गर्भधारण किये सात वर्ष हो जाने के कारण मेरे कष्ट असह्य हो गये हैं। तथागत ने यहाँ पधारकर हम पर कृपा की है, आप उनके पास जाइये। वहाँ जाकर मेरा प्रणाम निवेदन कर कहना, सुप्पवासा ने आपकी कुशल मंगल पूछी है। स्वामी! महापुरुषों के प्रति श्रद्धा व्यक्त करने से क्षुद्र जीव भी करुणा और दया के अधिकारी हो जाते हैं। जब भगवान दयावश पूछें कि- “सुप्पवासा कैसी है? तो आप बताना कि उसके कष्टों का आप ही निवारण कर सकते हैं, सात वर्षों से गर्भ धारण करने के कारण वह बहुत थक गई और अशक्त हो चुकी है, उसकी रक्षा करिये।”

कोलिय पुत्र अपनी धर्मपत्नी के लिए बहुत दुःखी था। पत्नी की बात मानकर वह वहाँ पहुँचा, जहाँ अनेक आयुष्मान् श्रीमन्त सज्जन भगवान बुद्ध से वार्तालाप कर रहे थे। कोलिय पुत्र था तो निम्न वर्ग का, पर अनुशासन जानता था। सो एक ओर चुपचाप खड़ा रहा।

*महाभिक्षु ने उसकी ओर देखा और करुणापूर्वक पास बुलाकर पूछा- “कहो आर्यपुत्र! अच्छे तो हो न?” प्रभु को प्रसन्न जानकर कोलिय पुत्र ने कहा- “भगवन्! सुप्पवासा ने आपको प्रणाम कहा है। आपकी कुशल मंगल पूछी है। उसे सात वर्ष गर्भ धारण किये हो गये, इस कारण बहुत दुख में है। आपकी कृपा हो जाये तो उसका कष्ट दूर हो जाये।”
भगवान बुद्ध की आँखें भर आई। उन्होंने कहा- “वत्स! जाओ सुप्पवासा को हमारा आशीर्वाद कहना। जब तुम वहाँ पहुँचोगे तो पाओगे कि उसने एक बच्चे को जन्म दिया है। अब उसे कोई कष्ट नहीं है।”*

भगवान बुद्ध की दया और ऋद्धि का स्मरण कर सभी उपस्थित लोग श्रद्धा से भर गये।

कोलिय पुत्र लौटा तो सुप्पवासा गर्भधारण से मुक्त हो चुकी थी। कोलिय पुत्र की प्रसन्नता और आश्चर्य का ठिकाना न रहा। तभी सुप्पवासा ने उसे बुलाया और कहा- “स्वामी! यह कष्ट तथागत की कृपा से ही निवृत्त हुआ है। आप उनके पास पुनः जायें और कहें- “महाराज! सुप्पवासा ने आपको सम्पूर्ण बौद्ध भिक्षुओं के साथ सात दिन के लिये भोज दिया है। कल से आप भोजन सुप्पवासा के यहाँ ही करना।”

कोलिय पुत्र पुनः तथागत की सेवा में उपस्थित हुआ और सुप्पवासा ने जो कुछ कहा था-वह उसी के सीधे-सादे शब्दों में निवेदन कर दिया। सब लोग असमंजस में पड़ गये, क्योंकि दूसरे दिन के लिये महामौदगलायन के शिष्य आबुस का निमन्त्रण पहले ही मिल चुका था। सुप्पवासा एक हरिजन कन्या थी। भगवान इनकार करते तो उसका अर्थ होता कि वह भी ऊँच-नीच का भेद-भाव करते हैं।

महामौदगलायन की ओर देखकर भगवान बुद्ध ने कहा- “आयुष्मान्! आप आबुस को कहें कि वह अपना निमन्त्रण आगे को बढ़ा दें। आबुस विचारशील व्यक्ति हैं, उन्हें समझाया जा सकता है पर सुप्पवासा की श्रद्धा को ठेस नहीं पहुँचाई जा सकती। वह दुखी हो जायेगी, इसलिए हम उनका निमन्त्रण पहले स्वीकार करते हैं।

अगले दिन से सात दिन तक भगवान बुद्ध ने सुप्पवासा के यहाँ ही भोजन किया और यह दिखा दिया-महान आत्मायें ऊँच-नीच, छोटे-बड़े का भेद-भाव नहीं करतीं।

 परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य 
 अखण्ड ज्योति मई 1970

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तेरा भगवान तेरे भीतर है। सारी दुनिया का भगवान तो बहुत बड़ा है। उसकी तो हम आपको जानकारी नहीं करा सकते और उस परब्रह्म के बारे में कोई आपको नहीं कह सकते। परमात्मा के बारे में हमारा ज्ञान बड़ा सीमित है  और परमात्मा की कोई जानकारी देने की सामथ्र्य हमारी नहीं है। हम एक जानकारी आपको दे सकते हैं, जिसका नाम है आत्मा, जो हमारे भीतर है। आत्मा की जानकारी कराना, आत्मा को परिशोधन करना, आत्मा को सही
करना, आत्मा को कशाय कल्मशों से मुक्त करना इसी का नाम है अध्यात्म।अध्यात्म किसे कहते हैं? अध्यात्म का नाम है, साइंस आॅफ सोल। साइंस आफ सोल किसे कहते हैं? साइंस, जो पदार्थ की साइंस है, मैटर की साइंस है, जिसको हम कहते हैं फिजिक्स। फिजिक्स क्या होती है? बेटे पदार्थ के बारे में, मैटर के बारे में, जो भी साइंस है, इसको हम फिजिक्स कहते हैं। इसके बहुत सारे हिस्से हैं। लेकिन क्यों साहब, ये किसकी साइंस है? बेटे, जड़ की है, पदार्थ की है, मैटर की है। और हमारा जीवात्मा की, जीवात्मा की भी एक साइंस है। सेल की साइंस बन सकती है, अणु की साइंस बन सकती है, तो जीवाणु की साइंस क्यों नहीं बनेगी? जीवाणु की भी एक साइंस है, जीवाण की साइंस का क्या नाम है? जीवाणु की साइंस का नाम है अध्यात्म। 

 

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