Friday 27, February 2026
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Reel_1 पूजा, भक्ति और ध्यान का वास्तविक अर्थ_2.mp4
परम् पूज्य गुरुदेव का अमृत संदेश
भगवान की पूजा कैसे करें गुरु जी? आप तो कह रहे थे भगवान बड़ा लंबा चैड़ा है।भगवान लंबा चैड़ा है। इतना लंबा चैड़ा है, इतना लंबा चैड़ा है कि भगवान का कुछ पता ही नहीं चलता। इतना लंबा चैड़ा है। मैंने एक दिन आपको लंबाई चैड़ाई बताई थी। इस संसार में जिस धारिका में हम रहते हैं, सूरज जैसे एक अरब तारे और ऐसी ऐसी धारिकाएं जिसमें देवयानी धारिका, जिसमें हम रहते हैं, इस के अंदर एक अरब सूरज है। सूरज सूरज कितना बड़ा होता है? जैसे अपने सूरज में नौ ग्रह और 32 उपग्रह। ऐसे ऐसे एक अरब सितारे हैं अपनी धारिका में। देवयानी में। और ऐसी ऐसी धारिकाएं एक अरब के करीब गिन ली गई हैं, तो इतना बड़ा ब्रह्मांड हो गया बेटे तेरी अकल खराब हो जाएगी। तू नाप नहीं सकता उसको। नाप नहीं सकता। उसकी गिनती इतनी बड़ी हो जाएगी कि गिनती पर कागज लिखता चल और सारे पर अक्षर और बिंदियां लगाता चल। गणित तेरा खत्म हो जाएगा। वह इतना लंबा विस्तार है। इतना बड़ा भगवान है। हां बेटे इतना बड़ा भगवान है। और एक-एक के भीतर, एक-एक सितारे के भीतर जो उसके हिस्से बटे हुए हैं, इतने ही ज्यादा हिस्से बटे हुए हैं। बेटे मैं क्या कह सकता हूं?कितने तरह के पानी, कितने तरह के पदार्थ, कितने तरह की फिजिक्स, कितने तरह की केमिस्ट्री, कितने तरह के इंसान, इतना बड़ा भगवान है। भगवान की कल्पना करना बड़ा मुश्किल पड़ सकता है। तो फिर भगवान को जिसको हम आप सिखाते हैं, भगवान की पूजा करनी चाहिए, भक्ति करनी चाहिए और आराधना करनी चाहिए, ध्यान करना चाहिए। और उससे कृपा प्राप्त करनी चाहिए वो तो महाराज जी फिर आपका कहां रहता है? कहां हम तलाश करें? कहां जाएं?बेटे कहीं मत तलाश करें। अपने भीतर तलाश कर। भीतर।
अखण्ड-ज्योति से
मानवीय शक्तियों का कोई अन्त नहीं, वे इतनी ही अनन्त हैं जितना यह आकाश। ईश्वरीय चेतना का प्रतीक प्रतिनिधि मानव प्राणी उन सब सामर्थ्यों को अपने अन्दर धारण किये हुए है, जो उनके पिता परमेश्वर में विद्यमान हैं। यदि आत्मा और परमात्मा का संयोग सम्भव हो सके तो साधारण सा दीन दीख पड़ने वाला व्यक्ति नर से नारायण बन सकता है और उसकी महानता परमात्मा जितनी ही विशाल हो सकती है।
आत्मा और परमात्मा में अन्तर उत्पन्न करने वाली माया और कुछ नहीं, केवल अज्ञान का एक इतना कलेवर मात्र है। भौतिक आकर्षणों, अस्थिर संपदाओं और उपहासास्पद तृष्णा वासनाओं में उलझे रहने से मनुष्य के लिए यह सोच समझ सकना कठिन हो जाता है कि वह जिस अलभ्य अवसर को - मनुष्य शरीर को प्राप्त कर सकता है। वह एक विशेष सौभाग्य है और उसका सदुपयोग जीवन लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए, विशेष उद्देश्यों की पूर्ति के लिए ही होना चाहिए। शरीर का ही नहीं आत्मा का भी आनन्द ध्यान में रखना चाहिए।
यदि हम अपने स्वरूप और कर्तव्य को समझ सकें और तदनुकूल करने के लिए तत्पर हो सकें तो इस क्षुद्रता और अशांति से सहज ही छुटकारा पाया जा सकता है जिसके कारण हमें निरन्तर क्षुब्ध रहना पड़ता है। अज्ञान की माया से छुटकारा पाना ही मनुष्य का परम पुरुषार्थ है। ऐसे पुरुषार्थी को ईश्वरीय महानता उपलब्ध हो सकती है और वह पुरुष से पुरुषोत्तम बन सकता है।
परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड ज्योति नवम्बर 1964
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