Thursday 03, July 2025
युग परिवर्तन का महान प्रयोजन | Yug Parivartan Ka Mahan Pariyojana | Pt Shriram Sharma Acharya
गुणों के रूप में भगवान की उपासना | Guno Ke Roop Mei Bhgwan Ki Pooja
गायत्रीतीर्थ शांतिकुंज, नित्य दर्शन
आज का सद्चिंतन (बोर्ड)
आज का सद्वाक्य
नित्य शांतिकुंज वीडियो दर्शन
!! शांतिकुंज दर्शन 03 July 2025 !! गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार !!
!! परम पूज्य गुरुदेव का कक्ष 03 July 2025 गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार !!
!! अखण्ड दीपक Akhand_Deepak (1926 से प्रज्ज्वलित) चरण पादुका गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार 03 July 2025
अमृतवाणी: संबंधियों के गलत मार्गदर्शन का विरोध पं श्रीराम शर्मा आचार्य जी
परम् पूज्य गुरुदेव का अमृत संदेश
कोई आदमी हमारा बाप है या हमारा बुजुर्ग है या हमारी बिरादरी का कोई पंच है और कोई गलत बात कहने के लिए करने के लिए कहता है, तो उसे कहिये हम नहीं मानेंगे आपकी बात। दूसरे उदाहरण दिये भी जा सकते हैं संबंधियों के कुटुंबियों के। अक्सर संबंधी और कुटुंबी हमें अनावश्यक रूप से धन कमाने के लिए और गलत काम करने के लिए भी सहमति और प्रोत्साहन देते रहते है। उनकी बातों का हमें अवज्ञा करना चाहिए।जैसे कि मैं आपको कई उदाहरण पेश कर सकता हूँ। विभीषण का उदाहरण इसी तरह का है। रावण उसका बड़ा भाई था, बड़े की बात मानी जानी चाहिए मोटे रिवाज के हिसाब से। लेकिन बड़े भाई की बात तभी मानी जानी चाहिए जब उसकी बात सही हो, मुनासिब हो। अगर बड़ा भाई गलत काम करता है, उसका समर्थन करने की कोई जिम्मेदारी छोटे भाई की नहीं है। रावण खराब काम करता था, कुंभकरण खराब काम करता था और विभीषण से कहा गया आप हमारे खानदान के हैं, हमारे कुटुंब के हैं, हम लोग जैसे करते हैं वैसा आप भी कीजिए। उन्होंने कहा मैं खानदान का हूँ जरुर और खानदान सम्बधी खानपान और दूसरी बातों की बात आयेगी तो मैं आपकी सहायता भी करूँगा। लेकिन गलत काम मानने के लिए और आपकी गलत नीतियों में सहयोग करने के लिए मैं बाध्य नहीं हूँ।विभीषण ने अपने भाइयों का कहना नहीं माना और भाइयों को छोड़कर चला आया।ये संघर्ष घर वालों से भी किया जा सकता है। माँ की आज्ञा का उल्लंघन करना कैकेयी और भरत का उदाहरण है। कैकेयी कहती थी मैं तेरी माँ हूँ और तू मेरा बेटा है। माँ जो कहे उसे बेटे को मानना चाहिए। और तुझे मेरा कहना मानना चाहिए। मैंने राज्य तेरे लिए रखा है, सो तुझे राज्य गद्दी पर बैठना चाहिए और रामचन्द्र जी को वनवास जाने देना चाहिए और तुझे मौज करनी चाहिए। भरत जी ने कहा-आप हमारी माँ हैं, हम आपको रोटी खिलायेंगे, और आपके पैर धोयेंगे और आपको प्रणाम करेंगे लेकिन आपकी गलत बात को मानने के लिए हम कतई तैयार नहीं हैं। और उन्होंने बिल्कुल माँ से मना कर दिया हम बिल्कुल नही मानेगे हम कतई नही मानेगे और किसी कीमत पर नहीं मानेंगे। आप माँ हैं तो हैं। लेकिन आज माँ से भगवान बड़ा है, आत्मा बड़ी है, न्याय बड़ा है।इस तरह के संघर्ष हमारे पारिवारिक संघर्षों में विकसित किये जा सकते हैं।
अखण्ड-ज्योति से
स्वामी जी यद्यपि एक बहुत बड़े योगी थे और उन्होंने राजयोग की शिक्षा के लिए अमरीका में जो विद्यालय खोला था, उसमें शिक्षा पाकर कितने ही व्यक्ति प्रसिद्ध योगी बन गये हैं, पर उन्होंने कभी योग की सिद्धियों या अद्भुत शक्तियों की तरफ ध्यान नहीं दिया। उनकी सबसे बड़ी सिद्धि यही थी कि उन्होंने भिक्षुक के रूप में रहते हुए जिस सेवा संस्था का संकल्प किया उस राम-कृष्ण मिशन’ की शाखाऐं आज देश भर में फैली हैं और उसकी तरफ से सैंकड़ों बड़े-बड़े अस्पताल, स्कूल और अन्य सेवा कार्य संचालित हो रहे है। इसी प्रकार जब ये अमरीका की सर्वधर्म महासभा में भाग लेने पहुँचे तो न तो उनके पास प्रतिनिधि का टिकिट था, और न कहीं ठहरने का ठिकाना था। एक दिन तो उनको स्टेशन के बाहर पड़े खाली बक्स में घुसकर रात व्यतीत करनी पड़ी पर उनको एक एक करके अपने आप सहायता मिलती गई और वे सभा में व्याख्यान देने को पहुँच गये।
उस समय तक अव्यवस्थित दशा रहने के कारण उन्होंने अपने भाषण की कुछ भी तैयारी नहीं की थी और न उस सम्बन्ध में कुछ विचार ही किया था, जब कि अन्य धार्मिक संस्थाओं के प्रतिनिधि महीनों से अपने भाषणों को तैयार करके और उनमें बहुत कुछ सुधार करके रट चुके थे। इसलिए अध्यक्ष के बार-बार कहने पर बहुत याद व्याख्यान मंच पर गये और विचार करने लगे कि ऐसी संसार प्रसिद्ध सभा के सामने क्या कहूँ। पर जैसे ही वे भाषण देने के स्थान पर खड़े हुए कि उनको अनुभव हुआ कि गुरुदेव श्रीराम कृष्ण पीछे खड़े उनको आशीर्वाद दे रहे है। बस उनका आत्मतेज जागृत हो उठा और उनका भाषण संसार के चुने हुए उन समस्त विद्वानों में सर्वश्रेष्ठ माना गया।
इस प्रकार स्वामी विवेकानन्द का लक्ष्य सदैव व्यवहारिक रूप में दीन जनों की सेवा उनका उद्धार रहा और इसी को उन्होंने सबसे बड़ा योग तथा परमात्मा का ध्यान जप, तप, माना। कलकत्ते में सन 1898 में जौन प्लेग का प्रकोप हुआ और सब जनता घबड़ा कर वहाँ से भागने को उद्यत हो गई, तो स्वामी जी ने नोटिस बँटवाकर लोगों को आश्वासन दिया और अपनी तरफ से सेवा योजना तैयार की। कई गुरु भाइयों ने शंका की कि इसके लिए धन कहाँ से आयेगा? स्वामी जी ने तुरन्त उत्तर दिया कि ‘यदि आवश्यकता होगी तो हमने अपने मठ के लिए जो स्थान खरीदा है उसे बेच देंगे। जब संन्यास लिया है तो हमें सदैव भिक्षा माँगकर खाने और पेड़ के नीचे रहने को तैयार रहना ही चाहिए।”
स्वामीजी का जीवन अन्त तक कर्ममय रहा। उनको बहुत अस्वस्थ देखकर एक दिन नाग महाशय ने विश्राम करने की सलाह दी तो उन्होंने कहा कि “गुरु महाराज मेरे भीतर जो शक्ति स्थापन कर गये हैं वह मुझे शान्त बैठने ही नहीं देती, निरन्तर कर्म के लिए ही प्रेरित करती रहती है। “यही कारण था कि जीवन के अन्तिम दिन (4 जुलाई 1902) को भी उन्होंने वेदान्त कालेज की योजना बनाकर उसे स्वामी प्रेमानन्द को समझाया। उस दिन उन्होंने अस्वस्थता का ध्यान न करके सब कार्य अपने हाथ से बड़े मनोयोग के साथ किया। पूजा मंदिर का दरवाजा बन्द करके तीन घण्टा तक वह ध्यान में बैठे रहे। उसमें सम्भवतः उनको अपने गुरुदेव और जगज्जननी का साक्षात्कार हुआ क्योंकि ध्यान से उठकर वे धीरे धीरे एक गीत गुनगुनाने लगे ‘चल मन निज निकेतन’ उसी रात्रि को लगभग नौ बजे उन्होंने एकान्त कमरे में लेटकर योग विधि से ब्रह्माण्ड को भेदकर प्राण त्याग दिया।
क्रमशः जारी
श्री भारतीय योगी
अखण्ड ज्योति- जून 1945 पृष्ठ 29
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