Wednesday 02, July 2025
कर्म करो—कर्मयोगी बनो Part 01| Karm Karo Karmyogi Bano | Shantikunj Rishi Chintan
अमृत सन्देश:- व्यक्तित्व विकास और भगवान की पूजा | Vyaktitva Vikas Aur Bhagwan ki Pooja
गायत्रीतीर्थ शांतिकुंज, नित्य दर्शन
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नित्य शांतिकुंज वीडियो दर्शन
!! शांतिकुंज दर्शन 02 July 2025 !! गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार !!
अमृतवाणी: सत्य की राह में साहस की आवश्यकता पं श्रीराम शर्मा आचार्य जी
अमृतवाणी: सत्य की राह में साहस की आवश्यकता पं श्रीराम शर्मा आचार्य जी
परम् पूज्य गुरुदेव का अमृत संदेश
आदमी के असहयोग करने का माद्दा विकसित हो जाए, बुरे को बुरा कहने का माद्दा विकसित हो जाये तो समझना चाहिए कि पाप, अनीति और अनाचार के विरूद्घ संघर्ष करने का पचास फीसदी मोर्चा फतह कर लिया।अगला चरण विरोध अब इससे आगे भी बढ़ना होगा और न केवल असहयोग बल्कि विरोध भी करना पड़ेगा और उनकी आज्ञाओं का उल्लघंन करना भी शुरू करना पड़ेगा। जैसे कि पिता जी ने कहा हमको तो बीस हजार दहेज लेना है और हमारा कहना मानो। श्रवणकुमार ने भी तो कहना माना था, रामचन्द्र ने भी तो कहना माना था। तुम हमारे बेटे हो, हम तुम्हारे बाप हैं, हम तुम्हारा ब्याह करते हैं। बाप का हुकूम मानो।ऐसे मौकों पर बाप के हुकूम न मानने की बेटे में हिम्मत तो होनी ही चाहिए कि बाप के पैर छुए, उनको प्रणाम करे और कहे कि आप हमारे पिताजी हैं और आपकी शान और इज्जत के हिसाब से आपका सम्मान करना मेरा काम है। मैं आपको प्यार करूँगा और आपकी सेवा करूँगा लेकिन मैं आपका गलत काम स्वीकार नहीं कर सकता। गलत काम को अस्वीकार करना और गलत बात की मर्यादा का उल्लघंन करना कोई बुरी बात नहीं है। आप बड़े हैं, बाप हैं लेकिन बाप से भी धर्म बड़ा है, ईमान बड़ा है, विवेक बड़ा है, न्याय बड़ा है। आप न्याय से बड़े नहीं हो सकते हैं।न्याय निष्ठों के उदाहरण आप को कितने उदाहरण दिये जा सकते हैं प्रह्लाद का उदाहरण। प्रह्लाद का बाप था हिरण्यकश्यप। वो ये कहता था कि सोना कमाकर के लाओ ईमानदारी से या बेईमानी से। राम का नाम लेने और समाज की सोचने से क्या फायदा? यही कहता था उसका बाप। बेटा कहता था कि नहीं पिताजी, सोना की जरुरत नहीं है। जब अपने देश में गरीब और दुःखियारे लोग रहते हैं, तो हम कम में भी काम चला सकते हैं और जो हमारे पास है वही काफी है। हम अपने सारी जिन्दगी धन कमाने के लिए क्यों लगायें? हमको अच्छे काम क्यों नहीं करने चाहिए और भगवान की आज्ञा के अनुसार विश्व में शान्ति लाने के लिए कोशिश क्यों नहीं करनी चाहिए? बाप नाराज हुआ, बोला- नहीं मेरा कहना मान। प्रह्लाद ने कहा नहीं, मैं कहना नहीं मानूँगा। उनने कहना नहीं माना और बाप बराबर उसको तंग करता रहा। बाप ने मारा, गालियाँ दीं, बुरा-बुरा कहा। ठीक है बेटे ने गालियाँ तो नहीं दीं, उसके बदले में बेटे ने बाप को मारा तो नहीं, लेकिन शांत चित्त से ये कहता रहा कि आपका कहना नहीं मानूँगा। आपका इज्जत करूँगा ठीक है, पर कहना नहीं मानूँगा किसी कीमत पर और उसने बाप का कहना नहीं माना। ठीक, प्रह्लाद को जला दिया गया और क्या-क्या कर दिया गया, लेकिन प्रह्लाद ने कहना नहीं माना।
पं श्रीराम शर्मा आचार्य जी
अखण्ड-ज्योति से
अपनी इस भावना को कार्य रूप में परिणित करने के लिये स्वामी जी सन् 1893 में, जब कि उन की आयु केवल 30 वर्ष की थी, और बहुत थोड़े साधन उनको प्राप्त थे, अमरीका जा पहुँचे। वहाँ कुछ ही दिनों में हजारों व्यक्तियों को हिन्दू-धर्म का प्रेमी बना दिया और सैंकड़ों ही उनके पास रह कर भारतीय साधन प्रणाली का अनुसरण करके आध्यात्मिक प्रगति में दत्तचित्त हो गये। स्वामी जी लगातार कई वर्ष तक अमरीका में और इंग्लैण्ड में धर्म-प्रचार करते रहे और फिर अपने निश्चय के अनुसार वहाँ के अनेक सुयोग्य तथा साधन सम्पन्न व्यक्तियों को लेकर भारतवर्ष वापस आये। पहले उन्होंने देश भर का दौरा करके जनता को जागृति का सन्देश सुनाया, मुक्ति का मार्ग दिखलाया और फिर अपने गुरु के नाम पर राम कृष्ण मिशन’ की स्थापना की जिसका एकमात्र लक्ष स्वामी जी की भावना के अनुसार भारतीय जनता की हर प्रकार से सहायता और उन्नति का प्रयत्न करना था।
स्वामी जी संकीर्णता की भावना से भी बहुत परे थे और वास्तव जिस किसी को धर्म के सत्य स्वरूप के दर्शन हुये है, वह चाहे किसी भी महत्व का अनुयायी क्यों न हो उसमें सब के प्रति सहिष्णुता, उदारता, प्रेम की भावना अवश्य पाई जाएगी। अमरीका की ‘सर्वधर्म महासभा’ में स्वामी जी ने सबसे पहले दिन जो संक्षिप्त भाषण दिया उसमें उन्होंने अपनी इस भावना को पूर्ण रूप से व्यक्त कर दिया। उन्होंने कहा कि “मुझे यह कहते गर्व होता है कि मैं जिस सनातन हिन्दू धर्म का अनुयायी हूँ उसने जगत को उदारता और विश्व को अपना समझने की उच्च भावना सिखाई है। इतना ही नहीं हम सब धर्मों को सच्चा मानते है और हमने प्राचीन काल में यहूदी और पारसी जैसे भिन्न धर्म वालों को भी अपने यहाँ आश्रय दिया था। मैं छोटेपन से नित्य कुछ श्लोकों का पाठ करता रहा हूँ और अन्य लाखों हिन्दू भी उनका पाठ करते है।
उनका आशय यही है कि- “जिस प्रकार भिन्न-भिन्न स्थानों से उत्पन्न होने वाली नदियाँ अन्त में एक ही समुद्र में इकट्ठी हो जाती है, इसी प्रकार हे प्रभु! मनुष्य अपनी भिन्न-भिन्न प्रकृति के अनुकूल पृथक्-पृथक् धर्म-मार्गों से अन्त में तेरे ही पास पहुँचते है” इसी प्रकार गीता में भी भगवान ने यही कहा है कि “मेरे पास कोई भी व्यक्ति चाहे जिस तरह का आये, तो भी मैं उसे मिलता हूँ। लोग जिन भिन्न-भिन्न मार्गों से अग्रसर होने का प्रयत्न करते है, वे सब रास्ते अन्त में मुझ में ही मिल जाते है।” पंथ-द्वेष धर्मान्धता और इनसे उत्पन्न क्रूरतापूर्ण पागलपन के जोश ने इस सुन्दर धरती को दीर्घकाल से नष्ट कर रखा है; बार-बार भूमि को मानव रक्त से तर कर दिया है, और संस्कृति को छार-छार कर दिया है। पर अब इन बातों का समय पूरा हो चुका है और मैं आशा करता हूँ कि आज प्रातः इस सभा को आरम्भ करने का जो घण्टा बजाया गया था वह सब प्रकार की अनुदारता, संकीर्णता और तलवार तथा कलम द्वारा किये जाने वाले अत्याचारों का अन्त करने वाला ‘मृत्यु घण्टा’ सिद्ध होगा।”
क्रमशः जारी
श्री भारतीय योगी
अखण्ड ज्योति- जून 1945 पृष्ठ 28
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