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Tuesday 01, July 2025

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अमृत सन्देश:- आत्म-विकास और सुधार की प्रक्रिया | Aaatam Vikas Aur Sudhar Ki Prakriya

अमृत सन्देश:- आत्म-विकास और सुधार की प्रक्रिया | Aaatam Vikas Aur Sudhar Ki Prakriya

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सफल बना देगी स्वामी विवेकानंद की ये 10 बाते | Rishi Chintan Youtube Channel

सफल बना देगी स्वामी विवेकानंद की ये 10 बाते | Rishi Chintan Youtube Channel

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गायत्रीतीर्थ शांतिकुंज, नित्य दर्शन

गायत्री माता
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गायत्री माता - अखंड दीपक
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चरण पादुका
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चरण पादुका
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सजल श्रद्धा - प्रखर प्रज्ञा (समाधि स्थल)
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प्रज्ञेश्वर महादेव - देव संस्कृति विश्वविद्यालय
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शिव मंदिर - शांतिकुंज
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हनुमान मंदिर - शांतिकुंज
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आज का सद्चिंतन (बोर्ड)

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आज का सद्वाक्य

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नित्य शांतिकुंज वीडियो दर्शन


!! शांतिकुंज दर्शन 01 July 2025 !! गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार !!

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अमृतवाणी: महाभारत- गलत का विरोध, सही का समर्थन पं श्रीराम शर्मा आचार्य जी

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परम् पूज्य गुरुदेव का अमृत संदेश



 मनुष्य अगर सीना तानकर खड़ा हो जाए और ये कहे कि हम आपकी गलत काम में सहायता नहीं कर सकते और हम आपके साथ नहीं हैं और हम आपका समर्थन नहीं कर सकते। ऐसा करने से दुष्टों  की हिम्मत पचास फीसदी कम हो जाती है।फिर ये बहादुरी हममें लड़ने की न हो, भले से न हो लेकिन लड़ने की बात न हो पर सही बात कहने की तो हो। कोई वोट माँगने के लिए आये, तो कहे कि साहब आपका चाल-चलन ऐसा नहीं है और आप इस लायक नहीं हैं  कि हम आपको एसेम्बली में भेजें और हम आपको चुनाव में वोट नहीं देंगे। तो आदमी की आधी हिम्मत कम हो जाती है। हममें से बहुत से लोगों को इस बात का माद्दा ग्रहण करना ही चाहिए कि जो आदमी सही काम नहीं कर सकते हैं और जो गलत रास्ते पर जा रहे हैं, उनके साथ में हर आदमी राजी नामा न करें, समझौता न करें, समर्थक न बनें। उसकी हाँ में हाँ न मिलाएँ। ठीक है, अगर विरोध करने की शक्ति अपने अन्दर नहीं है और लड़ने की शक्ति नहीं है तो कुछ देर के लिए चुप भी बैठ सकते हैं और उस लड़ाई के वक्त का इन्तजार भी कर सकते हैं। लेकिन समर्थन तो किसी भी हालत में नहीं करना चाहिए और सहयोग तो किसी भी हालत में नहीं करना चाहिए। उसका मित्र बनकर तो किसी भी हालत में नहीं रहना चाहिए। इसका अर्थ यह हुआ कि हम अनैतिकता का पोषण करते हैं, अनैतिकता का समर्थन करते हैं। संघर्ष यहाँ से शुरू होता है। संघर्ष की पहली प्रक्रिया वह है कि हम किसी बुरे आदमी का सहयोग न करें। कोई  जुआरी हमसे उधार माँगने आये कि हम  ब्याज से  पैसे दे देंगे, कहें कि हम पैसे नहीं दे सकते।  ये असहयोग हुआ। जो आदमी बुरा है उसे बुरा कहना, अच्छा है उसे अच्छा कहना । नम्र शब्दों में हम कहें, ठीक है। इज्जत खराब न करें, ये भी ठीक है। लेकिन हमको जो बात है-जो फैक्ट है उसको खोल ही देना चाहिए। खोल देने से अच्छाई रहेगी।यदि कोई बुरा आदमी सज्जनता की बाना पहने हैं, एक सियार-शेर का चमड़ा ओढ़कर रहता है और उसके बारे में लोगों की आँखें खुल जाएगी, तो क्या हर्ज की बात है? हमको सही कहना, अच्छे को अच्छा कहना, बुरे को बुरा कहना सीखना चाहिए और हमको गलत आदमियों का असहयोग करना सीखना चाहिए। उनके साथ में हम सहयोग न करें। 

पं श्रीराम शर्मा आचार्य जी

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अखण्ड-ज्योति से



परमहंस देव के इहलीला संवरण करने के पश्चात् जब परिव्राजक बनकर उन्होंने देश भ्रमण किया तो मार्ग में अलवर, खेतड़ी, लिम्बडी, मैसूर, रामनद आदि अनेक राज्यों के शासक उनके भक्त बन गये और उन सबने उनसे अपने यहाँ सुख पूर्वक रहकर साधन भजन करने का अनुरोध किया। पर उन्होंने उत्तर में सदैव यही कहा कि “मैं नहीं मानता कि इस प्रकार एकान्त में बैठकर साधन करने से मनुष्य की मुक्ति हो सकती है। इस प्रकार के लाखों साधु संन्यासी लोगों के लिये क्या कर रहे है? तत्वज्ञान का उपदेश? पर यह तो पागलपन या ढोंग है। भगवान रामकृष्ण का यह कथन पूर्णतः सत्य है कि ‘भूखे मरते को धर्म का उपदेश व्यर्थ है। जहाँ लाखों लोगों को खाने को नहीं मिलता। वहाँ वे धार्मिक कैसे बन सकते है? इस लिये सबसे पहले देश वासियों को पेट की समस्या हो हल करने लायक उपयोगी शिक्षा देनी चाहिये।
        

 इस कार्य के लिये पहले तो कार्यकर्ता चाहिये। फिर धन की आवश्यकता है। यह कार्य मेरे जैसे भिखारी संन्यासी के लिये कठिन अवश्य है, पर गुरू की कृपा से मैं इस कार्य को पूर्ण करके रहूँगा। भारत के एक एक शहर से ऐसे व्यक्ति इकट्ठे होंगे। जिनका हृदय देशबन्धुओं की दशा सुधारने के लिये जल रहा है और जो इस कार्य के लिये जीवन अर्पण करने को तैयार है। पर पैसा! मैं देश भर में रंक से लेकर राजाओं के पास तक घूम चुका हूँ, इस लिये मैं कंगाल हिन्दुस्तान में किसी का सहारा न लेकर समुद्र पार करके पश्चिम के देशों में जाऊँगा, वहाँ से अपनी बुद्धि के प्रभाव से धन प्राप्त करके देशोद्धार की योजना को पूर्ण करूँगा या इसी प्रयत्न में प्राण उत्सर्ग कर दूँगा।”                  

यह है एक सच्चे कर्म योगी की भावना। इसका अर्थ यह नहीं कि स्वामी विवेकानन्द को भगवान का ध्यान नहीं था अथवा वे ज्ञान और मुक्ति के मार्ग से अनजान थे। नहीं वे तो पहले ही श्रीरामकृष्ण की कृपा से भगवान का साक्षात्कार प्राप्त कर चुके थे और अब भगवान के आदेश से ही उन्होंने भारतवर्ष की दुर्दशा को मिटाने का प्राण किया था। वे जानते थे कि निस्वार्थ भाव से सेवा करना ही आत्मा को अपने लक्ष तक पहुँचाने का सर्वोत्तम मार्ग है। जो व्यक्ति अन्य प्राणियों को कष्टों और आवश्यकताओं के प्रति उपेक्षा का भाव रखता है, वह अध्यात्मिक मार्ग में कभी उन्नति नहीं कर सकता।

क्रमशः जारी
श्री भारतीय योगी
अखण्ड ज्योति- जून 1945 पृष्ठ 27

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