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Thursday 05, March 2026

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अमृत सन्देश:- भक्ति और योग दर्शन | Bhakti aur Yog Darshan

अमृत सन्देश:- भक्ति और योग दर्शन | Bhakti aur Yog Darshan

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अमृतवाणी:- जीवन कैसे जीयें? | Amritvanni Jeevan Kaise Jiyen | Pt Shriram Sharma Acharya

अमृतवाणी:- जीवन कैसे जीयें? | Amritvanni Jeevan Kaise Jiyen | Pt Shriram Sharma Acharya

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गायत्रीतीर्थ शांतिकुंज, नित्य दर्शन

गायत्री माता
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गायत्री माता - अखंड दीपक
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गुरुजी माताजी
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चरण पादुका
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सजल श्रद्धा - प्रखर प्रज्ञा (समाधि स्थल)
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परम् पूज्य गुरुदेव व वंदनीय माताजी कक्ष
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परम् पूज्य गुरुदेव व वंदनीय माताजी कक्ष
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प्रज्ञेश्वर महादेव - देव संस्कृति विश्वविद्यालय
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शिव मंदिर - शांतिकुंज
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हनुमान मंदिर - शांतिकुंज
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आज का सद्चिंतन (बोर्ड)

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आज का सद्वाक्य

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नित्य शांतिकुंज वीडियो दर्शन


!! अखण्ड दीपक Akhand_Deepak (1926 से प्रज्ज्वलित) चरण पादुका गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार 05 March 2026!!

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!! शांतिकुंज दर्शन 05 March 2026 !! गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार !!

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!! परम पूज्य गुरुदेव का कक्ष गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार 05 March 2026!!

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व्यक्तित्व निर्माण में परिवार की भूमिका _

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परम् पूज्य गुरुदेव का अमृत संदेश



अगर परिवार के संचालकों का दृष्टिकोण ऊंचा हो, परिष्कृत हो, फिर आप देखिए क्या से क्या नहीं बनता है। विनोबा भावे की मां के बच्चे थे तीन।तीन बच्चे थे और तीन बच्चों के लिए विनोबा भावे की मां ने ये कहा बेटे तुम लोग ब्रह्मज्ञानी बनना। तीनों के तीनों बच्चों ने कहा, माता हम आपकी आज्ञा ही मानेंगे। तीनों के तीनों ही ने माता की आज्ञा के अनुसार ब्रह्मज्ञानी होना स्वीकार कर लिया। एक ब्रह्मज्ञानी का नाम विनोबा भावे। एक ब्रह्मज्ञानी का नाम बिठोबा भावे। एक ब्रह्मज्ञानी का नाम बालकोबा भावे। तीनों के तीनों ही बच्चे आरंभिक जीवन से माता के आज्ञानुसार लेकर के ब्रह्मज्ञानी हो गए और सारे जीवन भर उन्होंने ब्रह्मज्ञानी का जीवन जिया। मां ने हमको आज्ञा दी थी। तो ब्रह्मचारी हो करके अब हम कैसे ब्याह शादी कर सकते हैं। माता की आज्ञा मानने वाला। क्यों साहब गुरु जी, हमारी हमारी भी हमारा भी बेटा ऐसा पैदा हो सकता है जो माता की आज्ञा मान बेटा तेरा नहीं हो सकता। तेरा नहीं हो सकता। तेरे यहां से औरंगजेब और शाहजहां पैदा होंगे। जो कि ये बुड्ढा हो जाएगा तो जेलखाने में पैदा करके मार-मार के सड़ा करके तेरा कचूमर निकालेंगे। तो महाराज जी, विनोबा साहब की मां का कैसे हो गया? क्या हो गया? विनोबा साहब की मां का व्यक्तित्व तूने देखा कि नहीं देखा? विनोबा की मां के पास एक पड़ोसी ने एक अपना बच्चा दे गयी थी। ये तीर्थ यात्रा के लिए चली गई थी। सात साल का बच्चा था और ये कह गई थी, बहन छह महीने बाद मैं आऊंगी तीर्थ यात्रा से। छह महीने मेरे बच्चे को पाल देना। बहन तू चली जा। जैसे अपने बच्चे को पालूंगी, उससे अच्छी तरह तेरे बच्चे को पालूंगी। तेरे कोई कष्ट नहीं होने दूंगी। पराया है।  पराया है, नहीं बेटे। चली गई और बच्चा उसके पास रह गया।बच्चा रह गया। विनोबा ने एक दिन अपनी मां से ये पूछा, मां इसका क्या कारण है? हम यह भी और यह दोनों भाई भाई भाई जैसे हैं। भाई भाइयों में जैसे प्रेम भाव रहना चाहिए। समानता से यह देखनी चाहिए कि सब बच्चों को समान मान ये करती है कि इस बच्चे को गर्म रोटी खिलाती है और हमको ठंडी खिलाती है। इस बच्चे की रोटी चुपड़ के देती है हमको रूखी रोटी देती है। ये तो पराया है। इसको तो कम देना चाहिए था और हमको ज्यादा देना चाहिए था। उन्होंने कहा नहीं बेटे तू समझता नहीं। ये पराया बेटा है। पराये बेटे का मतलब होता है भगवान का बेटा। ये भगवान का बेटा है और तू हमारा बेटा है। तू हमारे पाप से पैदा हुआ है और ये पुण्य से पैदा हुआ है। इसको हमने वायदा देकर के वचन देकर के उसकी मां को भेजा था। इसलिए हमको वचन को पूरा करना पड़ेगा। तेरे ऊपर हमारा अधिकार है। तुझे भूखा भी रख सकते हैं। तो मां ठीक है। ये भगवान का बेटा है। हां बेटे ये भगवान का बेटा है। कभी आपस में लड़ना झगड़ना हो तो तीनों भाई लड़ लेना। भगवान के बेटे से मत लड़ना। नहीं माता जी आपका आज्ञा मानेंगे।ऐसी संस्कारवान, ऐसी संस्कारवान अगर माताएं, पिता, अगर हो तो स्वयंभू मनु और सतरूपा रानी के तरीके से आपके घर में कुटुंबी बनेंगे और बढ़ेंगे और आप विकसित होंगे। 

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अखण्ड-ज्योति से



(1) ऐच्छिक ध्यान :-
हम अपनी इच्छा को एक विशेष दिशा में संग्रह पूर्वक लगायें। निकम्मे खाली बैठें वरना मन को पुनः पुनः उसी कार्य में लगाये रहें। जब कोई अनिष्ट विचार मन में आवे तो उसे अपनी इच्छा शक्ति से उत्तम विचार में परिवर्तित कर देना चाहिए। मस्तिष्क की धारणा में इस प्रकार के आग्रह से निम्न मन स्तर बदल कर उच्च स्थिति प्राप्त हो सकती है। ऐच्छिक ध्यान मन की चंचलता से मुक्ति का सर्वोत्तम उपाय है।

(2) एकाग्रता की सिद्धि :-
जब आप मन को ढीला छोड़ते हैं तो बुरे विचार, प्रलोभन, बल पूर्वक मनः प्रदेश में घुस आते हैं। इसका कारण मनुष्य की बहिर्मुखी प्रवृत्ति होना है। ऐसे मन के लिए एकाग्रता का अभ्यास अमृतोमय उपाय है। चंचल मन को अपने उद्देश्य पर जमाइये। ऐसी वृत्ति कीजिए कि नेत्र चाहे खुले हुए हों, अन्दर से आपका मन एक निश्चित स्थान, उद्देश्य, पात्र, परिस्थिति में एकाग्र रहे।

गीता में निर्देश है “जिस प्रकार अविचल प्रतिष्ठा वाले समुद्र के प्रति नाना नदियों के जल विशाल समुद्र को अपनी हलचल से विचलित नहीं कर सकते वैसे ही स्थिर चित्त वाले महान आत्मा को संसार की हलचल उद्वेलित नहीं कर सकती मनोनियम के परिपूर्ण ज्ञान से मुक्त हो कर वह पूर्ण शान्ति में निवास करता है।”

(3) प्राणायाम :-
प्राणायाम के अभ्यास से बुद्धि विकसित होती है और मन शान्त स्थिर होता है। आन्तरिक आनन्द प्राप्त होता है। प्राणायाम करने वाला सुखी रहता है। प्राणायाम से मन को अपने आधीन कर लीजिए। अनैच्छिक ध्यान ही हमारे लक्ष्य चिंतन में, ध्येय की प्राप्ति में बाधा डालती है। अतः प्राणायाम द्वारा इस विक्षेप को दूर करना चाहिए।

(4) निरन्तर अभ्यास :-
हमारा मन अभ्यास का क्रीत दास है। अतः आप नीरस विषय जिनसे मन भागता है अपने मानसिक नेत्रों के सन्मुख रखिये। आँखें बन्द कर उन्हीं को अपनी कल्पना द्वारा प्रस्तुत करने की कोशिश कीजिए। भावना को बार-बार दुहराने से मन में उत्तेजना इच्छा शक्ति के रूप में बदल जायेगी। एक समय में एक ही बात, स्थान, वस्तु, तत्व के ऊपर विचार करने का अभ्यास कीजिए। प्रारंभ में शुष्क तथा नीरस वस्तु के ऊपर चित्त को एकाग्र करना कठिन प्रतीत होता है। कालान्तर में मन स्वयं एक तत्व पर लगने लगता है।

(5) मौन का महत्व :-
चंचलता दूर करने के लिए चुप रहना, वाणी का उपवास बड़े महत्व का है। इसके द्वारा हम अपनी आत्मा और विश्व के वास्तविक स्वत्व को पहचानने में सफल हो सकते हैं। वास्तविक एकाग्रता कोलाहल पूर्व वातावरण में नहीं, शान्त और मौन वातावरण में ही हो सकती है।

 परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य 
 अखण्ड ज्योति सितम्बर 1950

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