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Friday 06, March 2026

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क्रोध के दो मिनट | Krodh Ke Do Minute | Life Changing Motivational Story

क्रोध के दो मिनट | Krodh Ke Do Minute | Life Changing Motivational Story

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अमृत सन्देश:-  समर्पण ही योग हैं | Samarpan hi Yog hai पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य

अमृत सन्देश:- समर्पण ही योग हैं | Samarpan hi Yog hai पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य

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गायत्रीतीर्थ शांतिकुंज, नित्य दर्शन

गायत्री माता
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गायत्री माता - अखंड दीपक
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गुरुजी माताजी
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चरण पादुका
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सजल श्रद्धा - प्रखर प्रज्ञा (समाधि स्थल)
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प्रज्ञेश्वर महादेव - देव संस्कृति विश्वविद्यालय
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शिव मंदिर - शांतिकुंज
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हनुमान मंदिर - शांतिकुंज
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आज का सद्चिंतन (बोर्ड)

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आज का सद्वाक्य

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नित्य शांतिकुंज वीडियो दर्शन


!! शांतिकुंज दर्शन 06 March 2026 !! गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार !!

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दृष्टिकोण का सुधार ही सबसे बड़ा सुधार है l_

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परम् पूज्य गुरुदेव का अमृत संदेश



मित्रों भावनाएं कहां से आएंगी? ये भावनाएं श्रवण कुमार का बाप सिखाएगा। ये, ये कौन सिखाएगा? ये वो सिखाएंगे जिनके घरों में श्रेष्ठता की परंपराएं, भलमनसाहत की परंपराएं, सज्जनता की परंपराएं, जो उन्होंने अपने जीवन में धारण की है, वो अपनी, अपने प्रभाव से और अपने व्यक्तित्व से दूसरों को बनाना सिखाएंगे। सीखिए। नहीं साहब कोई और सिखाएगा, कोई मास्टर सिखाएगा, स्कूल सिखाएगा, कोई नहीं सिखाएगा, सिखाएगा तो तू सिखाएगा। परिवार की समस्या को कौन सुधारेगा? बेटे हम सुधारेंगे। भगवान को प्राप्त करने के लिए समस्या कौन सुधारेंगा? गुरु सुधारेंगा। नहीं बेटे, गुरु तो हमारे भीतर बैठा रहता है। जिसको सदगुरु कहते हैं। हमारे भीतर निवास कहता है,वो अगर विकसित होगा, वो हमारा मार्गदर्शन करेगा। उसकी हम शरण में जाएंगे। उसका हम कहना मानेंगे वो रास्ता बताएगा। नियमों को बताएगा। कोई नहीं बताएगा बेटे, कोई नहीं बताएगा। आखिर में कांटे दुनिया में बहुत पड़े हुए हैं। कांटे दुनिया में से बिनना मुश्किल है। कांटे अगर कभी बीनना है, तो आपको पैरों में अपनी में चप्पल पहननी पड़ेगी, जूता पहनना पड़ेगा। कांटों को बीनना मुश्किल है। दुनिया को हम सुधारेंगे, दुनिया को संभालेंगे, दुनिया की परिस्थितिया ठीक करेंगे। बिल्कुल नामुमकिन है, बेटे हमको अपना दृष्टिकोण सुधारना पड़ेगा, अपना तौर तरीका सुधारना पड़ेगा, अपने आप को सही करना पड़ेगा। 

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क्रोध प्राणहरः शत्रुः क्रोधोऽमित्रमुखो रिपुः।
क्रोधोऽसि महातीक्ष्णः सर्वं क्रोधोऽर्षति॥
तपते यतते चैव यच्च दानं प्रयच्छति।
क्रोधेन सर्वं हरति तस्मात् क्रोधं विवर्जयेत्॥
(वाल्मीकि रामायण उत्तर. 71)

अर्थात् क्रोध प्राणहरण करने वाला शत्रु है, क्रोध अमित्र-मुखधारी बैरी है, क्रोध महातीक्ष्ण तलवार है, क्रोध सब प्रकार से गिराने वाला है। क्रोध तप, संयम और दान सभी हरण कर लेता है। अतः क्रोध को छोड़ देना चाहिए।

क्रोध त्याग की महिमा बताते हुए श्री शुक्राचार्य जी अपनी कन्या देवयानी से कहते हैं— “देवयानी! जो नित्य दूसरों के द्वारा की हुई अपनी निन्दा को सह लेता है, तुम निश्चय जानो कि उसने सबको जीत लिया। जो बिगड़ते हुए घोड़ों के समान उभरे हुए क्रोध को जीत लेता है, उसी को साधु लोग जितेन्द्रिय कहते हैं, केवल घोड़ों की लगाम हाथ में रखने वाले को नहीं। देवयानी! जो पुरुष उभड़े हुए क्रोध को अक्रोध के द्वारा शान्त कर देता है, तुम निश्चय जानो, उसने सब जीत लिया। जो पुरुष उभरे हुए क्रोध को क्षमा के द्वारा शान्त कर देता है और सर्प के द्वारा पुरानी केंचुली छोड़ने के समान क्रोध का त्याग कर देता है, वास्तविक अर्थों में वही “पुरुष” कहलाता है। जो क्रोध को रोक लेता है, निन्दा को सह लेता है और दूसरों के द्वारा सताये जाने पर भी उनको बदले में नहीं सताता, वही परमात्मा की प्राप्ति का अधिकारी होता है। जो सौ वर्षों तक हर महीने बिना थके लगातार यज्ञ करता रहे और जो कभी किसी पर क्रोध न करे— इन दोनों में क्रोध न करने वाला पुरुष ही श्रेष्ठ है।
(महाभारत आदिपर्व)

क्रोध दुःख के चेतन कारण के साक्षात्कार से उत्पन्न होता है। कभी-कभी हम दुःख के अनुमान मात्र से उद्विग्न हो उठते हैं। अमुक ने हमारे लिए ऐसा बुरा सोचा, या कोई षड्यन्त्र बनाया— ऐसा सोचकर हम क्रोध से तिलमिला उठते हैं, आँख-भौं सिकोड़ लेते हैं, चेहरा सुर्ख हो उठता है और हम यह अवसर देखा करते हैं कि कब वह व्यक्ति आए और कब हम प्रतिशोध लें।

क्रोध में दो भाव मूल रूप से विद्यमान रहते हैं—
(1) साक्षात्कार के समय दुःख
(2) उसके कारण के सम्बन्ध का परिज्ञान।

दुःख के कारण की स्पष्ट धारणा जब तक न हो, तब तक क्रोध की भावना का उदय नहीं होता। कारण का ज्ञान क्रोध की उत्पत्ति में सहायक होता है। यदि किसी ने हमारा अहित किया है और हम उससे अप्रसन्न हैं, तो क्रोध का भाव मन की किसी गुप्त कन्दरा में छिपा रहता है।

क्रोध का सम्बन्ध मन के अन्य विकारों से बड़ा घनिष्ठ है। क्रोध के वशीभूत होकर हमें उचित-अनुचित का विवेक नहीं रहता और हम हाथापाई कर उठते हैं। बातों-बातों में ही उखड़ उठना, लड़ाई-झगड़ा साधारण सी बात है। यदि तुरन्त क्रोध का प्रकाशन हो जाए, तब तो मानसिक स्वास्थ्य की दृष्टि से ठीक है, पर यदि वह अन्तःप्रदेश में पहुँचकर एक भावना-ग्रन्थि बन जाए, तो बड़ी दुःखदायी होती है।

 परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य 
 अखण्ड ज्योति मई 1950

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