Saturday 07, March 2026
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अमृत सन्देश:- भगवान मत बनो | Bhagwan mat bano पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य
अमृतवाणी:- उपासना से हम निहाल हो गए | Upasana Se Hum Nihal Ho Gaye | Pt Shriram Sharma Acharya
गायत्रीतीर्थ शांतिकुंज, नित्य दर्शन
आज का सद्चिंतन (बोर्ड)
आज का सद्वाक्य
नित्य शांतिकुंज वीडियो दर्शन
!! शांतिकुंज दर्शन 06 March 2026 !! गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार !!
अमृतवाणी:- अध्यात्म का वास्तविक उद्देश्य
परम् पूज्य गुरुदेव का अमृत संदेश
ये शिक्षण करने के लिए सारी की सारी जो विधियां है ये अध्यात्म इसी आधार पर टिका हुआ है। अगर आपको अध्यात्म की नेचर मालूम पड़ जाए, अध्यात्म का उद्येश्य मालूम पड़ जाए, तो बात बने। अभी तो मैंने ये बताया था कि अध्यात्म से समस्या का समाधान होता है। अब मैं ये कहता हूं, अध्यात्म का मतलब अपने आप का संशोधन, अपने आप का परिष्कार करना। किसी के सामने नाक रगड़ना या किसी से खुशामद करना, या रिश्वत देना जैसे कि आम लोगों का ख्याल है ये अध्यात्म का उद्येश्य नहीं है। अध्यात्म ये नहीं सिखाता आपको, किसी के सामने नाक रगड़िए, खुशामद कीजिए, किसी के सामने भीख मांगिए। ये तीनों ही बातें आध्यात्मिकता के सिद्धांतों से बाहर है। हमको किसी के सामने पल्ला पसारने की जरूरत क्या है ? हम क्यों पल्ला पसारें ? हमारा स्वाभिमान जाता है और हमारी बेइज्जती होती है। हम क्यों, क्यों भगवान के सामने पल्ला पसारें? भगवान ने हमको इस लायक बनाया है कि हम अपनी आवश्यकताओं को पूरा कर सकते हैं।और ना केवल अपनी आवश्यकताओं को, बल्कि हमारी सामथ्र्य श्रद्धा ऐसी है कि हम हजारों की आवश्यकता को पूरा कर सकते हैं। फिर हम क्यों मांगे भगवान से?
अखण्ड-ज्योति से
युग-निर्माण के उपयुक्त परिस्थितियाँ वे लोग उत्पन्न करेंगे जिनमें मूलतः उत्कृष्ट स्तर की शक्ति क्षमता, प्रतिभा और आस्था विद्यमान हो यह क्षमता भाषण सुनने या लिखने पढ़ने से ही उत्पन्न नहीं होती वरन् उसके लिए जन्मजात संस्कारों की भी आवश्यकता रहती है। आज धर्म और अध्यात्म पर भी राजनैतिक विषयों की भाँति ही धुँआधार भाषण होते है। कीर्तन, कथा, रामायण, यज्ञ आदि के उत्सव समारोह आगे होते रहते हैं जिसमें धर्म विषयों पर विद्वतापूर्ण भाषण होते हैं। रामलीला जगह-जगह होती है उसमें भी भगवान राम के आदर्शों को अपनाने की प्रेरणा देना ही उद्देश्य रहता है। गंगा-स्नान में मेले, कुम्भ आदि पूर्व चारों धामों, तीर्थ आदि में भी ऐसा ही वातावरण बनता है जिससे यदि मनुष्य चाहे तो बहुत कुछ प्रेरणा प्राप्त कर सकता है। नाटक, सिनेमाओं में भी कई बार धर्म-शिक्षा के दृश्य रहते हैं।
पत्र-पत्रिकाओं में कर्तव्य बोधक लेख बहुत छपते रहते हैं। गीता, रामायण जैसी प्रधान धर्म पुस्तकों की प्रतियाँ लाखों की संख्या में हर साल छपती हैं और लोगों द्वारा खरीदी एवं पढ़ी जाती हैं। ऐसा साहित्य और भी जगह-लेखन द्वारा निरन्तर यह प्रयत्न किया जा रहा है कि लोग अच्छे बनें। इन बातों को लोग पढ़ते-सुनते न हों सो बात भी नहीं है। पर देखा यह जाता है कि चिकने घड़े की तरह लोग उससे मनोरंजन मात्र कर लेते हैं, उसे जीवन में उतारने के लिए एक कदम भी आगे बढ़ने को तैयार नहीं होते। और तो और, धर्म एवं आध्यात्मिकता के प्रवचनकर्ता और लेखन स्वयं भी अपनी ‘कथनी की अपेक्षा’ करनी से बहुत पिछड़े रहते हैं। कई बार तो उनका आचरण बिलकुल उलटा देखा जाता है।
इन तथ्यों पर विचार करते हुए कारण जानने की गहराई में जब उतरा जाता है तब एक बात स्पष्ट होती है कि व्यक्ति में मूलतः वे तत्व भी होने चाहिए जिन में सद्ज्ञान को ग्रहण करने की शक्ति और आदर्श को जीवन में उतारने की साहसपूर्ण सामर्थ्य भी विद्यमान हो। इसके बिना अच्छी शिक्षा का भी कुछ विशेष लाभ नहीं मिल सकता। धर्म की शिक्षा देने वालों की वक्तृता भले ही नीरस हो, उनका चरित्र सामान्य लोगों की अपेक्षा अधिक पवित्र, अधिक प्यारा और अधिक प्रकाशवान होना चाहिए। आज वर्ग शिक्षा देने वाले लेखक वक्ता, तो बहुत हैं पर उनके पास कबीर, नानक, गुरु गोविंदसिंह, रामदास, बुद्ध, महावीर, गाँधी जैसा व्यक्तित्व नहीं हैं। वाणी की शक्ति तो स्वल्प है। प्रभाव वस्तुतः चरित्र का पड़ता है। संस्कारवान सुनने वाले और चरित्रवान कहने वाले जब कभी मिल जाते हैं तब थोड़ा-सा प्रशिक्षण भी जादू का असर उत्पन्न करता है। इसके बिना अन्य मनोरंजन की तरह धर्म भी दिल बहलाव का एक विषय बनकर रह जाता है। धर्म जीवन में उतारने की वस्तु है, आचरण में लाने पर ही उसका कोई लाभ और प्रभाव अनुभव किया जा सकता है।
यदि धर्म को व्यावहारिक रूप धारण करते हुए देखना हो तो ऐसे संस्कारवान व्यक्तियों का निर्माण करना होगा जो हमारी तरह धर्म को सुन समझकर ही सन्तुष्ट न हो जायं वरन् उसे कार्यान्वित करने के लिए साहसपूर्ण कदम उठा सकने की क्षमता भी रखते हों। तेजस्वी व्यक्तित्वों के निर्माण के लिए माता-पिता को तप करना होता है। प्राचीनकाल के इतिहास पुराणों को पढ़ने से स्पष्ट होता है कि महापुरुषों का जन्म देने वाले माता-पिताओं ने दीर्घ काल तक अनेक जन्मों तक तप किये थे। उस तप से शरीर और मनों को, रज वीर्य को ऐसा सुसंस्कारी बनाया था कि उससे तेजस्वी आत्माओं का प्रजनन संभव हो सके। उन बालकों का पालन-पोषण भी उपयुक्त वातावरण में हो सके ऐसी व्यवस्था करनी होती हैं तथा शिक्षा-दीक्षा के लिए भी ऐसा प्रबन्ध करना होता है कि जहाँ केवल साक्षरता ही नहीं वरन् चरित्र तथा व्यक्तित्व का भी विकास हो सके। सुसंस्कृत तथा श्रेष्ठ व्यक्तियों के निर्माण का यही मार्ग हैं। अपवाद रूप से कभी-कभी कीचड़ में कमल भी उत्पन्न होते हैं पर क्रम यही है कि संस्कारवान श्रेष्ठ व्यक्तित्व सदा श्रेष्ठ माता-पिता और श्रेष्ठ पारिवारिक वातावरण में से ही विनिर्मित होते रहते हैं।
परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड ज्योति मार्च 1964
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