Sunday 08, March 2026
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अमृतवाणी:- आत्मोन्नति के चार चरण | Atmonnati Ke Char Charan पूज्य गुरुदेव पं० श्रीराम शर्मा आचार्य
24 बार गायत्री महामंत्र गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य जी के स्वर में | 24 Time Gayatri Mantra
अपना मूल्यांकन भी करते रहें | Apna Mulyankan Bhi Krte Rahe सफल जीवन की दिशा धारा
भक्तों को भगवान मिलते है | Bhakton Ko Bhagwan Milte Hain |
अखंड ज्योति की प्रथम अंक की कथा गाथा
माँ की ममता – दुनिया का सबसे पवित्र प्रेम।
अमृत सन्देश:- दुनिया की राय पर चलोगे तो भटक जाओगे | Duniya ki rai par chaloge to bhatak jaoge पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य
अमृतवाणी:- अपूर्णता से पूर्णता की ओर भाग-01 परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य जी
गायत्रीतीर्थ शांतिकुंज, नित्य दर्शन
आज का सद्चिंतन (बोर्ड)
आज का सद्वाक्य
नित्य शांतिकुंज वीडियो दर्शन
!! गायत्री_माता_मंदिर Gayatri_Mata_Mandir गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार 08 March 2026!!
!! शांतिकुंज दर्शन 08 March 2026 !! गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार !!
!! परम पूज्य गुरुदेव का कक्ष गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार 08 March 2026!!
!! अखण्ड दीपक Akhand_Deepak (1926 से प्रज्ज्वलित) चरण पादुका गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार 08 March 2026!!
!! सप्त ऋषि मंदिर गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार 08 March 2026!!
!! महाकाल महादेव मंदिर शांतिकुञ्ज हरिद्वार 08 March 2026!!
!! प्रज्ञेश्वर महादेव मंदिर देव संस्कृति विश्वविद्यालय 08 March 2026!!
!! देवात्मा हिमालय मंदिर Devatma Himalaya Mandir गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार 08 March 2026!!
भगवान रिश्वत से नहीं, चरित्र से प्रसन्न होते है
परम् पूज्य गुरुदेव का अमृत संदेश
अब युग की रचना के लिये ऐसे व्यक्तियों की ही आवश्यकता है जो वाचालता और प्रोपेगैण्डा से दूर रह कर अपने जीवनों को प्रखर एवं तेजस्वी बना कर अनुकरणीय आदर्श उपस्थित करें और जिस तरह चन्दन का वृक्ष आस-पास के पेड़ों को सुगन्धित कर देता है, उसी प्रकार अपनी उत्कृष्टता से अपना समीपवर्ती वातावरण भी सुरभित कर सकें। अपने प्रकाश से अनेकों को प्रकाशवान कर सकें।
धर्म को आचरण में लाने के लिये निस्सन्देह बड़े साहस और बड़े विवेक की आवश्यकता होती है। कठिनाइयों का मुकाबला करते हुये सदुद्देश्य की ओर धैर्य और निष्ठापूर्वक बढ़ते चलना मनस्वी लोगों का काम है। ओछे और कायर मनुष्य दस-पाँच कदम चल कर ही लड़खड़ा जाते हैं। किसी के द्वारा आवेश या उत्साह उत्पन्न किये जाने पर थोड़े समय श्रेष्ठता के मार्ग पर चलते हैं पर जैसे ही आलस्य प्रलोभन या कठिनाई का छोटा-मोटा अवसर आया कि बालू की भीत की तरह औंधे मुँह गिर पड़ते हैं। आदर्शवाद पर चलने का मनोभाव देखते-दीखते अस्त-व्यस्त हो जाता है। ऐसे ओछे लोग अपने को न तो विकसित कर सकते हैं और न शान्तिपूर्ण सज्जनता की जिन्दगी ही जी सकते हैं। फिर इनसे युग-निर्माण के उपयुक्त उत्कृष्ट चरित्र उत्पन्न करने की आशा कैसे की जाय? आदर्श व्यक्तियों के बिना दिव्य समाज की भव्य रचना का स्वप्न साकार कैसे होगा? गाल बजाने पर उपदेश लोगों द्वारा यह कर्म यदि सम्भव होता सो वह अब से बहुत पहले ही सम्पन्न हो चुका होता। जरूरत उन लोगों की है जो आध्यात्मिक आदर्शों की प्राप्ति को जीवन की सब से बड़ी सफलता अनुभव करें और अपनी आस्था की सच्चाई प्रमाणित करने के लिये बड़ी से बड़ी परीक्षा का उत्साहपूर्ण स्वागत करें।
आदर्श व्यक्तित्व ही किसी देश या समाज की सच्ची समृद्ध माने जाते हैं। जमीन में गढ़े धन की चौकसी करने वाले, साँपों की तरह तिजोरी में जमा नोटों की रखवाली करने वाले कंजूस तो गली कूँचों में भरे पड़े हैं। ऐसे लोगों से कोई राष्ट्र न तो महान बनता और न शक्तिशाली। राष्ट्रीय प्रगति के एकमात्र उपकरण प्रतिभाशाली चरित्रवान व्यक्तित्व ही होते हैं। हमें युग-निर्माण के लिए ऐसी ही आत्माएँ चाहिये। इनके अभाव में अन्य सब सुविधा साधन होते हुए भी अभीष्ट लक्ष्य की प्राप्ति में तनिक भी प्रगति न हो सकेगी।
अखण्ड-ज्योति परिवार का प्रत्येक घर आदर्श व्यक्तित्व ढालने की टकसाल बने यही प्रयत्न हमें करना होगा। इसके लिए यह नितान्त आवश्यक है कि इनमें ऐसा सौम्य वातावरण रहा करे जिसके सान्निध्य में रहने वाले बालक संस्कारवान बनते चले जायँ और प्राचीन भारत की तरह हर घर में नर रत्नों का उद्यान खिला हुआ दृष्टिगोचर हो सके जन्मजात संस्कारों के अभाव में स्कूली शिक्षा व्यक्तित्व निर्माण में बहुत ही कम सहायक हो सकती है। आज कितने ही आदर्श विद्यालय, छात्रालय, एवं गुरुकुल अच्छी शिक्षा की व्यवस्था रख रहे हैं पर जन्म-जात संस्कारों के अभाव में उनमें पढ़ने वाले बालक भी वैसे नहीं बन रहें हैं जैसे कि आशा की जाती थी। इसलिए पत्तों की सफाई का ध्यान रखने से पूर्व हमें जड़ को सींचना भी नहीं भूलना चाहिये। नई पीढ़ी जन्मजात इन संस्कारों लेकर जन्म यह युग-निर्माण का एक अत्यन्त महत्वपूर्ण पहलू है। इसकी पूर्ति के लिये हमें सुव्यवस्थित योजना बना कर काम करना होगा।
वर्तमान पीढ़ी जिस रज वीर्य में जन्मी है, जिस वातावरण में पली है, वह संस्कारवान न होने से हीन मानसिक दशा में बुरी तरह हैं। मानवीय स्वाभिमान कर्तव्य और दायित्व से वह अपरिचित जैसी ही देखती है, विपन्नताओं का रोना तो रोती है पर उसे बदलने के लिए जिस साहस त्याग और बलिदान की आवश्यकता है उससे दूर-दूर ही बनी रहती। तृष्णा और वासना में इतना जकड़ रही है कि मानवोचित पुरुषार्थ के लिए अवकाश, उत्साह बच नहीं पाता। जिन आदर्शों के लिये हमारे पूर्व पुरुष प्राण तक देने में आनन्द मानते थे उन्हें आज उपहासास्पद बेवकूफी समझा जाता है। मनुष्य इतना स्वार्थी, धूर्त और संकीर्ण बना हुआ है कि धर्म और सदाचार केवल गाल बजाने तक सीमित रह गये हैं व्यवहार में पशुता एवं पैशाचिकता का ही बोलबाला रहता है।
यह परिस्थितियाँ बदलने के लिये मानव अन्तःकरण को बदलने के लिये लोक शिक्षण तो आवश्यक है ही पर साथ ही यह और भी आवश्यक है कि लोक शिक्षण का आधार व्यक्तिगत जीवन एवं परिवार को आदर्शवादी साँचे में ढाला जाय। अध्यात्म, पूजा-पाठ की कहने सुनने की वस्तु न रहे वरन् उसे दैनिक जीवन में, नियमित व्यवहार में उतारने को एक अनिवार्य आवश्यकता माना जाय। ऐसे व्यक्तित्व और परिवार न केवल वर्तमान समाज को परिवर्तित करेंगे वरन् नई पीढ़ी में आदर्शवादी नर-रत्नों को जन्म दे सकने में भी समर्थ होंगे। मनस्वी और तपस्वी मनुष्यों का समाज जितना बढ़ता जायगा उतना ही इस धरती पर स्वर्ग का अवतरण होगा। उज्ज्वल व्यक्तियों से ही भव्य समाज की नव्य रचना सम्भव होगी।
परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड ज्योति मार्च 1964
मित्रों, यह हमारी बेइज्जती है। कि हम भगवान के सामने अपनी कठिनाइयों और कमियों को कहें और ये कहें आप हमारी मदद कीजिए। आप इससे ज्यादा क्या मदद चाहते हैं? आपको मनुष्य का शरीर तो दे दिया।आपको इतनी पैनी अकल तो दे दी। फिर भी मदद मांगने को बाकी रह गई। फिर आप सोचें तब जब भगवान को अपना चरित्र और अपना स्वरूप दिखा करके प्रसन्न करना चाहते हो।गुलाब के फूल की तरीके से खिल के प्रसन्न करना चाहते हो तभी भी बात है। फुसलाना चाहते हैं? फुसलाना? फुसलाना चाहते हैं? फुसलाना चाहते है, ये फुसलाने की बात है। कि आप सवा रुपए का प्रसाद हनुमान जी को देकर के, हनुमान जी से अपनी मनोकामना पूरी करवाना चाहते हैं। क्या मतलब है आपका? ये बेटे ये फुसलाने वाली बात है। बच्चे को और कोई चीज देकर के हम काम चला लेते हैं और बच्चे को, बच्चे को मिठाई देकर के, बच्चे को गुब्बारा देकर के, बच्चे को पैसे देकर के,उसके कान में जो सोने की बालियां उतार लेना चाहते हैं। ये करना चाहते हैं आप? ये करना चाहते हैं? ये करना चाहते हैं? रिश्वत देना चाहते हैं? प्रसाद की रिश्वत देना चाहते हैं? प्रसाद की रिश्वत दे करके अपना काम निकालना चाहते हैं? भगवान को आप ऐसा घटिया समझते हैं ? कि प्रसाद देकर के आपका काम निकाल देगा। हनुमान जी को आप सवा रुपए का प्रसाद चढ़ा करके आप ये उम्मीदें रखते हैं। हमारी मनोकामनाएं पूरी होंगी। आप इसी से चाहते हैं। सवा रुपए से क्या क्या मनोकामना है ? हनुमान जी, आपके पांच मनोकामनाएं हमारी। सवा रुपए का दिया है। पांच चवन्नी आती हैं। हां साहब पांच चवन्नी तों आती हैं। एक रुपए, सवा रुपए में। हमने आपको सवा रुपए का प्रसाद चढ़ाया है। आप हमारी पांच मनोकामनाएं पूरी कीजिए।
अखण्ड-ज्योति से
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