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Friday 04, April 2025

शुक्ल पक्ष अष्टमी, चैत्र 2025




पंचांग 05/04/2025 • April 05, 2025

चैत्र शुक्ल पक्ष अष्टमी, कालयुक्त संवत्सर विक्रम संवत 2082, शक संवत 1947 (विश्वावसु संवत्सर), चैत्र | अष्टमी तिथि 07:26 PM तक उपरांत नवमी | नक्षत्र पुनर्वसु 05:32 AM तक उपरांत पुष्य | अतिगण्ड योग 08:03 PM तक, उसके बाद सुकर्मा योग | करण विष्टि 07:44 AM तक, बाद बव 07:26 PM तक, बाद बालव |

अप्रैल 05 शनिवार को राहु 09:12 AM से 10:46 AM तक है | 11:25 PM तक चन्द्रमा मिथुन उपरांत कर्क राशि पर संचार करेगा |

 

सूर्योदय 6:05 AM सूर्यास्त 6:34 PM चन्द्रोदय 11:33 AMचन्द्रास्त 2:18 AM अयन उत्तरायण द्रिक ऋतुवसंत

 

  1. विक्रम संवत - 2082, कालयुक्त
  2. शक सम्वत - 1947, विश्वावसु
  3. पूर्णिमांत - चैत्र
  4. अमांत - चैत्र

तिथि

  1. शुक्ल पक्ष अष्टमी   - Apr 04 08:13 PM – Apr 05 07:26 PM
  2. शुक्ल पक्ष नवमी   - Apr 05 07:26 PM – Apr 06 07:23 PM

नक्षत्र

  1. पुनर्वसु - Apr 05 05:20 AM – Apr 06 05:32 AM
  2. पुष्य - Apr 06 05:32 AM – Apr 07 06:24 AM


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SHRAVAN
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गायत्री अनुष्ठान की महत्ता नवरात्रि में सर्वाधिक मानी जाती है। गायत्री ‘गुरुमन्त्र’ है। देव मन्त्र कितने ही हैं–सम्प्रदाय भेद से कई प्रकार के मन्त्रों के उपासना विधान हैं, पर जहाँ तक ‘गुरुमन्त्र’ शब्द का सम्बन्ध है वह मात्र गायत्री के साथ जुड़ा है। इस्लाम में कलमा, ईसाई में बपतिस्मा को जो स्थान प्राप्त है वही हिन्दू धर्म में अनादि गुरु मन्त्र गायत्री को प्राप्त हैं। साधना की दृष्टि से गायत्री को ही सर्वांगपूर्ण माना जाता है। त्रिपदा के रूप में इसकी तीन सिद्धियों अमृत (आनन्द-उल्लास से भरा अन्तःकरण–चिरयौवन), पारस (उत्कृष्टतावादी प्रगतिशील सत्साहस) तथा कल्पवृक्ष (परिष्कृत चिन्तन-सद्बुद्धि प्राप्त होने तथा आप्तकाम होने का सौभाग्य अनुदान) के माध्यम इसकी महिमा शास्त्रों में गायी है। राम, कृष्ण आदि अवतारों की–देवताओं की–ऋषि-ऋषिकाओं का उपासना पद्धति भी गायत्री ही रही है। इस सर्वसाधारण का उपासना अनुशासन मानकर इसकी उपेक्षा करने वालों की कटु भर्त्सना की गयी है।

सामान्य दैनिक उपासनात्मक नित्यकर्म से लेकर विशिष्ट प्रयोजनों के लिये की जाने वाली तपश्चर्याओं तक में गायत्री को समान रूप में महत्व मिला है। गायत्री, गंगा, गीता, गौ और गोविंद हिन्दू धर्म के पाँच आधार माने गये हैं। जिनमें गायत्री सर्वप्रथम है। यही नहीं, इसमें जिन तथ्यों का समावेश है, उन्हें देखते हुए निकट भविष्य में इसके मानव जाति का सार्वभौम मंत्र माने जाने की पूरी-पूरी सम्भावना है। देश, धर्म, जाति, समाज और भाषा की सीमाओं से ऊपर इसे सार्वजनीन उपासना कहा जा सकता है। जब भी कभी मानवी एकता के सूत्रों को चुना जायगा तो निश्चिततः गायत्री को ही महामन्त्र के रूप में स्वीकारा जायगा।

दैवी आह्वान को सुना जाय और तद्नुसार ही आचरण किया जाय, यही उत्तम है। साधकों को उपासना के चमत्कार देखना हो तो वैज्ञानिक और भावनात्मक दोनों ही आधारों की कसौटी पर नवरात्रि की गायत्री साधनावधि में कसकर देख सकते हैं। व्यक्तित्व का परिष्कार, अन्तराल से विभूतियों के रत्नों का निकल पड़ना व विपत्ति बाधाओं का निराकरण ये प्रत्यक्ष प्रति फलों से रूप में मिलते देखे जा सकते हैं।

 इस देव पर्व पर देवत्व की प्रेरणा व दैवी अनुकम्पा निरन्तर बहती है। सतर्क–प्रयत्नशील मनस्वी साधक ऐसे ही शुभ मुहूर्त का लाभ उठाते व अन्यों को भी इसके लिये प्रेरित करते हैं। देवत्व की विभूतियों के जीवनचर्या में समावेश के रूप में इस अनुदान वर्षा को सहज ही देखा जा सकता हैं।

पं श्रीराम शर्मा आचार्य
 अखण्ड ज्योति मार्च 1982 पृष्ठ 45

 

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 Maa Mahagauri | माँ महागौरी

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देने से ही मिलेगा, Dene Se Hi Milega

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 गायत्री मंत्र है सबसे शक्तिशाली मंत्र जो आपके जीवन को बदल सकता है |

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चैत्र नवरात्रि नवम दिन माँ सिद्धिदात्री | Chaitra Navratri Navam Din Maa Siidhidatri

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Anusthan Karne Mein Samay Ka Mahatva | अनुष्ठान करने में समय का महत्व | Dr Chinmay Pandya

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वह शक्ति हमें दो दयानिधे, कर्त्तव्य मार्ग पर डट जावें | Vah Shakti Hame Do Dayanidhe

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गुटका बनाने वाले क्या तेरे मन में समायी | Gutka Banane Wale Kya Tere Man Mein | Rishi Chintan

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भगवान के भक्तों का योगदान | Bhagwan Ke Bhakto Ka Sandesh

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नवरात्री का अनुष्ठान क्यों? | Navratra Ka Aunsthan Kyo | Dr Chinmay Pandya

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गायत्रीतीर्थ शांतिकुंज, नित्य दर्शन

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गायत्री माता - अखंड दीपक
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चरण पादुका
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सजल श्रद्धा - प्रखर प्रज्ञा (समाधि स्थल)
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प्रज्ञेश्वर महादेव - देव संस्कृति विश्वविद्यालय
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शिव मंदिर - शांतिकुंज
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हनुमान मंदिर - शांतिकुंज
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आज का सद्चिंतन (बोर्ड)

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आज का सद्वाक्य

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नित्य शांतिकुंज वीडियो दर्शन


!! परम पूज्य गुरुदेव का कक्ष 05 April 2025 गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार !!

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!! परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य जी का अमृत सन्देश !!

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गायत्री मंत्र है सबसे शक्तिशाली मंत्र जो आपके जीवन को बदल सकता है |

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परम् पूज्य गुरुदेव का अमृत संदेश



एक बार महिषासुर। कहने लगा था? देवी हाँ, तू हमारे काबू में आ जा। काबू से क्या मतलब है? हमारी बीवी बन जा। कौन सी? कहने लगा था चण्डी से। चण्डी से कहने लगा था महिषासुर, तू हमारी बीवी बन जा, तू हमारी औरत बन जा, और हमारे कहने पर चल, और हमारा खाना पका। देवी ने कहा, अच्छा, आप हमको बीवी बनाना चाहते हैं? हाँ, आप हमसे हुक्म चलाना चाहते हैं? हाँ, आप हमारे ऊपर सवारी करना चाहते हैं और आप हमको गुलाम बनाना चाहते हैं? महिषासुर से पूछा, उन्होंने कहा, हम आपकी गुलाम भी बन सकती हैं और नौकरानी भी बन सकती हैं। लेकिन, लेकिन आप शर्त हमारी पूरी करेंगे तो हम बन जाएंगे। क्या? योमां जयति संग्रामे, योंगे दरको ढकोवसति, योमे प्रतिबले लोके, सबेभत्ता भविष्यति। मैं तुझे अपना खसम बनाने को भी तैयार हूँ, तेरी औरत बनने को तैयार हूँ, लेकिन शर्त पूरी कर। क्या शर्त पूरी करूँ? योमां जयति संग्रामे, मुझसे लड़ आ जा, लड़ मुझसे, पहले आ जा, मुझसे लड़, तब तेरी औरत बनूँगी। इतना पराक्रम, इतना पौरुष, इतना साहस दिखा, जितना साहस मेरे अंदर है, उतना पराक्रम तू भी दिखा, मैं तेरी औरत बनने को तैयार हूँ। देवी ने कहा और ये कहा, योमां प्रप्रतिबले लोके, सबेभत्ता भविष्यति, तू मुझे संग्राम में परास्त कर लेगा, हरा देगा, तो मैं तेरी औरत बनूँगी, इससे कम में नहीं बन सकती। यह कह करके जब उसने कहा कि मैं लड़ने को आपसे तैयार नहीं हूँ, तो उन्होंने कहा, तेरी अकल ठीक करूंगी। आप क्या बनाना चाहते हैं देवी को? आप देवी को क्या बनाना चाहते हैं? औरत बनाना चाहते हैं? न आप देवी के खसम बनना चाहते हैं, न भगत बनना चाहते हैं। भगत या खसम बनना चाहता है? भगत बनना चाहता है या खसम बनना चाहता है? खसम बनना चाहता है। फिर क्या कह रहा था? घंटे भर से देवी का भगत बनने का मतलब है कि देवी चाहता है। फिर क्या कह रहा था? घंटे भर से देवी का भगत बनने का मतलब है कि देवी होता है, खसम जो होता है, हुकुम देता है, अपनी बीवी को खाना पका के ला, हमारा फलाना काम कर, हमारे पैर दाब। यही कह रहे थे न? आप देवी को, देवी को हमारा हुकूम मानना पड़ेगा, देवी को हमारा कहना चलना पड़ेगा। सब के ऊपर ऐसे हुकुम चलाते हैं, गुरु को हमारा हुकूम मानना पड़ेगा, फलाने को हमारा हुकूम मानना पड़ेगा, देवता को हुकूम मानना पड़ेगा। उसने धूपबत्ती जला दी, आपके ऊपर, हमने माला पहना दी। तू हुकूम चलाएगा हमारे ऊपर? हाँ, साहब, हम तो हुकूम चलाएंगे, आपके चेला हैं, बड़ा चेला है हमारा मित्रों। क्या करना पड़ेगा आपको? अपने मन को, मन को उसके साथ जोड़ना पड़ेगा, संशोधन की प्रक्रिया के लिए। सारे के सारे विचार उसमें जुड़े हुए हैं। किसमें? जो हम आपको कर्मकाण्ड कराते हैं। कर्मकाण्डों का जादू इतना ही है, बेटे, प्रत्येक कर्मकाण्ड के साथ, साथ में शिक्षा भरी पड़ी है। वो शिक्षाएं अगर आपके हृदय में गूंजती रहें, दिमागों में चलती रहें, आपके विचार और चिंतन की धारा वही रहती है, तो मैं समझूँ, आपने विचार और क्रिया का समन्वय, समन्वय कर दिया।

पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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अखण्ड-ज्योति से



 इस नवरात्रि के दिव्य संक्रमण काल पर अपना आध्यात्मिक उत्थान चाहने वालों को अवश्य ही पूरी पवित्रता और एकाग्रता से साधना में दत्तचित्त हो जाना चाहिये। संख्या पूरी करने की हड़बड़ी छोड़कर प्रेम और एकाग्रता को अपनाना चाहिये। कम से कम दोनों काल (प्रातः सायं) में तीन घंटा समय निकाल कर 27 माला प्रति दिन नियमित समय पर जपना चाहिए। 10 से 12 माला जपने में साधारणतया एक घंटे का समय लगता है। इस भाँति 24000 का लघु अनुष्ठान पूरा करना चाहिये। जो इतना भी अपनी विविध व्यस्तताओं के कारण नहीं कर सकें, उन्हें कम से कम प्रति दिन दोनों सन्ध्या में 11 माला तो अवश्य ही जप कर लेना चाहिये। जो समय नवरात्रि की साधना में लगेगा, वह कदापि निष्फल न होगा।

साधना के नियम साधारण ही हैं। शौच स्नान से निवृत्त होकर शुद्धतापूर्वक प्रातःकालीन उपासना पूर्व मुख एवं सन्ध्या काल की पश्चिम मुख होकर करनी चाहिये। जप के समय घी का दीप या कम से कम धूपबत्ती जलती रहे। जल का पात्र निकट में रहे। नित्य सन्ध्या कर लेने के उपरान्त गायत्री माता और गुरु का पूजन करके जप प्रारम्भ कर देना चाहिये। नियमित जप समाप्त कर सूर्य के सम्मुख जल चढ़ा देना चाहिये।

 जिस भाँति उपयुक्त नक्षत्र, तिथि एवं दिवसों में बोये बीज, अनुकूल वृष्टि, सिंचाई एवं खाद प्राप्त कर एक विशेष रूप में पुष्ट और उन्नत फल प्रदान करते हैं, उसी प्रकार नवरात्रि की उपासना अन्य समयों में की गई उपासना की अपेक्षा अधिक बलशालिनी और फलवती होती है। जैसे दिन-रात्रि का मिलन काल-सन्ध्या, आध्यात्मिक उपासना करने के लिये अधिक उपयुक्त होती है, उसी प्रकार शीत और शीत की मिलन-वेला आश्विन नवरात्रि होती है। इस संक्रमण काल में जिस भाँति भौतिक प्रकृति अपने विशाल क्षेत्र में एक अवस्था से दूसरी में प्रवेश करती है, उसी भाँति सूक्ष्म प्रकृति के क्षेत्रों में भी उस समय संक्रमण काल उपस्थित होता है।

ऐसे समय में जो साधक सावधान और एकाग्र चेतना से उपासना करता है, उसे सहसा ही अपना निचला स्तर छोड़कर ऊर्ध्व के स्तर में जाने की सर्वव्यापिनी शक्ति द्वारा बल, सहायता और गति प्रदान की जाती है। जिसे अन्य समय में वह अपनी वैयक्तिक उपासना के बल पर पाने में असमर्थ था, वह अनायास ही उपलब्ध हो जाता है। इस भाँति नवरात्रि उपासना का विशाल परिणाम निष्ठावान एवं सच्चे उपासकों को मिलता रहता है।

नवरात्रि उपासना में ब्रह्मचर्य पालन अत्यावश्यक है। जो कर सकें, वे उपवास भी करें, परिमित फल और दूध लेना भी उपवासवत् ही है। जिनसे ऐसा नहीं बन पड़े, वे भी सात्विक-परिमित भोजन करें। स्वाद के लिये न खायें, अतः यथासम्भव नमक और मीठा (चीनी मिष्ठानादि) छोड़ दें। यह भी श्रेष्ठ व्रत ही है। इसके अतिरिक्त, पूरा या नियमित समय तक मौन, भूमि-शयन, चमड़े की बनी वस्तु का त्याग, पशुओं की सवारी का त्याग, अपनी शारीरिक सेवायें स्वयं करना, अपनी हजामत, वस्त्र धोना, भोजन बनाना आदि सेवायें दूसरे से न लेने का व्रत भी निभाने का प्रयत्न करें। अपनी सुख-सुविधाओं को यथासम्भव त्याग कर उपासना में लीन होना ही तप है।

 अखण्ड ज्योति अप्रैल 1956 पृष्ठ 47
पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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