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Monday 05, May 2025

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अखिल विश्व गायत्री परिवार शांतिकुंज हरिद्वार के तत्वावधान में युवा प्रकोष्ठ कौशाम्बी की टीम ने कौशाम्बी जनपद के एन डी कॉन्वेंट स्कूल एंड स्वर्गीय श्री समाधि महाराज बाबा सूरजपाल दास इंटर कॉलेज, नसीरपुर मूरतगंज में छात्र छात्राओं के लिए एक दिवसीय संस्कारशाला का आयोजन किया। कार्यक्रम की शुरुआत प्रधानाचार्य महेश कुमार ने मां सरस्वती के चित्र पर माल्यार्पण कर किया जिसमें युवा टोली ने गुरु वंदना एवं प्रज्ञा गीत प्रस्तुति दी। कार्यक्रम में  युवा सेल के मीडिया प्रभारी अभिषेक जायसवाल ने पर्यावरण संरक्षण और बाल संस्कारशाला संचालक अजीत कुशवाहा ने स्मार्टफोन के लाभ और हानि पर अपने विचार प्रस्तुत किए। वरिष्ठ कार्यकर्ता राजेंद्र केसरवानी ने नशा उन्मूलन और दहेज प्रथा पर अपने प्रज्ञागीत से छात्रों को प्रेरणा दी। युवा प्रकोष्ठ गायत्री परिवार कौशाम्बी के सह प्रभारी डॉ ज्ञानेश्वर त्रिपाठी ने गायत्री महामंत्र छात्र छात्राओं के जीवन के लिए क्यों जरूरी है इस विषय पर प्रकाश डाला। कार्यक्रम में युवा सेल के सौरभ वर्मा एवं संजय शर्मा द्वारा प्रस्तुत विचार व प्रज्ञा गीत आकर्षण का केंद्र रहे। युवा प्रकोष्ठ गायत्री परिवार कौशाम्बी ने विद्यालय के प्रबंधक मिथिलेश सिंह यादव एवं  प्रधानाचार्य महेश कुमार सहित सभी  शिक्षकों का आभार व्यक्त किया और बच्चों के मंगलमयी जीवन की कामना की।

इस मौके पर उप प्रधानाचार्य रामनरेश यादव, राधा रानी अग्रवाल, सरोज अग्रवाल, सुनील सिंह, अभिषेक साहू, अरुण कुमार, कुलदीप साहू, ज्योति सैनी, आकांक्षा पाल, नंदिता पाल, मनीषा विश्वकर्मा, आकांक्षा यादव, आरती श्रीवास्तव, महरोज फात्मा, रजवंती, अजय कुमार, उमेश यादव, संतलाल, अजय मिश्रा, मुन्नी देवी सहित विद्यालय के सैकड़ों छात्र छात्राएं मौजूद रहें।

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सफलता का मूल आधार क्या है | Safalta Ka Mul Aadhar Kya Hai | Samasya Ka Samadhan Rishi Chintan Se

सफलता का मूल आधार क्या है | Safalta Ka Mul Aadhar Kya Hai | Samasya Ka Samadhan Rishi Chintan Se

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धन उन्हीं के पास ठहरता है जो सद्‌गुणी हैं। पं श्रीराम शर्मा आचार्य जी

धन उन्हीं के पास ठहरता है जो सद्‌गुणी हैं। पं श्रीराम शर्मा आचार्य जी

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कोणार्क शक्तिपीठ की अद्भुत घटना Koraank Shaktipeeth Ki Adbhut Ghatna

कोणार्क शक्तिपीठ की अद्भुत घटना Koraank Shaktipeeth Ki Adbhut Ghatna

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आंतरिक दुर्बलताओं से लड़ पड़िए भाग 01

आंतरिक दुर्बलताओं से लड़ पड़िए भाग 01

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Namami Shamishan Nirvan Rupam, नमामीशमिशान निर्वाण रूपं | शिव रुद्राष्टकम, Shiv Rudrashtakam

Namami Shamishan Nirvan Rupam, नमामीशमिशान निर्वाण रूपं | शिव रुद्राष्टकम, Shiv Rudrashtakam

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परंपराओं को निभाना सिर्फ रीति नहीं, जिम्मेदारी है | Paramparaon Ko Nibhana sirf Reeti Nhi Jimmedari Hai

परंपराओं को निभाना सिर्फ रीति नहीं, जिम्मेदारी है | Paramparaon Ko Nibhana sirf Reeti Nhi Jimmedari Hai

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गायत्रीतीर्थ शांतिकुंज, नित्य दर्शन

गायत्री माता
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गायत्री माता - अखंड दीपक
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गुरुजी माताजी
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चरण पादुका
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सजल श्रद्धा - प्रखर प्रज्ञा (समाधि स्थल)
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प्रज्ञेश्वर महादेव - देव संस्कृति विश्वविद्यालय
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शिव मंदिर - शांतिकुंज
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हनुमान मंदिर - शांतिकुंज
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आज का सद्चिंतन (बोर्ड)

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आज का सद्वाक्य

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नित्य शांतिकुंज वीडियो दर्शन


!! शांतिकुंज दर्शन 04 May 2025 !! !! गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार !!

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!! परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य जी का अमृत सन्देश !!

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परम् पूज्य गुरुदेव का अमृत संदेश



आप लोगों को गायत्री उपासना करते समय प्रारंभिक अगर आप उपासक हों तो आपको गायत्री माता का ध्यान करना चाहिए। ध्यान करना चाहिए माता सद्बुद्धि रूपी माता, सद्विवेक रूपी माता, श्रद्धा रूपी माता, करुणा रूपी माता, प्रेम रूपी माता। अपना अमृत सा दूध हमको पीला देती है। दूध को पी करके हमारी नसें और हमारी नाड़ियाँ शुद्ध परक होती चली जाती हैं। हम स्नेह से भर रहे हैं, करुणा से भर रहे हैं, भावना से भर रहे हैं, स्नेह से भर रहे हैं, कोमलता से भर रहे हैं। हमारा जो स्थूल मन है, इसके अंदर कोमलता पैदा होनी चाहिए, सरसता पैदा होनी चाहिए, सौम्यता तो हममें पैदा होनी चाहिए। प्रारंभिक हमारी जो आवश्यकता है, सौम्यता की, करुणा की है। हमारा तो मन सब जगह से निष्ठुरता से भरा हुआ पड़ा है। जब इसमें ज्यादातर आ जाए, श्रद्धा आ जाए, तो हम ये कहने के अधिकारी हैं कि भगवान हमको शक्ति दीजिए और शक्ति आपको आ गई। शक्ति अगर आपको आ गई, कब? जब तक आप शुद्ध पवित्र नहीं हुए, तो आपकी हानि हो जाएगी, आपका नुकसान हो जाएगा। दुर्वासा ऋषि ने अपने क्रोध का समापन नहीं किया था। जप, तप उपासना करने लगे, उनके क्रोध की वृद्धि हो गई। विश्वामित्र जब तक अपने आपको संशोधन करने की पूरी प्रक्रिया नहीं कर सके, तब तक, जब तक अपने भजन में लग गए। भजन में लगने का परिणाम ये हुआ, उनको कि उनकी काम वासना ज्यादा उत्तेजित हो गई। उत्तेजित होने के फलस्वरूप फिर क्या हुआ बेटे? उनके एक शकुंतला नाम की लड़की भी थी, तुझे मालूम है, जो कण्व ऋषि के आश्रम में पैदा हुई थी। विश्वामित्र जी के पास मेनका आई थी, उन्होंने जप करते करते ब्याह कर लिया। साहब जी ऐसा हो सकता है? हाँ साहब, ऐसा हो सकता है। ये शक्ति जो आती है, शक्ति को प्राप्त करने से पहले संशोधन की जरूरत है। संशोधन की जरूरत है। संशोधन अगर आप प्राप्त कर लें, तब तब आपको सविता का ध्यान करना चाहिए।

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अखण्ड-ज्योति से



 ध्यान भूमिका की साधना में शरीर को ढीला और मन को खाली रखना चाहिए। इसके लिए शिथिलीकरण मुद्रा तथा उन्मनी मुद्रा का अभ्यास करना पड़ता है। शिथिलीकरण का स्वरूप यह है कि देह को मृतक-निष्प्राण मूर्छित, निद्रित, निश्चेष्ट स्थिति में किसी आराम कुर्सी या किसी अन्य सहारे की वस्तु से टिका दिया जाय और ऐसा अनुभव किया जाय मानो शरीर प्रसुप्त स्थिति में पड़ा हुआ है। उसमें कोई हरकत हलचल नहीं हो रही है। यह मुद्रा शरीर को असाधारण विश्राम देती और तनाव दूर करती है। ध्यानयोग के लिए यही स्थिति सफलता का पथ प्रशस्त करती है।

मन मस्तिष्क को ढीला करने वाली उन्मनी मुद्रा यह है कि इस समस्त विश्व को पूर्णतया शून्य रिक्त अनुभव किया जाय। प्रलय के समय ऊपर नील आकाश, नीचे नील जल स्वयं अबोध बालक की तरह कमल पत्र पर पड़े हुए तैरना अपने पैर का अँगूठा अपने मुख से चूसना, इस प्रकार का प्रलय चित्र बाज़ार में भी बिकता है। मन को शान्त करने की दृष्टि से यह स्थिति बहुत ही उपयुक्त है संसार में कोई व्यक्ति, वस्तु , हलचल, समस्या, आवश्यकता है ही नहीं, सर्वत्र पूर्ण नीरवता ही भरी पड़ी है- यह मान्यता प्रगाढ़ होने पर मन के लिए भोगने, सोचने, चाहने का कोई पदार्थ या कारण रह ही नहीं जाता।

अबोध बालक के मन में कल्पनाओं की घुड़दौड़ की कोई गुँजाइश नहीं रहती। अपने पैर के अँगूठे में से निसृत अमृत का जब आप ही परमानन्द उपलब्ध हो रहा है तो बाहर कुछ ढूँढ़ने खोजने की आवश्यकता ही क्या रही? इस उन्मनी मुद्रा में आस्था पूर्वक यदि मन जमाया जाय तो उसके खाली एवं शान्त होने की कोई कठिनाई नहीं रहती। कहना न होगा कि शरीर को ढीला और मन को खाली करना ध्यानयोग के लिए नितान्त आवश्यक है। साथ ही यह भी स्पष्ट है कि ध्यानयोग का चुम्बकत्व ही आत्मा और परमात्मा की प्रगाढ़ घनिष्ठता को विकसित करके द्वैत को अद्वैत बनाने में सफल होता है। आत्मा और परमात्मा का मिलन संयोग जितना गहरा होगा उतना ही परस्पर लय होने की-सम्भावना बढ़ेगी इस एकता के आधार पर ही बिन्दु को सिन्धु बनने का अवसर मिलता है। जीव के ब्रह्म बनने का अवसर ऐसे ही लय समर्पण पर एकात्म भाव पर निर्भर रहता है।

पं श्रीराम शर्मा आचार्य
 अखण्ड ज्योति मार्च 1973 पृष्ठ 50

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