Tuesday 06, May 2025
सद्विचारों की समग्र साधना | Sadvicharo Ki Samagra Sadhna | विचारों की अपार और अद्भुद शक्ति
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"क्या सभी धनवान लोग समान होते हैं? : तीन प्रकार के धनिक"
आदि शंकराचार्य जी द्वारा गायत्री का अर्थ | Aadi Shankrachrya Dwara Gayatri Ka Arth
आत्मविकास की विचार-साधना, Aatmavikash Ki Vichar Sadhana
अमृतवाणी:- बंधनों से मुक्ति | Bandhano Se Mukti
अमृतवाणी: मनःस्थिति में परिवर्तन | Manahsthiti Mein Pariwartan | गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
भारतीय संस्कृति शौर्य और साधना का संगम हैं | Bhartiya Sanakriti Shaurya Sadhna Ka Sangam
गायत्रीतीर्थ शांतिकुंज, नित्य दर्शन
आज का सद्चिंतन (बोर्ड)
आज का सद्वाक्य
नित्य शांतिकुंज वीडियो दर्शन
!! शांतिकुंज दर्शन 06 May 2025 !! !! गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार !!
गुरू और शिष्य के बीच के संबंध !! परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य जी का अमृत सन्देश !!
परम् पूज्य गुरुदेव का अमृत संदेश
सविता का ध्यान कराने के लिए हम आपको थोड़ी सी बानगी बताते हैं, चासनी बताते हैं, छोटी सी जानकारी देते हैं। सविता का ध्यान कैसे कराया जाएगा ये 27 नंबर का सैंपल हम बताते हैं। कैसे कराया जाएगा? कराएंगे तो बेटे हम ब्रह्मवर्चस में कराएंगे। ब्रह्मवर्चस में कराएंगे। ब्रह्मवर्चस में कराने से पहले आपको ये प्रारंभिक शिक्षण देते हैं। ये पी एम सी का कोर्स है, कौन सा? अभी जो हम कराते हैं, अभी हम आपको इसलिये प्रारंभिक शिक्षा दे रहे हैं। क्या आप ऐसा कर सकते हैं? क्या आपके लिए ऐसा संभव है? क्या आप अपना चिंतन और अपना विचार, आपको बदल दें? आप बदल सकेंगे तो हम आपको शक्ति दिलाएंगे। ब्रह्मवर्चस हमको आपको शक्ति देने के लिए बुलाते हैं, पर आपके लिए शर्त ये है कि आप अपना वर्तमान जीवन का क्रम संशोधित कर लें। क्योंकि वो जो शक्ति आएगी, वो आपके लिए लाभदायक हो सकती है, आपका भला कर सकती है। इसीलिए और शक्ति आई तो आपका पेट फट जाएगा, आप सहन नहीं कर पाएंगे। वो शक्ति, जो शक्ति को न कर सके। हजम शक्ति को प्राप्त करना मुश्किल नहीं है। शक्ति को हजम करना मुश्किल है। घी, घी में बेटे बड़ी ताकत होती है। घी में बड़ी ताकत होती है। घी प्राप्त करना, घी प्राप्त करना कोई मुश्किल नहीं है। 25 रुपये तेरे पास हो तो मुझे दे, मैं तुझे 1 किलो घी लाकर दे दूंगा। एक किलो घी मिल जाएगा। फिर महाराज जी, खा लूँ तो, खा लूँ तो बेटे, तेरे चेहरे पे चमक आ जाएगी। तू मोटा हो जाएगा। तो 1 किलो का डिब्बा है, मैं तो आज खा जाता हूँ। हजम नहीं होगा। हजम न होने से तेरा घी जो है, नुकसान करेगा, तेरे पैसे भी जाएंगे और तेरे दस्त हो जाएंगे। तो उल्टी हो जाएगी। शक्ति प्राप्त करना कोई मुश्किल नहीं है। भगवान का अनुग्रह प्राप्त करना कोई मुश्किल नहीं है। भगवान का अनुग्रह प्राप्त करना तो गुरू जी, बड़ा मुश्किल है। नहीं बेटे, कोई मुश्किल नहीं है। भगवान का अनुग्रह पाना कोई मुश्किल नहीं है। नहीं महाराज जी, बड़ा मुश्किल है। नहीं बेटे, कोई मुश्किल नहीं है। मुश्किल है। चल, मैं तेरी सहायता करता हूँ। मेरा गुरू मेरी सहायता करता है। क्या सहायता करता है? मैं सबेरे के वक्त, सबेरे के वक्त, जब यहाँ आता हूँ, उससे पहले अपने गुरू के सम्मुख बैठा रहता हूँ। हम दोनों के बीच में ऐसे सूत्र स्थापित हो गए हैं। ऐसे दोनों के बीच में सूत्र स्थापित हो गए हैं कि शरीर तो उनका न जाने कहाँ रहता है और हमारा शरीर यहाँ रहता है। पर हम आपस में बैठे हुए व्यक्तियों की तरह से बात करते रहते हैं, परामर्श करते रहते हैं, सलाह मशविरा करते रहते हैं। क्या करना चाहिए, क्या नहीं करना चाहिए? क्या हमको दिक्कत आ जाती है, क्या परेशानी आ जाती है? क्या हाल हो सकता है? बहुत सी बातों के लिए आपस में जैसे दो मित्र बैठ के बात कर लेते हैं। हम कर सकते हैं, गुरू जी हमको भी लाभ मिल सकता है। बेटे, ये लाभ मैं तुझे दिला सकता हूँ। चल।
अखण्ड-ज्योति से
जटिल संरचना वाले कोमल तारों एवं पुर्जा से बने यन्त्रों का उपयोग बहुत साज सँभाल के साथ किया जाता है। उन्हें झटके धक्के लगते रहे तो कुछ ही समय में गड़-बड़ी उत्पन्न हो जाती है। ट्रांजिस्टर, रेडियो, टेप रिकार्डर घड़ी आदि संवेदनशील यन्त्र भारी उठक-पटक बर्दाश्त नहीं कर सकते उन्हें ठीक रखना हो तो सावधानी के साथ उठाने, रखने बरतने का क्रम चलाना चाहिए। यही बात शरीर और मस्तिष्क के बारे में है, यदि उन्हें स्वस्थ स्थिति में रखना हो तो तनावों और आवेशों से उनकी समस्वरता को नष्ट होने से बचाना ही चाहिए।
शरीर को मृत समान निर्जीव करने- काया से प्राण को अलग मानने- अर्धनिद्रित स्थिति में माँस पेशियों को ढीला करके आराम कुर्सी जैसे किसी सुविधा-साधन के सहारे पड़े रहने को शिथिलीकरण मुद्रा कहते हैं। ध्यान-योग के लिए सही यही सर्वोत्तम आसन है। शरीर को इस प्रकार ढीला करने के अतिरिक्त मना को भी खाली करने की आवश्यकता पड़ता है। ऊपर नील आकाश-नीचे अनन्त नील जल-अन्य कोई पदार्थ, कोई जीव, कोई परिस्थिति कहीं नहीं, ऐसी भावना के साथ यदि अपने को निर्मल निद्रित मन वाले बालक की स्थिति में एकाकी होने की मान्यता मन में जमाई जाय तो मन सहज ही ढीला हो जाता है। इन दो प्रारम्भिक प्रयासों से सफलता मिल सके तो ही समझना चाहिए कि ध्यानयोग में आगे बढ़ने का पथ प्रशस्त हो गया।
संसारव्यापी शून्य नीलिमा की तरह ध्यानयोग में अपने हृदयाकाश को भी रिक्त करना पड़ता है। कामनायें-वासनायें-ऐषणाएं-आकांक्षाएँ , प्रवृत्तियाँ-भावावेश परक उद्विग्नतायें मन में जितनी उभर उफन रही होगी उतना ही अंतःक्षेत्र अशान्त रहेगा और एकाग्रता का-तन्मयता का-लय स्थिति का आधार अपनाकर हो सकने वाला ध्यान प्रयोजन पूरा न हो सकेगा।
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड ज्योति मार्च 1973 पृष्ठ 50
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