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Media   >   Social Media   >   Daily Update

Tuesday 05, August 2025

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विलनियस, लिथुआनिया में दीपयज्ञ का आयोजन सम्पन्न हुआ।

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उपासना में नियमितता का महत्त्व Upasna Mei Niyamitata Ka Mehtav गायत्री मन्त्र के शब्दों का दिव्य सन्देश

उपासना में नियमितता का महत्त्व Upasna Mei Niyamitata Ka Mehtav गायत्री मन्त्र के शब्दों का दिव्य सन्देश

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 Worship True Knowledge | The Angelic Light Of Rishi Thought

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चिंतन निष्ठा पवित्र और दृढ बनाएँ | Chintan Nishtha Pavitra Aur Dridh Banayen | Dr Chinmay Pandya

चिंतन निष्ठा पवित्र और दृढ बनाएँ | Chintan Nishtha Pavitra Aur Dridh Banayen | Dr Chinmay Pandya

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स्वयं क्रिया कुशल और सक्षम होने के बावजूद भी कितने ही व्यक्ति अन्य औरों से तालमेल न बिठा पाने के कारण अपनी प्रतिभा का लाभ समाज को नहीं दे पाते। उदाहरण के लिए फुटबाल का कोई खिलाड़ी अपने खेल में इतना पारंगत है कि घण्टों गेंद को जमीन पर न गिरने दे परन्तु यह भी हो सकता है कि टीम के साथ खेलने पर अन्य खिलाड़ियों से तालमेल न बिठा पाने के कारण वह साधारण स्तर का भी न खेल सके।

अक्सर संगठनों में यही भी होता है कि कोई व्यक्ति अकेले तो कोई ज़िम्मेदारी आसानी से निभा लेते हैं, किन्तु उनके साथ दो चार व्यक्तियों को और जोड़ दिया जाय तथा कोई बड़ा काम सौंप दिया तो वे ज़िम्मेदारी से कतराने लगते हैं। कुछ व्यक्तियों को यदि किसी कार्य कि ज़िम्मेदारी सौंप दी जाय  तो हर व्यक्ति यह सोच कर अपने दायित्व से उपराम होने की सोचने लगता है कि दूसरे लोग इसे पूरा कर लेंगे।

 बौद्ध साहित्य में सामूहिक जिम्मेदारी के आभाव का एक अच्छा प्रसंग आता है। किसी प्रदेश के राजा ने कोई धार्मिक अनुष्ठान करने के लिए राजधानी के निवासियों को निर्देश दिया कि सभी लोग मिलकर नगर के बाहर तैयार किये गए हौज में एक-एक लोटा दूध डालें। हौज को ढक दिया गया था और निश्चित समय पर जब हौज का ढक्कन हटाया गया तो पता चला कि दूध के भरने के स्थान पर हौज पानी से भरा था। कारण का पता लगाया गया तो मालूम हुआ कि प्रत्येक व्यक्ति ने यह सोच कर दूध के स्थान पर पानी डाला था कि केवल मैं ही पानी डाल रहा हूँ अन्य और लोग तो दूध ही डाल रहे हैं।

 समाज में रहकर अन्य लोगों से तालमेल बिठाने तथा अपनी क्षमता योग्यता का लाभ समाज को देने कि स्थिति भी सामाजिकता से ही प्राप्त हो सकती है।

 पं. श्रीराम शर्मा आचार्य
 जीवन देवता की साधना-आराधना वांग्मय 2/2.20

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अमृतवाणी:- हमारी लड़कियाँ तपस्वानी बनकर जाएँ | Hamari Ladkiyan Tapasvani Bnakar Jaye पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य

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जैसी करनी वैसी भरनी | Jaisi Karni Waisi Bharnii | Life Changing Motivational Story, Rishi Chintan

जैसी करनी वैसी भरनी | Jaisi Karni Waisi Bharnii | Life Changing Motivational Story, Rishi Chintan

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गायत्रीतीर्थ शांतिकुंज, नित्य दर्शन

गायत्री माता
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गायत्री माता - अखंड दीपक
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चरण पादुका
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चरण पादुका
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सजल श्रद्धा - प्रखर प्रज्ञा (समाधि स्थल)
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प्रज्ञेश्वर महादेव - देव संस्कृति विश्वविद्यालय
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शिव मंदिर - शांतिकुंज
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हनुमान मंदिर - शांतिकुंज
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आज का सद्चिंतन (बोर्ड)

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आज का सद्वाक्य

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नित्य शांतिकुंज वीडियो दर्शन


!! शांतिकुंज दर्शन 05 August 2025 !! गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार !!

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अमृतवाणी: हृदयवान आदमी की पहचान पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य

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परम् पूज्य गुरुदेव का अमृत संदेश



ईश्वरचंद्र विद्यासागर ने अपने घर वालों से कहा, "आप लोगों को ₹50 महीने में ही गुजारा करना पड़ेगा, गुजारा करना पड़ेगा। ज्यादा आपके ऊपर खर्च नहीं किया जा सकता।" साढ़े चार सौ रुपये महीने के बारे में उन्होंने यह व्यवस्था बनाई — जो विद्यार्थी यह अनुभव करते हों कि हमारे पास पढ़ाई की कमी है, शिक्षा की कमी है, पेंसिल की कमी है, मिट्टी के तेल की कमी है, फीस की कमी है या और दूसरी चीजों की कमी है, वो हमारे घर से ले जाया करें।
सब बच्चे आते। उस ज़माने के आदमी भी भले आदमी रहे होंगे। आज के ज़माने के होते तो? विद्यार्थी भी ऐसे, बेईमान। विद्यार्थियों को ही क्या कम समझते हैं? जब फीस माफ़ कराने के लिए वो चले आते हैं जो मालदारों के लड़के हैं, और फीस माफ़ करा जाते हैं, पेशकारों की बात करा के। बेचारे गरीब रह जाते हैं।
आज के विद्यार्थी की नहीं कहता, आज तो सबका बंटाधार ही होता चला जा रहा है। किसी ज़माने में शराफ़त थी। देने वालों में भी शराफ़त थी और लेने वालों में भी शराफ़त थी। केवल वही विद्यार्थी जाते थे, जो पाने के हकदार होते।
साढ़े चार सौ रुपये में हजारों विद्यार्थी लाभ उठाते। कोई-कोई पेंसिल माँग ले गया, कोई मिट्टी के तेल की एक बोतल माँग ले गया, कोई क्या माँग ले गया, कोई कापी माँग ले गया। हजारों बच्चों की भीड़ लगी रहती थी। वो साढ़े चार सौ रुपये में सैकड़ों-हजारों बच्चों की आवश्यकता को पूरा करते हुए, ईश्वरचंद्र विद्यासागर निहाल होते थे।
भगवान की भक्ति का यही तरीका है बेटे, यही तरीका है। दुनिया में जितने भी आदमी हुए हैं, जितने भी श्रेष्ठ आदमी हुए हैं, जितने महान आदमी हुए हैं, जितने गरिमा संपन्न आदमी हुए हैं — वो सब हृदयवान आदमी हैं, कलेजे वाले आदमी हैं, सहृदय आदमी हैं।
और सहृदय आदमी की पहचान यह है कि अपने व्यक्तिगत जीवन को, व्यक्तिगत जीवन की महत्वाकांक्षाओं को पैरों के नीचे पहले कुचल डाले। अमीरी भी होगी और हम दान भी करेंगे? नहीं बेटे। तू तो ढोंग बनाएगा। कहीं ना कहीं लोगों के ऊपर छाप डालेगा कि हम भी बड़े अमीर हैं और हम भी बड़े दानी हैं।
और धर्मशाला पर पत्थर लगाने के लिए सिवाय ₹200 देगा, और बस उसके नीचे लिखवा लेगा। क्या लिखवा लूँगा? — "स्व. ₹200, लाला चुन्नूलाल, बेटा मुन्नूलाल का पोता, सून्नूलाल का। इसने अपनी नानी की दादी की मौसी के मरने के स्वागत में, उसके एवज में ₹151 दान दिया।"
आ... आ............. बड़ा भारी दानी है रे तू तो! बड़ा भारी दानी है? हाँ, बड़ा भारी दानी हूँ।
अरे दानी, तेरी हम सब जानते हैं। तू कैसा दानी है? नाम के लोभी, यश के लोभी। किसी अच्छे काम के लिए देने का तेरा मन रहा होता, तो भगवान तेरे ही पास आ जाता। तू भगवान का हो जाता।

 

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अखण्ड-ज्योति से



‘‘जीवन की तृष्णा और सुख प्राप्ति की चाहत को दूर करो। किन्तु जो महत्त्वाकांक्षी हैं, उन्हीं की भाँति कठोर श्रम करो। जिन्हें जीवन की तृष्णा है, उन्हीं की भाँति सभी के जीवन का सम्मान करो। जो सुख के लिए जीवन यापन करते हैं, उन्हीं की भाँति सुखी रहो। अपने हृदय के भीतर पनपने वाले पाप के अंकुर को ढूँढक़र, उसे बाहर निकाल फेंको। यह अंकुर शिष्य के हृदय में भी यदा-कदा उसी तरह पनपने लगता है, जैसे कि वासना भरे मानव हृदय में। केवल महान वीर साधक ही उसे नष्ट कर डालने में सफल होते हैं। जो दुर्बल हैं, वे तो उसके बढऩे-पनपने के साथ भी नष्ट हो जाते हैं।’’

यह अनुभव सभी महान् शिष्यों का है। शिष्य के जीवन में तृष्णा और सुख की लालसा की कोई जगह नहीं है। मजे की बात है कि तृष्णा और सुख की लालसा किसी को भी सुखी नहीं कर पाती, हालांकि प्राय: सभी इसमें फँसे-उलझे रहते हैं। ऐसे लोगों के लिए जीवन आज में नहीं है, आने वाले कल में है। भविष्य में जीवन को खोजने वाले अपने वर्तमान से हमेशा असन्तुष्ट, असंतृप्त बने रहते हैं। इस सच्चाई का एक पहलू और भी है, जो तृष्णा और सुख की लालसा से अपने आप को जितना भरता जाता है- वह उतना ही अपने अहंकार को तुष्ट और पुष्ट करता रहता है। जबकि अहंकार का शिष्यत्व की साधना से कोई मेल

 शिष्यत्व तो समर्पण की साधना है- जिसका एक ही अर्थ है- अहंकार का अपने सद्गुरु के चरणों में विसर्जन। हालांकि इस समर्पण-विसर्जन के साथ भी कई तरह के भ्रम जनमानस में व्याप्त हैं। कई लोगों का सोचना है कि जब हमने समर्पण कर दिया- तब हम फिर कुछ काम क्यों करें? जब तृष्णा नहीं सुख की लालसा नहीं तब फिर मेहनत किसलिए? ये सवाल दरअसल भ्रमित मन की उपज है। जो जानकार हैं, समझदार हैं वे जानते हैं कि समर्पण और श्रद्धा का मतलब-निकम्मापन या निठल्ले बैठे रहना नहीं है। बल्कि इसका अर्थ है- सत्य के लिए, अपने गुरुदेव के लिए स्वयं को सम्पूर्णरूप से झोंक देना। इस सम्बन्ध में रमण महर्षि कहा करते थे- यह कैसी उलटबांसी है कि मिट्टी की खोज में आदमी सब कुछ लगा देता है- पर अमृत की खोज में कुछ भी नहीं लगाना चाहता। जबकि शिष्य तो वही है- जो गुरु के एक इशारे पर जीवन पर्यन्त अटूट और अथक श्रम करता रहे।

 केवल शिष्य ही जीवन का सच्चा ज्ञाता होता है, इसलिए उसे जीवन की महान्ï सम्भावनाओं को उजागर करने में तत्पर रहना चाहिए। यह तभी सम्भव है कि जब उसके मन में अपने और सभी के जीवन का सम्मान हो। साथ ही वह सुख के लिए इधर-उधर भटके नहीं बल्कि अपने कत्र्तव्य पालन में सुख की अनुभूति करे। भगवान् बुद्ध का कथन है कि इस संसार में सुखी वही है, जिसने सुख की वासना छोड़ दी है। वास्तविक दुख तो वासनाओं का है। जो जितना ज्यादा वासनाओं, कामनाओं एवं लालसाओं से भरा है, वह उतना ही ज्यादा दु:खी है। वासनाओं और लालसाओं के छूटते ही अन्तश्चेतना में शान्ति और सुख की बाढ़ आ जाती है। सब तरफ से सुख ही सुख बरसता है। समूची प्रकृति हर पल मन-अन्त:करण को सुख से भिगोती रहती है।

अखण्ड ज्योति जनवरी 1950 पृष्ठ 11

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