Monday 04, August 2025
भवानीशङ्करौ वन्दे श्रद्धाविश्वासरूपिणौ, जीवन पथ के प्रदीप | श्रद्धेय डॉ प्रणव पण्ड्या, Rishi Chintan
विद्या ही तो सफलता का मूल आधार है | Vidya Hi Tho Safalta Ka Mool Aadhar Hai
लक्ष्य : माया नहीं, सत्य को बनाओ लक्ष्य | Dr. Pranav Pandya जीवन पथ के प्रदीप
लंदन में दीपयज्ञ कार्यक्रम में सम्मिलित हुए आदरणीय डॉ. चिन्मय पंड्या जी।
भावी सम्भावनायें और हमारा कर्त्तव्य | Bhavi Sambhavnaye Aur Hamara Kartavya | Rishi Chintan Youtube
अमृतवाणी:- जीवन में जिम्मेदारियों का महत्व | पं श्रीराम शर्मा आचार्य जी
देव संस्कृति विश्वविद्यालय के प्रति-कुलपति डॉ. चिन्मय पंड्या जी ने ब्रिटेन प्रवास के दौरान भारत सरकार के पोलैंड में व्रोकलॉ शहर स्थित मानद कॉन्सुल श्री कार्तिकेय जोहरी जी एवं उनके परिवार से आत्मीय भेंट की। इस अवसर पर लॉर्ड कुमार रावल जी की गरिमामयी उपस्थिति भी विशेष रूप से उल्लेखनीय रही।
भेंट के दौरान लंदन में प्रस्तावित कार्यक्रम एवं भारत की वैश्विक सांस्कृतिक भूमिका को लेकर सारगर्भित चर्चा हुई। यह संवाद सांस्कृतिक समन्वय का प्रतीक बना और भारत की आध्यात्मिक चेतना को वैश्विक मंचों पर प्रतिष्ठित करने की दिशा में एक प्रेरणादायी पहल सिद्ध हुआ।
देव संस्कृति विश्वविद्यालय के प्रति-कुलपति आदरणीय डॉ. चिन्मय पंड्या जी ने अपने लिथुआनिया प्रवास के दौरान राजधानी विलनियस के केंद्रीय क्षेत्र में एक भव्य दीपयज्ञ का आयोजन किया। इस आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक कार्यक्रम में भारतीय प्रवासी समुदाय, स्थानीय नागरिकों तथा आध्यात्मिक जिज्ञासुओं ने उत्साहपूर्वक भाग लिया।
इस अवसर पर डॉ. पंड्या ने भारतीय अध्यात्म की वर्तमान समय में प्रासंगिकता पर प्रकाश डालते हुए पूज्य गुरुदेव पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी के विश्व बंधुत्व और नैतिक नेतृत्व संबंधी विचारों को प्रभावशाली रूप में प्रस्तुत किया। दीपयज्ञ न केवल एक आध्यात्मिक अनुष्ठान रहा, बल्कि यह भारत और लिथुआनिया के मध्य सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक संबंधों को सुदृढ़ करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल भी सिद्ध हुआ।
प्रकृति का वह अनिवार्य नियम है, कि जिसको आप जैसा समझते हैं कि वह आपको वैसा ही समझता है, भले ही आप उसे न जानते हों या आपको जानकर आश्चर्य और क्रोध आवे। जिसको आप छोटा समझते हैं, वह आपको वैसा ही समझता है। नागरिक कर्तव्यों और अधिकारों का ज्ञान अस्पृश्यता रूपी कलंक हम में से निकाल देना और सच्चा भ्रातृ-भाव हमारे बीच में फैलावेगा, वह हमको बतलायेगा कि जो बात अपने को बुरी लगती है, वही बात दूसरे को बुरी लगती है। जैसा व्यवहार हम दूसरों से चाहते हैं, वैसा ही व्यवहार हम दूसरों से करें, सब चीजें चाहती हैं कि हमारे साथ सद्व्यवहार किया जाय, चाहे वे जड़ हों या चेतन।
दुर्व्यवहार करने पर सभी वस्तुएं अपना बदला लेंगी। यदि भाई, नौकर, पड़ौसी, आदि चेतन जीवों से आप दुर्व्यवहार करते हैं तो अपना बदला लेते ही हैं। अचेत वस्तुएं भी ऐसा ही करती हैं। जूते के साथ दुर्व्यवहार कीजिएगा, उसे साफ नहीं रखिएगा तो वह काठ लेगा। छाते की फिक्र न कीजिएगा, उससे लापरवाही से पेश आइये, तो समय पर आप उसकी कमानी टूटी और कपड़ा कटा अर्थात् उसे बेकार पाइयेगा। यदि सुई की फिक्र न रखिएगा, तो किसी वक्त वह आपके शरीर में चुभ कर अपने अस्तित्व का माण आपको देगी। कार्यकुशल पुरुष सबके साथ सदा अच्छा और उचित व्यवहार करता है। इस कारण वह अपनी सब वस्तुएं, सब समय ठीक प्रकार से ठीक स्थान पर पाता है और सब चीजें उसकी सेवा करती हैं। उसका घर गन्दा नहीं रहता। उसके कपड़े मैले नहीं रहते। वह सदा चिड़चिड़ाया हुआ, घबराया हुआ, दूसरों पर अपना दोष लगाता हुआ, परेशान नहीं पाया जाता। उसका शरीर, उसकी आत्मा, उसका मस्तिष्क, सब स्वास्थ्य, स्थिर और प्रसन्न रहते हैं।
अपने नागरिक कर्तव्यों को न पालन कर हम देश की उन्नति में बाधा डाल रहे हैं। इसका प्रभाव हमारे आपस के प्रतिदिन के सम्बन्ध पर भी पड़ा है। जब हम मोची, दर्जी, धोबी आदि को कोई काम देते हैं तो हमें यह विश्वास नहीं रहता कि हम समय से काम कर देगा, न उसे विश्वास रहता है कि इस समय पर उसे दाम देंगे। इसी कारण परस्पर तकाजे पर तकाजा करते रहना पड़ता है। ऐसी दशा में समाज कैसे ठीक-ठीक चल सकता है? हालत यहाँ तक पहुँची है, कि यदि आप किसी को भोजन का निमन्त्रण दें और उन्होंने उसे स्वीकार भी कर लिया हो तो न आपको यह विश्वास रहता है कि वे आ जावेंगे तो भोजन मिल भी जायगा।
काशी में यह कायदा है कि शादी विवाह के भोज की याद निमन्त्रित सज्जनों को लोग आखिर तक बारबार स्वयं जाकर या दूसरों को भेज कर दिलाया करते हैं और मेरा खुद अनुभव है कि गाँव, देहात में निमन्त्रण स्वीकार करने के बाद जब समय से पहुँच गया हूँ तब वहाँ खाना पकाना शुरू किया गया है। मेजबानों को आखिर तक शंका रही कि वह आयेगा या नहीं। जब समाज की यह दशा है, जब किसी भी काम के लिये हम किसी दूसरे पर विश्वास नहीं कर सकते-तब क्या समाज का संगठन हो सकता है ? क्या समाज की प्रगति सम्भव है?
देश की उन्नति इने गिने बहुत थोड़े लोगों पर निर्भर नहीं रह सकती। देश की उन्नति, देश की प्रगति, देश का अभ्युदय, देश की स्वतन्त्रता, साधारण से साधारण व्यक्तियों के अपने कर्तव्यों और अधिकारों की जिम्मेदारी ठीक तरह समझने पर ही निर्भर है।
अखण्ड ज्योति-मार्च 1943 पृष्ठ 6
अमृतवाणी:- कर्म और साहस का आह्वान | Karm Aur Sahas Ka Avahan पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य
स्थिर चित्त से अभीष्ट दिशा में आगे बढिए | विचारों की अपार और अद्भुत शक्ति | Shantikunj Rishi Chintan
गायत्रीतीर्थ शांतिकुंज, नित्य दर्शन
आज का सद्चिंतन (बोर्ड)
आज का सद्वाक्य
नित्य शांतिकुंज वीडियो दर्शन
!! शांतिकुंज दर्शन 04 August 2025 !! गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार !!
अमृतवाणी: करुणा और उदारता का महत्व पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य
परम् पूज्य गुरुदेव का अमृत संदेश
जहाँ तक आध्यात्मिक जीवन का संबंध है, जहाँ तक भगवान की भक्ति का संबंध है, जहाँ तक मनुष्य की श्रेष्ठता और शालीनता का संबंध है, वो सारी की सारी बातें हृदय से ताल्लुक रखती हैं। वो आदमी की करुणा से ताल्लुक रखती हैं, वो आदमी की उदारता से ताल्लुक रखती हैं, वो आदमी की श्रद्धा से ताल्लुक रखती हैं, वो आदमी की भक्ति से ताल्लुक रखती हैं।
आदमी का मुलायम हृदय होना — जो मुलायम हृदय होगा, वो खा नहीं सकता, बेटे, खा नहीं सकता। मुलायम हृदय वाला आदमी खा नहीं सकता, जमा नहीं कर सकता, अमीर नहीं बन सकता। क्योंकि उसके सामने हजारों हाथ, पीड़ितों के चारों ओर फैले हुए दिखाई पड़ेंगे। खा नहीं सकता।
ईश्वरचंद्र विद्यासागर की तरीके से रो पड़ेगा। ईश्वरचंद्र विद्यासागर ने जब विद्यार्थी थे, तो उन्होंने सड़क पर खड़े होकर के बत्तियों के नीचे अपनी पढ़ाई जारी रखी थी। फिर जब वो अच्छी जगह पर चले गए, नौकरी लग गई, तो उनको ₹500 की नौकरी मिलने लगी। ₹500 की पहले दिन की तनख्वाह लेकर के आए, तो उनको दिखाई पड़ा — कितने बच्चे, कितने विद्यार्थी उन्हीं की तरीके से सड़क पर खड़े होकर के बत्ती के अभाव में, पैसे के अभाव में किताब पढ़ रहे थे।
उन्होंने ख्वाब देखा। ख्वाब देखा — ये इतने सारे बच्चे, मिट्टी के तेल के अभाव में किस तरीके से अपनी शिक्षा से वंचित रह रहे हैं। और हम ये अय्याशी करें? और हम मौज उड़ाएँ?
बेटे, आप कैसे भगवान के भक्त हैं, मैं नहीं जानता। न आपके हृदय में करुणा है, न आपके हृदय में दया है। यह अय्याशी से फुर्सत नहीं है, विलासिता से फुर्सत नहीं है, अमीरी से फुर्सत नहीं है, बड़प्पन से फुर्सत नहीं है, दौलतमंद होने से फुर्सत नहीं है, और अपनी महत्वाकांक्षाओं से फुर्सत नहीं है।
फिर इनका क्या होगा? जो भगवान हजारों-हजारों हाथों से आदमी से माँगता और पुकारता है?
ईश्वरचंद्र विद्यासागर ने देखा — अमीरी और गरीबी, और अमीरी और पिछड़ापन हर जगह मौजूद है। जो हमारे सामने था, हमारा बाप इतना गरीब था, किताबें माँग करके लाते थे, बत्ती के नीचे खड़े होते थे। क्या ऐसे विद्यार्थी भी हैं? ऐसे विद्यार्थी हैं, तो उनकी सहायता मुझे नहीं करनी चाहिए? मुझे अय्याशियाँ करनी चाहिए? मुझे मौज उड़ानी चाहिए?
ईश्वरचंद्र विद्यासागर के ईमान ने... अगर ईमान हमारे-आपके भीतर हो, तब। हृदय हमारे-आपके भीतर हो, तो। हम तो हृदयहीन हैं।
हृदय है तो सही, लगता तो है कहीं से लपड़प-लपड़प कोई चीज़ करती तो है, पर यह लोहार की धौंकनी की तरीके से... इसमें करुणा का नाम भी नहीं, दया का नाम भी नहीं है, उदारता का नाम भी नहीं है।
इसमें महत्वाकांक्षाएँ हैं, और इसमें लालसा और लिप्साएँ इतनी ज़्यादा जमा हो गई हैं कि सिवाय हमारे पास कुत्साएँ और कुण्ठाएँ जमा होती जा रही हैं।
भगवान क्या करेगा यहाँ आकर के? देवी क्या करेगी आकर के? आध्यात्मिकता क्या करेगी आकर के?
अखण्ड-ज्योति से
क्या आप कर्जदार है? यदि ऐसा है तो आपकी आत्मा को शान्ति नहीं मिल सकती। उन धनी मानी व्यक्तियों के उदाहरण अपने सन्मुख रखिये जो आजन्म ऋण के बोझ से दबे रहे। हमारे ग्रामीण तो 80 प्रतिशत कर्ज के बोझ से दबे हुए हैं। गोल्डस्मिथ, बालजाक, मार्क टवैन, वेबस्टर, लार्ड वायरन, सर वाल्टर स्काट सब कर्जदार रहे। वाल्टरस्काट आजन्म कर्ज चुकाते रहे। रूसी लेखक डास्टाएन्सकी कर्ज में डूबा रहा। उसकी इच्छा थी कि कर्ज से मुक्त हो जावे किन्तु न हो सका।
गोल्डस्मिथ इतना फिजूल खर्च रहा कि जौनसन साहब की सहायता करने पर भी ऋण मुक्त न हो सका। कथाकार बालजाक अपने महाजनों से डरा-2 फिरा करता था। मार्क स्वेन का 300,000 रु॰ व्यापार में नष्ट हो गया था। लार्ड वायरन जैसे कवि का घर कई बार नीलाम होते होते बचा सुविख्यात चित्रकार व्हिरलय तथा हेडेन का जीवन सदैव दुःख में रहा।
श्री योगेन्द्र बिहारी लाल ऋण ग्रस्त व्यक्तियों के उदाहरण देते हुए लिखते हैं-“सौ वर्ष पहले ल्योब्रमेल इंग्लैंड का फैशन ‘सम्राट् कहा जाता था। उसके कपड़े पहनने का ढंग ही फैशन हो जाता था पर ऋण के कारण उसका सब कुछ बिक गया। जब नीलाम करने वाले उसके घर आते थे तो वह कपड़ों की अलमारियों के पीछे छिप जाता था। अन्त में वह पकड़ा गया। दरिद्रता के कारण उसे फटी कमीज पहननी पड़ती थी, और जनता उस भूतपूर्व फैशन सम्राट पर हंसती थी। विलियन पिट का विवाह कुमारी एडेन से होने जा रहा था, पर पिट के ऋण ग्रस्त होने से विवाह न हो सका था।”
अब्राहम लिंकन ने किसी से शराब की दुकान में साझीदार के मरने पर लिंकन ग्यारह वर्ष तक ऋण चुकाता रहा।
खर्च के विषय में बेखबर रहने से मनुष्य की पूरी आयु नष्ट हो जाती है। इसी के सदुपयोग से जीवन सरस बनता है, समाज में आदर और प्रतिष्ठा प्राप्त होती है। कौटिल्य ने कहा है-“केवल धन के द्वारा मनुष्य गुण, आनन्द एवं मोक्ष की प्राप्ति करता है।” वास्तव में आर्थिक दृष्टि से सम्पन्न रहने से मनुष्य नैतिक एवं आध्यात्मिक उन्नति भी सरलता से कर सकता है। रुपया पास होने से सूर्योदय और गुलाब भी हमें सुन्दर लगते हैं। एक कवि ने लिखा है
“जब जेब में पैसा होता है,
जब पेट में रोटी होती है।
तब हर एक जर्रा हीरा है,
तब हर एक शबनम मोती होती है॥
इस उक्ति में एक शाश्वत सत्य अंतर्निहित है।
अखण्ड ज्योति जनवरी 1950 पृष्ठ 11
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