Sunday 03, August 2025
कठिनाइयों से डरिए नहीं लड़िए (भाग 01) पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य
जिसे जीना आता है, वह सच्चा कलाकार है | Jise Jina Aata Hai Wah Sachha Kalakar Hai
लंदन में दीपयज्ञ कार्यक्रम में सम्मिलित हुए आदरणीय डॉ. चिन्मय पंड्या जी
ब्रिटेन प्रवास के दौरान गायत्री परिवार के केंद्रीय प्रतिनिधि डॉ. चिन्मय पंड्या जी ने लंदन में स्थानीय गायत्री परिजनों द्वारा आयोजित दीपयज्ञ में सहभाग किया। शांतिकुंज से पधारे ज्योति कलश एवं टोली की उपस्थिति में संपन्न इस दिव्य आयोजन में शहर के गणमान्य नागरिकों और श्रद्धालु परिजनों ने भाग लिया।
इस अवसर पर डॉ. पंड्या जी ने पूज्य गुरुदेव का संदेश साझा करते हुए कहा कि "हर व्यक्ति को स्वयं को दीपक बनाकर समाज में प्रकाश फैलाना चाहिए।" विदित हो कि 2026 जन्म शताब्दी के क्रम में लेस्टर से अपनी यात्रा आरंभ कर ज्योति कलश लंदन पहुंचा ।
उपासना के लिए आवश्यक नियम | Upasna Ke Liye Avshyak Niyam
ब्रिटिश संसद में गूंजा भारतीय अध्यात्म का स्वर।
उपवास से सूक्ष्म शक्ति की अभिवृद्धि| Upvas Se Suksham Shakti ki Abhivradhi |गायत्री की पंचकोशी साधना
जीवन का उत्कर्ष | Jeevan Ka Utkarsh, A Life Changing Video Shantikunj Gayatri Pariwar
मनुष्य की दुर्बलता का अनुभव करके हमारे परम कारुणिक साधु संतों ने उद्धार के बहुत से रास्ते ढूँढ़े। अन्त में उन्हें भगवान का नाम मिला। इससे उन्होंने गाया कि-राम नाम ही हमारा आधार है। सब तरह से हारे हुए मनुष्य के लिए बस, राम नाम ही एक तारक मंत्र है। राम नाम यानी श्रद्धा-ईश्वर की मंगलमयता पर श्रद्धा। युक्ति, बुद्धि, कर्म, पुरुषार्थ, सब सत्य हैं, परन्तु अन्त में तो राम नाम ही हमारा आधार है।
लेकिन आजकल का जमाना तो बुद्धि का जमाना कहलाता है। इस तार्किक युग में श्रद्धा का नाम ही कैसे लिया जाए? सच है कि दुनिया में अबुद्धि और अन्धश्रद्धा का साम्राज्य छाया है। तर्क, युक्ति और बुद्धि की मदद के बिना एक कदम भी नहीं चला जा सकता। बुद्धि की लकड़ी हाथ में लिए बिना छुटकारा ही नहीं। परन्तु बुद्धि अपंगु है। जीवन यात्रा में आखिरी मुकाम तक बुद्धि साथ नहीं देती। बुद्धि में इतनी शक्ति होती तो पण्डित लोग कभी के मोक्ष धाम तक पहुँच चुके होते। जो चीज बुद्धि की कसौटी पर खरी न उतरे, उसे फेंक देना चाहिये।
बुद्धि जैसी स्थूल वस्तु के सामने भी जो टिक सके उसकी कीमत ही क्या है? परन्तु जहाँ बुद्धि अपना सर्वस्व खर्च करके थक जाती हैं और कहती है-’न एतदशकं विज्ञातुँ यदेतद्यक्षमिति।’ वहाँ श्रद्धा क्षेत्र शुरू हो जाता है। बुद्धि की मदद से कायर भी मुसाफिरी के लिए निकल पड़ता है। परन्तु जहाँ बुद्धि रुक जाती है, वहाँ आगे पैर कैसे रखा जाय? जो वीर होता है, वही श्रद्धा के पीछे-2 अज्ञान की अंधेरी गुफा में प्रवेश करके उस ‘पुराणह्वरेष्ठ’ को प्राप्त कर सकता है।
बालक की तरह मनुष्य अनुभव की बातें करता है। माना कि, अनुभव कीमती वस्तु है, परन्तु मनुष्य का अनुभव है ही कितना? क्या मनुष्य भूत भविष्य को पार पा चुका है? आत्मा की शक्ति अनन्त है। कुदरत का उत्साह भी अथाह है। केवल अनुभव की पूँजी पर जीवन का जहाज भविष्य में नहीं चलाया जा सकता। प्रेरणा और प्राचीन खोज हमें जहाँ ले जायं, वहाँ जाने की कला हमें सीखनी चाहिए। जल जाय वह अनुभव, धूल पड़े उस अनुभव पर जो हमारी दृष्टि के सामने से श्रद्धा को हटा देता है।
दुनिया यदि आज तक बढ़ सकी है तो वह अनुभव या बुद्धि के आधार पर नहीं, परन्तु श्रद्धा के आधार पर ही। इस श्रद्धा का माथा जब तक खाली नहीं होता, जब तक यात्रा में पैर आगे पड़ते ही रहेंगे, तभी तक हमारी दृष्टि अगला रास्ता देख सकेगी और तभी तक दिन के अन्त होने पर आने वाली रात्रि की तरह बार-बार आने वाली निराशा की थकान अपने आप ही उतरती जायगी। इस श्रद्धा को जाग्रत रखने का-इस श्रद्धा की आग पर से राख उड़ाकर इसे हमेशा प्रदीप्त रखने का-एकमात्र उपाय है राम-नाम।
राम-नाम ही हमारे जीवन का साथी और हमारा हाथ पकड़ने वाला परम गुरु है।
अखण्ड ज्योति-मार्च 1949 पृष्ठ 21
अमृतवाणी:- गुरुदेव का कार्यकर्ताओं को संदेश | Gurudev Ka Karyakartaon Ko Sandesh पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य
अमृतवाणी:- आध्यात्मिक उपासना का लाभ | Adhyatmik Upasana Ke Labh | गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
गायत्रीतीर्थ शांतिकुंज, नित्य दर्शन
आज का सद्चिंतन (बोर्ड)
आज का सद्वाक्य
नित्य शांतिकुंज वीडियो दर्शन
!! शांतिकुंज दर्शन 03 August 2025 !! गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार !!
!! महाकाल महादेव मंदिर Mahadev_Mandir गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार 03 August 2025
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!! गायत्री माता मंदिर Gayatri Mata Mandir गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार 03 August 2025
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!! देवात्मा हिमालय मंदिर Devatma Himalaya Mandir गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार 03 August 2025
!! सप्त ऋषि मंदिर गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार 03 August 2025
!! परम पूज्य गुरुदेव का कक्ष 03 August 2025 गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार !!
अमृतवाणी: हृदयवान की आवश्यकता क्यों है पं श्रीराम शर्मा आचार्य
परम् पूज्य गुरुदेव का अमृत संदेश
जो ईमान की सहायता करता है, भगवान उसकी सहायता करता है। मनुष्यों की सहायता से क्या बनेगा बेटे? मनुष्यों की सहायता से नहीं बनेगा कुछ। मनुष्य क्या कर सकते हैं? क्या सहायता करेंगे? कितने दिन तक सहायता करेंगे? असली सहायता मनुष्यों की नहीं है, असली सहायता भगवान की होती है।
जापान के गाँधी का गावा की सहायता करने के लिए एक और महिला आई। एक महिला आई, उसने कहा था जब मैं यह तलाश कर रही थी कि कोई कलेजे वाला आदमी, हृदयवान आदमी, करुणावान आदमी मिले, तो मैं भी उसके साथ जिंदगी काट डालूँ। मैंने बहुत तलाश किया। मेरी ब्याह-शादी के लिए ढेरों आदमियों के प्रस्ताव थे, लेकिन मैंने कहा मैं तो ऐसे आदमी को तलाश करूंगी जो करुणा से भरा हुआ पड़ा हो। करुणा की तलाश करने के लिए मुझे कोई नहीं मिला। मुझे आपका नाम सुना।
जापान के गाँधी का गावा हँसे। उन्होंने कहा, अरे! तुमको किसने बहका दिया है? मैं तो 1 घंटे मेहनत करता हूँ और ₹50 लेकर के आता हूँ। यह छप्पर देखो, यह है मेरा खुला हुआ छप्पर। यहाँ मैं रात को पड़ा रहता हूँ, दिन भर काम करता हूँ। आप मुझसे ब्याह करके करेंगी क्या?
उन्होंने कहा, मुझे तो हृदयवान चाहिए। हृदयवान चाहिए। पैसे वाले को मैं क्या करूँगी? शक्ल वाले को मैं क्या करूँगी? मुझे केवल हृदयवान चाहिए। हृदयवान के साथ।
उन्होंने कहा, तुमको भी ऐसे रहना पड़ेगा। और फिर तुम्हारे बच्चे पैदा होंगे, तो फिर मैं क्या करूँगा?
"नहीं, हमारे-तुम्हारे बच्चे क्यों होंगे? इस जमाने में तो फैमिली प्लानिंग भी है। उस जमाने में फैमिली प्लानिंग भी नहीं था। हमारे-तुम्हारे बच्चे नहीं हो सकते। हम साथ-साथ रहेंगे। बहन-भाई की तरीके से।"
शक करेंगे लोग। स्त्री-पुरुष की तरीके से हम और आप रहेंगे। और हम दोनों मिलकर काम करेंगे।
एक महिला भी साथ आ गई। दोनों ने मिल के वो काम करना शुरू किया। और मित्रों, फिर क्या किया? फिर की बात बताता हूँ।
धीरे-धीरे उन्नति होते-होते जापान की गवर्नमेंट ने अपने देश का सारा का सारा पिछड़ापन, पिछड़ापन दूर करने का काम जापान के गाँधी का गावा के सुपुर्द किया। सरकार ने करोड़ों रुपया दिया और जनता ने करोड़ों रुपया दिया। उसके आधार पर जनता, सारे के सारे जापान में दुखियारों की, दीनों की, पीड़ितों की, पतितों की सेवा करने के लिए जापान के गाँधी का गावा लगे रहे। कोढ़ियों की सेवा करने वाले ₹50 में गुजारा करने वाले, उसको मिली सहायता।
बेटे, हम कहते तो हैं, तेरी समझ में नहीं आता अभी। भगवान की सहायता किन के लिए? जिनके पास कलेजा है और हृदय है। तेरे पास हृदय है कहीं? अरे, हृदय है कहीं? हृदय पर छाती पर रख के तो देख। तेरे हाथ, तेरे हृदय है कहीं?
अक्ल है तेरे पास? अक्ल? अक्ल कितनी बड़ी अक्ल? अक्ल ज़ालिम अक्ल। अक्ल बेईमान अक्ल। अक्ल दुष्ट अक्ल। पापी अक्ल और पतित अक्ल और कमीनी अक्ल।
आपके और हमारे ऊपर इस बेहिसाब से हावी हो गई है। इस बेहिसाब से हावी हो गई है कि हम को जाने कहाँ-कहाँ से ले जाती है। और जाने क्या से क्या कराती है। जाने कितने-कितने जाल बुनने के लिए हमको मजबूर करती है। और कहाँ-कहाँ हमको भटकाती चली जाती है, यह अक्ल।
अखण्ड-ज्योति से
प्रत्येक प्राणी उन्नति की ओर अग्रसर होना चाहता है, पर जहाँ तक बाधक कारणों का सम्यक् परिज्ञान न हो एवं उनको दूर न किया जाये, उन्नति असंभव है। आध्यात्मिक उन्नति के लिए भी उसके बाधक कारणों को जानना परमावश्यक होता है। लेख में वैसे तीन दोषों पर संक्षेप में प्रकाश डाला जा रहा है। 1.ममत्व, 2.कपट और 3.अवगुणग्राही दृष्टि। जहाँ तक ये दोष रहेंगे, वहाँ तक साधना अग्रसर एवं फलवती नहीं होगी।
1.ममत्व- जहाँ तक साँसारिक पदार्थों में आत्मा की आशक्ति रहेगी, आत्मा का लक्ष्य बहिर्मुखी रहने के कारण आत्मानुभव का मार्ग बन्द ही रहेगा। इसलिए सारे भौतिक पदार्थों भाषों से अपनी आत्मा को अलग, भिन्न, समस्त कर उनके आकर्षण को रोकना बहुत ही आवश्यक है पर पदार्थों की आसक्ति हटते ही आत्मा के स्वरूप का दर्शन एवं अनुभव होगा, आत्मोन्नति का प्रथम सोपान है। जिन-जिन वस्तुओं को आत्मा मेरी अपनी समझता है उनकी प्राप्ति अभिवृद्धि में हर्ष एवं विनाश-क्षीणता में होता है। जहाँ ममत्व भाव नहीं वहाँ हर्ष शोक का प्रादुर्भाव नहीं होता है होता है तो अत्यल्प एवं क्षणिक।
आत्मा द्रव्य वास्तव में इन पाँच द्रव्यों से सर्वथा भिन्न है दृश्यमान सभी पदार्थ पौद्गलिक (भौतिक) है, क्योंकि पुद्गल के सिवाय सभी पदार्थ अरूपी हैं अरूपी पदार्थों पर आसक्ति नहीं होती । जिसे हम देखते हैं, सुनते हैं, खाते हैं, सूँघते हैं और स्पर्श करते हैं अर्थात् पाँचों इन्द्रियों द्वारा जिनके साथ हम अपना किसी प्रकार का सम्बन्ध करते हैं उन्हीं का मन विचार करता है अच्छे या बुरे मेरे या तेरे की कल्पना करता है उस कल्पना के द्वारा ही आत्मा अपने स्वरूप (विचार) से च्युत होकर उनके प्रति आकर्षित होती है। इसीलिए “मैं और मेरा” इसी को मोह का मूलमन्त्र माना गया है और मोह ही आत्मा का परम शत्रु सबसे प्रबल बाधक कारण माना गया है।
पर पदार्थों के संयोग से आत्मा विभाव दशा को प्राप्त होती है। इसीलिए सर्व संग परित्याग-अपरिग्रहता-निर्ग्रन्धता को जैन धर्म में प्रमुख स्थान दिया गया है। जैन तीर्थंकर स्वयं इनका आदर्श उपस्थित करते हैं अर्थात् साधना का आरम्भ सर्वसंग परिसंग परित्याग से ही करते हैं। आसक्ति का परिहार पदार्थों-द्रव्यों के स्वरूप को ज्ञान एवं परिणामों के द्वारा होता है। इनका मूलमन्त्र है “एगोहूँ नत्थि में कोह नाह मनस्स कस्सवि”-मैं किसी का नहीं-मेरी आत्मा अकेली है।” मनुष्य जरा सा विचार करे तो इस अकेलेपन का सहज अनुभव हो जाता है। जन्म-ग्रहण के समय आत्मा अकेली ही उत्पन्न होती है सत्य के समय भी सारे पदार्थों को छोड़कर वह अकेली ही परलोक जाती है। रोगादि दुख भी आत्मा को अकेले ही भोगने पड़ते है अतः आत्मा अकेली ही है बाह्य संयोग धन, दौलत, कुटुम्ब परिवार यावत् देह भी अपना नहीं हैं। तब उन पर समत्व रखना मूर्खता व अज्ञानता नहीं तो क्या है। योगी पुरुषों ने सबसे बड़ी भूल इसी को बतलाया है कि जो पदार्थ अपने नहीं उन्हें अपना मान लेना और अपने स्वरूप को भूल जाना
बहिर्मुखी वृति के कारण आत्मा की सारी शक्ति बाह्य पदार्थों की ओर लगी है और वह उनके लाभ हानि में ही सुख-दुख मान बैठा है, अन्यथा सुख व आनन्द कहीं बाहर से आने वाली चीज नहीं। सच्चे स्वरूप के अज्ञान के कारण ही वह इधर दौड़ धूप कर रहा है। यदि मैं अकेला हूँ, कोई भी चीज मेरी नहीं है तब उन पर आसक्ति कैसी? आनन्द यदि मेरे पास है तो उसकी प्राप्ति के लिए दौड़ धूप क्यों? इसी पर विचार करिये। पोद्गलिक-सभी पदार्थ रूप वाले विनाशी हैं, आत्मा अरूपी एवं अविनाशी है दृश्यमान सभी चीजें पुद्गल की बनी हुई हैं अतः ममत्व को हटाकर आत्मा का अन्तर्मुखी होना आध्यात्मिक साधना के लिए परमावश्यक कार्य है।
2. कपट- वस्तु के स्वरूप को अन्य प्रकार से दिखलाने का प्रयत्न कपट है मेरे हृदय में कुछ और ही। यह आत्मोन्नति का परम बाधक कारण है इस प्रपंच जाल से आत्मा बड़ी मलिन हो जाती है। भूमिका की शुद्धि के बिना सुभग चित्रों का आलेखन संभव नहीं। इसी प्रकार आत्मा का सरल-निष्कपट होना उसकी भूमिका शुद्धि है। जहाँ तक बकता है भ्रम फैलाने की वृति काम कर रही है, वहां तक सद्वृत्तियाँ पनप नहीं सकती। चित्त बहिर्मुखी बना रहता है। कैसे अपने दोषों को छिपाया जाये दूसरे को ठगा जाये, इसी में चित्त फंसा रहता है। वहाँ सुविचारों को अवकाश कहाँ? जो पापी है और अपने आपको छिपाने का प्रयत्न कर लोगों के समक्ष अपने को धर्मी दिखलाने की कोशिश करता है, उसका सुधार बहुत ही कठिन है।
3.अवगुणग्राही दृष्टि- यह भी एक बड़ा भारी अवगुण है इसके कारण मनुष्य अवगुणों की ओर अग्रसर होता है। ऐसी आत्मा हजार गुणों को नहीं देखती बल्कि छिद्रान्वेषी होकर अवगुण की ओर ही झुकती है। यह नहीं सोचती कि दोष हम सब में है किसी में कम और किसी में अधिक और पराये दोषों को देखने से लाभ ही क्या? एक सन्त ने इस सम्बन्ध में बहुत ही सुन्दर कहा है, “हे आत्मा दूर जलती हुई अग्नि को क्या देखता है। तेरे स्वयं पैरों में द्वेषों की अग्नि सुलग रही है उसे देखो, पराये मैल में कपड़े धोने से वे उज्ज्वल कैसे होंगे। थोड़े बहुत अवगुण सभी में होते हैं तुम्हारे में भी हैं तो अपने दोषों को क्यों नहीं देखते पराई निन्दा में क्यों लगे हो। निन्दा करने की यदि तुम्हारी आदत ही पड़ गई है तो अपने दोषों की निन्दा करो। अतः अपने दोषों की ओर दृष्टि डालों और दूसरे की निन्दा को छोड़ो।
“मनुष्य जैसे विचारों में रहता है वैसा ही बन जाता है” अवगुणों को ढूँढ़ने की दृष्टि रखने से स्वयं अवगुण का भाजन हो सकता है। इसीलिए इस दृष्टि दोष को निवारण कर हमें अपनी दृष्टि को गुण ग्राहक बनाना आवश्यक है। अवगुण देखने हो तो अपने देखो, जिससे उन्हें छोड़ने की भावना जगे तथा आत्मा दोष रहित बने। औरों के तो गुण ही देखो जिससे गुणी बने और गुणों के प्रति तुम्हारा आकर्षण बढ़े।
इन तीनों विवेचना का सार यही है कि इनके द्वारा आत्मा को बढ़ने का अवकाश भी नहीं होता। अतएव बहिर्मुखी वृत्तियों की ओर से हटकर अन्तर्मुखी होने का लक्ष्य रखा जाय। महत्व, कपट और अवगुण ग्राही दृष्टि से बचा जाय तभी आत्मोन्नति होगी।
अखण्ड ज्योति अप्रैल 1950 पृष्ठ 14
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