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Saturday 02, August 2025

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राजा को राजतंत्र की गरिमा का भान | Raja Ko Rajtantra Ki Garima Ka Bhan | Dr Chinmay Pandya

राजा को राजतंत्र की गरिमा का भान | Raja Ko Rajtantra Ki Garima Ka Bhan | Dr Chinmay Pandya

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 श्रीमद्भगवद्‌गीता : श्री कृष्ण का सन्देश | Dr. Pranav Pandya जीवन पथ के प्रदीप

श्रीमद्भगवद्‌गीता : श्री कृष्ण का सन्देश | Dr. Pranav Pandya जीवन पथ के प्रदीप

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मूर्ख : संपत्ति वही, जो सही समय पर काम आए | Motivational Story

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डलास से चलकर ज्योति कलश शिकागो पहुँचा।

डलास से चलकर ज्योति कलश शिकागो पहुँचा।

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हे सौम्य! हे सत्यकाम! ‘मैं कौन हूँ’ यह मालूम कर। अपने भीतर टटोल। इस संसार व शरीर की वास्तविकता को बूझ। जैसे ही तू जाग जाता है तेरा स्वप्न झूठा हो जाता है। इसी प्रकार जब तुझे आत्म ज्ञान हो जायगा तब यह संसार असत्य हो जायगा- अदृश्य हो जायगा। संसार केवल मन की उपज है। इसका अस्तित्व केवल सम्बन्ध रखता हुआ, परिवर्तनशील एवं परतन्त्र तथा दृष्टि विषयक और निर्भर रहने वाला है। यह ब्रह्म से निकला है, उसी में रहता है तथा अन्त में उसी में मिल जाता है।

हे सत्यकाम! तेरा प्रथम कर्त्तव्य अपनी आत्मा को पहचानना है। यह आत्मा अनन्त है तथा आत्मप्रकाश है। इस तुच्छ अपनेपन को नष्ट कर दें और सच्चिदानन्द आत्म से संपर्क रख। शरीर, स्त्री, सन्तान, तथा धन में जो आसक्ति है उसका त्याग कर दे। इच्छाओं स्वार्थ व ‘अपनेपन’ को तिलाँजलि दे दे तथा उस पूर्णज्ञान ‘निर्विकल्प समाधि’ को प्राप्त कर जिसमें न कोई विषय है, न उद्देश्य, न प्रसन्नता है, न दुःख, न सर्दी है न गर्मी, न भूख है न प्यास। तब तू सर्वश्रेष्ठ आनन्द, अनन्त शान्ति, असीम ज्ञान तथा अमर गति का भोग करेगा।

तू अज्ञान के आवरण से कृत्रिम निद्रा के वशीभूत है। तू आत्म ज्ञान द्वारा कृत्रिम निद्रा से जाग और ‘अमर गति’ को जान। तू कब तक माया के फन्दे में फंसा रहना चाहता है। बहुत हो चुका। अब तू इन बन्धनों को तोड़। अविधा की जंजीर को तोड़ दे-उन पाँच पर्दों को फाड़ दे और इस हाड़-माँस के पिंजरे से विजयी होकर निकल आ। मेमने की भाँति ‘मैं-मैं’ न कर, बल्कि ओऽम्-ओऽम्-ओऽम् की गर्जना कर, ओऽम्-ओऽम्-ओऽम् का स्मरण कर, स्वीकार कर, सिद्ध कर और पहचान। अपनी आत्मा को पहचान और इसी क्षण बन्धन से मुक्त हो जा। तू ही सम्राटों का सम्राट है- तू ही सर्वश्रेष्ठ है। उपनिषदों के अन्तिम शब्द ध्यान में ला। ‘तत् त्वं असि’- ‘तू’ ही ‘वह’ है। मेरे प्रिय सत्यकाम! ‘उसे’ जान- ‘उसे’ जानना ही ‘वह’ बन जाना है।

अपने भीतर टटोल। अपने को समस्त विचारों से विमुक्त कर ले। विचार शून्य बन जा। सत्य और असत्य की पहचान कर। अनन्त और अदृश्य में भेद कर। इस बहते हुए मन को बार-बार केन्द्रित करने की चेष्टा कर। विपरीत की द्वन्द्वता से ऊपर उठ। नेति-नेति, के पाठ का अध्ययन कर। धोखे के चक्रों का नाश कर दे। अपने को सर्वव्यापक आत्मा से मिला। आत्म ज्ञान प्राप्त कर और उस सर्वश्रेष्ठ आनन्द का भोग कर।

धर्म की प्रथम घोषणा यही है कि आत्मा एक है। ‘एक’ अनेक नहीं हो सकता। यह कैसे सम्भव है? एक अनेक के समान प्रतीत अवश्य होता है। जैसे रेगिस्तान में जल का आभास किसी स्थिति विशेष में मनुष्य, आकाश में नीलिमा, सीप की चाँदी तथा रस्सी का साँप। इसे ‘अध्यात्म’ कहते हैं। इस अध्यात्म को ब्रह्म- चिन्तन अथवा ज्ञान-अध्यात्म द्वारा नष्ट कर दे और ब्रह्मशक्ति द्वारा चमत्कृत हो। ब्रह्म अवस्था को पुनः प्राप्त करने की चेष्टा कर। अपने सत्-चित्त आनन्द स्वरूप में रमण कर।

 अज्ञान के कारण ही दुख और क्लेश व्यापते हैं। अपनी वास्तविक प्रकृति को पहचान और अनुभव कर। वास्तव में अस्तित्व, ज्ञान और सुख सम्पूर्ण हैं। तू वास्तव में अमर है तथा सर्वव्यापक आत्मा है। उपनिषद् के इस उपदेश को स्मरण रख “जीव और ब्रह्म एक है” ओऽम् के रहस्य पर विचार कर और अपने स्वरूप में स्थित हो। केवल आत्म-ज्ञान द्वारा ही अज्ञान तथा तीनों क्लेशों का नाश किया जा सकता है। आत्म ज्ञान ही तुझे अमर गति, अनन्त सुख, चिरस्थायी शान्ति और सुख दे सकेगा।
  
तू वह अमर आत्मा है जो समय, स्थान और उत्पत्ति से भी परे है। तू इसमें तनिक भी संदेह न कर। समय, स्थान और उत्पत्ति मन की उपज है। वह केवल मन में ही रहते हैं। दूरदर्शिता को प्राप्त कर। ढूँढ़ने वाले को ढूँढ़, जानने वाले को जान, सुनने वाले को अनुभव कर। इन नामों और आकारों में जो एकता है उसको पहचान। उद्देश्य विषय से भिन्न नहीं है, तू सर्वदा ही विषय को समझता रहा है।

अज्ञान की इस दीर्घ निद्रा से जाग। जन्म-मरण तथा उसके साथ के पापों से मुक्ति प्राप्त कर। आकारों के भ्रम से छुटकारा पा ले। मोह, ममता, मेरा तथा अपनेपन का त्याग कर। अपने को सर्वव्यापक जाग्रति जान। आत्म-ज्ञान के साम्राज्य के सिंहासन पर आरुढ़ हो जा। यही तेरा सर्व प्रथम घर है-अनन्त प्रकाश तथा असीम घर का अमिट स्थान है।

 इस “मैं” को क्रूरता के साथ नष्ट कर दे। अगर “मैं” अदृश्य हो जाएगा तो तेरे लिए ‘वह’ और ‘तू’ अथवा ‘यह’ और ‘वह’ नहीं रहेंगे। यह एक अभूतपूर्व असाधारण एवं अवर्णनीय अनुभव होगा। तब तू संसार की अन्तिम सुन्दरता को पा लेगा। तू तब ‘जीवन मुक्त’ हो जाएगा- एक स्वतंत्र पुण्यात्मा हो जायेगा। इस ज्ञान को दूसरों के साथ बाँट कर उन्हें भी ऊपर उठा। सत्य का सूर्य बन कर प्रकाश को चारों ओर फैला। इस अमित आनन्द और शाश्वत शाँति को जन-जन में बाँट, तू अमर हो जायगा।

स्वामी शिवानन्द जी
अखण्ड ज्योति सितम्बर 1942 पृष्ठ 3

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भक्ति, ज्ञान और विज्ञान की साधना त्रिवेणी |  Bhakti Gyan Aur Vigyan Ki Sadhan Triveni

भक्ति, ज्ञान और विज्ञान की साधना त्रिवेणी | Bhakti Gyan Aur Vigyan Ki Sadhan Triveni

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एक दयालु राजा ने चिड़ियों को बहेलियों द्वारा हत्या किये जाने से बचाने के लिये घोषणा की कि जो पकड़ी हुई चिड़ियाँ लायेगा उसे पुरस्कार मिलेगा। जो चिड़ियाँ इस प्रकार लाई जातीं राजा उन्हें मुक्त करा देता। उसकी दयालुता का यश फैलने लगा। थोड़े ही दिनों में आम लोगों ने यह धंधा अपना लिया ये दिन भर चिड़ियाँ पकड़ते। राजा के पास ले जाते और इनाम लेकर लौटते। हजारों बहेलिये बन गये और राज्य कोष खाली हो चला।

मंत्री ने राजा को रोका और कहा-निष्ठुरों को उपहार देने के स्थान पर उन्हें दंड उपयुक्त रहेगा। राजा ने नीति बदल दी।
अखंड ज्योति जून 1995

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हमारी उपासना उस स्तर की हो जैसा की रामकृष्ण नामक पुजारी की थी जो काली की उपासना कर उनसे चर्चा कर उनके हाथों भोजन पाकर परमहंस पद को प्राप्त कर गया। हमारी लगन परमसत्ता के प्रति मीरा के स्तर की हो जो बिना कोई कर्मकाण्ड या मंत्र के श्रीकृष्ण की दीवानी बनकर उन्हीं में समाकर उनका प्रतिरूप बन गई।

यही तत्त्वज्ञान पूजा अवधि में अतः करण में से स्वयं ही उद्भूत होता रहे व लगता रहे कि महाप्रज्ञा-आद्यशक्ति अन्तरात्मा में बैठकर हमें अंतर्जगत् व ब्राह्मीसत्ता सत्यों और तथ्यों से अनायास ही परिचित करा रही है, तो उपासना सफल होती चली जाती है। ऐसी साधना से परमसत्ता का प्यार भरा यथार्थवादी शिक्षण अनायास ही अमृतपान की तरह उपलब्ध होता चला जाता है। यही साधना से सिद्धि का मूलभूत तत्त्वदर्शन है। इसी को समझकर इस क्षेत्र में उतरा जाना चाहिए।
अखंड ज्योति मई 1995

 

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गायत्री मंत्र का जाप किस परेशानी में कैसे करें | Kis Pareshani Me Kaise Karen Gayatri Mantra Ka Jap

गायत्री मंत्र का जाप किस परेशानी में कैसे करें | Kis Pareshani Me Kaise Karen Gayatri Mantra Ka Jap

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ज्योति कलश यात्रा का उद्देश्य | Jyoti Kalash Yatra Ka Uddsheya | Dr Chinmay Pandya

ज्योति कलश यात्रा का उद्देश्य | Jyoti Kalash Yatra Ka Uddsheya | Dr Chinmay Pandya

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मिले गुरु से अनुदान उदार, पिया जी भर कर माँ का प्यार। | Mile Guru Se Anudan Udar Piya Ji Bharkar

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शिवजी का बनूँ मै पुजारी मेरे भोले भंडारी, हर हर शम्भू | Shivratri Special Shiv Bhajan, Rishi Chintan

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हनुमान गायत्री मन्त्र | Hanuman Gayatri Mantra | निष्ठा-शक्ति,निष्ठावान्, विश्वासी, एवं निर्भय होना।

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सिद्धेश्वर महादेव रुद्राभिषेक | Siddheshwar Mahadev Rudrabhishek | Dev Sanskriti Vishwavidyalaya

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 गायत्री साधना की सफलता के लक्षण एवं संकेत | Gayatri Sadhna Ki Safalta Ke Lakshan Evm Sanket

गायत्री साधना की सफलता के लक्षण एवं संकेत | Gayatri Sadhna Ki Safalta Ke Lakshan Evm Sanket

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अमृतवाणी:- शांत नहीं, शूरवीर थे बुद्ध | Shant Nhi Shoorvir The Buddh पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य

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गायत्रीतीर्थ शांतिकुंज, नित्य दर्शन

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चरण पादुका
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सजल श्रद्धा - प्रखर प्रज्ञा (समाधि स्थल)
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प्रज्ञेश्वर महादेव - देव संस्कृति विश्वविद्यालय
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शिव मंदिर - शांतिकुंज
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हनुमान मंदिर - शांतिकुंज
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आज का सद्चिंतन (बोर्ड)

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आज का सद्वाक्य

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नित्य शांतिकुंज वीडियो दर्शन


!! शांतिकुंज दर्शन 02 August 2025 !! गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार !!

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अमृतवाणी: करुणा की शक्ति पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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परम् पूज्य गुरुदेव का अमृत संदेश



क्रौंच पक्षी को घायल देख कर के बाल्मीकि की आँखों में से आँसू टपकने लगे। उन्होंने देखा, एक प्रेमी अपने साथी के लिए किस तरीके से तड़प सकता है। तीर से लगा हुआ एक घायल तड़प सकता है, दूसरा दूसरे के दुख को देखकर तड़प सकता है। दोनों तड़प गए। तड़पन बिजली की तरह बाल्मीकि के कलेजे पर गिरी। कलेजे पर गिरी, वो भी रोया। उसी तरीके से रोया, जिस तरीके से वो रो रहे थे दोनों।
बस जिस क्षण आँखों में से आँसू बाल्मीकि में से आए, मित्रों आप सही मानना, उसी दिन से उसके मन में से काव्य की धारा बहने लगी और वो आदिकवि कहलाए। कौन? बाल्मीकि। बाल्मीकि का जो कवित्व, उसकी करुणा के रूप में फूटा। बाल्मीकि रामायण उसी के आधार पर लिखी गई। बाल्मीकि रामायण का अनुवाद अन्यान्य ग्रंथों में होता हुआ चला गया। तुलसीदास जी के रामचरितमानस में भी हुआ।
और बेटे, वो करुणा जिसमें राम-भरत का मिलाप से लेकर के जाने हम क्या-क्या देखते हैं। और हमारी रामायण पढ़ते-पढ़ते बीसों बार आँखों में से आँसू आ जाते हैं। यह आँसू कहाँ से आते हैं? ये बेटे, बाल्मीकि की आँखों के आँसू हैं। और ये क्रौंच पक्षी के आँखों के आँसू हैं, जो बाल्मीकि के हृदय में घुसते हुए चले गए। बेटे, यह करुणा है। करुणा है, दूसरों के दुखों को देख कर के आदमी इतना व्याकुल और विह्वल हो जाता है कि हमको इनकी सहायता करनी ही चाहिए और करनी ही पड़ेगी।
जटायु की बात। जटायु ने सीता जी को देखा। सीता जी को देखा, सीता जी को एक कसाई हत्यारा लिए जा रहा था। उसमें जटायु की आँखों में आँसू आ गए। मैं कैसे करूँ? यह बच्ची को मैं कैसे छुड़ा दूँ? मैं इस बच्ची की कैसे सहायता करूँ? मैं क्या करूँ? मैं कैसे करूँ? यह देख कर के जब तड़पा, कौन? जटायु। जटायु तड़पा। उसने कहा, मैं इसको शायद बचा न सकूँ, पर अपनी ज़िंदगी खत्म तो कर सकता हूँ।
जटायु दौड़ता हुआ चला गया और रावण से बोला, हम इस तरीके से नहीं करने देंगे तुझे। यह गलत बात है। यह गलत बात है, तो हमारी ताकत बड़ी है। हम तुझे मार कर फेंक सकते हैं। तो फेंक, मार कर फेंक सकता है, तो तलवार चलाई रावण ने। रावण ने तलवार चलाई। उसके पंख कट कर के जटायु के नीचे गिर पड़े। हार गया जटायु, बेशक मर गया जटायु, बेशक।
लेकिन बेटे, भगवान आए। भगवान ने उठा कर के उनको कलेजे से लगा लिया जटायु को और आँखों के आँसुओं से उसके घावों को धोया और छाती से लगा कर के यह कहा, "जटायु, मैं तुझे ज़िंदा कर दूँ तब और तेरा शरीर अच्छा कर दूँ।"
"नहीं महाराज जी, जो जीवन का सबसे बड़ा लाभ था वो मैंने पा लिया। अब मैं ज़िंदा रह कर के क्या करूँगा? इस बुढ़्ढे शरीर को ले कर के मैं क्या करूँगा? अब मुझे जीने की कोई हविश नहीं है।"

पं श्रीराम शर्मा आचार्य

 

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अखण्ड-ज्योति से



व्यावहारिक जीवन में शालीनता, सज्जनता, सुव्यवस्था, संयमशीलता आदि सत्प्रवृत्तियों का प्रतिष्ठापन और संवर्धन करने के उपरांत ही पूजा विधानों के सफल होने की आशा करनी चाहिए। गंदगी से सना बच्चा यदि माता की गोद में बैठने के लिए मचले, तो वह उसकी इच्छा पूरी नहीं करती, प्यारा लगते हुए भी उसके रोने की परवाह नहीं करती। पहला काम करती है- उसे धोना, नहलाना, गंदे कपड़े उतारकर नये स्वच्छ वस्त्र पहनाना। इतना कर चुकने के उपरांत वह उसे गोद में लेती, दुलार करती, खिलाती और दूध पिलाती है। बच्चों की उतावली सफल नहीं होती, माता की व्यवस्था बुद्धि ही कार्यान्वित होती है।

अध्यात्म क्षेत्र में इन दिनों एक भारी भ्रांति फैली हुई है कि पूजा परक कर्मकाण्डों के सहारे जादूगरों जैसे चमत्कारी प्रतिफल मिलने चाहिए। देवता को स्तवन पूजन के मनुहार, उपहार पर फुसलाया जाना चाहिए और उससे अपनी उचित-अनुचित मनोकामनाओं को पूरा कराया जाना चाहिए। यह स्थापना अनैतिक है, असंगत भी। यदि इतने सस्ते में मनोकामनाएँ पूरी होने लगे, तो सफलता के लिए कोई क्यों परिश्रम करेगा और क्यों पात्रता विकसित करेगा? फिर सभी उद्योग परायण व्यक्ति मूर्ख समझे जाएंगे और देवता की जेब काटकर उल्लू सीधा करने वाले चतुर।

 यह मान्यता यदि सही रही होती, तो देव पूजा में अधिकांश समय बिताने वाले पंडित, पुजारी, साधु, बाबाजी अब तक उच्चकोटि की उपलब्धियाँ प्राप्त कर सकने की स्थिति में पहुँच गये होते। जबकि उनमें से अधिकांश सामान्य जनों से भी गई गुजरी स्थिति में देखे जाते हैं। इसी प्रकार तंत्र-मंत्र के फेर में पड़े रहने वाले आतुर और भावुक व्यक्ति बड़ी-बड़ी आशा अभिलाषाएं संजोएँ रहते हैं। समय बीतता जाता है और सफलता के दर्शन नहीं होते, तो फिर वे निराश होने लगते हैं। प्रयास बंद कर देते हैं। अध्यात्म अवलम्बन का उलाहना देते हैं और लगभग नास्तिक स्तर के बन जाते हैं।

 यह दु:खद परिस्थिति इसलिए उत्पन्न होती है कि उन्होंने आत्म-विज्ञान का तत्त्वदर्शन समझने से पूर्व आतुरता वश मात्र कर्मकाण्ड आरंभ कर दिये और बालू के महल बनाने लगे। जबकि होना यह चाहिए था कि बीज से वृक्ष उत्पन्न होने के सिद्धांत के साथ जुड़े हुए अन्य तथ्यों को भी समझते और उन पर समुचित ध्यान देते। बीज से वृक्ष बनने की बात सच है। साधना से सिद्धि मिलने की भी, परन्तु आदि और अंत को अपना लेना एवं बीच का विस्तार उपेक्षित कर देना सही नीति नहीं है। बीज को ऊर्वर भूमि, खाद और पानी तीनों का सुयोग मिलना चाहिए, वह अंकुरित होगा, बढ़ेगा और फूलेगा-फलेगा।
                  
 इतना किये बिना बीज से वृक्ष बना देने की जादूगरी कोई बाजीगर ही कर सकता है, यह उसी का काम है। हथेली पर सरसों जमाना। किसान वैसा नहीं करते। जादूगर रुपये बरसाकर दर्शकों को चकित कर सकते हैं, पर व्यवसायी जानते हैं कि यदि ऐसा संभव रहा होता, तो यह बाजीगर करोडग़ति हो गये होते और किसी को परिश्रम करके व्यवसाय संलग्ïन रहने की आवश्यकता न पड़ती। चलने पर ही रास्ता पूरा होता है। आत्मिक प्रगति, जिसे कोई चाहे तो देव अनुग्रह भी कह सकता है, जीवन को परिष्कृत करने की प्राथमिक आवश्यकता को पूरा किए बिना पकड़ में नहीं आ सकती।

 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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