Friday 01, August 2025
गुरुदेव को उद्देश्य को आगें बढ़ाये Gurudev Ke Uddeshyon Ko Aage Badhaye आद डॉ. चिन्मय पण्ड्या जी
आत्मविश्वास की महती शक्ति सामर्थ्य | Aatmaviswas Ki Mahati Shakti Samarthya
शिकागो पहुँचे शांतिकुंज के प्रतिनिधि।
कनाडा में डॉ. चिन्मय पंड्या जी का भावपूर्ण स्वागत।
गायत्री साधना का अधिकार भाग - 02 Gayatri Sadhna Ka Adhikar Part 02 गायत्री मन्त्र के शब्दों का दिव्य सन्देश
जाने क्या हैं ज्योतिष विज्ञान : ज्योतिर्विज्ञान की अति महती भूमिका | आध्यात्मिक चिकित्सा
राजा को राजतंत्र की गरिमा का भान | Raja Ko Rajtantra Ki Garima Ka Bhan | Dr Chinmay Pandya
एक मजदूर बड़े परिश्रम से कुछ चावल कमाकर लाया था। उन्हें खुशी-खुशी सिर पर रखकर घर लिये जा रहा था। अचानक उस बोरी में छेद हो गया और धीरे-धीरे उसकी गैर जानकारी में वे चावल पीछे की ओर गिरते गये । यहाँ तक कि कुछ आगे जाने पर उसकी बोरी ही खाली हो गई। जब पीछे देखा तो उसे होश आया। फर्लांगों से धीरे-धीरे वह चावल फैल रहे थे और धूल में मिलकर दृष्टिï से ओझल हो गए थे। उसने एक हसरतभरी निगाह उन दानों पर डाली और कहा- काश! मैं इन दानों को फिर से पा सका होता। पर वे तो पूरी तरह धूल में गढ़ चुके थे, वे मिल नहीं सकते थे। बेचारा खाली हाथ घर लौटा, दिन भर का परिश्रम, चावलों का बिखर जाना, पेट की जलती हुई ज्वाला इन तीनों की स्मृति उसे बेचैन बनाये दे रही थी।
मारे जीवन का अमूल्य हार कितना सुन्दर है; हम इसे कितना प्यार करते हैं। माता खुद भूखी रहकर अपने नन्हे से बालक को मिठाई खरीदकर खिलाती है, बालक के मल मूत्रों में खुद पड़ी रहकर उसे सूखे बिछौने पर सुलाती है। वह बड़े से बड़ा नुकसान कर दे, एक कहुआ शब्द तक नहीं कहती।
हमारी आत्मा हमारे जीवन से इतना ही नहीं, बल्कि इससे भी अधिक प्यार करती है। जीवन सुखी बीते, उसे आनन्द और प्रसन्नता प्राप्त हो, इसके लिए आत्मा पाप भी करती है। खुद नरकों की यातना सहती है- खुद मलमूत्रों में पड़ी रहकर उसे सूखे बिछौन पर सुलाती है। यह प्यार माता के प्यार से किसी प्रकार कम नहीं है। जीवन को वह जितना प्यार करती हैं, उतना क्या कोई किसी को कर सकता है?
पर हाय! इसकी एक-एक मणि चुपके-चुपके मजदूर के चावलों की तरह बिखरती जा रही है। और हम मदहोश होकर मस्ती के गीत गाते हुए झूम-झूमकर आगे बढ़ते जा रहे हैं। जीवन-लड़ी के अनमोल मोती घड़ी, घंटे, दिन, सप्ताह, पक्ष, मास और वर्षों के रूप में धीरे-धीरे व्यतीत होते जा रहे हैं। एक ओर माता कहती है कि मेरा पूत बड़ा हो रहा है, दूसरी ओर मौत कहती है कि मेरा ग्रास निकट आ रहा है। बूँद-बूँद करके जीवन रस टपक रहा है और घड़ा खाली होता जा रहा है। कौन जानता है कि हमारी थैली में थोड़ा-बहुत कुछ बचा भी है! फिर भी क्या हम इस समस्या पर विचार करते हैं? कभी सोचते हैं कि समय क्या वस्तु है? उसका क्या मूल्य है? यदि हम नहीं सोचते और अपनी पीनक को ही स्वर्ग-सुख मानते हैं तो सचमुच बीते वर्ष को गँवाना और नवीन वर्ष का आना कोई विशेष महत्व नहीं रखता।
क्या आप कभी इस पर भी विचार करते हैं कि आपके जीवन का इतना बड़ा भाग, सर्वोत्तम अंश किस प्रकार बर्बाद हो गया? क्या इसे इसी प्रकार नष्टï करना चाहिए था? क्या आत्मा को इन्हीं कर्मों की पूर्ति के लिये ईश्वर ने भेजा था, जिन को अब तक तुमने पूरा किया है? याद रखना, वह दिन दूर नहीं है जब तुम्हें यही प्रश्र शूल की तरह दुख देंगे।
जब जीवन रस की अन्तिम बूँद टपक जायेगी और तुम मृत्यु के कंधे पर लटक रहे होगे, तब तुम्हारी तेज निगाह बुढ़ापा, अधेड़ावस्था, यौवन, किशोरावस्था, बचपन और गर्भावस्था तक दौड़ेगी। अपने अमूल्य हार की एक-एक मणि धूलि में लोटती हुई दिखाई देगी। तब अपनी मदहोशी पर तिलमिला उठोगे।। आज तो समय काटने के लिये ताश या फलाश खेलने की तरकीब सोचनी पड़ती है। पर परसों पछतायेगा इन अमूल्य क्षणों के लिए! और शिर धुन-धुनकर रोयेगा अपने इस पाजीपन पर।
पं. श्रीराम शर्मा आचार्य
अमृतवाणी:- अहिंसा के योद्धा बुद्ध | Ahinsa Ke Yodha Buddh पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य
ध्यान:- भावना प्रेम का ध्यान | Bhavna Prem Ka Dhyan | Shraddhey Dr. Pranav Pandya, Rishi Chintan
गायत्रीतीर्थ शांतिकुंज, नित्य दर्शन
आज का सद्चिंतन (बोर्ड)
आज का सद्वाक्य
नित्य शांतिकुंज वीडियो दर्शन
!! शांतिकुंज दर्शन 01 August 2025 !! गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार !!
अमृतवाणी: संत एकनाथ और गधे की कथा पं श्रीराम शर्मा आचार्य
परम् पूज्य गुरुदेव का अमृत संदेश
संत एकनाथ कंधे पर काँवड़ पे रख करके, वो ले जा रहे थे गंगाजल रामेश्वरम् पर चढ़ाने के लिए।
रास्ते में एक गधा मिला, जो अपने प्राण त्याग रहा था प्यास की वजह से, प्यास की वजह से।
संत एकनाथ ने यह मुनासिब समझा — एक के प्राण की रक्षा होती हो, वो ज़्यादा अच्छी है।
देवता प्रसन्न होते हों तो क्या हर्ज है, बैकुंठ न मिलता हो तो क्या हर्ज की बात है।
उन्होंने गंगाजल उतारा।
उस गधे को, जिस गधे के स्थान पर कहीं पानी नहीं मिल रहा था, एक घड़ा उनके गंगाजल के बाहर रखा हुआ था, उतार के गधे के मुँह में डाल दिया।
गधे ने लंबी साँस खींची और यह कहा — "भाई साहब, एक और अगर घड़ा मिल जाता पानी, तो शायद हम इस लायक हो जाते कि जंगल में से निकल जाते।"
संत एकनाथ ने दूसरा वाला घड़ा, जो रामेश्वरम् पर चढ़ाने के लिए सुरक्षित रखा था, उसको उठाया और गधे के मुँह में डाल दिया।
दोनों गंगाजल के घड़े पीकर के, गधा खड़ा हो गया और हँसने लगा और यह कहने लगा — "आओ संत एकनाथ, हम और आप छाती से छाती मिलाकर के मिलें।"
उन्होंने कहा — "चल, चल। गधे के साथ में क्यों मिलूँगा छाती मिलाकर के? मैं गधा थोड़े ही हूँ!"
"तो कौन हैं आप?"
"हम तो रामेश्वरम् हैं।"
"यहाँ कैसे पड़े हुए थे?"
"हम यह तलाश करने के लिए पड़े हुए थे — किसी के दिल भी है क्या?
हृदय भी है क्या?
हृदय, हृदय मीन्स करुणा।
करुणा भी किसी के अंदर है क्या?
दर्द भी किसी के अंदर होता है क्या?
संवेदनाएँ भी किसी के अंदर रहती हैं क्या?
दूसरों की सहानुभूति रखने वाले भी दुनिया में कहीं रहते हैं क्या?"
"हम यह देखने गए थे।
संत का लिबास पहने हुए ढेरों आदमी घूमते थे, और हमने वो आदमी, करुणा से ओतप्रोत, देखा नहीं।
हम यह देखने के लिए गए थे कि, है तो हम रामेश्वरम् पर — संत का कहीं हमको साक्षात्कार मिल जाए, संत का दर्शन मिल जाए, तो हमारी आँखें धन्य हो जाएँ।
हमने आपको देख लिया — संत के रूप में, आपकी भरी हुई हृदय की करुणा को देख कर के।
और आप संत हैं।
आइए, आपको छाती से लगाएँ — संत हैं।"
यह संत एकनाथ ने गधे को छाती से लगाया और यह कहा —
"हमने भी, हमने भी भगवान को पा लिया।
पीड़ित के रूप में, पतित के रूप में।
पतित और पीड़ा — दोनों हाथ भगवान पसारे हुए बैठे हैं।
पीड़ा पुकारती है — 'हम पीड़ा हैं, आप कुछ मदद कर सकते हो तो हमारी कीजिए।'
और पतित पुकारता है — 'आप हमारी मदद कर सकते हो तो ऊँचा उठा दीजिए।'
पीड़ा और पतन, पीड़ा और पतन, पीड़ा और पतन — यह बेटे, भगवान के दो हाथ हैं।
जो यह माँगते हैं कि आप कुछ हमको दें, तो फिर हम आपको दें।
संत एकनाथ ने कहा —
"हमने आपको पीड़ित के रूप में, दुखियारे के रूप में, पतित के रूप में पा लिया, और हम आपको छाती से लगाते हैं।"
उन्होंने कहा —
"आपको हमने सहृदय के रूप में, सज्जन के रूप में पा लिया, और हम छाती से लगाते हैं।"
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड-ज्योति से
सच यही है कि सारा अस्तित्व एक है और हममें से कोई उस अस्तित्व से अलग-थलग नहीं है। हम कोई द्वीप नहीं है, हमारी सीमाएँ काम चलाऊ हैं। हम किन्हीं भी सीमाओं पर समाप्त नहीं होते। सच कहेें, तो कोई दूसरा है ही नहीं, तो फिर दूसरे के साथ जो घट रहा है, वह समझो अपने ही साथ घट रहा है। भगवान् महावीर, भगवान् बुद्ध अथवा महर्षि पतंञ्जलि ने जो अङ्क्षहसा की महिमा गायी, उसके पीछे भी यही अद्वैत दर्शन है। इसका मतलब इतना ही है कि शिष्य होते हुए भी यदि तुम किसी को चोट पहुँचा रहे हो, या दु:ख पहुँचा रहे हो अथवा मार रहे हो, तो दरअसल तुम गुरुघात या आत्मघात ही कर रहे हो, क्योंकि गुरुवर की चेतना में तुम्हारी अपनी चेतना के साथ समस्त प्राणियों की चेतना समाहित है।
ध्यान रहे जब एक छोटा सा विचार हमारे भीतर पैदा होता है, तो सारा अस्तित्व उसे सुनता है। थोड़ा सा भाव भी हमारे हृदय में उठता है, तो सारे अस्तित्व में उसकी झंकार सुनी जाती है। और ऐसा नहीं कि आज ही अनन्त काल तक यह झंकार सुनी जायेगी। हमारा नामोनिशाँ भले ही न रहे। लेकिन हमने जो कभी चाहा, किया, सोच, भावना बनायी थी, वह सब इस अस्तित्व में गूँजती रहेगी। क्योंकि हममें से कोई यहाँ से भले ही मिट जाये, लेकिन कहीं और प्रकट हो जायेगा।
जो लहर मिट गयी है, उसका जल भी उस सागर में शेष रहता है। यह ठीक है कि एक लहर उठ रही है, दूसरी लहर गिर रही है, फिर लहरें एक हैं, भीतर नीचे जुड़ी हुई हैं और जिस जल से उठ रही हैं यह लहर, उसी जल से गिरने वाली लहर वापस लौट रही है। इन दोनों के नीचे के तल में कोई फासला नहीं हैं। यह एक ही सागर का खेल है। हम सब भी लहरों से ज्यादा नहीं है। इस जगत्ï में सभी कुछ लहरवत् हैं।
परमेश्वर से एक हो चुके चेतना महासागर की भाँति है। सारा अस्तित्व उनमें समाहित है। हमारे प्रत्येक कर्म, भाव एवं विचार उन्हीं की ओर जाते हैं, वे भले ही किसी के लिए भी न किये जाये। इसलिए जब हम किसी को चोट पहुँचाते हैं, दु:ख पहुँचाते हैं, तो हम किसी और को नहीं, सद्गुरु को चोट पहुँचाते हैं, उन्हीं को दु:खी करते हैं। श्रीरामकृष्ण परमहंस के एक शिष्य ने बैल को चोट पहुँचायी। बाद में वह दक्षिणेश्वर आकर परमहंस देव की सेवा करने लगा। सेवा करते समय उसने देखा कि ठाकुर की पाँव पर उस चोट के निशान थे। पूछने पर उन्होंने बताया, अरे! तू चोट के बारे क्या पूछता है, यह चोट तो तूने ही मुझे दी है। सत्य सुनकर उसका अन्त:करण पीड़ा से भर गया।
क्या हम सचमुच ही अपने भगवान से प्रेम से करते हैं एवं उनमें भक्ति है? यदि हाँ तो फिर हमारे अन्त:करण को सभी के प्रति प्रेम से भरा हुआ होना चाहिए। हमें किसी को भी चोट पहुँचाने का अधिकार नहीं है। क्योंकि सभी में भगवान ही समाये हैं। सभी स्थानों पर उन्हीं की चेतना व्याप्त है। इसलिए हमारे अपने मन में किसी के प्रति कोई भी द्वेष, दुर्भाव नहीं होना चाहिए। क्योंकि इस जगत् में ईश्वर, खुदा से अलग कुछ भी नहीं है। उन्हीं के चैतन्य के सभी हिस्से हैं। उन्हीं की चेतना के महासागर की लहरें हैं। इसलिए लोगों को सर्वदा ही श्रेष्ठ चिंतन, श्रेष्ठ भावना एवं श्रेष्ठ कर्मों के द्वारा उनका अर्चन करते रहना चाहिए।
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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