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Thursday 31, July 2025

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अमृतवाणी:- विचार और कर्म का समन्वय ही सच्चा प्रभाव है | Vichar Aur Karm ka Samanvya Hi  Saccha Prabhav पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य

अमृतवाणी:- विचार और कर्म का समन्वय ही सच्चा प्रभाव है | Vichar Aur Karm ka Samanvya Hi Saccha Prabhav पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य

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सद्गुरू को तत्त्व से जान लेने का मर्म | Sadhguru Ko Tatva Se Jaan Lene Ka Marm | Guru Gita

सद्गुरू को तत्त्व से जान लेने का मर्म | Sadhguru Ko Tatva Se Jaan Lene Ka Marm | Guru Gita

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गायत्रीतीर्थ शांतिकुंज, नित्य दर्शन

गायत्री माता
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गायत्री माता - अखंड दीपक
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चरण पादुका
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चरण पादुका
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सजल श्रद्धा - प्रखर प्रज्ञा (समाधि स्थल)
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परम् पूज्य गुरुदेव व वंदनीय माताजी कक्ष
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परम् पूज्य गुरुदेव व वंदनीय माताजी कक्ष
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प्रज्ञेश्वर महादेव - देव संस्कृति विश्वविद्यालय
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शिव मंदिर - शांतिकुंज
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हनुमान मंदिर - शांतिकुंज
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आज का सद्चिंतन (बोर्ड)

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आज का सद्वाक्य

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नित्य शांतिकुंज वीडियो दर्शन


!! शांतिकुंज दर्शन 31 July 2025 !! गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार !!

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!! अखण्ड दीपक Akhand_Deepak (1926 से प्रज्ज्वलित) चरण पादुका गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार 31 July 2025

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!! परम पूज्य गुरुदेव का कक्ष 31 July 2025 गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार !!

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अमृतवाणी: यज्ञ और दान की महत्ता पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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परम् पूज्य गुरुदेव का अमृत संदेश



हम आपको प्रातःकाल जो ध्यान कराते हैं, उसमें यह बताते हैं कि विज्ञानमय कोश कहाँ हो सकता है।
बेटे, हृदय से हमने उपमा दी है।
हृदय चक्र, ब्रह्म चक्र को हमने विज्ञानमय कोश का आधार केंद्र बताया है।
और उसमें से, जब हम आपको अंतिम में ध्यान कराते हैं, तो हम आपको यह कहते हैं — इसका हृदय का जागृत, सज्जनता जागृत।
यह क्या है?
यह भी बेटे, आदमी की योगाभ्यास है और यह भी तपश्चर्या है।
इसका हृदय का होना, हृदयवान होना।
हृदयवान का होना मानें — हृदयवान का होने से मतलब यह है कि आप दूसरों के दुखों को, दूसरों के कष्टों को देखकर कि जब आपकी आँखों में आँसू आ जाते हैं, तो बेटे मैं आपको हृदयवान कहता हूँ।
और दूसरों को सुखी बनाने में आपको उतनी खुशी होती है, जितनी कि स्वयं को खुशी देने में।
जितना आपको उत्साह आता है, उतना ही उत्साह अगर आपको आता है, तो मैं आपको सहृदय व्यक्ति कहता हूँ।
सहृदय व्यक्ति।
सहृदय व्यक्ति को क्या मिल सकता है बेटे?
सहृदय व्यक्ति को क्या मिल सकता है?
तू जैसी चाहे, वैसी मैं कथा बता दूँ तुझे।
कहे तो मैं पुराणों की कथा बता दूँ, और कहे तो अभी की बता दूँ — इतिहास की बता दूँ।
पुराणों पर तेरा विश्वास है?
हाँ महाराज जी, थोड़ा-थोड़ा तो है।
तो चल, मैं तुझे इतिहास बताता हूँ।
एक नेवला था।
नेवला था, जिसका आधा हिस्सा सोने का हो गया था।
और आधा हिस्सा सोने का कराने के लिए यज्ञ, यज्ञों में मारा-मारा फिरता था।
एक यज्ञ में मेरा आधा हिस्सा सोने का हो गया।
एक और यज्ञ हो जाए कहीं, तो मेरा बाकी हिस्सा भी सोने का हो जाए, सोने का हो जाए।
पांडवों का यज्ञ कराया था श्रीकृष्ण वाला।
वहाँ भी वो नेवला गया।
रोने लगा — "हमारा, हमारा इस यज्ञ के पानी से भी शरीर नहीं होता।
पहला यज्ञ जैसा मुकाबला दुनिया में कहीं होता ही नहीं है।"
लोगों ने उसको बुलाया और यह पूछा —
"अरे नेवले, कौन सा यज्ञ था जो पांडवों के यज्ञ से भी बड़ा हुआ है?"
उन्होंने कहा — "एक यज्ञ।"
उसका किस्सा बताया।
उसने कहा — "एक ब्राह्मण था।
सात दिन तक, सात दिन तक कोशिश करने के बाद में, उसको अकाल के दिनों में बड़ी मुश्किल से चार रोटी का अनाज कमा कर के लाया।
चार रोटी का अनाज कमा कर के लाया और चार रोटी से उसने चार-चार हिस्से बना करके चार रोटियाँ — एक अपनी थाली में, एक अपनी बीवी की थाली में, एक बच्चे की थाली में, एक कन्या की थाली में — चारों में रख दी।"
उनने कहा — "सात दिन बाद एक रोटी मिली है।"
उसको एक ख्याल आया।
यह ख्याल आया कि — "हमसे भी ज़्यादा कोई दुखी तो नहीं है?
हमसे भी ज़्यादा भूखा तो नहीं है?
कोई ऐसा आदमी तो नहीं है जिसका प्राण निकल जाए इस अनाज के बिना?"
"इसलिए हम तो अभी-अभी, केवल सात दिन से मिला है।
हम तो और भी ज़िंदा रह सकते हैं।
जिसका प्राण निकल रहा होगा, उसका हक पहले है।" 


 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

 

 

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अखण्ड-ज्योति से



आध्यात्मिकता का अर्थ है उस चेतना पर विश्वास करना, जो प्राणधारियों को एक दूसरे के साथ जोड़ती है, सुख-संवर्धन और दु:ख-निवारण की स्वाभाविक आकांक्षा को अपने शरीर या परिवार तक सीमित न रख कर अधिकाधिक व्यापक बनाती है। अध्यात्म का सीधा अर्थ आत्मीयता के विस्तार के रूप में किया जा सकता है। ‘प्रेम ही परमेश्वर है’ का सिद्धान्त यहाँ अक्षरश: लागू होता है। अन्तरात्मा की सघन पिपासा, प्रेम का अमृत पान करने की होती है। इसी लोभ में उसे निरन्तर भटकना पड़ता है। छल का व्यापार प्रेम, विश्वास के सहारे ही चलता है। वासना के आकर्षण में प्रेम की संभावना ही उन्माद पैदा करती है। यह तो कृत्रिम और छद्मप्रेम की बात हुई, उसकी यथार्थता इतनी मार्मिक होती है कि प्रेम देने वाला और प्रेम पाने वाला दोनों ही धन्य हो जाते हैं।

दार्शनिक विवेचना में इस भक्तिमार्गी आस्तिकता के लिए कोई स्थान नहीं है। वेदान्त ने आत्मा के परिष्कृत स्तर को ही परमात्मा माना है और उत्कृष्टता से भरापूरा अन्त:करण ही ब्रह्मलोक है। अपनी महानता पर विश्वास और तदनुरूप श्रेष्ठ आचरण का अवलम्बन, यही है सच्ची आस्तिकता। इसी के परिपोषण में साधना और उपासना का विशालकाय ढाँचा खड़ा किया जाता है।

अनेकता में समाविष्ट एकता की झाँकी कर सकना ही ईश्वर दर्शन है। सृष्टि का प्रत्येेक सजीव और निर्जीव घटक एक-दूसरे से प्रभावित ही नहीं होता, वरन् परस्पर पूरक और अभिन्न भी है। एक की संवेदना दूसरे को प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप में प्रभावित किये बिना नहीं रह सकती, इसलिए अमुक व्यक्तित्वों की सुख-सुविधा को ध्यान में न रखते हुए समस्त विश्व का हित साधन करने की दृष्टि रखकर ही जीवन की कोई  रीति-नीति निर्धारित की जाय, यह दृष्टि तत्त्व दर्शन का प्रत्यक्ष प्रतिफल  है। जब यह स्वत: सिद्ध सत्य चेतना के गहन मर्मस्थल तक प्रवेश कर जाए और निरन्तर इसी स्तर की अनुभूति होने लगे तो समझना चाहिए कि अध्यात्म और जीवन का समन्वय हो चला।

 पूजा की इतिश्री अमुक कर्मकाण्डों की पूर्ति के साथ ही हो जाती है; किन्तु आध्यात्मिकता व्यक्ति के अन्तरङ्गï और बहिरङ्ग जीवन में व्यावहारिक हेर-फेर करने के लिए विवश करती है। आत्मसुधार, आत्म निर्माण के क्रम में अन्तरङ्ग की आस्थाओं, मान्यताओं, आकांक्षाओं और अभिरुचियों में महत्वपूर्ण परिवर्तन  होता है। आत्मसंयम, इंद्रिय निग्रह, मर्यादा-पालन, सादगी, सज्जनता, नम्रता, चरित्र गठन, कर्त्तव्य-पालन, धैर्य, साहस, संतुलन जैसी अनेक सत्प्रवृत्तियाँ अन्तरङ्ग आध्यात्मिकता के वृक्ष पर फल-फूलों की तरह अनायास ही लदने लगती हैं। ऐसे व्यक्ति को महामानव स्तर के उत्कृष्ट व्यक्तित्व से सुसम्पन्न देखा जा सकता है।
                  

बहिरङ्ग जीवन में आध्यात्मिकता की प्रतिक्रिया श्रमशीलता, स्वच्छता, सुव्यवस्था, सद्व्यवहार, ईमानदारी, शालीनता, न्यायनिष्ठा, जनसेवा, उदारता जैसे आचरणों में प्रकट होती है। ऐसे लोगों को समाजनिष्ठ, कर्तव्यनिष्ठ एवं धर्मनिष्ठ कहा जा सकता है। मर्यादाओं का उल्लंघन वे करते नहीं, साथ ही अनीति को सहन भी नहीं करते। अवांछनीयता के विरुद्ध उनका संघर्ष अनवरत रूप से चलता रहता है। न वे किसी से अनावश्यक मोह बढ़ाते  हैं और न किसी को स्नेह-सद्भाव से वंचित करते हैं।

आध्यात्मिकता को प्राचीन भाषा में ब्रह्मïविद्या कहते हैं। यह उत्कृष्ट चिन्तन और आदर्श कर्तव्य की एक परिष्कृत जीवन पद्धति है, जिसे अपनाने पर भीतर सन्तोष और बाहर सम्मान की वे उपलब्धियाँ प्राप्त होती हैं, जिन पर कुबेेर और इन्द्र जितने वैभव को निछावर किया जा सके। व्यक्तित्व की पूर्णता और प्रखरता का सारा आधार आध्यात्मिकता पर  ही अवलम्बित माना जा सकता है।

 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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