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Wednesday 30, July 2025

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किसी भी कार्य में सफलता पाने के लिए जो मंजिल तय करनी पड़ती है, उसे साधना कहा जाता है। इस साधना में यदि विघ्र-बाधाएँ उपस्थित हो जायें, तो प्राय: मंजिल बीच में ही अधूरी छूट जाती है। जीवन का भौतिक पहलू हो या आध्यात्मिक, कोई भी निरापद नहीं है। सांसारिक कार्यों में सफलता पाने के इच्छुक व्यक्ति मार्ग में पडऩे वाली आर्थिक, तकनीकी, प्रतिस्पद्र्धात्मक आदि बाधाओं से छुटकारा पाने का मार्ग भी पहले से ही निर्धारित कर लेते हैं अथवा उनका सामना करने के लिए कमर कसकर तैयार हो जाते हैं।

अध्यात्म मार्ग में भी कम विघ्र बाधाएँ नहीं होती हैं। आध्यात्मिक एवं सांसारिक उपलब्धियों की बाधाओं में अंतर मात्र इतना ही है कि भौतिक प्रगति के मार्ग में बाह्य विघ्र बाधाएँ अधिक होती हैं, जबकि आत्मिकी क्षेत्र में मनुष्य की स्व उपार्जित विघ्र बाधाएँ ही प्रधान होती है। आत्मिक मार्ग के प्रत्येक पथिक को महान् कार्यों, ईश्वर प्राप्ति आदि के मार्ग में आने वाली प्रमुख बाधाओं से परिचित होना आवश्यक है।

साधक यदि बीमार रहता हो, तो उसके लिए नियमित रूप से साधना, उपासना, स्वाध्याय, सत्संग का लाभ उठा पाना कठिन होता है। तामसी एवं असंयम पूर्ण भोजन से चित्त में चंचलता तथा दोष पूर्ण विचार उत्पन्न होते हैं, जिससे चिंतन विकृत होता चला जाता है। इसीलिए साधना काल में साधक को सात्विक, पौष्टिक तथा प्राकृतिक रसों से परिपूर्ण सादा आहार ही ग्रहण करना चाहिए। बड़े और महान्ï कार्य समय एवं श्रम साध्य होते हैं। इसमें शंका-आशंका करने वालों को सफलता नहीं मिलती। इसके लिए दृढ़ विश्वासी, संकल्प के धनी व्यक्ति ही सफल हो पाते हैं।

बार-बार संदेह किसी भी कार्य को असफल ही करता है। गुरु बनाते समय यह ध्यान रखना चाहिए कि वह उस विषय विशेष का पूर्ण ज्ञाता हो। अनभिज्ञ, अल्पज्ञ व्यक्ति को अपना गुरु या मार्गदर्शक बनाना अनुचित है। सच्चे साधक को प्रसिद्धि के विपरीत ठोस कार्यों द्वारा साधना को महत्त्व देना चाहिए। पूर्ण सफलता मिल जाने पर यश छाया के रूप में पीछे-पीछे दौडऩे लगता है। किसी भी कार्य को ठीक एक ही समय पर नियमपूर्वक करते रहने से उस कार्य की आदत बन जाती है।

 नियमितता के अभाव में कोई भी साधना सफल नहीं होती। कुतर्कों को त्याग कर साधक को आत्मा की आवाज सुनना और उसका अनुसरण करना चाहिए, क्योंकि सामाजिक रीति-रिवाज, मर्यादा, धर्म, ईश्वर, अस्तित्व यह सब विषय ऐसे हैं, जिन्हें तर्क द्वारा हल नहीं किया जा सकता। आलस्य एक भयंकर बीमारी के समान है। आलस्य के वशीभूत होकर मनुष्य अपनी कार्य कुशलता को ही खो डालता है। आलस्यवश कार्य न करना, तो पतन पराभव का कारण ही बनता है।

अध्यात्म मार्ग के पथिक को बुरे कर्म, बुरे विचारों वाले लोगों से दूर ही रहना चाहिए, अन्यथा किसी न किसी रूप में उसके विचार आप पर प्रभावी हो ही जाएँगे। दूसरों के दोषों को देखने में अपनी शक्ति खर्च न करें, आपके अंत:करण में लगी अचेतन की फिल्म भी दूसरों के दुर्गुणों को अपने अंदर आत्मसात कर लेती है। हम सभी सत्य की खोज में दौड़ रहे हैं। कोई भी पूर्ण सत्य को प्राप्त नहीं कर सका। यह मानकर दूसरों के धर्म, उनकी मान्यताओं के प्रति उदार दृष्टिकोण अपनाएँ। कट्टरता की संकीर्णता साधना मार्ग का सबसे बड़ा अवगुण है।

पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

 

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सदगुरुदेव वचनामृत

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अपने सौभाग्य को सराहते रहें | Apne Saubhagya Ko Sarahate Rahe

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उसे अवश्य पा लोगे | Use Avashya Pa Loge | ऋषि चिंतन के सानिध्य में

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तत्वों की न्यूनाधिकता से रोगोत्पत्ति : स्वस्थ जीवन का रहस्य | गायत्री मन्त्र के 24 अक्षर

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काम में असफलता से बचने के 9 तरीके | अमृतवाणी:- व्यावहारिक अध्यात्मवाद : भाग 1

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नित्य शांतिकुंज का ध्यान कैसे करे | Nitya Shantikunj Ka Dhayan | Shantikunj Visit |

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Om Chanting Meditation 108 Times | Gurudev Pt Shriram Sharma Acharya, Rishi Chintan

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गुरुदेव के कार्य को कैसे और किस भाव से करें | Gurudev Ke Karya Ko Kaise Kare | Dr Chinmay Pandya

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Man Ki Granthi Kaise Khole | Shraddheya Dr Pranav Pandya

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आप हमारे माइक बन जाईये । Aap Hamare Mike Ban Jayiye । Pt. Shriram Sharma Acharya

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अमृतवाणी:- ज्ञान और दंड धर्म स्थापना के दो स्तम्भ | Gyan Aur Dand Dharm Sthapna Ke Do Stambh पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य

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गायत्रीतीर्थ शांतिकुंज, नित्य दर्शन

गायत्री माता
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गायत्री माता - अखंड दीपक
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चरण पादुका
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चरण पादुका
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सजल श्रद्धा - प्रखर प्रज्ञा (समाधि स्थल)
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प्रज्ञेश्वर महादेव - देव संस्कृति विश्वविद्यालय
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शिव मंदिर - शांतिकुंज
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हनुमान मंदिर - शांतिकुंज
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आज का सद्चिंतन (बोर्ड)

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आज का सद्वाक्य

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नित्य शांतिकुंज वीडियो दर्शन


!! शांतिकुंज दर्शन 30 July 2025 !! गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार !!

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अमृतवाणी: गुणों के रूप में भगवान की उपासना पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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परम् पूज्य गुरुदेव का अमृत संदेश



भगवान कहाँ है, बताइए ज़रा?
भगवान वहाँ मंदिर में बैठा हुआ है?
तब मंदिर में एक खिलौना रखा है, छोटा सा हिस्सा तो है, सारा का सारा पहाड़ तो नहीं है।
नहीं साहब, छोटा सा हिस्सा है।
तो बेटे, बस मान लिया तैने।
छोटे में ही भगवान को मान सकता है।
श्री कृष्ण जी भगवान हैं?
हाँ, कृष्ण जी तो कोई एक इंसान ही तो है।
ऐसी शक्ल वाले तो लाखों करोड़ों आदमी होंगे।
हाँ महाराज जी, होंगे तो सही, उन्हीं में से तो एक है।
हाँ, तो फिर मैं तुझसे कहता हूँ — गुणों में से, गुणों के रूप में भगवान को मानने में तुझे क्या आपत्ति है?
शक्ल के रूप में मान सकता है, नाम के रूप में मान सकता है, रूप के रूप में मान सकता है — तो गुणों के रूप में मानने में क्या आफत है तेरे ऊपर?
उसके रूप में मान बेटे।
हम अपने शरीर में सत्कर्मों के रूप में भगवान को मान सकते हैं, और सत्कर्मों को जीवन में धारण करते हुए हम भगवान की पूजा का आनंद ले सकते हैं, और भगवान की पूजा से जो हमको वरदान मिलने चाहिए, उसको प्रत्यक्ष पा सकते हैं।
विचारों के रूप में, सद्ज्ञान के रूप में हम भगवान को पा सकते हैं।
सत्साहस के रूप में हम इसको पा सकते हैं।
इन गुणों को जितना ज्यादा हम भीतर धारण करते हैं और उसके लिए हम जितनी कोशिश करते हैं — बेटे, वो सारी की सारी भगवान की उपासना में से कम में नहीं है, देवता की उपासना में से कम में नहीं है, योगाभ्यास से कम में नहीं है, तपश्चर्या से कम नहीं है।
अपने आप का संशोधन कर लेना, और अपने आप के गुणों का परिष्कार कर लेना — अगर आप यह करते होंगे, तो मैं कहूँगा आपसे कि आप प्रत्यक्ष भगवान की पूजा करते हैं।
और आपको प्रत्यक्ष परिणाम मिलने चाहिए भगवान की पूजा के।
परोक्ष परिणाम भी हो सकते हैं, लेकिन मैं तो प्रत्यक्ष उपासना की बात कहता हूँ, प्रत्यक्ष भगवान की बात कहता हूँ, और प्रत्यक्ष मंत्र की बात कहता हूँ।
और मैं यह कहता हूँ — आप प्रत्यक्ष का परिणाम प्रत्यक्ष में पाइए।
प्रत्यक्ष में देखिए।
प्रत्यक्ष का परिणाम प्रत्यक्ष में देखिए।
भगवान की दुनिया में कायदा काम कर रहा है, कानून काम कर रही है, एक नियम काम कर रहे हैं, एक मर्यादा काम कर रही है।
आप समझते क्यों नहीं हैं?
यहाँ अंधेर नगरी थोड़े ही है।
यहाँ तो एक क्रम है और यहाँ एक कायदा है।
कायदा क्रम की ओर अगर आप चलेंगे, तो आप पाएँगे कि हम उन्नतिशील होते चले जाते हैं।
फिर आपकी उन्नति को दुनिया के परदे पर कोई रोक नहीं सकता।
और अगर आप अपने आप को परिष्कृत कर नहीं रहे हैं, और आप अपने आप को संशोधित कर नहीं रहे हैं — तो बेटे, सारी दुनिया की सारी मदद आपके लिए बेकार साबित हो जाएगी।
और आप उल्टे मुँह गिरेंगे।
और आप रोएँगे।
और आप पछताएँगे।
इसलिए मैं यह कह रहा था — आप में से हर एक आदमी को, जो हमारे अन्नमय कोश, मनोमय कोश और प्राणमय कोश — यह तीन देवता, इन देवताओं को अगर भौतिक सिद्धियों की आवश्यकता हो, आप इन तीनों का पूजन करना शुरू करें, और तीनों को अपने स्वभाव का, गुण का, कर्म का हिस्सा बनाने का प्रयत्न करें।

पं श्रीराम शर्मा आचार्य

 

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अखण्ड-ज्योति से



एक प्रसिद्ध चित्रकार के जीवन की एक घटना हैं। उसके पास एक धनी कलाप्रेमी चित्र खरीदने आया। उसने एक चित्र को देखकर उसका दाम पूछा। चित्रकार ने उसकी कीमत 50 गिन्नी बताई। कला प्रेमी ने छोटे से चित्र की अधिक कीमत पर आश्चर्य जताया। इस पर कलाकार ने कहा- पूरे तीन साल निरंतर परिश्रम करने के बाद मैं इस योग्य बना हूं कि ऐसे चित्र को चार दिनों में बना सकता हूँ। इसके पीछे मेरा वर्षों का अनुभव, साधना और योग्यता छिपी हुई है। कला प्रेमी उत्तर से संतुष्ट हुआ और उसने चित्र खरीद लिया। यदि चित्रकार अपनी कला का मूल्य कम लगाता तो निश्चय ही उसे कम मूल्य मिलता, पर उसके आत्म विश्वास और कला साधना की जीत हुई।

 चित्रकार ने अपने को जितना मूल्यवान समझा, संसार ने उतना ही महत्व स्वीकार किया। हमें उतना ही सम्मान, यश, प्रतिष्ठा प्राप्त होती है, जितना हम स्वयं अपने व्यक्तित्व का लगाते हैं। शांत चित्त से कभी-कभी अपने चरित्र की अच्छाइयों, श्रेष्ठताओं और उत्तम गुणों पर विचार करें। आप जितनी देर तक अपनी अच्छाइयों पर मन एकाग्र करेंगे, उतना वे आपके चरित्र में विकसित होंगी। बुराइयों को त्यागने का अमोघ उपाय यह है कि हम एकान्त में अपने चरित्र, स्वभाव और श्रेष्ठ गुणों का चिन्तन करें और इससे दिव्यताओं की अभिवृद्धि करते रहें।

 मनुष्य के मन में ऐसी अद्भूत गुप्त चमत्कारी शक्तियां दबी पड़ी रहती हैं कि वह जिन गुणों का चिन्तन करता है, गुप्त रूप से वे दिव्य गुण उसके चरित्र में बढ़ते-पनपते रहते हैं। आत्म निरीक्षण के माध्यम से आप अपने दैवीय विशिष्ट गुण को बखूबी मालूम कर सकते हैं अथवा किसी योग्य चिकित्सक की सहायता ले सकते हैं। अब्राहम लिंकन की उन्नति का गुर यही था। उसने निरंतर ध्यान और मनोवैज्ञानिक अध्ययन द्वारा अपने छिपे हुए गुणों को खोज निकाला। वह उसी दिशा में निरंतर उन्नति करता गया। एक चिरप्रचलित उक्ति है- ‘मनुष्य अपने मन में स्वयं को जैसा मान बैठा है, वस्तुत: वह वैसा ही है।’

 प्राय: हम देखते हैं कि अनेक अभिभावक दूसरों के बच्चों की मुक्त कंठ से प्रशंसा करते हैं और अपने बच्चे की बुराई। वे बच्चों को  डांटते-फटकारते हैं। नतीजतन उनके बच्चे बड़े होकर घर से भाग जाते हैं या घर पर नहीं टिकते। अभिभावक अपने बच्चों का कम मूल्य लगाते हैं, फलस्वरूप समाज भी उन्हें घटिया दर्जे का ही मानता है। आप कभी-कभी अपने गुणों, अपनी विलक्षण प्रतिभा, अपनी विशेष ईश्वरीय देन के बारे में खूब सोचिए। त्रुटियों की उपेक्षा कर श्रेष्ठताओं की सूची बनाइए। उन्हीं पर विचार और क्रियाएं एकाग्र कीजिए। यह अपनी श्रेष्ठताएं विकसित करने का मनोवैज्ञानिक मार्ग है।
                  

प्रिय पाठक, आपको अपनी शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक, आध्यात्मिक और अनेक शक्तियों का ज्ञान नहीं है। आप नेत्रों पर पट्टी बांधे अन्धा-धुन्ध आगे मार्ग टटोल रहे हैं। यदि आप अपनी गुप्त शक्तियों के सहारे आगे बढऩे लगें, मन को सृजनात्मक रूप में शिक्षित कर लें तो जीवन फूलों की सेज प्रतीत होगा और अनेक कार्य आप पूर्ण करने लगेंगे।

आप ताकत की दवाइयां खाते हैं। पौष्टिक अन्न लेते हैं। डंड, मुद्गर और तरह-तरह की कसरतें करते हैं। पर सच तो यह है कि शक्ति कहीं बाहर से नहीं आती, वह स्वयं हमारे अन्दर ही मौजूद है। जो हमारे मन की अवस्था के अनुसार घटती-बढ़ती रहती है। डेढ़ पसली के महात्मा गांधी के शरीर में एक दृढ़ निश्चयी मन की ही ताकत थी। उस मन की शक्ति से ही उन्होंने विदेशी राष्ट्र की जड़ें खोखली कर दी थीं। आप में भी असीम शक्तियाँ भरी पड़ी हैं। उनकी खोज की जाय, तो निश्चय ही आप संसार को चमत्कृत कर सकते हैं। अब आज से आप नए सिरे से अपने व्यक्तित्व का मूल्यांकन कीजिए।

 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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