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Wednesday 05, November 2025

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गायत्रीतीर्थ शांतिकुंज, नित्य दर्शन

गायत्री माता
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गायत्री माता - अखंड दीपक
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चरण पादुका
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चरण पादुका
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सजल श्रद्धा - प्रखर प्रज्ञा (समाधि स्थल)
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प्रज्ञेश्वर महादेव - देव संस्कृति विश्वविद्यालय
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शिव मंदिर - शांतिकुंज
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हनुमान मंदिर - शांतिकुंज
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आज का सद्चिंतन (बोर्ड)

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आज का सद्वाक्य

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नित्य शांतिकुंज वीडियो दर्शन






परम् पूज्य गुरुदेव का अमृत संदेश



कैसा मुसीबत का समय है। आदमी को मालूम तो है, पर नहीं भी है। बकरे को जब काटने के दिन आते हैं, तो उसके कुछ सेकंड और कुछ मिनट पहले तक वह भी चारा खाता रहता है, पानी पीता रहता है और आपस में टकराव मारता रहता है। यह ध्यान नहीं है कि हमारा क्या बुरा समय आने वाला है।
आज ऐसी ही विभीषिकाओं से समय घिरा हुआ है। आदमी का चाल-चलन, आदमी का चिंतन, आदमी का चरित्र, आदमी का व्यवहार जिस तरीके से घटिया हो गए हैं, उससे नेचर बहुत नाखुश हो गई है। अदृश्य जगत में ऐसा भयावह वातावरण पैदा हो गया है कि रोज प्रकृति के प्रकोप की घटनाएँ आप सुनते रहते हैं।
प्रकृति का प्रकोप होता है तो आए दिन महामारियाँ फैलती हैं, आए दिन भूकंप आते हैं, आए दिन दूसरी मुसीबतें आती हैं। मुसीबतों का चारों ओर अंधकार आज के जमाने में छाया हुआ है। कल के बारे में कोई नहीं जानता। महायुद्ध के पश्चात हमारा क्या होगा, कल के बारे में कोई नहीं जानता।
बढ़ी हुई जनसंख्या का परिणाम क्या होगा, कोई जानता नहीं है। आज की आपाधापी जिस तरीके से आदमी को हैरान और परेशान करने पर तुली हुई है, उसके परिणाम क्या होंगे, आज ही कौन अच्छी दिशा है। लेकिन कल के दिन हमारे और भी भयंकर परिणाम आने की बात दिखाई पड़ती है।
अपराध बे-तरीके से बढ़ते चले जाते हैं। हर आदमी का स्वभाव उच्छृंखल और अपराधी होता चला जाता है। वर्जनाएँ, जिसके अंतर्गत कहा गया था कि आदमी को मर्यादाओं में रहना चाहिए, आदमी बे-तरीके से दौड़ता हुआ चला जा रहा है। इसके परिणाम तो खराब होने ही वाले हैं।
इस सृष्टि का नियत नियम ऐसा है—कर्म को भरना पड़ता है। कर्म के भरने वाले परिणाम को कोई नहीं मेट सकता। जहर खाने के बाद में बचाव करने की आशा कौन करेगा? आग में हाथ देने के बाद में बचाव किया था कौन करेगा? आज भी इसी तरीके की परिस्थितियाँ हैं, जिसमें कि आप और हम, सारी दुनिया के लोग, जिसमें संपन्न लोग भी शामिल हैं, गरीब लोग भी शामिल हैं, भारतीय भी शामिल हैं, प्रवासी भी शामिल हैं, अन्यान्य लोग भी शामिल हैं—एक तरह की मुसीबत में गिरे हुए हैं।
क्या फिर दुनिया का विनाश ही होना है? विनाश नहीं होगा। जिस भगवान ने इस दुनिया को इतनी बेहतरीन दुनिया बनाया है कि जैसे अब तक ब्रह्मांड के किसी भी जगह पता नहीं चला कि इतनी खूबसूरत दुनिया, इतना खूबसूरत ग्रह कहीं और भी है क्या। जिस कलाकार ने इस दुनिया को बनाया है, वह आसानी से मिटने वाला नहीं है।

परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य 

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अखण्ड-ज्योति से



आत्मकल्याण के साधक को उसकी प्राप्ति के मार्ग में सब से अधिक रोड़ा है तो यह काम है। काम विजय के बिना आत्म साक्षात्कार सम्भव नहीं हो सकता। काम को वश कर सर्वोत्तम दृष्टि प्राप्त करने के लिये अनेक साधन हैं। पर उन सब साधकों में गायत्री सर्वश्रेष्ठ है।

गायत्री की उपासना के प्रथम रूप में मातृरूप है, जिसमें सभी दिव्यताएं मौजूद हैं, करने पर अल्प समय में ही सब स्त्रियों में मातृभाव उत्पन्न होने लग जाता है जिससे कर्मरूपी शत्रु का दमन और सर्वात्म भाव का मार्ग खुल जाता है।

अब इस मार्ग में प्रगति शीघ्र होने में बाधा नहीं रहती। धीरे-धीरे साधक की दृष्टि विशाल होने लगती है। गायत्री माता का साक्षात्कार केवल स्त्रियों में ही नहीं अपितु प्राणी मात्र में होने लगता है। सब में उसको उसकी अनुभूति होने लगती है। मानवता का ध्येय साध्य होने में गायत्री उपासना ही मेरे विचार में सर्वश्रेष्ठ है।

नित्य प्रातः और सायं संध्या-समय एकान्त में मन एकाग्र कर गायत्री माता के रूप में स्थूल रूप से ध्यान करें। उसमें सत्चित् और आनन्द का आरोप करें। उसकी सर्व व्यापकता, सर्व शक्ति मानत्व का अनुभव कर ध्यान करें। सभी स्त्रियों को गायत्री माता के रूप में देखें। उनके शरीर, मन और बुद्धि का प्रकाश गायत्री माँ ही है। सो विचार दृढ़ करता जाए। इस प्रकार धीरे धीरे पर तीव्र अभ्यास से दृष्टि विशाल होती है। बुद्धि में प्रकाश की प्राप्ति है। ईर्ष्या, द्वेष, वैरत्व हिंसा का समूल उच्छेद होता है। सब चराचर में उसी ‘माँ’ को दिव्य झाँकी होने लगती है।

अन्य साधनों से भी यह लाभ हो सकता है, परन्तु जितना शीघ्र कामवासना का त्याग गायत्री साधना से होता है, अन्य साधनों से नहीं होता यह मेरा विश्वास है।

अतः जो अधिक काम वासना का स्थान शीघ्र करना चाहता हो वह गायत्री की साधना करे तो वह अपना ध्येय शीघ्र प्राप्त कर लेगा। यह पंक्तियाँ में किसी पढ़े सुने आधार पर नहीं कहता वरन् अपनी गायत्री उपासना में अनुभव के आधार पर उपलब्ध हुए सुदृढ़ विश्वास को प्रकट कर रहा हूँ।

अखण्ड ज्योति 1951 जुलाई

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