Tuesday 04, November 2025
आप सभी को गुरु नानक जयंती की हार्दिक शुभकामनाएँ!
अथर्ववेदीय चिकित्सा पद्यति के प्रणेता युगऋषि
जब सद्गुरु मिलते हैं, जीवन बदल जाता है | डॉ. चिन्मय पंड्या जी | 108 कुण्डीय महायज्ञ तेलंगाना
क्या सच में हर दिन पुनर्जन्म होता है ? । Kya Sach Mei Har Din Punarjanm Hota Hai पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य
हमारी संस्कृति में नारी का सम्मान कितना जरूरी है ? नारी का सहज सौम्य स्वरूप पुनः प्रतिष्ठित
गायत्रीतीर्थ शांतिकुंज, नित्य दर्शन
आज का सद्चिंतन (बोर्ड)
आज का सद्वाक्य
नित्य शांतिकुंज वीडियो दर्शन
!! शांतिकुंज दर्शन 04 November 2025 !! गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार !!
अमृतवाणी:- ब्रह्ममुहूर्त का संदेश परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
परम् पूज्य गुरुदेव का अमृत संदेश
आप सभी जानते हैं कि जब रात्रि समाप्त होती है, उत्तर-पूर्व दिशा से ही सूरज निकलता है। सूरज के निकलने की कोई और दिशा है ही नहीं। जब चारों ओर अंधकार छाया हुआ होता है, जब हर एक आदमी ठोकर खाता हुआ फिरता है, न दिशा का ज्ञान है, न वस्तु का ज्ञान है, सब जगह घोर अंधेरा छाया हुआ है और निशाचर, जिसमें उल्लूक भी शामिल है, बिच्छू, साँप भी शामिल हैं, चोर, भूत-पलीत भी शामिल हैं, सब घूमते-फिरते रहते हैं। भले आदमी शांति के खर्राटे लेकर सोए रहते हैं। ऐसे अंधकार के समय में, जब चारों ओर निस्तब्धता छाई रहती है, हलचलों का नाम भी दिखाई नहीं पड़ता, नींद की खुमारी सब पर चढ़ी रहती है। ऐसे घोर अंधकार के समय में, सुनसान सब जगह हो जाता है, कुछ दिखाई नहीं पड़ता है।
उस अंधकार को दूर करने के लिए जब कभी सूरज निकलता है, जब कभी उषाकाल आता है, ब्रह्म मुहूर्त आता है, तो उसके लिए देखना पूरब ही पड़ता है। प्राची अपने साथ उषाकाल लाती है, ब्रह्म मुहूर्त लाती है। प्रातःकाल में ही सूरज की लालिमा चमकती है और वह घोर अंधकार, जो और किसी तरह दूर नहीं हो सकता, उसको मिटाने के लिए और कोई समर्थ नहीं हो सकता था, वह केवल प्राची से उदय होने वाले सूर्य के द्वारा ही उदय होता है। यह आप दिन और हर दिन देखते हैं।
लेकिन एक ऐसी बात भी है, जो आपको कभी-कभी देखने को मिलती है। कभी-कभी समय ऐसे बुरे बदल जाते हैं कि चारों ओर अंधकार जैसी परिस्थितियाँ छा जाती हैं। लोग रास्ता भूल जाते हैं। भ्रम, भ्रांतियाँ और विकृतियाँ आदमी के मस्तिष्क के ऊपर इतनी छा जाती हैं कि न आदमी को अपने निजी कर्तव्यों का ज्ञान रहता है, न सामाजिक उत्तरदायित्व का ध्यान रखता है। ऐसे भटकाव की स्थिति में, ऐसी मुसीबत आकर खड़ी हो जाती है जैसे कि आज आप देख रहे हैं। चारों ओर मुसीबतों का माहौल है, चारों ओर भय और आशंका का आतंक भरा वातावरण छाया हुआ है।
आप देखते हैं न, एटम बम की विभीषिकाओं के बारे में किस कदर बातें अखबारों में छपती रहती हैं। आप पढ़ते हैं न, किस कदर हवा के जहरीली हो जाने की वजह से और संसार में तापमान बढ़ जाने की वजह से कैसी मुसीबतें आने वाली हैं।
परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड-ज्योति से
भारतीय धर्म में नारी की असाधारण महत्ता है। क्योंकि मानव जाति की उद्गम गंगोत्री नारी ही है। ऋषियों ने नारी को प्रत्यक्ष देवताओं में गिना है और उसके प्रति पूज्य भावना रखने का मनुष्य मात्र को उपदेश दिया है। बेटी, बहिन और माता के तीनों ही रूप में नारी को भारतीय पुरुष सदा से दैवी भावनाओं के साथ सिर झुकाता रहा है। यह पूज्य भावना ही हिन्दू जाति की वह श्रेष्ठता थी जिसके कारण वह संसार का सिरमौर रहा। भगवान मनु ने स्पष्ट शब्दों में कहा था “जहाँ स्त्रियों की पूजा होती है वहाँ देवता निवास करते हैं। और जहाँ वे तिरष्कृत होती हैं वहाँ (उन्नति के) सब प्रयत्न निष्फल होते हैं।”
विकार पूर्ण वासना की, दूषित दृष्टि की, यहाँ सदा से निन्दा की जाती रही है। ‘रमणी’ नारी का घृणित और विकृत रूप है। स्त्री की जहाँ शंकराचार्य प्रभृति महात्माओं ने निन्दा की है, उससे दूर रहने का आदेश किया है, वह रमणी रूप ही है। माता के रूप में भगवती आद्य शक्ति की स्वयं शंकराचार्य जी ने भी अत्यन्त भावना पूर्ण स्तुति की है।
आज लोगों की आँखों में कीचड़ भर गई है वे वस्तु स्थिति को नहीं देख पर रहे। रमणी और कामना की विषैली प्रतिमूर्ति बनाकर नारी को देखा जा रहा है, आज सिनेमा, नाटक, उपन्यास, चित्र, संगीत, कला आदि में स्त्री को विलास सामग्री के रूप उपस्थित किया जा रहा है। तरुणी, नवयौवना, अर्ध नग्न, विलासिनी, विकार ग्रस्त, भाव भंगिमा वाली नारी का आज पुरुष समाज चिन्तन करता है उससे इन्द्रिय सुख की ही कामना करता है बेटी को वात्सल्य, बहिन का सौहार्द, माता की आराधना, लोग भूलते से जा रहे हैं।
इस दूषित दृष्टि का कितना दुष्परिणाम होता है इसे आज का मन्द बुद्धि जन समाज नहीं समझता। प्राचीन काल के ऋषि मुनि समझते थे। शारीरिक निरोगता, बलिष्ठता, दीर्घ जीवन, मानसिक संतुलन, पारिवारिक सुव्यवस्था, सुसंतति, पारस्परिक विश्वास, रक्त शुद्धि, पितृ भक्ति, पवित्रता, आदि लाभों से मनुष्य जाति तभी लाभान्वित हो सकती है। जब दृष्टि में पवित्रता हो आत्मिक लाभ तो इस तत्व के बिना हो ही नहीं सकता। नारी जैसे पूजनीय परम पवित्र तत्व के प्रति कुविचारों की दोष दृष्टि रहेगी तो उसका यह आध्यात्मिक तिरस्कार समाज का नाश कर देगा उसे पतन के गर्त में गिरने से कोई बचा न सकेगा। भगवान मनु का वचन असत्य नहीं हो सकता कि ‘यदि नारी का तिरस्कार होगा तो (उन्नति के) सब प्रयत्न निष्फल होंगे।’
अखण्ड ज्योति द्वारा गायत्री प्रचार का जो आन्दोलन चलाया जा रहा है, उसमें मुझे सर्वोत्कृष्ट लाभ यह पड़ दिखाई पड़ता है कि ईश्वर की, नारी (गायत्री) के रूप में आराधना करने के स्त्री जाति के प्रति पवित्रता, आदर और श्रद्धा की भावना का जन समाज में विकास होगा। गायत्री उपासनाओं में कुमारी कन्याओं की पूजा होती है। ध्यान और पूजन में अमित सौंदर्य की प्रति मूर्ति गायत्री के प्रति मातृभावना स्थापित करनी पड़ती है। इस प्रकार मनुष्य नारी के जिन पुत्री, बहिन और माता के निर्मल स्वरूपों को भूलता जाता है उनको पुनः हृदयंगम कर सकेगा।
मेरी गायत्री आन्दोलन के प्रति बड़ी श्रद्धा है। शक्ति भर इस पुण्य कार्य में भाग लेती हूँ। मेरा विश्वास है कि आचार्य जी का यह प्रयत्न भारतीय नारी जाति के लिए वैसा ही उन्नायक सिद्ध होगा जैसा कि पूज्य बापू का हरिजन आन्दोलन करोड़ों भूल मानवों में प्राण संसार करने वाला सिद्ध हुआ। मैं उस सुन्दर भविष्य का आशाजनक स्वप्न देखती हूँ जब कि पुरुषों के हृदय में नारी के प्रति पुण्य भावनाएँ रहेगी और फलस्वरूप यह भारत भूमि सम्पूर्ण सुख साधनों से परिपूर्ण होकर देव भूमि बनेगी। भगवान करे यह गायत्री आन्दोलन सफल हो।
अखण्ड ज्योति 1951 जुलाई
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