Monday 03, November 2025
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अमृत सन्देश:- असली सन्ध्या वन्दन का रहस्य क्या है ? । Asli Sandhya Vandan Ka Rehshay Kya Hai पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य
गायत्रीतीर्थ शांतिकुंज, नित्य दर्शन
आज का सद्चिंतन (बोर्ड)
आज का सद्वाक्य
नित्य शांतिकुंज वीडियो दर्शन
!! शांतिकुंज दर्शन 03 November 2025 !! गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार !!
अमृतवाणी:- तीन आरंभिक कदम समारोह, प्रकाशन, सत्संग परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
परम् पूज्य गुरुदेव का अमृत संदेश
युग परिवर्तन का अर्थ विचार परिवर्तन है। इसके लिए उपरोक्त दोनों साधनों का प्रयोग किया जाना चाहिए। समारोह, प्रेस, प्रकाशन के बाद तीसरा उपाय साप्ताहिक सत्संग है। इसके लिए अपना स्थान बनाया जा सकता है। किसी अन्य के स्थान का भी उस अवधि के लिए उपयोग हो सकता है।
केंद्रीय कार्यालय के लिए भी काफी स्थान तो चाहिए ही, और यदि स्थान हो, तो उससे अनेक गतिविधियां भी चलनी चाहिए। यह क्रम साप्ताहिक उपासना एवं कथा सत्संग के रूप में चलता रहे। धार्मिक शिक्षा की साप्ताहिक पाठशालाएं भी चलती रह सकती हैं, जिसमें बच्चे और वृद्ध समान रूप से शिक्षण प्राप्त किया करें।
यदि स्थान उपयुक्त मिल जाए, तो वहां ऑफसेट प्रेस या साइकिल स्टॉल मशीन की व्यवस्था बन जाए। इसी केंद्रीय कार्यालय से भारत से छपकर आने वाले साहित्य की प्रतियां हाथों-हाथ वितरित हो जातीं और पाठकों के पास सरलतापूर्वक पहुंचाई जा सकती हैं।
उठाने के लिए तो अगले दिनों अनेकों कदम हैं, पर शुभारंभ तीन कार्यक्रमों से करना चाहिए। श्रीगणेश के रूप में इतने से भी काम चल जाएगा —
एक, समारोहों की योजना।
दूसरा, प्रकाशनों की व्यवस्था।
तीसरा, साप्ताहिक पूजा तथा शिक्षा।
जहां इतना बन पड़ेगा, वहां अगले महत्वपूर्ण कदम उठाने में कोई संदेह न रहेगा।
आप लोगों ने विभीषिकाओं से निवारण एवं वातावरण-संशोधन के हेतु प्रज्ञा पुरश्चरण का स्वरूप बनाया एवं उसे नित्य उपासना का एक अंग बनाया है। इससे हमें भारी प्रसन्नता है। भारतवर्ष में भी सूर्योदय के समय 20 लाख से अधिक प्रज्ञा परिजन इस अनुष्ठान को नित्य संपन्न करते हैं। सारे विश्व भर में यही क्रम चल पड़े — ऐसी हमारी कामना है।
आप लोग जहां भी रहते हैं, जिस स्थिति में भी हों, इस उपासना को चलाते रहें। इसे आज की परिस्थितियों को देखते हुए एक महत्वपूर्ण आवश्यकता एवं आवश्यक पुण्य मानकर किया जाना चाहिए। और भी नैष्ठिक उपासक अपने इस अनुष्ठान में जुड़ते चले जाएं — इसका प्रयास सतत करते रहना चाहिए।
हम इस समय प्रवासी भारतीयों के बीच पहुँच सकने की स्थिति में नहीं हैं, फिर भी हमारा सूक्ष्म शरीर आप लोगों के बीच इस अवसर पर सदा विद्यमान रहेगा। आप लोग हमारी उपस्थिति, प्रेरणा एवं सहायता की समय-समय पर प्रत्यक्ष अनुभूति करते रहेंगे। आज के इस समारोह में आप हमारा टेप प्रवचन मात्र ही नहीं सुन रहे होंगे, वरन् ऐसी समीपता का भी अनुभव करेंगे, जो आप सबको हर क्षेत्र में ऊंचा उठाने और आगे बढ़ाने में सहायक सिद्ध हो सके।
परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड-ज्योति से
मानव स्वभाव के दुर्गुणों में चिड़चिड़ापन आन्तरिक मन की दुर्बलता का सूचक है। सहिष्णुता के अभाव में मनुष्य बात-बात में चिढ़ने लगता है, नाक भौं सिकोड़ता है, प्रायः गाली-गलौज देता है। मानसिक दुर्बलता के कारण वह समझता है कि दूसरे उसे जान बूझ कर परेशान करना चाहते है उसके दुर्गुणों को देखते हैं, उनका मजाक उड़ाते हैं। किसी पुरानी कटु अनुभूति के फलस्वरूप वह अत्यधिक संवेदनशील हो उठता है। और उसकी भावना ग्रन्थियाँ उसकी गाली-गलौज या बेढंगे व्यापारों में प्रकट होती हैं।
चिड़चिड़ेपन के रोगी में चिंता तथा शक सूबे की आदत प्रधान है। कभी-कभी शारीरिक कमजोरी के कारण, कब्ज, परिश्रम से थकान, सिर दर्द, नपुँसकता के कारण आदमी तनिक उठता है। अपनी कठिनाइयों तथा समस्याओं को उद्दीप्त होकर देखते-देखते उसे गहरी निराशा हो जाती है। चिड़चिड़ापन एक पेचीदा मानसिक रोग है। अतः प्रारम्भ से ही इसके विषय में हमें सावधान रहना चाहिए।
जिस व्यक्ति में चिड़चिड़ेपन की आदत है, वह सदा दूसरों के दोष ढूंढ़ता रहता है। वह व्यक्ति अन्य व्यक्तियों की दृष्टि में तो बुरा होता ही है। स्वयं भी एक अव्यक्त मानसिक उद्वेग का शिकार रहता है। उसके मन में एक प्रकार का संघर्ष चलता है। वह भ्रमित कल्पनाओं का शिकार रहता है। उसके संशय ज्ञान-तन्तुओं पर तनाव डालते हैं। भ्रम बढ़ता रहता है। और वह मन ही मन ईर्ष्या की अग्नि में दग्ध होता रहता है। वह क्रोधित, भ्रान्त, दुःखी सा नजर आता है। तनिक सी बात में उसकी उद्विग्नता का पारावार नहीं रहता। गुप्त मन पर प्रारम्भ में जैसे संस्कार जम जाते हैं, उनके फलस्वरूप ऐसा होता है। यह आदत से पड़ने वाला एक संस्कार है।
रोग से मुक्ति के साधन -
मन में दृढ़ निश्चय करना चाहिए कि चिड़चिड़ापन बुरा है। हम उसे अपने स्वभाव में से निकालना चाहते हैं। हम दूसरों के बोलने, हँसने मजाक, या कार्यों से नहीं चिड़ेंगे हम उनकी परवाह न करेंगे। अपने स्वभाव में मृदुत सरस बनेंगे, सहिष्णु बनेंगे। मनुष्य के मन में सत् तथा असत् दोनों प्रकार के विचारों का क्रम चला करता है। अपने दुर्बल विचारों के प्रति बड़ा सतर्क रहना चाहिए। जब कोई चिन्ता या निराशाजनक बात मन में आवे, आप उसके प्रतिकूल भावना कर उद्रेक कीजिये। चिड़चिड़ेपन के दमन के लिए मृदुता, प्रसन्नता, सहानुभूति की भावना अत्यन्त लाभदायक है। प्रबलता से मन में शुभ संकल्प जाग्रत कीजिए।
जब कभी आपको क्रोध आवे तो आप मन ही मन कहिए “दूसरों से गलती हो ही जाती है। मुझे दूसरों की गलती पर क्रुद्ध नहीं होना चाहिए। यदि दूसरे गलती करते हैं, तो उसका यह मतलब नहीं कि मैं और भी गलती कर उसका प्रतिशोध लूँ। मैं शुभ संकल्प वाला साधक हूँ। शुभ संकल्प के फलित होने के लिए उद्विग्न मन होना उचित नहीं। हम सहिष्णु बनेंगे। दूसरे स्वयं अपनी गलती का अनुभव करेंगे हम धैर्य धारण करें। जितना ही आप विचारों को ऊपर लिखित भावनाओं पर एकाग्र करेंगे, उतना ही बल आपको मिलेगा। पुनः पुनः दृढ़ता से उन में स्मरण करने से स्वभाव बदल जायेगा, प्रकृति मधुर बन जाएगी। आवेश को रोकने से मन को बल मिलेगा।
अपने दैनिक व्यवहार में प्रेमी, सहानुभूतिपूर्ण, सौम्य और प्रसन्नमुद्रा से काम लीजिये। इस मधुर स्वभाव का प्रभाव आपके कुटुम्ब पर तथा समाज पर बहुत अच्छा पड़ेगा। सुख शान्ति से जीवन व्यतीत करने के लिए मिष्ट भाषी और मधुर स्वभाव सर्वोत्तम तत्व है। मधुरता का प्रवाह तुम्हारे इर्द−गिर्द वातावरण में फैल जायेगा। चिड़चिड़ा होना आपकी एक बड़ी कमजोरी है, मधुरता से, सरसता से और प्रसन्नता से उसे ठीक कर लीजिये। ऐसे मधुर वचन बोलिये कि छोटे बच्चे आपके चारों ओर आकर्षित होकर चले आये, पत्नि प्रसन्न हो उठे, नौकर भी प्रसन्नता से आपकी आज्ञा वजा लायें। संकल्प की दृढ़ता, आवेश को रोकने तथा मधुर आदर्श सामने रखने से निश्चय ही आप चिड़चिड़ेपन से छुटकारा पा सकेंगे।
अखण्ड ज्योति 1951 जून
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