Sunday 02, November 2025
Ep:-08 Hamare_antah_ka_devasur_sangram_SHIKHA
सजल श्रद्धा–प्रखर प्रज्ञा ध्यान कक्ष का लोकार्पण | डॉ. चिन्मय पंड्या जी | विजयवाड़ा स्वागत समारोह
मन का असली भगवान | अहंकार और दिखावे से सच्ची भक्ति तक की यात्रा | प्रेरक कथा
मैं से मुक्ति : आध्यात्मिक जीवन का असली आरम्भ | तू ही है
अमृत सन्देश:- एक कदम महानता की ओर । Ek Kadam Mahanta Ki Aur पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य
अमृतवाणी:- आध्यात्मिक उपासना का लाभ | Adhyatmik Upasana Ke Labh | गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
गायत्रीतीर्थ शांतिकुंज, नित्य दर्शन
आज का सद्चिंतन (बोर्ड)
आज का सद्वाक्य
नित्य शांतिकुंज वीडियो दर्शन
!! अखण्ड दीपक #Akhand_Deepak (1926 से प्रज्ज्वलित) चरण पादुका गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार 02 November 2025 !!
!! परम पूज्य गुरुदेव का कक्ष गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार 02 November 2025 !!
!! देवात्मा हिमालय मंदिर Devatma Himalaya Mandir गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार 02 November 2025 !!
!! #गायत्री_माता_मंदिर #Gayatri_Mata_Mandir गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार 02 November 2025 !!
!! सप्त ऋषि मंदिर गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार 02 November 2025 !!
!! शांतिकुंज दर्शन 02 November 2025 !! गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार !!
!! महाकाल महादेव मंदिर शांतिकुञ्ज हरिद्वार 02 November 2025 !!
!! महाकाल महादेव मंदिर शांतिकुञ्ज हरिद्वार 02 November 2025 !!
कम पूंजी में प्रकाशन की व्यवस्था
परम् पूज्य गुरुदेव का अमृत संदेश
देव संस्कृति के आदर्शों से अनुप्राणित साहित्य को घर-घर पहुंचाने और युग संदेश से जन-जन को अवगत कराने के लिए प्रज्ञा साहित्य की बड़े परिमाण में आवश्यकता है। युग समस्याओं के समाधान की अनेकानेक दिशाधाराएं हैं। उनसे सर्वसाधारण को परिचित कराने के लिए आवश्यक है कि प्राणवान, सस्ता एवं सामयिक साहित्य प्रकाशन नियमित रूप से होता रहे।
भारत में 40 पैसा सीरीज की फोल्डर पुस्तिकाएं हर वर्ष लाखों-करोड़ों की संख्या में प्रकाशित-प्रचारित होती हैं। आवश्यकता है कि यही प्रकाशन क्रम हर देश में, हर भाषा में, स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार चल पड़े। भारत में छपा साहित्य मंगाने की तुलना में सरल तरीका यही है कि हर देश में प्रज्ञा प्रकाशन के लिए अपनी-अपनी व्यवस्थाएं हों। छोटे फोटोग्राफ ऑफसेट प्रेसों के माध्यम से न्यूनतम पूंजी से भी यह प्रकाशन क्रम चलता रह सकता है।
प्रकाशन को खपाने के लिए स्थायी सदस्यों की श्रृंखला बने। सदस्यों के पास नियमित रूप से फोल्डर साहित्य पहुंचता और वितरित होता रहे। हर महीने एक सेट छपता रहे, तो यह एक मासिक पत्रिका प्रकाशित करने की तुलना में कहीं अधिक सुगम और प्रभावी कार्यक्रम माना जा सकता है।
इसकी पहल भी इंग्लैंड से होगी, तो इसका अनुकरण 74 अन्य देशों में भी चल पड़ेगा। इसकी भावभरी आशा की गई है और कार्यान्वयन पर पूरा विश्वास रखा गया है। वाणी के माध्यम से प्रवचन समारोह की योजना बननी चाहिए और लेखनी के माध्यम से साहित्य प्रकाशन की व्यवस्था होनी चाहिए।
परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड-ज्योति से
उपासना- जिन लोगों के हृदय में शिव रूप त्याग और वैराग्य बसा है, ऐश्वर्य, धन , सौभाग्य उनके पास स्वयं आते हैं और जिन लोगों के अन्तःकरण लक्ष्मी, धन दौलत की लाग में मोहित हैं वे दरिद्र के पात्र रहते हैं जैसे जो कोई सूर्य की तरफ पीठ मोड़ कर अपनी छाया को पकड़ने दौड़ता है, तो छाया उससे आगे बढ़ती जाती है। कभी काबू में नहीं आती है। और जो कोई छाया से मुँह फेर कर सूर्य की और दौड़े तो छाया अपने आप ही पीछे भागती आती है, साथ छोड़ती ही नहीं।
कौन प्रार्थना अवश्य सुनी जाती है? जिससे हमारा स्वार्थों इतना कम हो कि मानो वह सत्य स्वभाव ईश्वर का अपना ही काम है यह तो रही अति उत्कृष्ट उपासना। उपासना की जरा न्यून स्थिति बच्चे की सी श्रद्धा और विश्वास है, और यह निष्ठा भी क्या प्यारी और प्रबल है। बच्चा अपने माता-पिता को अनन्त शक्तिमान मानता है। और उनके बल को अपना बल समझ कर माता की गोद में बैठा हुआ शाहनशाही करता है, रेल को भी धमका लेता है। पवन और पक्षियों पर भी हुकुम चलाता है, दरिया को भी कोसने लगता है और कोई चीज असम्भव जानता ही नहीं। धन्य हैं वे पुरुष उच्च भाग्य वाले जिनका इस जोर का विश्वास सचमुच सर्व शक्तिमान पिता में जम जाए।
दुःखी दुष्ट में और रंगीले मतवाले मस्त में फर्क सिर्फ इतना ही है। एक के चित्त में कामना अंश ऊपर है भक्ति अंश नीचे। दूसरे के चित्त में राम ऊपर है और काम नीचे। एक यदि साक्षर है। तो उलट पलट से दूसरा राक्षस है।
माँगना दो प्रकार का है, एक तो तुच्छ “मैं” (अहंता, ममता) को मुख्य रखकर अपनी वृद्धि और दूसरा ज्ञान-प्राप्ति, तत्व-दर्शन, हरि सेवा को परम प्रयोजन ठान कर आत्योन्नति माँगनी। प्रथम प्रकार की प्रार्थना तो मानो ईश्वर का तुच्छ नाम रूप (जीव) का अनुचर बनाना है। अपनी सेवा की खातिर इर्नाश्वर को बुलाना है, उलटी गंगा बहाना है। द्वितीय प्रकार की प्रार्थना सीधी बाट पर जाना है।
आत्मा में चित्त के लीन होते समय जो भी संकल्प होगा सत्य तो अवश्य ही हो जायगा, परन्तु यदि वह संकल्प अज्ञान, अधर्म और स्वार्थमय है तो काँटेदार विष भरे अंकुर की नाई उगकर दारुण परिणाम का हेतु होगा। अहंता, ममता और भोग कामना सम्बन्धी ईश्वर से प्रार्थना करना मैले ताँबे (ताम्र) के बर्तन में पवित्र दूध को भरना है। दुःख पाकर जो सीखोगे तो पहिले ही अपवित्र वासना को क्यों नहीं त्याग देते। अशुभ भावना में औरों का भी बुरा होता है और अपनी भी खराबी। शुभ भावना, पवित्र भाव, ज्ञान, विज्ञान की प्राप्ति में न केवल अपना ही कल्याण होता है वरन् परोपकार भी। मन में सत्वगुण, शान्ति, आनन्द और शुद्धि हो तो हमारे काम स्वयं ईश्वर के काम होते हैं। पूरे होते देर लग ही नहीं सकती।
आज पहले ही नहीं समझ जाओ, अभी समझ लो, तो मारोगे ही नहीं मरने के वक्त गीता तुम्हारे किस काम आयेगी? अपनी जिन्दगी को ही भगवान की गीत बना दो। मरते वक्त दीपक तुम्हें क्या उजाला करेगा। हृदय में हरि ज्ञान प्रदीप अभी जला दो।
अखण्ड ज्योति 1951 जून
| Newer Post | Home | Older Post |
