Saturday 01, November 2025
स्वर्ग और नरक कहाँ हैं? | एक प्रेरक प्रसंग | अखंड ज्योति
माँ का प्रेम या मोह? | पक्षी की त्यागमयी कहानी | दिल छू लेने वाली कहानी
गायत्री मन्त्र का सूक्ष्म ग्रन्थियों पर प्रभाव
अमृतवाणी:- तप क्या है — भूखा रहना या कठिनाइयाँ सहना ? | पं श्रीराम शर्मा आचार्य जी
आज की महाभारत मन की असुरता | Aaj Ki Mahabharat Man Ki Asurta | Dr Chinmay Pandya
अमृत सन्देश:- सच्ची विरासत धन नहीं, गुण है। Sacchi Virasat Dhan Nhi Gun Hai पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य
Gayatri Stavan English गायत्री स्तवन इसको सुनने से मन को शांति और आत्म विश्वास मिलता है
गायत्रीतीर्थ शांतिकुंज, नित्य दर्शन
आज का सद्चिंतन (बोर्ड)
आज का सद्वाक्य
नित्य शांतिकुंज वीडियो दर्शन
!! शांतिकुंज दर्शन 01 November 2025 !! गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार !!
अमृतवाणी:- यू.के. के परिजनों का अनुकरणीय प्रयास परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
परम् पूज्य गुरुदेव का अमृत संदेश
प्रायः 74 देशों में प्रवासी भारतीय अच्छी संख्या में रहते हैं। आवश्यकता इस बात की है कि सामूहिक गायत्री पुरश्चरण, प्रज्ञा पुराण कथा, गायत्री यज्ञ, युग निर्माण सम्मेलन, संकीर्तन, संगीत जैसे कार्यक्रमों के साथ सम्मेलन, समारोहों का भी क्रम चलता रहे। वे कभी-कभी देशभर के भी होते रह सकते हैं, अन्यथा क्षेत्रीय एवं स्थानीय स्तर पर उन्हें लगातार किया ही जाना चाहिए।
पारस्परिक स्नेह, सौजन्य उत्पन्न करने वाली घनिष्ठता इस आधार पर और आगे बढ़ाई जा सकती है। साथ ही ऐसी योजनाएं भी उसी आधार पर बनती रह सकती हैं, जिनका कार्यान्वयन स्थानीय परिस्थितियों में संभव हो। दूसरा कार्यक्रम जो शुभारंभ के रूप में किया जाना चाहिए, वह यह है कि प्रज्ञा प्रकाशन हर देश में स्थापित किया जाए, जिसमें देव संस्कृति के आधारभूत सिद्धांतों और प्रचलनों की महत्ता एवं उपयोगिता से सर्वसाधारण को अवगत कराते रहना संभव हो सके।
समारोह, प्रवचन तो यदा-कदा ही होते हैं, जबकि बौद्धिक प्रशिक्षण की आवश्यकता निरंतर बनी रहती है। यह कार्य तभी हो सकता है, जबकि नियमित रूप से उस विषय का साहित्य उपलब्ध होता है। इसकी छाप अधिक समय तक बनी रहती है। सशक्त साहित्य साथ रहने से ही संस्कार प्रबल बनते हैं। सशक्त लोक शिक्षण की गाड़ी इसी क्रम से चल सकती है, इससे कम में नहीं चल सकती।
इस संदर्भ में यू.के. के परिजनों ने उत्साहवर्धक कदम उठाए हैं और दूसरों द्वारा अपनाए जाने योग्य उदाहरण प्रस्तुत किए हैं। हमारी हार्दिक इच्छा थी कि हर देश में प्रवासी भारतीयों के द्वारा युग निर्माण सम्मेलन संपन्न हों। यह कार्य इंग्लैंड वालों ने सर्वप्रथम कर दिखाया। अब अन्य देशों की बारी है। उन्हें भी इस कार्य को छिटपुट ढंग से नहीं, योजनाबद्ध रूप से, बड़े आकार में, बड़े सरंजाम के साथ संपन्न करना चाहिए।
हर सम्मेलन का उद्देश्य वही हो — देव संस्कृति का प्रचार-प्रसार हेतु कार्यक्रम का सुनियोजित कार्यान्वयन। आशा की जानी चाहिए कि अब तक जिन 74 देशों में युगांतरीय चेतना का आलोक पहुँचा है, उन सभी स्थानों पर ऐसे ही विशालकाय आयोजन होंगे और उनकी शाखा-प्रशाखाओं के रूप में छोटे-छोटे स्थानीय प्रज्ञा समारोहों का क्रम भी चल पड़ेगा। यही प्रक्रिया भारत भूमि में अपनाई गई है। इससे बड़ी संख्या में जनमानस प्रभावित हुआ है एवं नितांत पड़े अछूते-अछूते क्षेत्रों तक प्रज्ञा आलोक पहुँचा है।
परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड-ज्योति से
रंगीन काँच का चश्मा पहन लेने पर आँखों पर सब चीजें उसी रंग की दीखती है जिस रंग का कि वह काँच होता है। कुबुद्धि का चश्मा लगा लेने से सीधी साधारण सी परिस्थितियाँ और घटनायें भी दुःखदायी दिखाई देने लगती हैं। जिस मनुष्य को भौंरी रोग हो जाता है सिर घूमता है, मस्तिष्क के चक्कर आते हैं उसे दिखाई पड़ता है कि सारी पृथ्वी, मकान, वृक्ष आदि घूम रहे हैं। डरपोक आदमी को झाड़ी में भूत दिखाई देने लगता है। जिसके भीतर दोष है उसे बाहर के सुधार के कुछ लाभ नहीं हो सकता, उसका रोग मिटेगा तभी बाहर बुरी अनुभूतियों का निवारण होगा।
पीला चश्मा पहनने वाले के सामने चाहे कितनी ही चीजें बदल कर रखी जाएं पर पीले पन के अतिरिक्त और कुछ दिखाई न देगा। बुखार से मुँह कडुआ हो रहा है उसे स्वादिष्ट पदार्थ भी कडुए लगेंगे। कुबुद्धि ने जिसके दृष्टिकोण को, चिर प्रवाह को दूषित बना दिया है वह चाहे स्वर्ग में रखा जाय चाहे कुबेर सा घने पति या इन्द्र सा सत्ता सम्पन्न बना दिया जाय तो भी दुःखों से छूट न सकेगा।
गायत्री महामंत्र का प्रधान कार्य कुबुद्धि का निवारण है जो व्यक्ति कुबुद्धि से बचने और सद्बुद्धि की ओर अग्रसर होने का व्रत लेता है वही गायत्री का उपासक है। इस उपासना का फल तत्काल मिलता है जो अपने अन्तःकरण में सद्बुद्धि को जितना स्थान देता है उसे उतनी ही मात्रा में तत्काल आनन्दमयी स्थिति का लाभ प्राप्त होता है।
सोये हुए गाँव को जैसे बाढ़ बहा ले जाती है वैसे ही पुत्र और पशुओं में लिप्त मनुष्य को मौत ले जाती है। जब मृत्यु पकड़ती है उस समय पिता, पुत्र, बन्धु या जाति वाले कोई भी रक्षा नहीं कर सकते। इस बात को जानकर बुद्धिमान पुरुष को चाहिये कि वह शीतवान बने और निर्वाण की ओर ले जाने वाले मार्ग को जल्द साफ करे।
समाप्त....
अखण्ड ज्योति 1951 जून
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