Friday 31, October 2025
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गायत्रीतीर्थ शांतिकुंज, नित्य दर्शन
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नित्य शांतिकुंज वीडियो दर्शन
!! शांतिकुंज दर्शन 31 October 2025 !! गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार !!
अमृतवाणी:- देव संस्कृति का संदेश क्या है परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
परम् पूज्य गुरुदेव का अमृत संदेश
युगांतरीय चेतना का उद्भव प्रज्ञा अभियान के रूप में भारत भूमि से पुनः हो रहा है। ऐसा कुछ इस माध्यम से किया जा सकता है, जिस पर गर्व किया जा सके। अब बारी उस सभ्यता का देश-देशांतरों में प्रतिनिधित्व करने वाले प्रवासी भारतीयों की है, जिन्हें हर क्षेत्र में मनुष्य समुदाय को देव संस्कृति का स्वरूप समझाना है, जो संव्याप्त पतन, पराभव व भावी महाविनाश से समूची मानव जाति को बचा सकती है।
सर्वप्रथम कार्य तो यह है कि विभिन्न जाति या संप्रदाय के व्यक्ति, जो प्रवासी भारतीयों के रूप में विदेशों में बसे हैं, एक परिवार की तरह रहने लगें। भारत बहुत बड़ा देश है। उसमें अनेकों भाषाएं बोली जाती हैं और अनेकों संप्रदायों की भरमार है। इस विभिन्नता, विचित्रता के बावजूद एकात्मता यहां की विशेषता है। देव संस्कृति के अनुयाई प्राचीन काल में इस प्रकार की एकता बनाए रहे हैं। दर्शन की भिन्नता के कारण उन्होंने कभी व्यवहार भेद नहीं होने दिया।
अब नवयुग की बेला में वर्ग भेद न पनपने देकर, एक माता के पुत्रों जैसी एकात्मता उत्पन्न की जानी चाहिए। युग निर्माण योजना की लाल मशाल इसी संघ शक्ति की प्रतीक है। सभी को अब इसके नीचे एकजुट हो जाना चाहिए।
इस हेतु आवश्यक है कि समय-समय पर इन देशों में सम्मेलन, समारोह होते रहें। इससे एक-दूसरे को परिचित होने का अवसर मिलता है और प्रेम भाव बढ़ता है। मिलजुल कर काम करने का ऐसा मार्ग मिलता है, जिससे सामूहिक कठिनाइयों से निपटना एवं प्रगतिशीलता के मार्ग पर चल सकना संभव हो सके।
इन दिनों हमें युग निर्माण सम्मेलनों की हर क्षेत्र में व्यवस्था बनानी चाहिए, ताकि समीपवर्ती लोग सरलतापूर्वक उसमें सम्मिलित होते रहें। पूरे देश या क्षेत्र का एक बड़ा समारोह तो यदा-कदा कहीं-कहीं ही हो सकता है, क्योंकि उसके लिए बड़े साधन जुटाने पड़ते हैं, जिनकी व्यवस्था बनाना प्रायः बड़े, साधन-संपन्न एवं प्रखर व्यक्तियों से ही संभव है
परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड-ज्योति से
संसार में भेजते समय प्रभु हमें सद्बुद्धि रूपी कामधेनु भी देते हैं ताकि वह हमारे सम्पूर्ण सुख साधन जुटाती रहे परन्तु हमें भूल वश, भय वश, अज्ञान वश, आय ग्रस्त होकर सद्बुद्धि को त्यागकर कुबुद्धि को अपना लेते हैं और जैसे मिथ्याचरण से बीमारी न्योता बुलाई जाती है वैसे ही मानसिक अव्यवस्था के कारण कुबुद्धि को आमंत्रित किया जाता है। यह पिशाचिनी जहाँ आई नहीं कि जीवन का सारा क्रम उलटा हुआ नहीं, दोनों एक साथ रह नहीं सकतीं, जहाँ कुबुद्धि होगी वहाँ तो अशान्ति, चिंता, तृष्णा, दीनता, नीचता, क्रूरता आदि की कष्टकारक स्थितियों का ही निवास होगा।
गायत्री, सद्बुद्धि ही है। इस महामंत्र में सद्बुद्धि के लिये ईश्वर से प्रार्थना की गई है। इसके चौबीस अक्षरों में 24 अमूल्य शिक्षा संदेश भरे हुए हैं वे सद्बुद्धि के मूर्तिमान प्रतीक हैं। उन शिक्षाओं में से वे सभी आधार मौजूद हैं जिन्हें हृदयंगम करने वाले का सम्पूर्ण दृष्टिकोण शुद्ध हो जाता है और उस भ्रम अन्य अविद्या का नाश हो जाता है जो आये दिन कोई न कोई कष्ट उत्पन्न करती रहती है। गायत्री महामंत्र की रचना ऐसे वैज्ञानिक आधार पर हुई है कि उसकी साधना से अपने भीतर छिपे हुए अनेकों गुप्त शक्ति केन्द्र खुल जाते हैं और अन्तस्तल में सात्विकता की निर्झरिणी बहने लगती है।
विश्व व्यापी अपनी प्रबल चुम्बक शक्ति से खींचकर अन्तः प्रदेश में जमा कर देने की अद्भुत शक्ति गायत्री में मौजूद है। इन सब कारणों से कुबुद्धि का शमन करने में गायत्री अचूक रामबाण मंत्री की तरह प्रभावशाली सिद्ध होता है। इस शमन के साथ-साथ अनेकों दुःखों की समाप्ति हो जाना भी पूर्णतया निश्चित है। गायत्री देवी प्रकाश की वह अखंड ज्योति है जिसके कारण कुबुद्धि का अशानान्धकार दूर होता है और अपनी वही स्वाभाविक स्थिति प्राप्त हो जाती है जिसको लेकर आत्मा इस पुरायमयी धरती माता की परम शान्तिदायक गोदी में किलोल करने आया है।
क्रमश जारी....
अखण्ड ज्योति 1951 जून
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