Thursday 30, October 2025
आसनों का प्रकार | गायत्री की पंचकोशी साधना एवं उपलब्धियां | वांग्मय No 13 पृष्ठ ४.२९
अध्यात्म भगोड़ों का नहीं शूरवीरों का साथ देता है |परिवार ही असली साधना है |प्रेरक कहानी
ईश्वर अपने बताए नियमों मर्यादाओं में बँधा है | Eswar Apne Bataye Niyam Maryadaon Mei Bandha Hai
!! परम पूज्य गुरुदेव का कक्ष गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार 30 October 2025 !!
अब तेरा दु:ख दर्द हृदय का | Ab Tera Dukh Dard Hriday ka | Kirti Bhrgu, AWGP Pragya Geet
अमृत सन्देश:- लोभ से मुक्ति का मार्ग। Lobh Se Mukti Ka Marg पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य
गायत्रीतीर्थ शांतिकुंज, नित्य दर्शन
आज का सद्चिंतन (बोर्ड)
आज का सद्वाक्य
नित्य शांतिकुंज वीडियो दर्शन
!! शांतिकुंज दर्शन 30 October 2025 !! गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार !!
!! अखण्ड दीपक #Akhand_Deepak (1926 से प्रज्ज्वलित) चरण पादुका गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार 30 October 2025 !!
!! परम पूज्य गुरुदेव का कक्ष गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार 30 October 2025 !!
युग परिवर्तन में प्रवासी भारतीयों की भूमिका
परम् पूज्य गुरुदेव का अमृत संदेश
भारत भूमि से भूतकाल की तरह इन दिनों भी विश्व मानव की भ्रांतियों से उबारने का मार्ग दिखाने वाला अभियान तूफानी गति से चल पड़ा है। उसके परिणाम भी सामने आ रहे हैं। लेकिन युग परिवर्तन के यह प्रयास इसी छोटी सीमा में अवरुद्ध नहीं रखे जा सकते। इन्हें विश्वव्यापी बनाने का काम उनका है, जो भारतीय संस्कृति की गरिमा से परिचित हैं और अन्य देशों में निवास करने के कारण उसे फैला सकने में समर्थ हैं।
दीपक जहां जलता है, वहीं रोशनी भी देता है। हीटर जहां चलता है, वहीं गर्मी फैलाता है। हर प्रवासी भारतीय का सामयिक एवं चिरस्थाई कर्तव्य यही है कि वह जहां भी रहे, वह अन्यान्य प्रकार की सृजन योजनाएं करते हुए युग समस्याओं के समाधान हेतु संबद्ध क्षेत्र में परिचित, प्रभावित करने में कुछ उठा न रखे। विश्व मानव की सेवा साधना का यह पुण्य संपादन हमारे पूर्वजों की परंपरा का पुनर्जीवन ही है, जिन्होंने धरती को स्वर्गादपि गरीयसी का मान दिलाया। वह देव मानव स्वयं देव मानव कहलाए।
यह सब कैसे किया जाए, इसका एक ही उत्तर है कि प्रवासी भारतीय स्वयं को देव संस्कृति का उत्तराधिकारी प्रतिनिधि अनुभव करें। संपर्क क्षेत्र को इस प्रवाह की महिमा व परिणति समझाते रहें। शुभारंभ वे निजी जीवन और परिवार से करें। जिनके अपने विश्वास प्रगाढ़ होते हैं, जो आदर्शों का स्वयं परिपालन करते हैं, उन्हीं के लिए संभव है कि वह दूसरों को आकर्षित, अनुप्राणित करें और अपने ही अपनाने के लिए सहमत करें।
इस दृष्टि से आवश्यक है कि प्रवासी भारतीय जहां भी रहते हों, संघबद्ध होकर रहें, परस्पर मिलने-जुलने का क्रम बनाएं और ऐसे उपाय सोचें-अपनाएं, जिनसे अपने समुदाय में देव संस्कृति की निष्ठा और परंपरा प्रगाढ़ बनी रहे। साथ ही उस स्थान पर भी प्रकाश फैलाना संभव हो सके, जहां अभी समुचित जानकारी के अभाव में अंधकार जैसी स्थिति बनी हुई है।
परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड-ज्योति से
दुःख चाहे व्यक्तिगत हो या सामूहिक उनका कारण एक ही है और वह है कुबुद्धि। संसार में इतने प्रचुर परिमाण में सुख-साधन भरे पड़े हैं कि इन खिलौनों से खेलते-खेलते सारा जीवन हँसी-खुशी बीत सकता है। मनुष्य को ऐसा अमूल्य शरीर, मस्तिष्क एवं इन्द्रिय समूह मिला हुआ है कि इनके द्वारा साधारण वस्तुओं एवं परिस्थितियों में भी इतना आनन्द किया जा सकता है कि स्वर्ग भी उसकी तुलना में तुच्छ सिद्ध हो। इतना सब होते हुए भी लोग बेहाल दुःखी हैं, जिन्दगी में कोई रस नहीं, मौत के दिन पूरे करने के लिये समय को एक बोझ की तरह काटा जा रहा है। मन में चिन्ता, बेबसी, भय, दीनता और बेचैनी की अग्नि दिन भर जलती रहती है। जिसके कारण पुराणों में वर्जित नारकीय यात्राओं जैसी व्यथाएं सहनी पड़ती हैं।
यह संसार चित्र सा सुन्दर है इसमें कुरूपता का एक कण भी नहीं, यह विश्व विनोदमयि क्रीड़ा का प्राँगण है इसमें चिन्ता और भय के लिए कोई स्थान नहीं, यह जीवन आनन्द का निर्वाध निर्भर है इसमें दुःखी रहने का कोई कारण नहीं। स्वर्गादपि गरीयसी इस जननी जन्म भूमि में वे सभी तत्व मौजूद हैं जो मानस की कली को खिलाते हैं। इस सुरदुर्लभ नर तन की रचना ऐसे सुन्दर ढंग से हुई है कि साधारण वस्तुओं को वह अपने स्पर्श मात्र से ही सरस बना लेता है।
परमात्मा का राजकुमार आत्मा इस संसार में क्रीड़ा कल्लोल करने आता है। उसे शरीर रूपी रथ, इन्द्रियों रूपी सेवक, मस्तिष्क रूपी मंत्री देकर परमात्मा ने यहाँ इसलिये भेजा है कि इस नन्दन वन जैसे संसार की शोभा को देखे, उसमें सर्वत्र बिखरी हुई सरसता का स्पर्श और आस्वादन करे। प्रभु के इस महान उद्देश्य में बाधा उपस्थित करने वाली, जीवन के महान प्रयोजन को नष्ट करने वाली, स्वर्ग को नरक बना देने वाली कोई वस्तु है तो वह केवल ‘कुबुद्धि ही है’।
स्वस्थता हमारी स्वाभाविक स्थिति है, बीमारी अस्वाभाविक एवं अपनी भूल से पैदा हुई वस्तु है। पशु-पक्षी जो प्रकृति का स्वाभाविक अनुसरण करते हैं, बीमार नहीं पड़ते, वे सदा स्वास्थ्य का सुख भोगते हैं पर मनुष्य नाना प्रकार की मिथ्या आहार-विहार द्वारा बीमारी को न्यौता बुलाता है। यदि वह भी अपना आहार-विहार प्रकृति के अनुकूल रखे तो कभी बीमार न पड़े। इसी प्रकार सद्बुद्धि स्वाभाविक है। वह ईश्वर प्रदत्त है, दैवी है, जन्मजात है, जीवन संगिनी हैं।
क्रमश जारी....
अखण्ड ज्योति 1951 जून
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