Wednesday 29, October 2025
अमृत सन्देश:- अपनी पहचान कर्म से बनाओ। Apni Pehchan Karm Se Bnao पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य
गायत्री मंत्र वन्दनीय माता जी की आवाज में | Gayatri Mantra Mata Bhagwati Devi Mata ji Voice
गायत्रीतीर्थ शांतिकुंज, नित्य दर्शन
आज का सद्चिंतन (बोर्ड)
आज का सद्वाक्य
नित्य शांतिकुंज वीडियो दर्शन
!! शांतिकुंज दर्शन 29 October 2025 !! गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार !!
अमृतवाणी:- क्या विज्ञान से बड़ी है भावनाओं की शक्ति परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
परम् पूज्य गुरुदेव का अमृत संदेश
लक्ष्यविहीन प्रगति की परिणति निश्चय ही भयावह होगी। चिंतन की विकृति की अदृश्य जगत में प्रतिक्रिया, प्रकृति प्रकोप एवं विक्षुब्ध वातावरण के रूप में देखी जा सकती है। ऐसा लगता है, मानव सामूहिक महाविनाश की सुनियोजित तैयारी चल रही हो। परिस्थितियों को देखते हुए यह निष्कर्ष सत्य प्रतीत होता दिखता है।
समाधान एक ही है कि चिंतन, चरित्र और व्यवहार में आदर्शवादी आस्थाओं की प्रतिष्ठापना करने वाली देव संस्कृति को पुनर्जीवित किया जाए। शालीनता, सहकार, स्नेह, सद्भाव से भरा जीवन ही भारत की देव संस्कृति का पर्याय है। इसकी अपेक्षा से मनुष्य के पतन का माहौल बना है।
मानवीय गरिमा को सुरक्षित रखने वाली देव संस्कृति को प्रखर बनाया जाना ही आज का युग धर्म है। भारतीय संस्कृति के अनुयाई भले ही किसी भी देश में रहते हों, उनमें से प्रत्येक का यह कर्तव्य है कि वह अपनी-अपनी संतति की ही नहीं, सारे संसार की सुख-शांति हेतु फिर से उन देव परंपराओं को पुनर्जीवित करने में भावभरा योगदान दें, जिन्हें प्रचलित कर कभी भरतवासियों ने सतयुगी परिस्थितियां विनिर्मित की थी।
वैज्ञानिकों, बुद्धिजीवियों द्वारा पिछले दिनों किए गए कार्यों से यह कहीं अधिक महत्वपूर्ण है कि भावनाओं, आकांक्षाओं एवं गतिविधियों में उत्कृष्टता का समावेश कर सकने में सर्वथा समर्थ देव संस्कृति के स्वरूप एवं उद्देश्य को सही रूप में संसार भर के सम्मुख प्रस्तुत करने में कुछ उठाया न रखा जाए। इसके सहारे ही मानवता को विनाश की चुनौती से बचाया जा सकता है।
समय की मांग है कि ध्वंसलीला आरंभ होने के पूर्व ही संस्कृति के अग्रदूत चेतें और उज्ज्वल भविष्य के मार्ग में आए अवरोधों को दूर हटाएं।
परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड-ज्योति से
‘कुबुद्धि’ को ही माया, असुरता, अविद्या, आदि नामों से पुकारते हैं। यह आवरण मनुष्य की मनोभूमि पर जितना मोटा चढ़ा होता है वह उतना ही दुखी पाया जाता है। शरीर पर मैल की जितनी मोटी तह जम रही होगी उतनी ही खुजली मचेगी और दुर्गन्ध उड़ेगी, यह तह जितनी ही कम होगी उतनी ही खुजली और दुर्गन्ध कम होगी। शरीर में दूषित, विजातीय विष एकत्रित न हो तो किसी प्रकार को कोई रोग न होगा।
पर यह विकृतियाँ जितनी अधिक जमा होती जायेगी शरीर उतना ही रोग-ग्रस्त होता जायेगा। ‘कुबुद्धि’ एक प्रकार से शरीर पर जमी हुई मैल की तह या रक्त में भरी हुई विषैली विकृति है जिसके कारण खुजली, दुगन्ध, बीमारी तथा अनेक प्रकार की अन्य असुविधाओं के समान जीवन में नाना प्रकार की पीड़ा, चिन्ता, बेचैनी और परेशानी उत्पन्न होती रहती है।
लोग नाना प्रकार के कष्टों से दुखी हैं। कोई बीमारी से कराह रहा है, कोई गरीबी से दुखी है, किसी का दाम्पत्य जीवन कष्टमय है, किसी को सन्तान की चिंता है, व्यापार में घाटा, उन्नति में अड़चन, असफलता की आशंका, मुकदमा, शत्रु के आक्रमण का भय, अन्याय का उत्पीड़न, मित्रों का विश्वासघात, दहेज की चिन्ता, प्रियजनों का विछोह, आदि का दुख आये दिन दुखी बनाये रहता है।
व्यक्तिगत जीवन की भाँति धार्मिक, आर्थिक, सामाजिक, राजनैतिक एवं अन्तर्राष्ट्रीय क्षेत्रों में भी अशान्ति कम नहीं है। यदि कोई व्यक्ति अपने आपको बहुत सम्भाल कर रखे, तो भी व्यापक बुराइयों एवं कुव्यवस्थाओं के कारण उसकी शान्ति नष्ट हो जाती है और जीवन का आनन्दमय उद्देश्य प्राप्त करने में बाधा पड़ती है।
क्रमश जारी....
अखण्ड ज्योति 1951 जून
| Newer Post | Home | Older Post |
