Tuesday 28, October 2025
गायत्री मन्त्र वैदिक परम्परा का सर्वोत्कृष्ट मन्त्र, Gayatri Mantra Sarvotkrisht | Dr Chinmay Pandya
अमृत सन्देश:- क्या दूसरों से उम्मीदें रखना ठीक है | Kya Dusron Se Ummedein Rakhna Theek Hai? पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य
गायत्रीतीर्थ शांतिकुंज, नित्य दर्शन
आज का सद्चिंतन (बोर्ड)
आज का सद्वाक्य
नित्य शांतिकुंज वीडियो दर्शन
!! शांतिकुंज दर्शन 28 October 2025 !! गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार !!
अमृतवाणी:- भौतिक प्रगति - वरदान या अभिशाप परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
परम् पूज्य गुरुदेव का अमृत संदेश
बंधुओं, भारत में जन्मीं देव संस्कृति विश्व संपदा है। सूरज पूर्व से निकलता तो है, तो भी संसार की प्राण चेतना को प्रदान करता है। सूर्य किरणों की तरह ही देव संस्कृति ने भी पुरातन काल में संसार भर के मनुष्यों को प्रगति, व्यवस्था, शालीनता का पाठ पढ़ाया है। मध्यकाल में छाए कुछ शताब्दियों के कुहासे के छट जाने के बाद, अब फिर ऐसी स्थिति है कि यह विश्व के पुनर्निर्माण में अपना महा योगदान देने की भूमिका संपन्न कर सके।
गत सौ वर्षों में भौतिक दृष्टि से विश्व प्रगति की दिशा में आगे बढ़ा है। वैज्ञानिक आविष्कारों ने सुविधा साधन बढ़ाए हैं। आर्थिक और बौद्धिक दृष्टि से हुई इस प्रगति के बावजूद हम पाते हैं कि शरीर और मानसिक स्वास्थ्य की दृष्टि से मनुष्य और भी अधिक दुर्बल, उद्विग्न, अधिक संकीर्ण एवं अभावग्रस्त होता गया है।
परिवार संस्था में न अब पारस्परिक स्नेह रह गया है, न सहकार। आपस के टकराव और आपाधापी की नीति के कारण अपराधी दुष्प्रवृत्तियों की ऐसी बाढ़ आई है, जिसने चिर संचित सभ्यता को समूल नष्ट करने की चुनौती खड़ी कर दी है।
कुल मिलाकर आज का व्यक्ति पूर्वजों की तुलना में चेतना की दृष्टि से दीन, दरिद्र और संवेदना शून्य हो चला है, भले ही बाहर से वह संपन्नता, शालीनता का मुखौटा बांधे क्यों न फिरता हो।
दूरदर्शियों का कथन है कि प्रगति के साथ बढ़ती हुई दुर्गति से व्यक्ति की जो दुर्गति हुई है, उसके परिणाम सारे संसार के लिए अभिशाप बनकर भविष्य को अंधकारमय किए दे रहे हैं।
अखण्ड-ज्योति से
मनुष्य ईश्वर का उत्तराधिकारी एवं राजकुमार है। आत्मा परमात्मा का ही अंश है। अपने पिता के सम्पूर्ण गुण और वैभव बीज रूप उसमें मौजूद है। जलते हुए अंगार में जो शक्ति है वही छोटी चिनगारी में भी मौजूद है। इतना होते हुए भी हम देखते हैं कि मनुष्य बड़ी निम्न कोटि का जीवन बिता रहा है। दिव्य होते हुए भी दैवी सम्पदाओं से वंचित हो रहा है।
परमात्मा सत् है, परन्तु उसके पुत्र हम असत् में निमग्न हो रहे हैं। परमात्मा आनन्द स्वरूप है हम दुःखों से संतप्त हो रहे हैं। ऐसी उल्टी परिस्थिति उत्पन्न हो जाने का कारण क्या है। यह विचारणीय प्रश्न है। जबकि ईश्वर का अविनाशी राजकुमार अपने पिता के इस सुरम्य उपवन संसार में विनोद क्रीड़ा करने के लिये प्राया हुआ है तो उसकी जीवन यात्रा आनन्दमयी न रहकर दुख दरिद्र से भरी हुई क्यों बन गई है? यह एक विचारणीय पहेली है।
अग्नि स्वभावतः उष्ण और प्रकाशवान् होती है, परन्तु जब जलता हुआ अंगार बुझने लगता है तो उसका ऊपरी भाग राख से ढ़क जाता है। तब उस राख से ढके हुए अंगार में वे दोनों ही गुण दृष्टिगोचर नहीं होते जो अग्नि में स्वभावतः होते हैं। बुझा हुआ, राख से ढ़का हुआ अंगार न तो गरम होता है और न प्रकाशवान्। वह काली-कलूटी कुरूप भस्म का ढेर मात्र बना हुआ पड़ा रहता है। जलते हुए अंगार को इस दुर्दशा में पहुँचाने का कारण वह भस्म है जिसने उसे चारों ओर से घेर लिया है, यदि यह राख का परत ऊपर से हटा दिया जाय तो भीतरी भाग में फिर वैसी ही अग्नि मिल सकती है जो अपने उष्णता और प्रकाश के गुण से सुसम्पन्न हो।
परमात्मा सच्चिदानन्द है। वह आनन्द से ओत-प्रोत है। उसका पुत्र आत्मा भी आनन्दमय ही होना चाहिए। जीवन की विनोद क्रीड़ा करते हुए इस नन्दनवन में उसे आनन्द ही आनन्द अनुभव होना चाहिए। इस वास्तविकता को छिपाकर जो उसके बिल्कुल उलटी दुःख-दरिद्र और क्लेश-कलह की स्थिति उत्पन्न कर देती है वह कुबुद्धि रूपी राख है। जैसे अंगार को राख ढ़क कर उसको अपनी स्वाभाविक स्थिति से वंचित कर देती है वैसे ही आत्मा की परम सात्विक, परम आनन्दमयी स्थिति को यह कुबुद्धि ढ़क लेती है। और मनुष्य निकृष्ट कोटि का दीन-हीन जीवन व्यतीत करने लगता है।
क्रमश जारी....
अखण्ड ज्योति 1951 जून
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