Saturday 06, September 2025
क्या ज्ञानदान वास्तव में सबसे बड़ा दान है? पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य
परम वंदनीय माताजी को भावभीनी श्रद्धांजलि | महाप्रयाण दिवस
व्यक्त्वि की समग्र साधना हेतु चान्द्रायण तप | Vyaktitva Ki Samagra Sadhna Hetu Chandrayan Tap
🌺 अनंत चतुर्दशी की शुभकामनाएं! 🌺
अमृतवाणी:- त्रिपदा गायत्री का रहस्य | Gayatri Tripda Ka Rehsay पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य
हम जो बोते है वही पाते है The law of karma
गायत्रीतीर्थ शांतिकुंज, नित्य दर्शन
आज का सद्चिंतन (बोर्ड)
आज का सद्वाक्य
नित्य शांतिकुंज वीडियो दर्शन
!! शांतिकुंज दर्शन 06 September 2025 !! गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार !!
अमृतवाणी: हमारी लड़कियाँ तपस्वानी बनकर जाएँ पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य
परम् पूज्य गुरुदेव का अमृत संदेश
अगर आप मर्द हैं, तो आप स्त्रियों के बारे में होशियार रहना। स्त्रियों के बारे में होशियार रहना।
कोई बहन-भाई रिक्शे में बैठकर के साथ-साथ जाते हैं और हंसते हुए जाते हैं, हर आदमी यह कहता है — यह प्रेमी-प्रेमिका जा रहे हैं और किसी की औरत को भगा के ला रहा है।
देखने वाला हर आदमी कहता है, देखने वाला हर आदमी कहता है।
किसी सयानी लड़की को आप बार-बार बुलाते हैं, बार-बार आवाज देते हैं — “तुम यह कर लेना, तुम यह कर लेना” — क्यों? इतने आदमी बैठे हुए हैं, उनसे क्यों नहीं कहते?
तो — गुरुजी, आप महिलाओं को, लड़कियों को बुरा मानते हैं और आप उनको दूर करना चाहते हैं?
बेटे, मैं दूर नहीं करना चाहता।
मैं लड़कियों को मुझसे ज़्यादा बढ़ाने वाला कौन हो सकता है? कौन मुझसे ज़्यादा प्रोत्साहन करेगा?
लेकिन — आप आंखें नीचे रखिए, नीचे रखिए। और आंख से आंख मिलाकर के लड़कियों की तरफ मत देखिए।
और जहां तक हो सके, शरीर से काफी दूर रहिए, काफी दूर रहिए।
और जहां तक हो सके, आप यह कोशिश कीजिए कि लड़कियों से कोई बातचीत करनी पड़े, तो कई लड़कियां हों या कई लड़के हों — अकेले मत कीजिए।
अकेले में जब आप बात कर रहे होंगे — चाहे आप कोई बात कर रहे हों, खाने-पीने की बात कर रहे हों — “हमको बैंगन का स्वाद अच्छा नहीं लगता, तुम हमारे लिए टमाटर की चटनी बना देना।”
तो हैं यही ये — लेकिन सारा आदमी ये समझेगा कि ये कोई गलत बात कहते हैं और खराब बात कह रहे हैं।
लड़कियों के बारे में, महिलाओं के बारे में — पुरानी प्राचीन परंपरा ये थी कि साधु जो हैं, जो इसके स्वामी नारायण संप्रदाय है गुजरात में — उनमें उन लोगों का ये है कि कोई साधु किसी स्त्री से अपना शरीर नहीं छुआ सकता।
मैं उतना ज़्यादा आदर्शवादी तो नहीं हूं, लेकिन मैं ये ज़रूर चाहता हूं कि आपकी आंखों में शील हो और मर्यादा हो।
स्त्रियों के बारे में।
और मैं महिलाओं से कहता हूं — कि तुम कहीं शाखाओं में जा रही हो, तुम प्रचार करने जा रही हो — तो लड़कियों, हमारी इज्जत का ध्यान रखना।
इज्जत का — हमारी का ध्यान रखना।
तुम क्या कहती हो, क्या बोलती हो, क्या व्याख्यान देती हो — उसकी दो कौड़ी की कीमत है।
सबसे बड़ी कीमत यह है — कि ये शांतिकुंज की लड़कियां हैं। इसमें तमीज है कि नहीं? और शौर्य है कि नहीं?
दांत फाड़ के "ही ही ही" करोगी और ड्रेस उल्टे-सीधे कपड़े पहन के बैठोगी — तो बेटे, हम मर जाएंगे।
अच्छी तरीके से जाना।
यहां लड़कियों को तूने देखा नहीं? यहां भेजते हैं और उनको रुद्राक्ष की माला पहना के, रुद्राक्ष की माला पहना के भेजते हैं। कपड़े पहना के भेजते हैं।
और हम उनको तपस्वी के रूप में भेजते हैं।
तो महिला जागृति की लड़कियां — जहां कहीं भी जाओ, सिर्फ तपस्वी के रूप में जाना।
अपने घर में जो चाहना वो पहनना।
कभी स्टेज के ऊपर, कभी किसी मंच पर, किसी सामाजिक सभा में — इस तरह का लिबास पहन के मत जाना, जो हमारी शान के खिलाफ है।
अखण्ड-ज्योति से
संसार की उत्पत्ति भगवान से हुई है और भगवान ही सारे जगत में परिपूर्ण हैं। मनुष्य अपने कर्मों द्वारा इन भगवान की पूजा करके परम सिद्धि रूप भगवान को सहज ही प्राप्त कर सकता है। जो जिस कार्य को करता हो, जिसका जो स्वाभाविक कर्म हो उसी को करे, न तो सबके कर्म एक से हो सकते हैं और न एक सा बनाने की व्यर्थ चेष्टा ही करनी चाहिये। नाटक में सभी पात्र एक ही पात्र का पार्ट करना चाहें तो वह खेल बिगड़ जायेगा। इसलिये अपनी अपनी जगह सभी की जरूरत है और सभी का महत्व है। राजा और मजदूर दोनों की ही आवश्यकता है और दोनों ही अपना अपना महत्व रखते हैं। इसलिये कर्म न बदलो मन के भाव को बदल डालो। कर्म का छोटा बड़ा पन बाहरी है। महत्व तो हृदय के भाव का है। ऊँच नीच का भाव रखकर राग द्वेष पूर्वक पराये अहित के लिये लोक दृष्टि में शुभ कर्म करने वाला नरक गामी हो सकता है।
स्वार्थ को सर्वथा छोड़कर निष्काम भाव से श्री भगवान की प्रीति के लिये भगवद्ज्ञानसार साधारण स्वकर्म करता हुआ ही मनुष्य परम सिद्धि रूप परमात्मा को पा सकता है। मनुष्य इस प्रकार अपने प्रत्येक कर्म को मुक्ति या भगवत् प्राप्ति का साधन बना सकता है। जिस कर्म में काम, क्रोध, लोभ आदि नहीं हैं जिसमें भगवान को छोड़कर अन्य किसी भी फल की आकाँक्षा नहीं हैं जो कर्म की अथवा फल की आसक्ति से नहीं किन्तु भगवान के दिये हुये स्वाँग का खेल अच्छी तरह खेलने की इच्छा से निरन्तर भगवत्- स्मरण करते हुये भगवत् प्रीत्यर्थ सात्विक कर्म उत्साह पूर्वक किया जाता है, उसी विशुद्ध कर्म से भगवान की पूजा होती है।
यह पूजा अपने किसी भी उपर्युक्त दोषों से रहित विहित स्वकर्म के द्वारा प्रत्येक स्त्री पुरुष सहज ही अपने अपने स्थान में रहते हुये ही कर सकता है। केवल मन के भाव को बदल कर कर्म का प्रवाह भगवान की ओर मोड़ देने की जरूरत है। फिर प्रत्येक कर्म तुम्हारी मुक्ति का साधन बन जायेगा और अपने सहज कर्मों को करते हुये भी तुम भगवान को प्राप्त कर जीवन सफल कर सकोगे।
क्रमशः जारी
अखण्ड ज्योति जनवरी 1960 पृष्ठ 9
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