Friday 05, September 2025
वर्तमान में हमारे देश का गौरव | समस्याओं का समाधान ऋषि चिंतन से | पं श्रीराम शर्मा आचार्य
जिंदगी जीनी हो तो इस तरह जिएँ | Jindegi Jeeni Ho Tho Es Tarah Jiyen
पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी का सुनिश्चित विश्वास | गायत्री मन्त्र के शब्दों का दिव्य सन्देश
बुद्ध की नमन परंपरा : अहंकार को छोड़कर ही ईश्वरीय मार्ग पर चलना संभव है। | Rishi Chintan
विद्या का वितरण | Vidhya Ka Vitran
IN Sign in आज के समय के सन्दर्भ में गुरुदेव के शब्द | Aaj Ke Samay Ke Sandarbh Gurudev Ke Shabd | Dr Chinmay
अमृतवाणी:- नशा छोड़ने का आसान तरीका क्या है | Nasha Chodne Ka Aasan Tarika Kya Hai पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य
गायत्रीतीर्थ शांतिकुंज, नित्य दर्शन
आज का सद्चिंतन (बोर्ड)
आज का सद्वाक्य
नित्य शांतिकुंज वीडियो दर्शन
!! शांतिकुंज दर्शन 05 September 2025 !! गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार !!
अमृतवाणी: मिशन तुम्हारे व्यवहार पर टिका है पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य
परम् पूज्य गुरुदेव का अमृत संदेश
पैसे के संबंध में आप अपना छाप यह डाल के आना — पैसे के बारे में आप निष्पृह हैं। पैसे के बारे में आप निष्पृह हैं।
कहीं आपने ऐसा शुरू कर दिया कि आरती उतारी और आरती में बस पैसे डालना शुरू किया। वह जमा हुआ है, उसमें से एक मुट्ठी जेब में डाल लिए — तो बेटे, हर आदमी की आंख देख लेगी और तेरी इज्जत जाएगी, गायत्री माता की इज्जत जाएगी, वानप्रस्थ आश्रम की इज्जत जाएगी, और हमारी इज्जत जाएगी, और भगवान की इज्जत जाएगी।
हिंदू धर्म और संस्कृति और परंपरा की इज्जत जाएगी, गायत्री माता की इज्जत जाएगी।
फिर क्या करना चाहिए पैसे के बारे में?
पैसे के बारे में आप जानना चाहते हो तो ठीक है। आप अपने घर में क्या दुकान करते हैं, क्या नहीं करते हैं — वहां बेईमानी कर सकते हैं। लेकिन वहां, जहां आपको हजारों-हजारों आदमी देख रहे हैं, और भगवान देख रहा है, और जहां आप ऋषि की वेदी पर बैठे हुए हैं — वहां सिर्फ पैसे की चालाकी मत करना।
पैसे की चालाकी आप करेंगे तो बेटे बड़ा मट्टी पलीत हो जाएगी।
पैसे का सवाल नहीं है — सवाल आपकी ईमानदारी का है। और सवाल इस बात का है कि आपका तौल और आपका वजन इस लायक है कि नहीं।
आप दो-दो पैसों के ऊपर ईमान खराब करते हैं, तो हम कैसे मानेंगे कि आप कोई ऐसे चरित्रवान आदमी हैं? और ऐसे आदमी हैं जो नया युग लाने के लिए लोगों के सामने नमूना पेश कर सकते हैं?
पैसे के बारे में मत करना। पैसे के बारे में कुछ मत करना।
जहां से एक-एक पैसा आए — रसीद है, रसीद देना। वहां आपके पास रसीद ना हो, तो हाथ की पर्ची काट के दे आना — “देखिए, हम गायत्री तपोभूमि जा रहे हैं और आपके यह 11 रुपये मिले हैं। हम वहां से रसीद भेजेंगे। जब तक कि आपकी जानकारी के लिए, ताकि हम बेईमानी ना कर लें, आपको अपने हाथ की पर्ची लिखकर के दे जाते हैं — 11 रुपये हमको आपके मिले हैं। रसीद हम वहां से भेजेंगे।”
यहां तक कि किराया-भाड़ा भी कहीं दें — आप किराया-भाड़ा का भी उनको पर्ची बनाकर के दे आना।
आपने देखा नहीं है?
रेलवे से टिकट लेते हैं। और जो गवर्नमेंट के स्टाफ के आदमी हैं, रेलवे वालों से रसीद ले लेते हैं — “हमने टिकट खरीदा है।”
बेटे, आपको टिकट कोई देता हो तो भी आप रसीद देना। और उसकी कागज की रसीद भिजवाना। और टिकट का पैसा नाम डलवाना। नाम डलवाना।
पैसे के बारे में — पैसे के बारे में अगर आपने खरा पन अपना कायम रखा, तो बेटे हमारी इज्जत कायम रहेगी और हमारे मिशन की इज्जत कायम रहेगी।
और लोगों ने आपके बारे में ये ख्याल बनाना शुरू कर दिया कि ये बड़ा पैसे के बारे में ढीला आदमी है, पैसे के बारे में चालक आदमी है — बस बेटे, फिर आपका श्लोक बोलना, मंत्र बोलना और आपका अमुक करना — सब एक ओर। और पैसे की चालाकी एक ओर।
दूसरी एक और बात बताता हूं।
जहां आप जाएंगे, आपके प्रति आकर्षण पैदा होगा। आपको बड़ा आदमी माना जाएगा, वजनदार आदमी माना जाएगा।
अखण्ड-ज्योति से
शिक्षक, आचार्य, गुरु एवं सद्गुरु समाज के दिव्य प्रकाश-स्रोत होते हैं। वे ज्ञान एवं चेतना की एक अवस्था विशेष के दिव्य प्रतीक प्रतिनिधि हैं। कला सिखाने वाला शिक्षक, जिंदगी सिखाने वाला आचार्य, चेतना के गहन मर्म से परिचय कराने वाला गुरु एवं शिष्य को अपने में मिला लेने वाला तत्त्व सद्गुरु कहलाता है। ये चारों तत्त्व आपस में घुले-मिले तो हैं, पर एक नहीं हैं। हर एक की अपनी सीमा एवं सामर्थ्य होती है, परंतु अनगढ़ व्यक्तित्व को सुधार-सँवारकर भौतिक एवं आत्मिक रूप से परिपूर्ण करने में इनका अपना-अपना मौलिक योगदान रहता है।
शिक्षक ज्ञान की किसी कुशलता का विशेषज्ञ होता है। वह कुशलता के विशेष आयामों को खोलता एवं अनावृत्त करता है। उसमें अपने क्षेत्र विशेष का विशेष एवं गंभीर ज्ञान होता है। उसमें विषय विशेषरूपी प्रतिभा का गंभीर विकास हुआ रहता है। शिक्षक को अपने विषय का गहरा अनुभव होता है और वह इस अनुभव का स्पर्श विद्यार्थी को भी करा देता है। शिक्षक में शिक्षार्थी के भीतर कुशलता को विकसित करने की अपार क्षमता होती है। उसमें शिक्षार्थी को अपने जैसा तथा अपने से भी बेहतर एवं निष्णात बना देने की कला होती है।
साधारण से छात्र को अत्यंत प्रतिभावान शोधार्थी के रूप में गढ़ देने की विशेषज्ञता शिक्षक का दिव्य परिचय है। शिक्षक ज्ञान का समुद्र होता है, जिसमें कला-कुशलताएँ उद्दाम लहरों की भाँति उफनती-उमड़ती रहती हैं। वह शिक्षार्थी के जीवन में इन कुशलताओं की बाढ़ ला देता है। वह उसे असाधारण प्रतिभा से निष्णात एवं पारंगत कर देता है। इस प्रकार शिक्षक ज्ञान का, कुशलता का बोध कराता है, परंतु जहाँ जिंदगी जीने की कला सिखाने की बारी आती है, शिक्षक असहाय और असमर्थ हो जाता है। इस बिंदु पर उसकी सारी सीमाएँ समाप्त हो जाती हैं, क्योंकि वह इस विषय से अनभिज्ञ एवं अपरिचित-सा होता है। सर्जन अपने ऑपरेशन थिएटर में सर्जरी का ज्ञान देता है, परंतु जिंदगी की सर्जरी की कला नहीं बता पाता। यह थोड़ा कठिन है, क्योंकि जिंदगी जीकर ही सीखी जा सकती है। स्वयं के व्यक्तित्व को परिष्कृत-परिमार्जित करके ही दूसरों के व्यक्तित्व को गढ़ा जा सकता है।
आज समाज, राष्ट्र और विश्व में प्रतिभाओं की कमी और अभाव नहीं है। मेडिकल, टेक्नीकल, प्रोफेशनल कॉलेजों से अव्वल दरजे में निकलने वाले प्रतिभावान छात्रों की कमी नहीं है और न ही पब्लिक कॉर्पोरेट सेक्टर एवं प्रोफेशनल कॉलेजों में एक्जेक्यूटिव ऑफिसर एवं प्रोफेसरों का अभाव है, परंतु ये विशेषज्ञ शिक्षक एवं प्रतिभाशाली छात्र दोनों ही जिंदगी जीने के मामले में दुर्बल एवं कमजोर हैं। इनका आंतरिक व्यक्तित्व बिखरा, धुँधला एवं खोखला-सा दिखाई देता है। ये किसी गहरी प्यास से प्यासे लगते हैं। इनकी भावना भटकी हुई, अतृप्त एवं अनबुझी होती है। इन्हें बौद्धिकता तो मिली, परंतु अनुभव नहीं मिला, प्रवीणता तो प्राप्त हुई, परंतु व्यक्तित्व नहीं सँवरा और न अनुभव कराने वाला, सँवारने वाला आचार्यरूपी शिक्षक मिला।
अखण्ड ज्योति फरवरी 2000 पृष्ठ 6
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