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Thursday 04, September 2025

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योग साधना के तीन मार्ग \ Yog Sadhna Ke Teen Marg

योग साधना के तीन मार्ग \ Yog Sadhna Ke Teen Marg

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भय | श्रद्धेय डॉ प्रणव पण्ड्या | Bhay | Shraddheya Dr. Pranav Pandya

भय | श्रद्धेय डॉ प्रणव पण्ड्या | Bhay | Shraddheya Dr. Pranav Pandya

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उपासना की सफलता के तीन आधार | Upasana Ki Saflata Ke Teen Aadhar

उपासना की सफलता के तीन आधार | Upasana Ki Saflata Ke Teen Aadhar

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जल तत्व का प्रयोग | Jal Tatva Ka Prayog

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अमृतवाणी:- खर्चीली शादियाँ हमें कैसे दरिद्र बनाती हैं | Kharchi Shadi Hame Beiman Banati Hai पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य

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अखंड ज्योति का कागज़ गुरुदेव स्वयं बनाते थे | डॉ. चिन्मय पण्ड्या जी | Shantikunj Rishi Chintan

अखंड ज्योति का कागज़ गुरुदेव स्वयं बनाते थे | डॉ. चिन्मय पण्ड्या जी | Shantikunj Rishi Chintan

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गायत्रीतीर्थ शांतिकुंज, नित्य दर्शन

गायत्री माता
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गायत्री माता - अखंड दीपक
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चरण पादुका
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चरण पादुका
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सजल श्रद्धा - प्रखर प्रज्ञा (समाधि स्थल)
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परम् पूज्य गुरुदेव व वंदनीय माताजी कक्ष
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परम् पूज्य गुरुदेव व वंदनीय माताजी कक्ष
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प्रज्ञेश्वर महादेव - देव संस्कृति विश्वविद्यालय
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शिव मंदिर - शांतिकुंज
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हनुमान मंदिर - शांतिकुंज
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आज का सद्चिंतन (बोर्ड)

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आज का सद्वाक्य

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नित्य शांतिकुंज वीडियो दर्शन


!! परम पूज्य गुरुदेव का कक्ष गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार 04 September 2025 !!

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!! अखण्ड दीपक #Akhand_Deepak (1926 से प्रज्ज्वलित) चरण पादुका गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार 04 September 2025 !!

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!! शांतिकुंज दर्शन 04 September 2025 !! गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार !!

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अमृतवाणी: भजन ही आत्मा का भोजन है पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य

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परम् पूज्य गुरुदेव का अमृत संदेश



अपनी नियमितता के संबंध में, पूजा और भजन के संबंध में — पूजा और भजन हमारा मुख्य उद्देश्य है बेटे। हमने भजन सिखाया है, लोगों को भजन सिखाएंगे। भजन के प्रति बड़ी हमारी एक निष्ठा है।
अभी आप क्या कह रहे थे? अभी हम ये कह रहे थे कि भजन को तू जिस तरीके से करना चाहता है, उसकी मैं बात कहता हूं। मैं जो भजन सिखाता हूं, वो तो हमारा जीवात्मा का साबुन है। वो तो हमारा जीवन का ध्रुवतारा है, वो तो हमारा प्राण है।
हम रोटी खाए बिना ज़िंदा रह सकते हैं, लेकिन भजन के बिना ज़िंदा नहीं रह सकते, क्योंकि हमारे लिए सांस की जरूरत है और भगवान के प्रकाश की जरूरत है। सांस और भगवान का प्रकाश, हमारी दृष्टि से दोनों एक बराबर हैं।
लेकिन हमारा अलग है, आपका अलग है। जिस दृष्टि से आप लेते हैं, उससे मुझे नाराज़गी है। जिस दृष्टि से मैं लेता हूं, बेटे, उसका तो मैं प्रचार करना चाहता हूं, फैलाना चाहता हूं।
आप जहाँ कहीं भी बाहर जाएं, अपनी नियमितता के बारे में इन बातों को ध्यान रखना। आपकी किसी चीज में नागा हो जाए — आज तो बड़े थके हुए आए हैं, ला अभी सोएंगे — नहीं बेटे। संध्या का समय है तो पहले संध्या करना।
रामचंद्र जी के इस बारे में, जब वह सीता जी को तलाश करने गए तो उन्होंने अपने वियोग में विलखते हुए देखा — अब संध्या काल हो गया। सीता कहीं भी हो गई, किसी भी हैसियत में हो गई, लेकिन अपना भजन करने के लिए और संध्या करने के लिए इस नदी के तालाब पर जरूर आएगी।
संध्या के बारे में गैरहाज़िरी मत करना। संध्या के बारे में नागा मत करना। नागा मत करना। भजन के बारे में कहीं नागा मत करना। भजन के बारे में कहीं नागा मत करना।
और जबान से आप मिठास बरसाना, अमृत बरसाना, प्यार बरसाना, प्यार बरसाना और लोगों की प्रशंसा करना।
आपने जो आदत सारी जिंदगी भर रही है, शायद वही आदत वहां भी जाने लगी है। तो बेटी, हमारी भी इज्जत खराब हो जाएगी, तेरी भी इज्जत खराब होगी। बाहर जहाँ कहीं भी जाएं, जिन लोगों से मिलें — उनकी प्रशंसा करना तेरा पहला काम है।
"आपने बड़ी मशक्कत से यज्ञ किया", "आपने बहुत अच्छी तरीके से यह पंडाल बनाया", "और आपने कैसी तैयारियाँ की हैं", "और आपको दो महीना समय लग गया", "काम छोड़े बैठे हैं" — खूब भरपूर प्रशंसा करना उनकी।
और प्रशंसा के बाद में, जहाँ कमी दिखाई पड़ती हो — "भाई साहब, अगर ऐसा संभव हो जाए कि इसकी जगह पर हम यह काम कर लें तो कैसा अच्छा रहेगा? बताइए क्या राय है?" — जो आप कहें, तो ठीक है। पर यहां कुछ इंतजाम नहीं हो सका।
"अरे देखिए, कोशिश करते हैं, फिर शायद इंतजाम हो जाए।"
आप एजेंट से कहेंगे क्या? आप उसके प्रेस्टीज को चोट मत मारिए। अहं को मत मारिए चोट। आप इस ढंग से मत कहिए जिससे उसकी इज्जत... "अरे आपको तो क्या आता है", "देखिए ये बना के रख दिया है", "ये देखिए, पंडाल कहीं ऐसा होता है क्या?", "ये देखिए तख़्त — इस पर हम बैठेंगे?", "ये टूटा हुआ तख़्त है", "और देखिए, आपको तो ये भी नहीं आता", "ये भी नहीं आता!"
बेटे, यहाँ आप नुक्ताचीनी करेंगे — ठीक है, उस आदमी की गलती तो आप बता ही देंगे। लेकिन आप में अपना घटियापन... अपना घटियापन पेश आता है। यह आप बड़े घटिया आदमी हैं। आपको प्यार करना नहीं आता। आपको मोहब्बत नहीं आती। आपको दुलार करना नहीं आता। आपको प्रोत्साहन देना नहीं आता।
आपकी जुबान में बिच्छू का डंक है। आपको बिच्छू का डंक लेकर मत जाना। हमने कोई ऐसा वानप्रसथी नहीं बनाया है, कोई ऐसा नेता हम नहीं बनाना चाहते जो बिच्छू का डंक जीभ में लेकर के जाए। जीभ में लेकर के जाए।
आप वहाँ नम्र होकर के जाना, सज्जन होकर के जाना और सही होकर के जाना। दो बातों का और ध्यान रखना — इसमें आप चूक मत करना कभी। इसमें आपने चूक कर डाली तो हम मर जाएंगे बस।

 

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अखण्ड-ज्योति से



हम प्रत्येक धर्मप्रेमी से करबद्ध प्रार्थना करते हैं कि धर्म के वर्तमान विकृत रूप में संशोधन करें और उसको सुव्यवस्थित करके पुनरुद्धार करें। धर्माचार्यों और आध्यात्म शास्त्र के तत्वज्ञानियों पर इस समय बड़ा भारी उत्तरदायित्व है, देश को मृत से जीवित करने का, पतन के गहरे गर्त में से उठाकर समुन्नत करने की शक्ति उनके हाथ में है, क्योंकि जिस वस्तु से-समय और धन से-कौमों का उत्थान होता है, वह धर्म के निमित्त लगी हुई हैं। जनता की श्रद्धा धर्म में है। उनका प्रचुर द्रव्य धर्म में लगता है, धर्म के लिये छप्पन लाख साधु संत तथा उतने ही अन्य धर्मजीवियों की सेना पूरा समय लगाये हुए है।

 करीब एक करोड़ मनुष्यों की धर्म सेना, करीब तीन अरब रुपया प्रतिवर्ष की आय, कोटि-कोटि जनता की आन्तरिक श्रद्धा, इस सब का समन्वय धर्म में है। इतनी बड़ी शक्ति यदि चाहे तो एक वर्ष के अन्दर-अन्दर अपने देश में रामराज्य उपस्थित कर सकती है, और मोतियों के चौक पुरने, घर-घर वह सोने के कलश रखे होने तथा दूध दही की नदियाँ बहने के दृश्य कुछ ही वर्षों में दिखाई दे सकते हैं। आज के पददलित भारतवासियों की सन्तान अपने प्रातः स्मरणीय पूर्वजों की भाँति पुनः गौरव प्राप्त कर सकती है।

अखंड ज्योति धर्माचार्यों को सचेत करती है कि वे राष्ट्र की पंचमाँश शक्ति के साथ खिलवाड़ न करें। टन-टन पों-पों में, ताता थइया में, खीर-खाँड़ के भोजनों में, पोथी पत्रों में, घुला-घुला कर जाति को और अधिक नष्ट न करे, वरन् इस ओर से हाथ रोककर इस शक्ति को देश की शारीरिक, आर्थिक, सामाजिक, मानसिक शक्तियों की उन्नति में नियोजित कर दें। अन्यथा भावी पीढ़ी इसका बड़ा भयंकर प्रतिशोध लेगी।

आज के धर्माचार्य कल गली-गली में दुत्कारे जायेंगे और भारत-भूमि की अन्तरात्मा उन पर घृणा के साथ थूकेगी कि मेरी घोर दुर्दशा में भी यह ब्रह्मराक्षस कुत्तों की तरह अपने पेट पालने में देश की सर्वोच्च शक्ति को नष्ट करते रहे थे। साथ ही अखंड-ज्योति सर्वसाधारण से निवेदन करती है कि वे धर्म के नाम पर जो भी काम करें उसे उस कसौटी पर कस लें कि “सद्भावनाओं से प्रेरित होकर आत्मोद्धार के लिये लोकोपकारी कार्य होता है या नहीं।” जो भी ऐसे कार्य हों वे धर्म ठहराये जावें इनके शेष को अधर्म छोड़ कर परित्याग कर दिया जाय।

 अखण्ड ज्योति सितंबर 1942 पृष्ठ 7

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