Wednesday 03, September 2025
वर्तमान समय की समस्याएँ | Vartmaan Samay Ki Samasyayein | Pt Shriram Sharma Acharya
सफलता की कुंजी आत्मविश्वास | Safalta Ki kunji Aatamvishwas | पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य
"युग निर्माण के चार स्तंभ: समानता, सहकारिता, विश्व बंधुत्व और कर्तव्यनिष्ठा"
कर्म फल सिद्धांत : "रोगों का मूल कारण: कर्मों का फल"| Motivational Story
Fourth and final pilgrimage to the Himalayas Part 02 | My Life its & Legacy Message
अमृतवाणी:- शिक्षा ही है प्रगति का मार्ग | Siksha Hi Hai Pragati Ka Marg पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड ज्योति जब घरों में पहुँचे |Akhand Jyoti Jab Gharo Mei Pahuche Dr Chinmay Pandya
गायत्रीतीर्थ शांतिकुंज, नित्य दर्शन
आज का सद्चिंतन (बोर्ड)
आज का सद्वाक्य
नित्य शांतिकुंज वीडियो दर्शन
!! शांतिकुंज दर्शन 03 September 2025 !! गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार !!
अमृतवाणी: जीभ का स्वाद नहीं, संस्कार जरूरी है पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य
परम् पूज्य गुरुदेव का अमृत संदेश
जीभ के बारे में कहीं, जहाँ चीजें परोसी जा रही हों, वहाँ आप इस बात को देखना कि आपका इंटरव्यू लिया जा रहा है। इंटरव्यू लिया जा रहा है। जायकेदार चीजें, जो आपको पसंद हैं कि यह चीजें पसंद हैं — यह हमने आपको तो नहीं बता सकते, पर इन देवकन्याओं को, लड़कियों को हमने पढ़ा दिया था यहाँ से।
बेटी, तुम्हें कुछ खाना हो तो फिर यहाँ खा लेना। वहाँ जाकर के ध्यान से रहना, जैसे तुम यहाँ रहती हो। कोई मिठाई वगैरह प्रस्ताव हो — ज़रा सी चीज तो स्वागत के लिए ले लेना, लेकिन यह मत करना कि सारी की सारी मिठाइयाँ खाती रहो। तुम्हें उल्टी होने लगे और टट्टी होने लगे।
तो तुम्हें उल्टी टट्टी हो जाएगी, तो तुम बीमार पड़ जाओगे और हमारी बेइज्जती हो जाएगी। यह वहाँ नहीं रहती होंगी, ऐसे रहती होंगी। यहाँ से जीभ पर काबू लेकर गई थी।
आप जीभ पर काबू लेकर के जाना, क्योंकि आपका जनता के सामने इंटरव्यू हो रहा है। और जनता के सामने अपनी बातचीत पर लगाम रख के जाना। आपस में आप दो आदमी बात करते हो, आपकी दो आदमियों में तीसरा आदमी सुनता रहता है कि ये वानप्रस्थी आपस में क्या बात कर रहे हैं।
अरे, स्टेज पर तो हम बढ़िया-बढ़िया बात कहेंगे और आपस में बात कर रहे हैं — तो बेटे, आपस की तेरी बात है, वही असली तेरी है। असल में तेरी असली बात वही है, जिसके द्वारा तेरी इज्जत को लोग देखेंगे, परखेंगे कि आपस में तुम क्या बात कर रहे हो।
आपस में क्या बात करते हो और तुम्हारे रहने-सहने का ढंग। बेटे, हम तुमको बाराती बनाकर के नहीं भेज रहे हैं। कहाँ? लोगों के पास।
लोगों के पास आप जाएं, बाराती बन के मत जाना। बाराती किसे कहते हैं? बाराती, बेटे, उसे कहते हैं जो फरमाइशें — फरमाइशें — "कोको कोला लाइए", "6 बज गए, चाय लाइए", "यह कीजिए", "और हमको माला नहीं पहनाई", "और हमको यह नहीं दिया"।
फरमाइशें ही फरमाइशें करते जाते हैं। आपको हम वॉलंटियर बनाकर भेज रहे हैं। इसीलिए भेज रहे हैं कि जहाँ कहीं भी आप जाएं, उन लोगों को जानकारियाँ नहीं हैं।
आप कंधे से कंधा मिलाकर काम करना और एक वॉलंटियर की तरीके से उनको बताना — "आपको काम करना नहीं आता है? देखिए हमको आता है, हम काम करेंगे यहाँ।"
हमको तो स्टेज पर व्याख्यान तो शाम को ही देना है, दो घंटे। दो घंटे देना है। बाकी तो 22 घंटे बचते हैं। 22 घंटे हम क्यों बैठे रहेंगे? हम आपके साथ काम करेंगे और एक स्वयंसेवक की तरीके से काम करेंगे। बेटे, ऐसे काम करना।
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड-ज्योति से
अखंड ज्योति के जीवन का प्रधान उद्देश्य ‘धर्म की सेवा’ है। यह धर्म की पूजा के लिये ही प्रकट हुई है और इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए इसे जीवित रहना है। जिसका प्राण ही धर्म में पिरोया हुआ हो, वह अपने ईष्ट पर इस प्रकार की आपत्ति आते देखकर, उसे लाँछित और तिरस्कृत होते देखकर, मार्मिक वेदना का अनुभव करती है “प्रत्येक व्यक्ति धार्मिक बने” यह उपदेश करने के साथ हम धर्म के वर्तमान स्वरूप में शोधन भी करना चाहते हैं।
हम अनुभव करते हैं कि सदियों की पराधीनता गरीबी और अज्ञान ने धर्म के वास्तविक स्वरूप को बहुत ही विकृत, दोषपूर्ण, एवं जर्जरित कर दिया है, अनेक छिद्रों के कारण उसका वर्तमान स्वरूप छलनी की तरह छिरछिरा हो गया है, जिससे राष्ट्र की उच्चतम सद्भावनाओं के साथ डाली हुई पञ्चमाँश शक्ति नीचे गिर पड़ती है और छलनी में दूध दुहने वाले के समान केवल पश्चात्ताप और निराशा ही प्राप्त होती है।
सद्भावना से प्रेरित होकर आत्मोद्धार के लिए जो लोकोपकारी कार्य किये जाते हैं, वे धर्म कहलाते हैं।” धर्म की इस मूलभूत आधार शिला के ऊपर हमें देश काल की स्थिति के अनुसार नवीन कर्मकाँडों की रचना करनी होगी। दूध रखने के लिये छेदों वाले बर्तन को हटाना होगा, जिसमें से कि सारा दूध चू कर मिट्टी में मिल जाता है। ईश्वर की सच्ची उपासना उसकी चलती फिरती प्रतिमाओं से प्रेम करने में है। परमार्थ की वेदी पर अपने निजी तुच्छ स्वार्थों को बलिदान करना धर्म हैं।
धर्म और ईश्वर की सच्चे अर्थों में पूजा करने वाले व्यक्तियों का कार्य-क्रम वर्तमान परिस्थितियों में अपने आस-पास छाये हुए अज्ञान और दारिद्र के घोर अन्धकार को दूर हटाना होगा। अविद्या के कारण हमारी कौम अंधेरे में टकराती फिर रही है, दरिद्रता के कारण हमारा देश पशुओं से भी गया बीता दयनीय जीवन बिता रहा है। जिसके हृदय में धर्म हैं, उसके हृदय में दया करुणा और प्रेम के लिये स्थान अवश्य होगा। जो व्यक्ति धर्म के नाम पर माला तो सारे दिन जपता है, पर बीमार पड़ौसी की सेवा के लिये आधा घंटा की भी फुरसत नहीं पाता, हमें संदेह होगा कि वह कहीं धर्म की विडम्बना तो नहीं कर रहा है।
.... क्रमशः जारी
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड ज्योति सितंबर 1942 पृष्ठ 7
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