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Tuesday 02, September 2025

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स्वाध्याय एवं सत्संग। Swadhyay evam Satsang | Pt Shriram Sharma Acharya

स्वाध्याय एवं सत्संग। Swadhyay evam Satsang | Pt Shriram Sharma Acharya

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दुर्बुद्धि और दुष्प्रवृत्तियों से छूटना ही मुक्ति है  | Durbudhi Aur Duspravrition Se Chutna Hi Mukti Hai

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आस्तिकता, श्रद्धा और विश्वास: जीवन में असाधारण शक्ति का स्रोत

आस्तिकता, श्रद्धा और विश्वास: जीवन में असाधारण शक्ति का स्रोत

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नारियों को आगे बढ़ने दे | Nariyon ko Aage Badhne De

नारियों को आगे बढ़ने दे | Nariyon ko Aage Badhne De

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 हम दिव्य जीवन जिएँ | Hum Divya Jeevan Jiyen | Pt Shriram Sharma Acharya

हम दिव्य जीवन जिएँ | Hum Divya Jeevan Jiyen | Pt Shriram Sharma Acharya

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अमृतवाणी:- गाँव-गाँव में प्रौढ़ शिक्षा का अभियान | Gaav Gaav Mei Prodh Siksha Ka Abhiyan पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य

अमृतवाणी:- गाँव-गाँव में प्रौढ़ शिक्षा का अभियान | Gaav Gaav Mei Prodh Siksha Ka Abhiyan पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य

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गायत्रीतीर्थ शांतिकुंज, नित्य दर्शन

गायत्री माता
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गायत्री माता - अखंड दीपक
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चरण पादुका
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चरण पादुका
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सजल श्रद्धा - प्रखर प्रज्ञा (समाधि स्थल)
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प्रज्ञेश्वर महादेव - देव संस्कृति विश्वविद्यालय
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शिव मंदिर - शांतिकुंज
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हनुमान मंदिर - शांतिकुंज
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आज का सद्चिंतन (बोर्ड)

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आज का सद्वाक्य

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नित्य शांतिकुंज वीडियो दर्शन


!! शांतिकुंज दर्शन 02 September 2025 !! गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार !!

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अमृतवाणी: मेरी इज्जत टिकिया और मूंगफली ने बिगाड़ दी पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य

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परम् पूज्य गुरुदेव का अमृत संदेश



खान-पान के संबंध में कभी आपको मौका आए तो आप प्रशंसा तो करना। किसकी करेंगे प्रशंसा? उसकी भावना की — खिलाने वाले की — खिलाने में उसमें जो उसका प्रेम है, उसकी। लेकिन पदार्थों की मत करना।
पदार्थों की आपने प्रशंसा करना शुरू की — आपकी मिठाई बहुत अच्छी बनी है, पूरी बहुत अच्छी बनी है और जलेबी तो बहुत ही अच्छी बनी है। ऐसा तो अच्छा बना है — तो आपकी इज्जत दो कौड़ी की हो जाएगी। दो कौड़ी की हो जाएगी और आपको जो संयमी व्यक्ति मानना चाहिए, वह नहीं माना जाएगा। आपकी, बेटे, इज्जत खराब हो जाएगी।
मैं तो दो जगह इज्जत खराब करा कर आया हूं और मुझे जिंदगी भर इन बातों का रहेगा दुख। मैंने अपनी दो जगह इज्जत खराब करा ली — लोगों के सामने अपना जीभ का चटोरापन बता दिया।
एक तो मैं बिलासपुर गया था, एक सज्जन के यहां। उन्होंने तिल की एक टिकिया सी बना रखी थी — तिल की थी और उड़द की दाल थी। उसको उन्होंने तेल में या घी में तलकर के रख दिया खाने में। और न जाने क्या मेरा दिमाग खराब हो गया — वो जो उनकी टिकियां थीं, वो दो खा ली।
और फिर जब दोनों खा लीं तो उन्होंने फिर टिकियां परोसने की कोशिश की — तो फिर मैंने कहा, अच्छा दो और दे दो। और दो खा लीं। "अरे गुरु जी को टिकिया बहुत पसंद है, टिकिया बहुत पसंद है!"
जब वहां से जिनका यहां मैं नाम नहीं लेना चाहता — जब कोई बिलासपुर से आता है तो एक उसके डिब्बे जो आते हैं, टीन के, उसमें से वो तिल की टिकियां ज़रूर भेजते हैं।
मुझे ये समझते हैं कि ये आदमी तिल की टिकियों के लिए बड़ा चटोरा है और बड़ा लालायित रहता है। बेटे, मेरी इंद्रिय से मैंने इज्जत गंवा दी।
और एक और मैंने गंवा दी इज्जत। मैं गुजरात के दौरे पर गया हुआ था। मोटरों में एक दिन लंबा सफर कर रहा था। मुझे असल में चक्कर आने लगे — तो वहां मोटर के अड्डे पर, सड़क पर ये-ये चिल्ला रहे थे — नमक की मूंगफली होती है, खारी सिंग, खारी सिंग।
ये क्या चीज बेचता है? ये मूंगफली है नमक की। तो मैंने कहा, ला मैं ले लूं — इससे ये होता रहेगा, मेरा मुंह जो ऐसा पानी आता है तो ठीक है, बना रहेगा।
तो मैंने इसको 10 पैसे की बेच रहा था — पुड़िया लंबी-लंबी — उससे ले ली। एक वहां से खाली, उसमें से मुंह में डालता रहा। और जो मेरे साथ चार-पांच आदमी बैठे थे, वो उसी प्रांत के थे — गुजरात के थे।
फिर अगली दूर कहीं खड़ा हुआ, कई मील पर जाकर के। फिर मैंने 10 पैसे दिए और फिर एक को ले ली — वही मूंगफली। मूंगफली ले ली। उसमें से फिर एक-एक मूंगफली खाता रहा।
खाता रहा — तो कोई 30-40 मील का सफर किया होगा और मैंने दो-दो मूंगफली के पैकेट खा लिए। दो मूंगफली के पैकेट खा लिए।
बस बेटे, मेरे सारे गुजरात में मेरी ऐसी बेइज्जती और ऐसी बदनामी हुई — जो कोई गुजरात से आता है, खारी सिंग लेकर के आता है। खारी सिंग लेकर के आता है।
पैकेट में लेकर के — खारी सिंग — जो कोई भी लेकर आएगा ना — कोई केला लाएगा, ना नारंगी लाएगा, ना पूरी लाएगा, ना कचौड़ी लाएगा — खारी सिंग, खारी सिंग।
और हमारी लड़कियां जो हैं — बस कोई आ गया, कोई आ गया, गुजराती आ गया — "आज क्यों ये खारी सिंग बंट रही हैं? खारी सिंग बंट रही है। खारी सिंग — बस गुरु जी को खारी सिंग, खारी सिंग अच्छी लगती है।"
बेटे, मेरी इज्जत खराब हो गई। मैंने जो ये बताया था कि मैंने 24 साल जौ की रोटी खाकर के और छाछ पीकर के रहा था, मेरा जायका कहीं नहीं है।
लोगों ने ये समझा कि — ये तो जीभ का कितना चटोरा आदमी है। और मेरी इज्जत गुजरात में तो खारी सिंग ने खराब कर दी, और मध्य प्रदेश में उस तिल की टिकिया ने खराब कर दी।
आप जीभ पर काबू रखना। आप हमारे प्रतिनिधि होकर के जा रहे हैं। 

 

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अखण्ड-ज्योति से



 शरीर और उसकी गतिविधियों के संबंध में सामान्य रूप से हमारी स्थिति ऐसी रहती है, जैसी बच्चों के प्यारे मामाजी की। जिन्होंने अपनी ऐनक आँखों पर चढ़ा रखी है और सारे घर में ऐनक को ढूँढ़ने के लिए उलट-पुलट कर रहे हैं। भन्नाये हुए मामाजी जब बच्चों से ऐनक का पता पूछते हैं, तो बच्चे भी उनकी इस अनभिज्ञता का खूब आनंद लेकर खिलखिलाते हैं। आँखों पर चश्मा चढ़ा है और दुनिया में ढूँढ़ा जा रहा है।
  
अध्यात्मवेत्ताओं ने लगभग यही स्थिति सामान्य लोगों के संबंध में पायी है। ज्ञान और विभूतियों का अथाह सागर मानवीय काया में भरा हुआ है और मनुष्य दर-दर की ठोकरें खा रहा है। पदार्थों में सुख, शांति, संतोष खोजता फिरता अभावग्रस्त जीवन जी रहा है।
  
शरीर गतिशील रहता है, बुद्धि निर्णय लेकर उसकी दिशा निर्धारित करती है, किन्तु वास्तविकता तो यह है कि यह निर्णय मानवीय अंतराल की गहराइयों में छिपी भावनाओं के अनुरूप होते हैं। शराबी की बुद्धि नशा किये जाने के विरुद्ध लाख तर्क प्रस्तुत करे या अन्यों के तर्कों से प्रभावित हो, किन्तु अंतः में समायी कुसंस्कार जनित भावना उसके कदम मदिरालय तक खींच ले जाती है। यदि कहा जाये कि व्यक्ति की जीवन धारा भावनाओं पर ही आधारित है, तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। जिन मूलभूत भावनाओं पर जीवन सत्ता का आधिपत्य है, वे हैं-

 पहली शारीरिक प्रवृत्ति सहकारिता- शरीर का प्रत्येक कोश अपने आप में पूर्ण है। यदि उपयुक्त सेल कल्चर में रखा जाये, तो प्रत्येक कोश अमीबा की तरह अपना स्वाभाविक जीवन व्यतीत कर सकता है। फिर भी सभी कोश सहकारिता का परिचय देते हुए अपने आपको विभिन्न ऊतकों, अवयवों एवं संस्थानों में गठित कर लेते हैं।
  
दूसरी प्रवृत्ति संघर्ष की है। जीवकोशों में रसायन, हारमोन्स, विटामिन आदि का सुनिश्चित परिणाम है। यदि विजातीय तत्त्व इस संतुलन को बिगाड़ते हैं,तो सेल मेम्ब्रेन में पाये जाने वाले एन्जाइम निरंतर उन तत्त्वों से जूझते रहते हैं। जीवन साधना का एक बड़ा  साधन संघर्ष है, जिसके द्वारा अपनी इंद्रियों एवं भावनाओं को नियंत्रित किया जाता है।
  
सामंजस्य  की सुंदर प्रवृत्ति शारीरिक गतिविधियों में देखी जाती है। रक्त किसी कारण से शरीर से बीस  प्रतिशत तक निकल भी जाये, तो रक्त आयतन यथावत् बना रहता है। लगभग दस घण्टे के भीतर उसकी पूर्ति मज्जा कोशों द्वारा कर दी जाती है। एक गुर्दा या एक फेफड़ा किसी कारणवश निकाल भी दिया जाये, तो दूसरा दोनों की पूरी व्यवस्था सँभाल लेता है। दुर्गंध पाते ही श्वास नलियाँ सिकुड़ जाती हैं व खाँसी आने लगती है।             

अंग-अवयवों की सतत सक्रियता उसकी पराक्रम भावना पर आधारित है। पराक्रम का घटना रोग है तथा रुकना मृत्यु, चाहे वह कोशिका संबंधी हो, अंग अवयव या जीवन संबंधी। निरंतर सक्रियता बनाये रखे बिना निर्बाध जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती। भौतिक जीवन में आलस्य, प्रमाद व मानसिक थकान अनुभव करना एक तरह से पराक्रम भावना का घटना है। शरीर की प्रत्यावर्तन  की भावना शरीर को नित नूतनता प्रदान करती है। अस्थियों में जमे कैल्शियम का तो क्त्त् प्रतिशत भाग हर साल नया हो जाता है। रक्तकण एवं शरीर के प्रत्येक कोश की आयु अल्प होती है। नये कोशों का निर्माण एवं पुराने कोशों के अवसान का क्रम चलता रहता है। अस्सी दिनों में शरीर की प्रायः सारी चमड़ी नई हो जाती है।
  
नियमित अनुशासन  बने रहना जीवन के लिए अत्यंत आवश्यक है। हृदय को ही लें, उसकी सामान्य धड़कन गति 60 से 100 बार प्रति मिनट है। यदि यह ताल रहित  हो जाये, तो व्यक्ति कार्डियक फेल्योर की स्थिति में पहुँच जाता है। स्रष्टा की सर्वोच्च कृति मानव शरीर है। उसकी गतिविधियाँ निर्वाह करने में समर्थ है। इनको पोषण देकर परिवार, समाज एवं विश्व व्यवस्था तक फैलाया जा सके, तो स्वस्थ शरीर, स्वच्छ मन और सभ्य समाज की सरंचना असंभव नहीं।

 श्रीराम शर्मा आचार्य

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