Monday 01, September 2025
जीवन का अर्थ | Jeevan Ka Artha | ऋषि चिंतन के सानिध्य में
"आत्मनिरीक्षण: दोषों के विनाश और आत्म-विकास की पहली सीढ़ी" | पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य
सफलता : असफलता अंत नहीं — नई दिशा की शुरुआत है | Motivational Story
अमृतवाणी:- ब्रह्मचर्य का सच्चा अर्थ क्या है ? - भाग 4
अमृतवाणी:- लोगों के विचार बदलने का अभियान | Logo Ke Vichar Badalne Ka Abhiyan पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य
हम दिव्य जीवन जिएँ | Hum Divya Jeevan Jiyen | Pt Shriram Sharma Acharya
गायत्रीतीर्थ शांतिकुंज, नित्य दर्शन
आज का सद्चिंतन (बोर्ड)
आज का सद्वाक्य
नित्य शांतिकुंज वीडियो दर्शन
!! शांतिकुंज दर्शन 01 September 2025 !! गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार !!
अमृतवाणी: गुरुदेव का कार्यकर्ताओं को संदेश पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य
परम् पूज्य गुरुदेव का अमृत संदेश
एक काम यह है — अब आप यहां से जाएंगे। जाएंगे, लोगों के सामने इस रूप में जाएंगे कि हम कोई आपको शिक्षण करने आए हैं। शिक्षण से क्या होगा? हर आदमी आपको ज्यादा बारीकी से देखेगा, बहुत पैनी नजर से देखेगा। आपकी शक्ल को भी देखेगा, चेहरे को भी देखेगा। माला तो पहनाएगा, पर आपको देखेगा जरूर बारीकी से।
स्टेज पर हम बैठे हुए हैं। आप यहां 500 आदमी बैठे हुए हैं। हर एक की नजर हमारे ऊपर है। हमारी तरफ देख रहे हैं। इसका क्या मतलब है? हमारा इंटरव्यू ले रहे हैं। 500 आदमी! गुरुजी को कैसा बोलना आता है? उनकी कैसी नाक है? कैसे इनके बाल हैं? हर आदमी की आंख हमारे ऊपर लगी हुई है। बेटे, आप जनता के सामने इंटरव्यू देने जा रहे हैं। इंटरव्यू देने जा रहे हैं जैसे कि कंपटीशन में इंटरव्यू होता है।
हर आदमी आपको देखेगा। क्या चीज देखेगा? आपकी आवाज। आवाज भी देखेगा। लेकिन हर चीज, आपकी हर चीज देखेगा। आपको नंगा करके देखेगा। कैसे नंगा करके? जैसे मिलिट्री में भर्ती किए जाते हैं। पहले तो यह देखते हैं — ऊंचाई, लंबाई। फिर क्या करते हैं? फिर वहां ले जाते हैं, कमरे में ले जाते हैं। क्यों साहब, यहां काहे के लिए ले आए? अब आपको नंगा करेंगे।
तो नंगा से क्या मतलब है आपका? आपको हम यह देखेंगे कि आपके सब चीजें — शरीर के वो हिस्से जो आपको नहीं दिखाए पड़ते — उसको भी हम देखेंगे। मिलिट्री में तब भर्ती करेंगे। जनता आपको नंगा करके देखेगी। जनता आपको नंगा करके देखेगी। जनता में अगर आप नंगा होने के लिए तैयार नहीं हैं, तो आप विश्वास रखिए, आपकी इज्जत नहीं हो सकती और आपके अंदर प्रभाव उत्पन्न नहीं हो सकता।
हमको प्रभाव उत्पन्न करने के लिए नंगा होने के लिए तैयार होना चाहिए। बेटे, क्या करना पड़ेगा? कई चीजें ऐसी हैं जो आपके ईमान से ताल्लुक रखती हैं। वो तो शायद उनकी समझ में ना आएं — जो कि मैं समझा चुका हूं, कि आपको अपना दृष्टिकोण कैसे बनाना चाहिए।
लेकिन आपको मालूम है — रिटर्न टेस्ट के अलावा वायवा भी होता है। इंटरव्यू में बातचीत से भी पूछा जाता है और मौखिक बात भी होती है। वो भी करना पड़ता है ना। इसमें आपकी बाहर की बातों को भी लोग देखभाल करेंगे। और इससे आपका तौल, आपका वजन और आपकी इज्जत के बारे में पता लगाएंगे।
क्या-क्या चीजें हैं, गुरुजी? बेटे, एक तो बात यह है — सबसे पहले तेरा व्यक्तित्व देखेंगे। क्या-क्या व्यक्तित्व देखेंगे? सब बात में तेरा इम्तिहान लेंगे और हर बात में से तेरे काट लेंगे नंबर।
काहे-काहे में देखेंगे? नंबर काट लेंगे तेरे — इज्जत और भजन के लिए। जब तुझे खाना खिलाएंगे लोग — वानप्रस्थियों को — आप कहां से आए हैं? शांतिकुंज के वानप्रस्थ आए हैं! शांतिकुंज के वानप्रस्थ आए हैं। घर में जो रोटी खाता होगा, उसकी अपेक्षा तुझे अच्छी रोटी खिलाएगा। अपने घर में मक्के की खाता होगा, तुझे गेहूं की खिलाएगा। गेहूं की खाता होगा तो तुझे पराठा खिलाएगा।
तो महाराज जी, पराठा तो मैं खाऊं कि ना खाऊं? खाना तो सही बेटे, पर क्या करेगा — तेरी इज्जत और तेरा इंटरव्यू उसके ऊपर टिका हुआ है। लिखा हुआ है — मैंने तुझे यहां सिखाया था कि जिव्हा का हमको संयमी होना चाहिए और जिव्हा पर कंट्रोल करना चाहिए।
वो आदमी जिसने मिठाई लाकर परोस दी है — वो यह देखेगा। यह देखेगा कि इसका तरीका क्या है? इसकी नियत क्या है? इसका ढंग क्या है? ढंग क्या है आपका? आपका इम्तिहान लेगा।
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड-ज्योति से
स्वाध्याय से मनुष्य का अन्तःकरण निर्मल कर देने और उसके अंतर्पट खोलने की सहज क्षमता विद्यमान् है। आन्तरिक उद्घाटन हो जाने से मनुष्य स्वयं ही आत्मा अथवा परमात्मा के प्रति जिज्ञासु हो उठता है। उसकी चेतना ऊर्ध्वमुखी होकर उसी ओर को उड़ने के लिए पर तोलने लगती है। उच्च आध्यात्मिक अनुभूतियों का प्रस्फुटन स्वाध्याय के द्वारा ही हुआ करता है। स्वाध्याय निःसन्देह एक ऐसा अमृत है, जो मानस में प्रवेश कर मनुष्य की पाशविक प्रवृत्तियों को नष्ट कर देता है।
चारित्रिक उज्ज्वलता स्वाध्याय का एक साधारण और मनोवैज्ञानिक फल है। सद्ग्रन्थों में सन्निहित साधु वाणियों का निरन्तर अध्ययन एवं मनन करते रहने से मन पर शिव संस्कारों की स्थापना होती हैं, जिससे चित्त अपने आप दुष्कृत्यों की ओर से फिर जाता है। स्वाध्यायी व्यक्ति पर कुसंग का भी प्रभाव नहीं पड़ने पाता, इसका भी एक वैज्ञानिक कारण है। जिसकी स्वाध्याय में रुचि है ओर जो उसको जीवन का एक ध्येय मानता है, वह आवश्यकताओं से निवृत्त होकर अपना सारा समय स्वाध्याय में तो लगाता है। इसलिये उसके पास कोई फालतू समय ही नहीं रहता, जिसमें वह जाकर इधर-उधर यायावरी करेगा और दूषित वातावरण से अवांछनीय तत्त्व ग्रहण कर लायेगा।
उसी प्रकार रुचि-साम्य-संपर्क के सिद्धान्त के अनुसार भी यदि उसके पास कोई आयेगा तो प्रायः उसी रुचि का होगा और उन दोनों को एक सामयिक सत्संग का लाभ होगा। रुचि वैषम्य रखने वाला स्वाध्यायशील के पास जाने का कोई प्रयोजन अथवा साहस ही न रखेगा और यदि संयोगवश ऐसे कोई व्यक्ति आ भी जाते हैं तो उसके पास का वातावरण अपने अनुकूल न पाकर, देर तक ठहर ही न पायेंगे। निदान संगत-असभ्य आचरण दोषों का स्वाध्यायशील के पास कोई प्रश्न ही नहीं उठता।
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड ज्योति, मार्च १९६९ पृष्ठ २४
| Newer Post | Home | Older Post |
