Sunday 31, August 2025
ईश्वरीय अपनत्व की कसौटी | Ishwariy Apnatv Ki Kasauti | जीवन पथ के प्रदीप | श्रद्धेय डॉ प्रणव पण्ड्या
आत्मदेव की उपासना | Aatmadev Ki Upasna | ऋषि चिंतन के सानिध्य में
पूरा कबीला गायत्री मंत्र बोलता हैं | Pura Kabeela Gayatri Mantra Bolta Hai | Dr. Chinmay Pandaya
आस्तिकता, श्रद्धा और विश्वास: जीवन में असाधारण शक्ति का स्रोत
गायत्री द्वारा त्रिविध दुःखों का निवारण भाग - 2 | Gayatri Dwara Trividh Dukho Ka Nivaran Part 02
व्यसनों के पिशाच से बचें भाग - 01 | Vyasanao Ke Pisach Se Kaise Bache Part 01
अमृतवाणी:- राजनीति से नहीं, अध्यात्म से परिवर्तन | Rajniti Se Nhi Adhyatam Se Parivratan पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य
ध्यान:- अद्वैत का ध्यान | Advaita Ka Dhyan | Shraddhey Dr. Pranav Pandya, Rishi Chintan
गायत्रीतीर्थ शांतिकुंज, नित्य दर्शन
आज का सद्चिंतन (बोर्ड)
आज का सद्वाक्य
नित्य शांतिकुंज वीडियो दर्शन
!! सप्त ऋषि मंदिर गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार 31 August 2025 !!
!! प्रज्ञेश्वर महादेव मंदिर #Prageshwar_Mahadev 31 August 2025 !!
!! शांतिकुंज दर्शन 31 August 2025 !! गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार !!
!! परम पूज्य गुरुदेव का कक्ष गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार 31 August 2025 !!
!! #गायत्री_माता_मंदिर #Gayatri_Mata_Mandir गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार 31 August 2025 !!
!! महाकाल महादेव मंदिर शांतिकुञ्ज हरिद्वार 31 August 2025 !!
!! अखण्ड दीपक #Akhand_Deepak (1926 से प्रज्ज्वलित) चरण पादुका गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार 31 August 2025 !!
!! देवात्मा हिमालय मंदिर Devatma Himalaya Mandir गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार 31 August 2025 !!
अमृतवाणी: कर्म और साहस का आह्वान पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य
परम् पूज्य गुरुदेव का अमृत संदेश
भले आदमी की जिंदगी, शरीफ की जिंदगी के भीतर जो हमारी कमजोरियां हैं, एक-एक को हम पैरों के तरीके से रौंद के फेंकेंगे। आप चलिए इस मोर्चे पर। और बाहर... हां बेटे, मैं बाहर की भी कहता हूं। बात यह है, मैं बाहर की भी कहता हूं। तेरे घर के भीतर जो दुष्ट परंपराएं चलती हैं, मैं उसके लिए भी तुझे सलाह दूंगा, उसके लिए भी लोहा लेने की कोशिश करना, मोर्चा लेने की कोशिश करना।
डॉक्टर दोनों कामों को लेकर चलता है। डॉक्टर को ऑपरेशन करना पड़ता है, मरहम लगानी पड़ती है। तू डॉक्टर के तरीके से चल। घर वालों को प्यार कर, घर वालों को दुलार कर, घर वालों को सहयोग कर, घर वालों की सेवा कर। लेकिन जहां कहीं भी घर वाले वो काम कर रहे हों जो नहीं करने चाहिए, वैसे तो ये भी रोकने चाहिए।
और ना केवल घर वालों के विरुद्ध, बल्कि सारे समाज के विरुद्ध। सारे समाज में जो अच्छाइयां हैं, उनको समर्थन करना चाहिए और प्रोत्साहन देना चाहिए। लेकिन जहां भी हमको गलतियां दिखाई पड़ती हैं, जहां भी कुरीतियां दिखाई पड़ती हैं, जहां भी अवांछनीयता दिखाई पड़ती हैं, हमको लोहा भी लेना चाहिए।
हमको ब्रह्मक्षत्र नाम की एक कौम थी, किसी जमाने में प्राचीन काल में। फिर तो दो हिस्से हो गए उसके। एक ही कौम थी, जिसमें ब्राह्मण और क्षत्रिय का सम्मिश्रण था। जैसे-जैसे परशुराम, राम। परशुराम राम ब्राह्मण भी थे और क्षत्रिय भी थे। ब्राह्मण धन क्षत्रिय। क्षत्रिय थे कौन? परशुराम जी। और बहुत सारे विश्वामित्र। विश्वामित्र कौन थे? ब्रह्मऋषि और वो राजऋषि। बेटे, ये दोनों का मिला हुआ जोड़ा था प्राचीन काल में।
ब्राह्मणों को ही दोनों काम करने पड़ते थे। ऋषियों को ही दोनों काम करने पड़ते थे। अवांछनीयता को उखाड़ना भी पड़ता था, और धर्म की स्थापना को भी बनाना पड़ता था। और हवन कराना, गायत्री के जप कराना, अनुष्ठान कराना—सब काम कराना। बेटे, अच्छा यह जरूर कराना—अखंड कीर्तन कराना, कथा कहना, सत्यनारायण स्वामी की कथा कहना। जो भी कर सकते हो, करना। लेकिन यह ध्यान रखना कि इस अकेले से काम नहीं चलेगा। अकेले से काम नहीं चलेगा।
लोगों के अंदर वह वृत्ति भी आपको जगानी पड़ेगी, वह शौर्य भी जगाना पड़ेगा, वह साहस भी जगाना पड़ेगा, वह हिम्मत भी जगानी पड़ेगी, और वह रोष और मन भी जगाना पड़ेगा, जिसके बिना इस दुनिया का संतुलन कायम नहीं रह सकता।
मित्रों, आप लोगों को पहला हिस्सा, पहला काम मैंने यह बताया कि आप बंटवारे के लिए तैयार हो और अपनी जिंदगी में बंटवारा करें—यहां से जाते ही और अपने क्रियाकलापों में दोनों तरह की चीजों को आप शामिल करें। ज्ञान वाली चीज को, धर्म की स्थापना वाली चीज को, पूजा-पाठ वाली चीज को। और साथ-साथ में संघर्ष वाली चीज को—जिसमें अपने भीतर से संघर्ष करना, और अपने स्वभाव और कर्म और आदतों को ठीक करना। यह अपने आप को संघर्ष का पहला चरण है।
उसके बाद है हमारे बहिरंग जीवन। बहिरंग जीवन में भी संघर्ष खड़ा करना पड़ेगा। संघर्ष के लिए मैं आपको शुभकामना भेजता हूं और आशीर्वाद भेजता हूं। और मैं चाहता हूं आप लड़ाकों की तरीके से, गुरु गोविंद सिंह की तरीके से, दूसरे-दूसरे समर्थ लोगों की तरीके से समाज में इस तरह का उदाहरण पैदा करें, जिससे यह मालूम पड़ता हो कि उन्होंने नीति और धर्म की स्थापना में भी मदद की, और अनीति और पाप के उन्मूलन में भी उतनी ही बहादुरी से और साहस से काम लिया।
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड-ज्योति से
स्वाध्याय से मनुष्य का अन्तःकरण निर्मल कर देने और उसके अंतर्पट खोलने की सहज क्षमता विद्यमान् है। आन्तरिक उद्घाटन हो जाने से मनुष्य स्वयं ही आत्मा अथवा परमात्मा के प्रति जिज्ञासु हो उठता है। उसकी चेतना ऊर्ध्वमुखी होकर उसी ओर को उड़ने के लिए पर तोलने लगती है। उच्च आध्यात्मिक अनुभूतियों का प्रस्फुटन स्वाध्याय के द्वारा ही हुआ करता है। स्वाध्याय निःसन्देह एक ऐसा अमृत है, जो मानस में प्रवेश कर मनुष्य की पाशविक प्रवृत्तियों को नष्ट कर देता है।
चारित्रिक उज्ज्वलता स्वाध्याय का एक साधारण और मनोवैज्ञानिक फल है। सद्ग्रन्थों में सन्निहित साधु वाणियों का निरन्तर अध्ययन एवं मनन करते रहने से मन पर शिव संस्कारों की स्थापना होती हैं, जिससे चित्त अपने आप दुष्कृत्यों की ओर से फिर जाता है। स्वाध्यायी व्यक्ति पर कुसंग का भी प्रभाव नहीं पड़ने पाता, इसका भी एक वैज्ञानिक कारण है। जिसकी स्वाध्याय में रुचि है ओर जो उसको जीवन का एक ध्येय मानता है, वह आवश्यकताओं से निवृत्त होकर अपना सारा समय स्वाध्याय में तो लगाता है। इसलिये उसके पास कोई फालतू समय ही नहीं रहता, जिसमें वह जाकर इधर-उधर यायावरी करेगा और दूषित वातावरण से अवांछनीय तत्त्व ग्रहण कर लायेगा।
उसी प्रकार रुचि-साम्य-संपर्क के सिद्धान्त के अनुसार भी यदि उसके पास कोई आयेगा तो प्रायः उसी रुचि का होगा और उन दोनों को एक सामयिक सत्संग का लाभ होगा। रुचि वैषम्य रखने वाला स्वाध्यायशील के पास जाने का कोई प्रयोजन अथवा साहस ही न रखेगा और यदि संयोगवश ऐसे कोई व्यक्ति आ भी जाते हैं तो उसके पास का वातावरण अपने अनुकूल न पाकर, देर तक ठहर ही न पायेंगे। निदान संगत-असभ्य आचरण दोषों का स्वाध्यायशील के पास कोई प्रश्न ही नहीं उठता।
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड ज्योति, मार्च १९६९ पृष्ठ २४
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